“मम्मी जी,” स्वाति ने बहुत ही कोमलता से सुमित्रा जी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “मैं देख रही हूँ कि आप पिछले कुछ महीनों से बहुत परेशान हैं। हमने ममता को इसलिए रखा था ताकि आपको आराम मिले, लेकिन आप तो पहले से भी ज़्यादा थकने लगी हैं।”
सुमित्रा जी ने गहरी सांस ली और कहा, “बहू, तुम नहीं समझोगी। मेरा ये घर है, मैंने इसे अपने तरीके से सहेजा है। जब वो लड़की काम बिगाड़ती है, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।”
स्वाति ने मुस्कुराकर कहा, “मैं समझती हूँ मम्मी जी। लेकिन आप खुद सोचिए, क्या उन साफ कोनों और बचे हुए थोड़े से तेल की कीमत आपकी सेहत और घर की शांति से ज़्यादा है? आप और पापा जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी ज़िम्मेदारियां उठाई हैं। अब आपका समय खुद के लिए जीने का है। आप ममता के काम में दस कमियां निकालेंगी, तो वह भी चिढ़ेगी और आपको भी मानसिक तनाव होगा। मान लीजिए कि वह आपके जैसा 100 प्रतिशत काम नहीं कर सकती, लेकिन अगर वह 70 प्रतिशत भी कर रही है, तो बाकी के 30 प्रतिशत को नज़रअंदाज़ कर दीजिए।”
“अरे सुमित्रा जी, आजकल तो आपके पैर ज़मीन पर पड़ते ही नहीं। सुबह-सुबह इतनी जल्दी कहाँ की तैयारी है?” पड़ोस में रहने वाली विमला जी ने सब्ज़ी वाले से मोलभाव करते हुए सुमित्रा जी को टोका।
सुमित्रा जी के हाथ में दूध की दो थैलियां थीं और चेहरे पर हल्की सी थकान। उन्होंने रुककर एक गहरी सांस ली और माथे से पसीना पोंछते हुए कहा, “क्या बताऊँ विमला जी, जब से बेटा और बहू का ट्रांसफर इसी शहर में हुआ है, तब से तो जैसे सांस लेने की फुर्सत ही नहीं मिलती। बहू स्वाति भी तो बैंक में काम करती है, सुबह ही निकल जाती है। अब पीछे से दोनों पोते-पोतियों को स्कूल भेजना, उनका टिफिन बनाना, सब मुझे ही देखना पड़ता है।”
विमला जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “लेकिन आप तो हमेशा कहती थीं कि बेटा-बहू पास आ जाएं तो बुढ़ापा सुधर जाए। अब तो आप शाम को मंदिर भी नहीं आतीं।”
“मंदिर जाने का समय ही कहाँ मिलता है? बच्चों की स्कूल बस के आने का समय हो जाता है, फिर उन्हें खाना खिलाना, सुलाना। अच्छा, मैं चलती हूँ, कहीं बस का समय न निकल जाए,” यह कहकर सुमित्रा जी जल्दी-जल्दी अपने घर की ओर बढ़ गईं।
सुमित्रा जी और उनके पति राघव जी का जीवन पिछले कई सालों से बेहद शांत और अनुशासित चल रहा था। उनका इकलौता बेटा समीर, अपनी पत्नी स्वाति और दो बच्चों—सात साल के आरव और चार साल की काव्या—के साथ पुणे में रहता था। सुमित्रा जी और राघव जी अक्सर अकेलेपन की शिकायत करते थे। वे तरसते थे कि उनके घर में भी बच्चों की हंसी गूंजे। त्यौहारों पर जब आस-पड़ोस के घर भरे-पूरे दिखते, तो राघव जी अक्सर कहते, “अपना तो घर ही काटने को दौड़ता है। न कोई शोर, न कोई रौनक।”
