अपनी सारी पीड़ा, दुकान जलने का दुख और परिवार की भुखमरी की हालत अपने भाई के सामने रख दी और हाथ जोड़कर कुछ रुपयों का कर्ज मांगा।
विकास ने एक ठंडी सांस ली और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “देखो रघु, आजकल हर दूसरे दिन कोई न कोई रिश्तेदार ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी लेकर आ जाता है।
शहर में हम लोग पैसे पेड़ से नहीं तोड़ते हैं। पहले भी मैंने दो-चार रिश्तेदारों की मदद की थी, आज तक वो पैसे लौटकर नहीं आए। आजकल लोग रिश्तेदारी का वास्ता देकर ठगने का काम ज्यादा कर रहे हैं।” विकास की पत्नी ने भी ताना मारते हुए कहा, “हाँ, और हमारे यहाँ कोई खैरात तो बंट नहीं रही है। आप किसी और से मांग कर देख लीजिए।”
रघुनाथ एक बहुत ही सीधा-सादा और मेहनती इंसान था। एक छोटे से कस्बे में उसकी कपड़े की एक छोटी सी दुकान थी, जिससे वह अपनी पत्नी सुमित्रा और दो छोटे बच्चों का पेट पालता था। जीवन भले ही विलासिता से भरा नहीं था, लेकिन उनकी छोटी सी दुनिया में सुकून और प्यार की कोई कमी नहीं थी।
सुमित्रा एक समझदार पत्नी थी जो हर सुख-दुख में रघुनाथ के कंधे से कंधा मिलाकर चलती थी। लेकिन किस्मत को शायद उनका यह साधारण सा सुख भी मंजूर नहीं था।
दिवाली के ठीक दो दिन पहले, शार्ट सर्किट की वजह से बाजार में भयंकर आग लग गई। उस आग ने कई दुकानों को अपनी चपेट में ले लिया, जिनमें रघुनाथ की दुकान भी शामिल थी। रातों-रात रघुनाथ की जिंदगी भर की जमा-पूंजी और आजीविका का एकमात्र साधन राख के ढेर में तब्दील हो गया।
सब कुछ खत्म हो चुका था। जो माल उसने कर्ज लेकर त्योहार पर बेचने के लिए मंगाया था, वह भी जलकर खाक हो गया। अगले कुछ दिन रघुनाथ और उसके परिवार के लिए किसी भयानक सपने से कम नहीं थे। लेनदार तगादा करने लगे और घर में खाने के लाले पड़ गए। बच्चों की स्कूल की फीस भी भरनी थी
और ऊपर से सुमित्रा की तबीयत सदमे की वजह से बिगड़ गई। रघुनाथ ने कस्बे में कई जान-पहचान वालों से मदद मांगनी चाही, लेकिन जब इंसान का वक्त बुरा होता है, तो लोग अक्सर किनारा कर लेते हैं। हर किसी ने कोई न कोई बहाना बनाकर उसे टाल दिया।
निराशा के घने अंधकार में रघुनाथ को अपने चचेरे भाई, विकास की याद आई। विकास कानपुर शहर का एक बहुत बड़ा व्यापारी था। बचपन में दोनों ने काफी समय साथ बिताया था, हालांकि अब उनके बीच रुतबे और हैसियत का बहुत बड़ा फासला आ चुका था। रघुनाथ ने सोचा कि अगर वह विकास के पास जाकर अपनी परेशानी बताए, तो शायद वह कुछ रुपयों की मदद कर दे या अपने किसी कारखाने में उसे कोई छोटी-मोटी नौकरी ही दे दे। सुमित्रा के मंगलसूत्र को गिरवी रखकर रघुनाथ ने कानपुर जाने के लिए बस का किराया जुटाया और भारी मन से शहर की ओर निकल पड़ा।
कानपुर पहुंचकर रघुनाथ जब विकास की आलीशान कोठी के सामने खड़ा हुआ, तो उसे अपनी गरीबी और उस कोठी की भव्यता के बीच का अंतर साफ नजर आ रहा था। हिचकिचाते हुए उसने दरवाजा खटखटाया। नौकर उसे अंदर ले गया। कुछ देर बाद विकास और उसकी पत्नी हॉल में आए। रघुनाथ को देखते ही विकास के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। रघुनाथ ने अपनी सारी पीड़ा, दुकान जलने का दुख और परिवार की भुखमरी की हालत अपने भाई के सामने रख दी और हाथ जोड़कर कुछ रुपयों का कर्ज मांगा।
