“कभी खुद को आईने में देखा है तुमने, मीरा? क्या हाल बना लिया है अपना। न बालों में कंघी करने का होश है, न ढंग के कपड़े पहनने का। आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए हैं और वजन तो जैसे बढ़ता ही जा रहा है। घर का हाल देखो, ऐसा लगता है जैसे कोई कबाड़खाना हो। सोफे पर बच्चों के खिलौने पड़े हैं, डाइनिंग टेबल पर तुम्हारी फाइल्स और लैपटॉप। आखिर तुम्हारे वर्क फ्रॉम होम का मतलब क्या है?
क्या दिन के चौबीस घंटे सिर्फ लैपटॉप के आगे आंखें फोड़ना ही काम है? अगर तुम अपने घर, बच्चों और खुद पर ध्यान नहीं दे सकती, तो छोड़ दो यह नौकरी। मैं कमा तो रहा हूँ, भूखे थोड़े ही मर रहे हैं हम।” समीर का यह उलाहना कोई नया नहीं था। वह पिछले आधे घंटे से इसी तरह अपना गुस्सा निकाल रहा था।
मीरा चुपचाप बैठी, बिना कोई जवाब दिए अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए अपना प्रेजेंटेशन पूरा कर रही थी। समीर अपना भाषण खत्म करके करवट बदलकर सो गया। कुछ ही पलों में उसकी भारी खर्राटे पूरे कमरे की शांति को चीरने लगे।
मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी थकी हुई आंखों को मला और लैपटॉप बंद कर दिया। रात के डेढ़ बज चुके थे। वह धीरे से उठी और बच्चों के कमरे में गई। सात साल का रोहन और चार साल की नव्या गहरी नींद में थे। नव्या ने अपना कंबल लात मारकर हटा दिया था। मीरा ने झुककर बेटी को ठीक से उढ़ाया,
उसके माथे को चूमा और फिर रोहन का स्कूल बैग चेक करने लगी। पेंसिल बॉक्स में पेन्सिलें छीलकर रखीं, नव्या की पानी की बोतल धोकर सुखाने के लिए रखी। एक माँ के रूप में उसे हमेशा यह अपराधबोध सताता था कि वह अन्य माताओं की तरह अपने बच्चों के साथ घंटों पार्क में नहीं खेल पाती, या उन्हें रोज नई-नई कहानियां नहीं सुना पाती।
लेकिन हकीकत यह भी थी कि समीर की आमदनी से इस बड़े शहर में घर का किराया, बच्चों की स्कूल फीस और ईएमआई चुकाना अब संभव नहीं रह गया था। इसलिए मीरा ने एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में घर से ही काम करना शुरू किया था ताकि वह काम के साथ-साथ घर भी देख सके।
किचन में जाकर मीरा ने सुबह के लिए तैयारी शुरू की। फ्रिज से गोभी निकाली और उसे काटने लगी ताकि सुबह बच्चों के टिफिन के लिए पराठे बनाने में आसानी हो। गैस पर दाल उबलने के लिए रख दी। उसे पता था कि सुबह सात बजे से उसका एक विदेशी क्लाइंट के साथ जरूरी कॉल था, इसलिए किचन का आधा काम रात में ही निपटा लेना समझदारी थी।
काम करते-करते उसकी नज़र किचन की खिड़की के कांच में पड़े अपने अक्स पर गई। समीर गलत नहीं कह रहा था। वह सच में बेतरतीब हो गई थी।
अपने लिए फेशियल या स्पा तो दूर, उसे ढंग से बाल धोने का भी समय नहीं मिलता था। लेकिन समीर यह क्यों नहीं समझता कि यह सब वह अपने किसी शौक के लिए नहीं, बल्कि इसी परिवार के भविष्य के लिए कर रही है?