लेकिन जब से समीर ने अपने माता-पिता के अकेलेपन को देखते हुए अपनी कंपनी में गुज़ारिश करके होम-टाउन ट्रांसफर लिया था, तब से घर का नज़ारा बिल्कुल बदल गया था। सुमित्रा जी को जिस आराम की आदत पड़ चुकी थी, वह अचानक छिन गया था। सुबह छह बजे से घर में भागदौड़ शुरू हो जाती। स्वाति को आठ बजे निकलना होता था, इसलिए वह जल्दी-जल्दी नाश्ता बनाती, लेकिन बच्चों को नहलाना, तैयार करना, उनके नखरे उठाना—यह सब सुमित्रा जी के हिस्से आ गया था।
राघव जी, जिन्हें सुबह शांति से अखबार पढ़ने और चाय पीने की आदत थी, अब काव्या के रोने और आरव की किताबों के शोर के बीच अपनी चाय ठंडी कर बैठते थे। हालांकि वे कभी खुलकर कुछ नहीं कहते थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी झुंझलाहट रहने लगी थी। सुमित्रा जी की तो दोपहर की नींद ही उड़ गई थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे इस बदलाव को कैसे स्वीकार करें। मन ही मन वे बेटे-बहू के पास आने से खुश तो थीं, लेकिन शरीर अब इस दोहरी मेहनत के लिए तैयार नहीं था।
स्वाति एक बहुत ही सुलझी हुई और समझदार बहू थी। वह जानती थी कि उसके सास-ससुर अब बूढ़े हो रहे हैं और बच्चों की ज़िम्मेदारी उन पर डालना ठीक नहीं है। वह ऑफिस से आकर भी घर का सारा काम खुद करने की कोशिश करती, सप्ताहांत पर सुमित्रा जी को आराम देती, लेकिन हफ़्ते के पांच दिन बच्चों को संभालना सुमित्रा जी के लिए एक पहाड़ जैसा हो गया था। सुमित्रा जी के व्यवहार में अब चिड़चिड़ापन साफ झलकने लगा था। बात-बात पर उनका गुस्सा बच्चों पर या घर के छोटे-मोटे कामों पर निकलने लगा था।
स्वाति को यह बात गहराई से महसूस होने लगी कि उसकी सास शारीरिक और मानसिक रूप से थक रही हैं। उसने एक दिन रात को समीर से इस बारे में बात की। “समीर, मम्मी जी को बच्चों और घर के काम से बहुत थकान हो रही है। उनकी उम्र अब आराम करने की है। मुझे लगता है हमें घर के काम और बच्चों की देखभाल के लिए एक फुल-टाइम मेड (सहायिका) रख लेनी चाहिए। इससे मम्मी जी को आराम मिलेगा और वे बच्चों के साथ सिर्फ क्वालिटी टाइम बिता पाएंगी।”
समीर को भी स्वाति की बात सही लगी। अगले ही हफ्ते उन्होंने ‘ममता’ नाम की एक बाई को सुबह से शाम तक के लिए काम पर रख लिया। ममता का काम घर की साफ-सफाई, बर्तन, कपड़े और बच्चों के स्कूल से आने के बाद उन्हें संभालना था। स्वाति को लगा कि अब घर का माहौल शांत हो जाएगा और सुमित्रा जी को आराम मिलेगा।
लेकिन, समस्या का समाधान इतनी आसानी से नहीं होने वाला था। सुमित्रा जी को अपने घर के काम में किसी बाहरी व्यक्ति का दखल और उसका काम करने का तरीका बिल्कुल पसंद नहीं था। जिस आराम के लिए ममता को रखा गया था, वह आराम सुमित्रा जी को रास नहीं आ रहा था। उनका पूरा दिन अब ममता के पीछे-पीछे घूमते और कमियां निकालते हुए बीतता।
“अरे ममता, पोछा ऐसे नहीं लगाते, कोनों में तो तुमने सफाई की ही नहीं।”
“ममता, बच्चों के कपड़ों में इतना साबुन क्यों लगा रही हो, कपड़े खराब हो जाएंगे।”
