स्वाभिमान की छत

रात के खाने का समय हो चुका था, लेकिन घर में पसरा सन्नाटा किसी तूफान के आने का संकेत दे रहा था। डाइनिंग टेबल पर रखे खाने से उठती भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी। तभी बेडरूम से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। कांच का एक गिलास ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया था।

“तुम्हें मेरी बात समझ नहीं आती क्या? मैंने कहा था कि मेरे घर में मेरे नियम चलेंगे!” समीर की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि बाहर सड़क से गुज़रते लोगों के कदम भी एक पल के लिए ठिठक जाते।

सामने खड़ी निर्मला  अपनी दोनों हथेलियों को आपस में कसकर पकड़े हुए थी। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने उन्हें बहने की इजाज़त नहीं दी थी। वह धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोली, “समीर, अपनी आवाज़ नीची रखिए। बच्चे दूसरे कमरे में हैं, वे डर रहे हैं। आप हर छोटी बात पर इस तरह तमाशा क्यों खड़ा कर देते हैं?”

“तमाशा? मैं तमाशा कर रहा हूँ?” समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था। “मैं दिन-रात गधों की तरह खटकर इस घर की ईएमआई भरता हूँ, तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के खर्चे उठाता हूँ, और तुम मुझे तमीज़ सिखा रही हो? अगर मेरी बातें इतनी ही चुभती हैं, तो निकल जाओ मेरे घर से! अभी के अभी अपना सामान बाँधो और दफा हो जाओ!”

यह पहली बार नहीं था जब समीर ने निर्मला  को घर से बाहर निकालने की धमकी दी थी। पिछले दस सालों की शादीशुदा ज़िंदगी में यह वाक्य निर्मला  के लिए एक भयानक रोज़मर्रा की बात बन चुका था। समीर एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर था और अच्छी खासी तनख्वाह उठाता था। वहीं निर्मला  एक साधारण से प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी,

जहाँ उसे मुश्किल से पंद्रह हज़ार रुपये महीने मिलते थे। समीर की नज़र में निर्मला  की उस नौकरी और उसकी कमाई की कोई औकात नहीं थी। वह अक्सर निर्मला  को यह एहसास दिलाता रहता था कि वह उसके पैसों पर पल रही है।

मध्यमवर्गीय परिवारों में एक घर खरीदने का सपना बहुत बड़ा होता है। समीर और निर्मला  ने भी सात साल पहले यह फ्लैट खरीदा था। लेकिन उस फ्लैट का भारी-भरकम होम लोन समीर के लिए एक ऐसा हथियार बन गया था, जिसे वह हर लड़ाई में निर्मला  के खिलाफ इस्तेमाल करता था। “यह मेरा घर है, क्योंकि इसकी किश्तें मेरी जेब से जाती हैं। तुम तो यहाँ बस एक मेहमान हो,” यह ताना निर्मला  के दिल में किसी खंजर की तरह चुभता था।

निर्मला  की अपनी कोई खास सामाजिक ज़िंदगी नहीं बची थी। समीर के गुस्सैल स्वभाव के कारण अड़ोस-पड़ोस के लोग भी उनसे कतराते थे। रिश्तेदार पीठ पीछे बातें बनाते थे। ऐसे में निर्मला  के पास अपने मायके वालों के अलावा कोई सहारा नहीं था। उसके माता-पिता और एक छोटा भाई हमेशा उसके सुख-दुख में ढाल बनकर खड़े रहते थे, लेकिन निर्मला  अपनी परेशानियों का बोझ उन पर नहीं डालना चाहती थी। वह जानती थी कि उसके पिता एक रिटायर्ड इंसान हैं और भाई अभी अपने करियर की शुरुआत कर रहा है।

