मीरा के हाथों में मायके से आया वह लिफाफा किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। खिड़की से छनकर आती दोपहर की उदास हवा उस पन्ने को फड़फड़ा रही थी, मानो वह कागज भी मीरा के सीने में उठते तूफान की गवाही दे रहा हो।
उसकी आँखों से गिरती गर्म बूंदों ने खत की स्याही को कई जगह से धुंधला कर दिया था। खत उसकी भाभी गरिमा का था। शब्द बहुत नपे-तुले थे, लेकिन उन शब्दों के पीछे छिपी खीझ और उपेक्षा को मीरा बहुत अच्छी तरह महसूस कर रही थी।
“तुम्हारे लाडले कबीर को तो जैसे चैन ही नहीं है,” गरिमा भाभी ने लिखा था। “कल शाम को मोहल्ले के लड़कों के साथ साइकिल दौड़ा रहा था। न जाने कहाँ ध्यान था, सामने से आती बाइक से टकरा गया। शुक्र मनाओ कि जान बच गई, लेकिन दाहिने हाथ की हड्डी दो जगह से टूट गई है और माथे पर भी गहरे घाव आए हैं।
डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ा दिया है और पंद्रह दिन के पूरे आराम को कहा है। हम तो अपनी तरफ से इसका पूरा इलाज करवा ही रहे हैं, लेकिन तुम भी जानती हो कि आजकल महंगाई कितनी है और ऊपर से इसके रोज-रोज के नए झमेले। खैर, तुम चिंता मत करना, ठीक हो जाएगा।”
खत के आखिरी शब्द ‘चिंता मत करना’ मीरा के दिल में किसी बर्छी की तरह चुभ रहे थे। वह सोच रही थी कि दस साल का एक मासूम बच्चा, जो अपनी माँ के बिना हर रात रो-रोकर सोता हो, वो इस भयंकर दर्द को कैसे सह रहा होगा?
क्या गरिमा भाभी उसे समय पर दवा दे रही होंगी? क्या रात को दर्द से कराहते वक्त किसी ने उसके सिर पर हाथ फेरा होगा? मीरा का मन अपने ही अस्तित्व को धिक्कार रहा था। कैसी माँ है वह, जो अपने ही बच्चे की पीड़ा में उसके पास नहीं है?
मीरा की यह दूसरी शादी थी। उसके वर्तमान पति, नवीन, एक बहुत बड़े व्यापारी थे और समाज में उनका बहुत रुतबा था। लेकिन इस रुतबे और आलीशान महल जैसी जिंदगी की एक बहुत भारी कीमत मीरा ने चुकाई थी—अपना पहला बेटा, कबीर। मीरा के पहले पति, कुणाल, एक बहुत ही सुलझे हुए और प्यार करने वाले इंसान थे।
कुणाल के लिए कबीर उसकी जान था। दफ्तर से लौटते ही कुणाल का पहला काम अपने जूते उतारकर कबीर को गोद में उठाना होता था। बाप-बेटे की उस दुनिया में मीरा भी कई बार खुद को बाहरी महसूस करती थी।
कुणाल हमेशा कबीर के लिए नए-नए खिलौने, किताबें और ढेर सारी चॉकलेट्स लाते थे। वे अक्सर कहते थे, “मेरा बेटा एक दिन बहुत बड़ा अफसर बनेगा, देखना मीरा, यह हमारा नाम रौशन करेगा।”
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक मनहूस रात, एक भयानक सड़क हादसे ने कुणाल को हमेशा के लिए मीरा और कबीर से छीन लिया। मीरा की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई।
चौबीस साल की उम्र, गोद में चार साल का बच्चा और सिर पर कोई छत नहीं। कुणाल के परिवार वालों ने पहले ही उन्हें संपत्ति से बेदखल कर दिया था। हारकर मीरा को अपने मायके, अपने भाई सुमित के घर आकर शरण लेनी पड़ी।
शुरुआत के कुछ महीने तो ठीक गुजरे, लेकिन फिर गरिमा भाभी के ताने शुरू हो गए। “हम कब तक इस विधवा ननद और उसके बेटे का बोझ उठाएंगे?” ये शब्द मीरा को रोज तीरों की तरह चुभते थे। उसका भाई सुमित अपनी पत्नी के सामने हमेशा मूक दर्शक बना रहता। फिर एक दिन, नवीन का रिश्ता आया।
नवीन की पहली पत्नी का कैंसर से देहांत हो चुका था और उन्हें अपने घर को सँभालने के लिए एक सुशील पत्नी की तलाश थी। सुमित और गरिमा ने बिना सोचे-समझे हाँ कर दी। लेकिन नवीन की एक शर्त थी—वह मीरा को तो अपनाएंगे, लेकिन किसी और के खून यानी कबीर को अपने घर में नहीं घुसने देंगे।
मीरा ने बहुत मिन्नतें कीं, सुमित के पैरों में गिरकर रोई, लेकिन मायके वालों ने उसे मजबूर कर दिया। “अगर तूने यह रिश्ता ठुकराया, तो हम तुझे और तेरे बेटे को धक्के मारकर घर से निकाल देंगे।
फिर जाना दर-दर की ठोकरें खाने,” सुमित ने साफ कह दिया था। एक बेबस औरत, जिसके पास न कोई शिक्षा थी न कोई नौकरी, उसे अपनी और अपने बच्चे की रोटी के लिए घुटने टेकने पड़े। कबीर को मामा-मामी के रहमो-करम पर छोड़कर, मीरा को एक नई डोली में बैठना पड़ा।
“मम्मा… आप रो रही हो?”