“सब्ज़ी में इतना तेल क्यों डाल दिया? तुम्हें तो काम करने का कोई सलीका ही नहीं है।”
पूरे घर में दिन भर बस सुमित्रा जी की यही आवाज़ें गूंजती रहतीं। ममता बेचारी चुपचाप सुनती, लेकिन कई बार वह भी चिढ़ जाती। घर में शांति आने की बजाय एक नया तनाव पैदा हो गया था। राघव जी, जो पहले बच्चों के शोर से परेशान थे, अब अपनी पत्नी की इस नई ‘ड्यूटी’ से और भी ज़्यादा परेशान रहने लगे।
एक दिन राघव जी ने तंग आकर सुमित्रा जी से कह ही दिया, “अरे भाग्यवान, जब बहू ने उस लड़की को तेरे आराम के लिए रखा है, तो तू क्यों सारा दिन दरोगा बनकर उसके सिर पर सवार रहती है? उसे अपना काम करने दे। तू आराम से बैठकर टीवी देख, या जाकर सो जा। तेरे इस दिन भर के शोर-शराबे से मेरे सिर में दर्द होने लगा है।”
सुमित्रा जी को राघव जी की बात चुभ गई। “मैं कोई शौक से नहीं बोलती। ये नौकरानियां कामचोर होती हैं। अगर मैं सिर पर न खड़ी रहूं तो घर को कूड़ाखाना बना देंगी। बहू का क्या है, वह तो ऑफिस चली जाती है, पीछे से घर तो मुझे ही देखना पड़ता है न।”
घर का माहौल दिन-ब-दिन भारी होता जा रहा था। स्वाति और समीर के बीच भी अब इस बात को लेकर बहस होने लगी थी। समीर ने एक दिन चिढ़कर कह दिया, “स्वाति, मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि मेरा ट्रांसफर मत करवाओ। पुणे में हम अपनी ज़िंदगी जी रहे थे और मम्मी-पापा यहां शांति से थे। तुमने ही कहा था कि उन्हें हमारी ज़रूरत है, बच्चों को दादा-दादी का प्यार मिलना चाहिए। अब देखो, वो भी परेशान हैं और हम भी। मैं ऐसा करता हूँ, फिर से पुणे ट्रांसफर की एप्लीकेशन डाल देता हूँ।”
स्वाति को समीर की बात सुनकर बहुत दुख हुआ। उसने कहा, “समीर, भागना किसी समस्या का हल नहीं है। हम यहाँ इसलिए आए थे ताकि परिवार साथ रह सके। अगर परेशानियां आई हैं, तो हमें उन्हें सुलझाना होगा। मम्मी जी को अपनी पुरानी दिनचर्या और घर के नियंत्रण को छोड़ने में परेशानी हो रही है। मैं आज ही उनसे इस बारे में खुलकर बात करूँगी।”
उसी शाम, जब समीर बच्चों को लेकर पार्क गया हुआ था, स्वाति ने दो कप चाय बनाई और सुमित्रा जी के कमरे में चली गई। सुमित्रा जी अपने घुटनों पर बाम लगा रही थीं।
“मम्मी जी, चाय,” स्वाति ने मुस्कुराते हुए कप उनकी तरफ बढ़ाया और उनके पास पलंग पर बैठ गई।
सुमित्रा जी ने चाय ली, लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी सुबह की ममता के साथ हुई बहस की थकान थी।
“मम्मी जी,” स्वाति ने बहुत ही कोमलता से सुमित्रा जी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “मैं देख रही हूँ कि आप पिछले कुछ महीनों से बहुत परेशान हैं। हमने ममता को इसलिए रखा था ताकि आपको आराम मिले, लेकिन आप तो पहले से भी ज़्यादा थकने लगी हैं।”
सुमित्रा जी ने गहरी सांस ली और कहा, “बहू, तुम नहीं समझोगी। मेरा ये घर है, मैंने इसे अपने तरीके से सहेजा है। जब वो लड़की काम बिगाड़ती है, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।”