मीरा को समीर के इस चिड़चिड़ेपन का असली कारण पता था। समीर की अपनी कंपनी में पिछले तीन सालों से तरक्की रुकी हुई थी। वह एक बहुत ही ईमानदार और मेहनती इंसान था, लेकिन कॉर्पोरेट दुनिया की जो चापलूसी और राजनीति होती है, वह उसे बिल्कुल नहीं आती थी।
उसके कई जूनियर बॉस की हां में हां मिलाकर और उनके साथ वीकेंड पार्टीज करके प्रमोशन ले चुके थे, जबकि समीर वहीं का वहीं था। इस हीन भावना और कार्यस्थल की कुंठा ने समीर को भीतर से कड़वा कर दिया था। वह ऑफिस का सारा गुस्सा, अपनी असफलता की सारी हताशा घर आकर मीरा की अव्यवस्था और उसके रूप-रंग पर निकाल देता था।
मीरा यह सब समझती थी, इसलिए वह अक्सर चुप रह जाती थी। वह जानती थी कि अगर वह भी पलटकर जवाब देगी, तो घर में रोज महाभारत होगी और उसका सीधा असर बच्चों के कोमल मन पर पड़ेगा।
अगली सुबह हमेशा की तरह एक तूफान लेकर आई। मीरा सुबह साढ़े पांच बजे उठ चुकी थी। गैस के एक बर्नर पर चाय उबल रही थी, दूसरे पर टिफिन के लिए पराठे सिक रहे थे और साथ ही वह अपने मोबाइल पर ईमेल भी चेक कर रही थी। समीर उठा तो हमेशा की तरह उसका मूड खराब था।
“मीरा, मेरी नीली शर्ट प्रेस क्यों नहीं है? तुम्हें हजार बार कहा है कि मेरे कपड़े रात को ही निकाल कर रख दिया करो,” समीर झुंझलाते हुए बोला। मीरा ने बिना आपा खोए कहा, “वो शर्ट कल ही तो धोने में डाली है समीर, आप दूसरी वाली पहन लीजिए। मैंने ग्रे वाली शर्ट निकाल कर बिस्तर पर रख दी है।” समीर बड़बड़ाता हुआ बाथरूम चला गया।
बच्चों को उठाना, उन्हें नहलाना, तैयार करना और फिर स्कूल वैन तक छोड़ कर आना—यह सब मीरा ने एक मशीन की तरह किया। ठीक सात बजे वह अपने लैपटॉप के सामने बैठी थी, एक हाथ में चाय का कप था और दूसरे हाथ से वह क्लाइंट को अपनी रिपोर्ट समझा रही थी।
दिन भर कॉल्स, मीटिंग्स, घर की सफाई, कपड़े धोना और रात के खाने की तैयारी में समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम को जब बच्चे स्कूल से आए, तो वह उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाकर होमवर्क करवा रही थी और साथ ही अपनी एक जरूरी फाइल भी अपडेट कर रही थी।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। समीर ऑफिस से लौट आया था। लेकिन आज उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। वह सोफे पर धम्म से बैठ गया और उसने अपना सिर दोनों हाथों के बीच थाम लिया। उसकी आंखें लाल थीं। मीरा ने तुरंत लैपटॉप बंद किया और पानी का ग्लास लेकर उसके पास गई। “क्या हुआ समीर? तबीयत तो ठीक है?” उसने नरमी से पूछा।
समीर ने पानी का ग्लास लिया और एक ही सांस में पी गया। उसकी आवाज कांप रही थी। “आज ऑफिस में अप्रेजल की लिस्ट आ गई मीरा। मुझे फिर से दरकिनार कर दिया गया है। जिस लड़के ने दो साल पहले मेरे अंडर ट्रेनिंग ली थी, उसे मेरा मैनेजर बना दिया गया है। सिर्फ इसलिए क्योंकि वह बॉस के साथ गोल्फ खेलने जाता है।
मैं हार गया हूँ मीरा। मुझे लगता है मैं किसी काम का नहीं हूँ। मेरी सैलरी भी नहीं बढ़ी और अगले महीने से घर की ईएमआई भी बढ़ने वाली है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ।” समीर की आंखों से आंसू छलक पड़े। वह इंसान, जो कल रात मीरा को उसकी कमियों पर कोस रहा था, आज अपनी ही विफलताओं के बोझ तले टूटकर रो रहा था।