एक मीठी सी, चुलबुली आवाज़ ने मीरा को अतीत के उस दर्दनाक भँवर से बाहर खींच लिया। यह आरव था, नवीन और मीरा का सात साल का बेटा। आरव स्कूल से लौट आया था और अपनी स्कूल यूनिफॉर्म में ही दौड़कर मीरा के गले लग गया था।
मीरा ने हड़बड़ाकर अपने आँसू पोंछे, खत को साड़ी के पल्लू के नीचे छिपाया और चेहरे पर एक झूठी, लेकिन बेहद सधी हुई मुस्कान लाते हुए बोली, “अरे नहीं मेरा बच्चा, वो खिड़की खुली थी ना, तो आँखों में थोड़ी धूल चली गई थी। तू बता, आज स्कूल में क्या-क्या किया?”
“मम्मा, मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है। आज टिफिन में जो आपने सैंडविच दिया था, वो मेरे दोस्त ने खा लिया था। जल्दी से कुछ अच्छा सा दे दो ना,” आरव ने अपना भारी स्कूल बैग सोफे पर पटकते हुए मासूमियत से कहा।
“अभी लाई मेरे राजा बेटा,” मीरा ने आरव का माथा चूमा और भागकर रसोई की तरफ चली गई।
रसोई में जाते ही मीरा ने गैस जलाई और आरव के लिए गर्मागर्म पराठे और उसकी मनपसंद पनीर की सब्जी निकालने लगी। लेकिन उसका मन आज रसोई में नहीं था। जैसे ही उसने पहला पराठा सेंकना शुरू किया, उसकी आँखों के सामने कबीर का वो चेहरा आ गया, जब वह आखिरी बार मायके गई थी। कबीर के कपड़े मैले थे, बाल बिखरे हुए थे और वह एक कोने में सहमा हुआ बैठा था। जब मीरा ने उसे गले लगाना चाहा, तो वह पीछे हट गया था, मानो कह रहा हो कि ‘अब तुम मेरी माँ नहीं हो।’ गरिमा भाभी ने तब भी यही कहा था, “अरे यह तो पूरे दिन मिट्टी में खेलता रहता है, एकदम जंगली हो गया है।”
मीरा ने आरव के लिए प्लेट सजाई और डाइनिंग टेबल पर लाकर रख दी। आरव ने खुशी-खुशी खाना शुरू कर दिया।
“मम्मा, आप भी खाओ ना! आप सुबह से कुछ नहीं खाती हो, पापा भी कल कह रहे थे कि मम्मा आजकल बहुत कमज़ोर हो गई हैं,” आरव ने पराठे का एक टुकड़ा तोड़कर अपनी छोटी-सी उँगलियों से मीरा के मुँह की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
आरव की इस बात में कितना प्यार था, लेकिन आज मीरा का गला रुंधा हुआ था। वह निवाला उसके गले से नीचे उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। जो माँ अपने ही बड़े बेटे की टूटी हुई हड्डी और उसके भूखे पेट की कल्पना कर रही हो, वह इन स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद कैसे ले सकती थी?