विकास ने एक ठंडी सांस ली और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “देखो रघु, आजकल हर दूसरे दिन कोई न कोई रिश्तेदार ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी लेकर आ जाता है। शहर में हम लोग पैसे पेड़ से नहीं तोड़ते हैं। पहले भी मैंने दो-चार रिश्तेदारों की मदद की थी, आज तक वो पैसे लौटकर नहीं आए। आजकल लोग रिश्तेदारी का वास्ता देकर ठगने का काम ज्यादा कर रहे हैं।” विकास की पत्नी ने भी ताना मारते हुए कहा, “हाँ, और हमारे यहाँ कोई खैरात तो बंट नहीं रही है। आप किसी और से मांग कर देख लीजिए।”
ये शब्द रघुनाथ के सीने में तीर की तरह चुभ गए। जिस भाई पर उसे आखिरी उम्मीद थी, उसने न सिर्फ मदद करने से इंकार किया, बल्कि उसे एक धोखेबाज और भिखारी भी समझ लिया। रघुनाथ बिना कुछ कहे, नम आँखों से उस कोठी से बाहर निकल आया।
दोपहर का वक्त था और रघुनाथ कानपुर की अजनबी सड़कों पर भटक रहा था। उसकी जेब में बस इतने ही पैसे बचे थे कि वह एक वक्त का खाना खा सके। घर वापस लौटने का किराया भी उसके पास नहीं था। वह एक चौराहे के पास फुटपाथ पर बैठ गया और अपनी किस्मत पर रोने लगा। उसे लगा कि वह किसी से फोन मांगकर सुमित्रा से बात कर ले, लेकिन जब उसने एक-दो लोगों से मिन्नत की कि उसे एक जरूरी कॉल करनी है, तो लोगों ने उसे शक की नजर से देखा। कोई उसे नशा करने वाला समझ रहा था, तो कोई मोबाइल चोर। रघुनाथ को इस बात का बहुत गहरा धक्का लगा। उसने महसूस किया कि आज के समय में दया, सहानुभूति और मदद का सिक्का पूरी तरह से खोटा हो चुका है। कुछ फरेबी और झूठे लोगों की वजह से समाज से विश्वास नाम की चीज खत्म हो गई है, और इसी वजह से उसके जैसे सच में जरूरतमंद इंसान को भी लोग चोर या भिखारी समझने लगे हैं।
शाम ढलने लगी थी और अचानक मौसम ने करवट ली। तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। रघुनाथ खुद को भीगने से बचाने के लिए भागकर एक बहुत बड़े गोदाम के शेड के नीचे खड़ा हो गया। वह गोदाम शहर के सबसे बड़े थोक कपड़ा व्यापारी का था। बारिश इतनी तेज थी कि गोदाम के बाहर खड़े ट्रकों से माल उतारना नामुमकिन हो रहा था। तभी रघुनाथ ने देखा कि एक ट्रक का तिरपाल तेज हवा से फट गया है और अंदर रखी लाखों रुपये की रेशमी साड़ियों की पेटियां भीगने लगी हैं।
गोदाम का मैनेजर छतरी लेकर पागलों की तरह भाग रहा था और अपने मजदूरों पर चिल्ला रहा था कि वे जल्दी-जल्दी पेटियां अंदर रखें, लेकिन मजदूर कम थे और बारिश बहुत ज्यादा। पेटियों का वजन इतना था कि दो लोगों के बिना उठ नहीं रही थीं। रघुनाथ जो अब तक सिर्फ अपनी किस्मत को कोस रहा था, उसने देखा कि यह किसी की मेहनत की कमाई बर्बाद हो रही है। बिना एक पल सोचे, वह बारिश में भीगता हुआ ट्रक के पास पहुंचा और पेटियां उठाने में मजदूरों की मदद करने लगा।
मैनेजर ने उसे अजनबी समझकर रोकना चाहा, लेकिन रघुनाथ ने जोर से कहा, “बाबूजी, मुझे काम करने दीजिए, माल खराब हो जाएगा!” और वह पूरी ताकत से पेटियां गोदाम के अंदर पहुंचाने लगा।