मीरा चाहती तो उस वक्त समीर को ताना मार सकती थी। वह कह सकती थी कि ‘देखा, तुम खुद तो कुछ कर नहीं पा रहे और अपना गुस्सा मुझ पर निकालते हो।’ लेकिन मीरा ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने बच्चों को टीवी देखने के लिए दूसरे कमरे में भेज दिया। वह समीर के पास बैठी और उसके कंधे पर हाथ रखा।
“समीर, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। तुम अपनी जगह बिल्कुल सही हो। अगर चापलूसी करके आगे बढ़ना पड़े, तो वैसी तरक्की से यह ईमानदारी की हार कहीं बेहतर है,” मीरा ने शांत स्वर में कहा।
“लेकिन घर कैसे चलेगा मीरा? बच्चों की फीस, ईएमआई… मेरे अकेले के बस का नहीं रहा अब,” समीर रुआंसा होकर बोला।
मीरा उठी और अलमारी से एक फाइल निकालकर लाई। उसने फाइल समीर के सामने खोल दी। “तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है समीर। मैंने पिछले छह महीनों में दो नए प्रोजेक्ट्स लिए थे, जिनके लिए मैं रात-रात भर जागकर काम कर रही थी। उन प्रोजेक्ट्स का पेमेंट आ गया है। मैंने बच्चों की अगले एक साल की फीस पहले ही जमा कर दी है और जो पैसे बचे हैं, उनसे हम ईएमआई का एक्स्ट्रा बोझ आराम से उठा सकते हैं।”
समीर फटी-फटी आंखों से उस फाइल को, बैंक की रसीदों को और फिर मीरा के थके हुए, बिना मेकअप वाले चेहरे को देखने लगा। अचानक उसे मीरा के बिखरे बाल, उसके आंखों के नीचे के काले घेरे और उसका बढ़ा हुआ वजन बदसूरत नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे पवित्र और खूबसूरत गहने लगने लगे। उसे याद आया कि कैसे वह कल रात इसी औरत को ताने मार रहा था, जो चुपचाप इस घर की नींव को मजबूत करने के लिए खुद को गला रही थी। उसका ‘वर्क फ्रॉम होम’ कोई मजाक नहीं था, बल्कि वह इस परिवार की सबसे बड़ी ढाल थी।
समीर को अपने कहे एक-एक शब्द पर पछतावा होने लगा। वह मीरा के सामने घुटनों के बल बैठ गया और उसके हाथ अपने हाथों में ले लिए। “मुझे माफ कर दो मीरा। मैं बहुत बड़ा बेवकूफ हूँ। मेरी अपनी कुंठाओं ने मुझे अंधा कर दिया था। मैं अपनी नाकामयाबी का सारा ठीकरा तुम्हारी मेहनत और तुम्हारे समर्पण पर फोड़ रहा था। तुम दिन-रात मशीन की तरह खटती हो और मैंने कभी तुम्हें एक गिलास पानी तक पूछने की जहमत नहीं उठाई। तुमने इस बिखरे हुए घर को नहीं, बल्कि मुझ जैसे बिखरे हुए इंसान को संभाल कर रखा है।”
मीरा की आंखों में भी आंसू आ गए। उसने समीर को उठाया और मुस्कुराते हुए बोली, “परिवार में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता समीर। हम दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। कभी तुम थक जाओगे तो मैं वजन उठा लूंगी, कभी मैं थक जाऊंगी तो तुम संभाल लेना।”
उस दिन के बाद से घर का माहौल बदल गया। समीर ने अपनी ऑफिस की राजनीति से परेशान होना छोड़ दिया और वह अपना खाली समय मीरा और बच्चों को देने लगा। अब सुबह की चाय समीर बनाता था और रात को बच्चों के बैग वह लगाता था। घर अब भी कभी-कभी बिखरा रहता था, लेकिन अब उस बिखरे घर में शिकायतें नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए सम्मान और बेशुमार प्यार था।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।