दिन बीतते गए, लेकिन समीर के रवैये में कोई सुधार नहीं आया। बात-बात पर निर्मला  को नीचा दिखाना, बच्चों के सामने उसका अपमान करना और हर बहस के अंत में उसे ‘घर से निकल जाने’ की धमकी देना—यह सब समीर की फितरत बन चुका था। बच्चों पर इस रोज़-रोज़ की कलह का बहुत गहरा और नकारात्मक असर पड़ रहा था। बारह साल का आरव और आठ साल की मायरा घर में किसी कोने में दुबक कर बैठे रहते थे। वे अपने पिता की आवाज़ सुनते ही सहम जाते थे। निर्मला  के लिए यह देखना सबसे ज़्यादा पीड़ादायक था कि उसके बच्चे अपने ही घर में किसी कैदी की तरह जी रहे हैं।

एक रविवार की सुबह, नाश्ते की मेज़ पर किसी मामूली सी बात को लेकर फिर से बहस छिड़ गई। बात इतनी बढ़ गई कि समीर ने आपा खो दिया और खाने की प्लेट ज़मीन पर फेंक दी।

“तुम्हारी इस दो कौड़ी की नौकरी के घमंड ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है,” समीर चिल्लाया। “तुम्हें लगता है कि तुम अपने उन पंद्रह हज़ार रुपयों से इन बच्चों को पाल लोगी? तुम मेरे बिना एक दिन भी सड़क पर गुज़ारा नहीं कर सकती। चुपचाप मेरे हिसाब से रहना सीखो, वरना दरवाज़ा खुला है। अभी निकलो मेरे घर से!”

इस बार निर्मला  ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने चुपचाप ज़मीन पर बिखरा हुआ खाना साफ किया, बच्चों को उनके कमरे में भेजा और सीधे बेडरूम में चली गई। कुछ देर बाद वह एक छोटा बैग लेकर बाहर आई। समीर ने उसे देखा तो व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ बोला, “क्या हुआ? जा रही हो? जाओ, दो दिन में अक्ल ठिकाने आ जाएगी और नाक रगड़ते हुए वापस आओगी।”

निर्मला  ने उसकी तरफ एक नज़र देखा, जिसमें अब आँसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी खामोशी थी। वह बिना कुछ कहे घर से बाहर निकल गई।

निर्मला  सीधे अपने माता-पिता के घर पहुँची। उसके चेहरे की उदासी देखकर उसके पिता समझ गए कि कुछ बहुत बुरा हुआ है। निर्मला  ने सारी बात कह सुनाई। “पापा, मैं अब और यह ज़िल्लत नहीं सह सकती। वह इंसान मुझे इंसान नहीं, अपनी खरीदी हुई कोई चीज़ समझता है। मैं हर दिन घुट-घुट कर नहीं जी सकती। लेकिन मैं अपने बच्चों का भविष्य भी खराब नहीं करना चाहती।”

पिता ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, “बेटी, कोई भी रिश्ता स्वाभिमान से बड़ा नहीं होता। तुमने बहुत सह लिया। अब तुम्हें वो करना चाहिए जो सही है।”

निर्मला  ने अगले दो दिन बहुत भागदौड़ में बिताए। वह बैंक गई, कुछ वकीलों से मिली और अपने भाई के साथ कुछ कागज़ी कार्यवाहियाँ पूरी कीं। दरअसल, समीर को यह पता ही नहीं था कि निर्मला  ने अपनी उस ‘दो कौड़ी’ की नौकरी के पैसों को कभी अपने ऊपर खर्च नहीं किया था। पिछले दस सालों से वह अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा म्यूचुअल फंड्स और फिक्स्ड डिपॉज़िट में बचा रही थी। वह जानती थी कि किसी भी आपात स्थिति में यह पैसा काम आएगा। और आज, वह आपात स्थिति आ चुकी थी।

निर्मला  की अपनी बचत, कुछ गहने जो उसने खुद के पैसों से बनवाए थे, और उसके पिता की थोड़ी सी आर्थिक मदद—इन सबको मिलाकर एक बहुत बड़ी रकम तैयार हो गई थी। निर्मला  ने उस बैंक मैनेजर से मुलाकात की जहाँ से समीर ने होम लोन लिया था। उसने एकमुश्त राशि जमा करके उस घर का सारा बकाया कर्ज़ा चुका दिया। जो घर समीर के लिए उसके अहंकार का प्रतीक था, आज वह बैंक के कर्ज़ से पूरी तरह मुक्त हो चुका था।