स्वाति ने मुस्कुराकर कहा, “मैं समझती हूँ मम्मी जी। लेकिन आप खुद सोचिए, क्या उन साफ कोनों और बचे हुए थोड़े से तेल की कीमत आपकी सेहत और घर की शांति से ज़्यादा है? आप और पापा जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी ज़िम्मेदारियां उठाई हैं। अब आपका समय खुद के लिए जीने का है। आप ममता के काम में दस कमियां निकालेंगी, तो वह भी चिढ़ेगी और आपको भी मानसिक तनाव होगा। मान लीजिए कि वह आपके जैसा 100 प्रतिशत काम नहीं कर सकती, लेकिन अगर वह 70 प्रतिशत भी कर रही है, तो बाकी के 30 प्रतिशत को नज़रअंदाज़ कर दीजिए।”
सुमित्रा जी चुपचाप स्वाति को देख रही थीं।
स्वाति ने आगे कहा, “हम यहाँ इसलिए आए थे ताकि हम आपके अकेलेपन को दूर कर सकें, न कि आप पर बोझ बन सकें। समीर बहुत परेशान हैं। वो वापस पुणे जाने की सोच रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके यहाँ आने से आपकी शांति छिन गई है।”
“पुणे वापस?” सुमित्रा जी एकदम से चौंक गईं। “नहीं-नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है? इतने सालों बाद तो घर में रौनक आई है।”
“तो फिर आपको भी थोड़ा बदलना होगा मम्मी जी,” स्वाति ने प्यार से समझाते हुए कहा। “ममता को उसका काम करने दीजिए। आप बच्चों के साथ खेलिए, पापा जी के साथ शाम को टहलने जाइए, अपनी सहेलियों से मिलिए। घर अगर थोड़ा अव्यवस्थित भी हो जाएगा, तो मैं ऑफिस से आकर संभाल लूँगी। बस आप अपनी सेहत और इस घर की खुशी को उन छोटी-छोटी बातों पर कुर्बान मत होने दीजिए।”
उस दिन स्वाति की बातों ने सुमित्रा जी के मन पर एक गहरा असर किया। उन्हें एहसास हुआ कि वे वास्तव में एक अवांछित नियंत्रण के मोह में अपनी और अपने परिवार की खुशियां खराब कर रही थीं। उन्होंने मन ही मन तय किया कि अब वे घर के छोटे-मोटे कामों में दखल नहीं देंगी।
अगली सुबह जब ममता काम पर आई, तो उसने देखा कि सुमित्रा जी सोफे पर आराम से बैठकर चाय पीते हुए अखबार पढ़ रही हैं। ममता ने डरते-डरते झाड़ू उठाई, लेकिन सुमित्रा जी ने उसे कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मुस्कुराकर कहा, “ममता, काम खत्म करके बच्चों के लिए सेब काट देना, मैं मंदिर होकर आती हूँ।”
राघव जी ने भी हैरानी और खुशी से सुमित्रा जी की ओर देखा। उस दिन के बाद से घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा। सुमित्रा जी ने घर की ज़िम्मेदारी ममता पर छोड़ दी और अपना समय बच्चों को कहानियां सुनाने, मंदिर जाने और अपने लिए जीने में लगाने लगीं। घर में फिर से वही पुरानी हंसी और सुकून लौट आया था। कभी-कभी चीज़ों को उनके हाल पर छोड़ देना ही सबसे बड़ा सुख होता है, यह बात अब सुमित्रा जी अच्छी तरह समझ चुकी थीं।
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#रिश्तों की धूप-छाँव
लेखिका : आर्या विनोद