“तू खा ले बेटा, मम्मा को अभी भूख नहीं है। मम्मा ने सुबह नाश्ता कर लिया था भारी सा,” मीरा ने झूठ बोलते हुए आरव का सिर सहलाया।
आरव कुछ पल उसे गौर से देखता रहा। बच्चों की आँखें कई बार बड़ों के छिपे हुए दर्द को बहुत जल्दी पढ़ लेती हैं। वह खाना चबाते हुए अचानक रुक गया और बोला, “मम्मा, सच-सच बताओ, आज मामू के घर से कोई चिट्ठी आई है ना? आप जब भी वो चिट्ठी पढ़ती हो, आप हमेशा रोती हो और फिर खाना भी नहीं खाती।”
आरव के इस सीधे सवाल ने मीरा को अंदर तक हिला दिया। वह नहीं चाहती थी कि नवीन या आरव को उसके इस आंतरिक द्वंद्व की भनक भी लगे। नवीन एक अच्छे पति थे, उन्होंने मीरा को दुनिया की हर सुख-सुविधा दी थी, लेकिन कबीर के नाम पर वे आज भी उतने ही सख्त थे। उनके घर में कबीर का नाम लेना भी एक अघोषित अपराध था।
“अरे नहीं पागल! किसी की चिट्ठी नहीं आई। ले, मैं भी खाती हूँ तेरे साथ,” मीरा ने बात को टालने के लिए जबरदस्ती एक निवाला अपने मुँह में रख लिया। वह चबा कम रही थी, निगल ज़्यादा रही थी, ताकि आरव को यकीन हो जाए कि सब सामान्य है।
आरव संतुष्ट होकर वापस अपने खाने में मशगूल हो गया। खाना खत्म करने के बाद, वह हमेशा की तरह दौड़कर अपने कमरे में गया और एसी चलाकर अपने मुलायम बिस्तर पर लेट गया। मीरा उसके पीछे-पीछे कमरे में आई। उसने आरव के जूते उतारे, उसे आरामदायक कपड़े पहनाए और उसके सिरहाने बैठकर धीरे-धीरे उसके बालों में उँगलियाँ फेरने लगी। कुछ ही मिनटों में आरव गहरी और सुकून भरी नींद में सो गया।
आरव की मासूम, शांत और सुरक्षित नींद को देखकर मीरा की आँखें फिर से भर आईं। वह चुपचाप उठी और अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर औंधे मुँह गिर पड़ी। अब उसे रोकने वाला कोई नहीं था। तकिए में मुँह छिपाकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।
उसका मन बार-बार उस अस्पताल या उस कमरे की तरफ भाग रहा था जहाँ कबीर लेटा होगा। जब कबीर साइकिल से गिरा होगा, जब खून निकला होगा, जब डॉक्टर ने उस मासूम के हाथ को खींचकर प्लास्टर चढ़ाया होगा, तो क्या उसने दर्द से चीखते हुए ‘माँ’ को नहीं पुकारा होगा? वो माँ, जो चंद कोसों की दूरी पर एक बड़े से महल में अपने दूसरे बेटे को मखमली बिस्तर पर सुला रही है।
मीरा को याद आया कि कुणाल के जीवित रहते हुए अगर कबीर को हल्की सी खरोंच भी आ जाती थी, तो कुणाल पूरा घर सिर पर उठा लेते थे। “मीरा, तुमने ध्यान क्यों नहीं रखा? मेरे बच्चे को चोट कैसे लग गई!” वे पागलों की तरह फर्स्ट-एड बॉक्स ढूँढते, कबीर को अपनी छाती से चिपका लेते और तब तक उसे चूमते रहते जब तक कबीर का रोना बंद न हो जाए। कुणाल का वो लाड़ला, जिसके लिए कभी सितारों को तोड़ लाने की बातें होती थीं, आज लावारिसों की तरह एक कोने में पड़ा अपने टूटे हुए हाथ के साथ सिसक रहा था।
“मुझे माफ कर देना कुणाल… मुझे माफ कर देना मेरे बच्चे…” मीरा बंद कमरे में सिसकियाँ भरते हुए बड़बड़ा रही थी। “मैं एक बहुत बुरी माँ हूँ। मैंने अपनी झूठी दुनिया बसाने के लिए अपने ही अंश को दाँव पर लगा दिया। तुम्हारी आखिरी निशानी की मैं हिफाजत नहीं कर सकी।”
मीरा जानती थी कि वह चाहकर भी आज कबीर से मिलने नहीं जा सकती। नवीन का सख्त आदेश था कि मायके से रिश्ता सिर्फ औपचारिक रहेगा। अगर वह आज कबीर के पास जाती है, तो इस घर में तूफान खड़ा हो जाएगा। लेकिन एक माँ का दिल कब तक इस पिंजरे में कैद रह सकता था? हर गुजरते पल के साथ मीरा के अंदर का अपराधबोध एक ज्वालामुखी बन रहा था। वह बिस्तर पर पड़ी उस छत को घूरती रही, जहाँ उसे कबीर का चेहरा अपनी तरफ देखकर सवाल करता हुआ नजर आ रहा था—”माँ, क्या तुम सच में मेरी नहीं रही?”
क्या आप भी मानते हैं कि समाज के बनाए इन कठोर नियमों के आगे एक माँ की ममता अक्सर हार जाती है? क्या मीरा को अपने वर्तमान परिवार की परवाह किए बिना कबीर के पास चले जाना चाहिए? अपनी राय कमेंट करके जरूर बताएँ।
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