तीसरे दिन की शाम को निर्मला  वापस उसी फ्लैट के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने चाबी से दरवाज़ा खोला और अंदर दाखिल हुई। समीर सोफे पर बैठकर टीवी देख रहा था। निर्मला  को देखकर उसके चेहरे पर वही पुरानी विजयी और अहंकारी मुस्कान आ गई।

“आ गई ना वापस? मैंने तो कहा ही था कि दो दिन में मायके वालों को भी तुम बोझ लगने लगोगी। अब बैग अंदर रखो और मेरे लिए चाय बनाओ,” समीर ने टीवी से नज़रें हटाए बिना हुक्म चलाया।

निर्मला  अपनी जगह से नहीं हिली। वह शांति से समीर के सामने गई और सेंटर टेबल पर एक भूरे रंग का लिफाफा रख दिया।

“यह क्या है? कोई नया नाटक?” समीर ने चिढ़ते हुए पूछा।

“खोल कर देख लीजिए,” निर्मला  की आवाज़ में एक ऐसा ठहराव था जो समीर ने पहले कभी नहीं सुना था।

समीर ने झिझकते हुए लिफाफा उठाया और उसके अंदर रखे कागज़ बाहर निकाले। वे बैंक के दस्तावेज़ थे। ‘नो ड्यूज़ सर्टिफिकेट’ (No Dues Certificate) पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था कि इस संपत्ति पर अब बैंक का कोई कर्ज़ा बाकी नहीं है। समीर की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसे हुआ।

“य… यह क्या है? तुमने यह कैसे किया?” समीर हकलाया।

निर्मला  ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “यह उस दो कौड़ी की नौकरी का कमाल है, जिसे आप हमेशा जलील करते थे। पिछले दस सालों में मैंने अपनी कमाई का एक-एक पैसा जोड़ा था। मेरे पिता ने भी मेरी मदद की। मैंने इस घर का सारा लोन चुका दिया है। अब यह घर बैंक का नहीं, हमारा है।”

समीर का चेहरा पसीना-पसीना हो गया। उसका वह हथियार, जिससे वह हर रोज़ निर्मला  को डराता था, अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।

निर्मला  ने अपनी बात जारी रखी, “आपने हमेशा मुझे एहसास दिलाया कि मैं आप पर बोझ हूँ। आपने अपने पैसों का रौब दिखाकर मुझे और मेरे बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। लेकिन अब बहुत हुआ समीर। मैंने यह कर्ज़ा इसलिए नहीं चुकाया कि मुझे आपसे कोई बराबरी करनी थी, बल्कि इसलिए चुकाया ताकि आज के बाद आप कभी मुझे इस घर से बाहर निकलने की धमकी ना दे सकें।”

निर्मला  की आवाज़ अब थोड़ी ऊँची हो गई थी, लेकिन उसमें गुस्सा नहीं, एक अडिग आत्मविश्वास था। “सुन लीजिए समीर! अब से इस घर में रहने के लिए मेरे सामने कोई शर्त मत रखना। मैं इस घर की मालकिन हूँ, कोई किराएदार नहीं, जिसे आप जब चाहें बेदखल कर दें। अगर आपको इस घर में मेरे और बच्चों के साथ रहना है, तो आपको सम्मान के साथ रहना होगा। अगर आपको यह मंज़ूर नहीं है, तो दरवाज़ा आपके लिए भी उतना ही खुला है जितना मेरे लिए था!”

समीर के पास कहने के लिए एक शब्द नहीं था। उसका खोखला अहंकार ज़मीन पर गिरकर उसी कांच के गिलास की तरह चकनाचूर हो चुका था। वह चुपचाप सिर झुकाए बैठा रहा। निर्मला  ने अपना बैग उठाया और सीधे बच्चों के कमरे की तरफ बढ़ गई। आज वह उस घर में एक दबी-कुचली पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी औरत के रूप में चल रही थी, जिसने अपने आत्मसम्मान की कीमत अपनी खामोश तपस्या से चुकाई थी।

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