अगले तीन घंटे तक, रघुनाथ बिना रुके, भूखे पेट, उस भयंकर बारिश में भारी पेटियां ढोता रहा। उसने न तो अपनी थकान की परवाह की और न ही अपने भीगते कपड़ों की। उसकी तेजी और लगन देखकर बाकी मजदूरों में भी जोश आ गया। आखिरकार, रात के ग्यारह बजे तक पूरा माल सुरक्षित गोदाम के अंदर पहुंच गया।
मैनेजर ने राहत की सांस ली। सभी मजदूर हांफ रहे थे। मैनेजर ने मजदूरों को उनकी दिहाड़ी दी और फिर रघुनाथ के पास आया। उसने अपनी जेब से पांच सौ रुपये निकाले और रघुनाथ की तरफ बढ़ाते हुए बोला, “भाई, तूने आज बहुत बड़ा नुकसान होने से बचा लिया। अगर तू न होता, तो आज लाखों का माल पानी में बह जाता। यह ले तेरी मेहनत का पैसा।”
रघुनाथ ने कांपते हाथों से वे पैसे लिए। सुबह से जो हाथ मदद के लिए फैल रहे थे और तिरस्कार पा रहे थे, उन्हीं हाथों में आज मेहनत की कमाई थी। उसे लगा जैसे उसकी खोई हुई इज्जत उसे वापस मिल गई हो।
तभी एक बड़ी सी कार गोदाम के बाहर आकर रुकी। उसमें से गोदाम के मालिक, सेठ रामनारायण जी उतरे। उन्हें मैनेजर ने फोन पर माल भीगने की सूचना दी थी, इसलिए वे घबराए हुए आए थे। मैनेजर ने उन्हें बताया कि माल पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें सबसे बड़ा योगदान इस अजनबी मजदूर का है, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना काम किया।
सेठ रामनारायण जी ने रघुनाथ को ऊपर से नीचे तक देखा। भीगे कपड़े, थका हुआ चेहरा, लेकिन आँखों में एक गजब की ईमानदारी। सेठ जी एक अनुभवी व्यापारी थे, उन्होंने इंसान को परखने में कभी गलती नहीं की थी।
“क्या नाम है तुम्हारा भाई? और तुम इन मजदूरों के साथ पहले तो कभी नहीं दिखे?” सेठ जी ने नरमी से पूछा।
रघुनाथ ने हाथ जोड़कर अपना नाम बताया और फिर बिना कोई शिकायत किए, अपनी पूरी सच्चाई बयां कर दी। उसने बताया कि कैसे उसकी दुकान जल गई, कैसे वह मदद की आस में शहर आया था, कैसे उसके अपनों ने उसे दुत्कार दिया और कैसे समाज ने उस पर शक किया। उसने यह भी कहा कि वह यहाँ भीख मांगने नहीं आया था, बस अपनी किस्मत से हार गया था, लेकिन इस काम ने उसे बता दिया कि उसके हाथ-पैरों में अभी भी ताकत है।
सेठ रामनारायण जी उसकी कहानी सुनकर बहुत भावुक हो गए। वे समझ गए कि यह कोई साधारण मजदूर नहीं है, बल्कि हालातों का मारा एक स्वाभिमानी और ईमानदार इंसान है जिसे सिर्फ एक मौके की तलाश है।
सेठ जी ने रघुनाथ के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा, “रघुनाथ, तुम्हारे रिश्तेदार ने तुम्हारी मजबूरी को धोखा समझा, क्योंकि उसे पैसों से प्यार था, इंसानियत से नहीं। लेकिन तुमने आज मेरे लाखों के माल को अपना समझकर बचाया, जबकि तुम चाहते तो आराम से शेड के नीचे खड़े होकर तमाशा देख सकते थे। मुझे मेरे नए टेक्सटाइल कारखाने के लिए एक ऐसे ही ईमानदार और मेहनती सुपरवाइजर की जरूरत थी, जो काम को काम समझे, बोझ नहीं। क्या तुम मेरे कारखाने में काम करोगे? तनख्वाह इतनी होगी कि तुम कुछ ही महीनों में अपने सारे कर्ज उतार दोगे और अपनी दुकान फिर से खड़ी कर सकोगे।”
रघुनाथ को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने झुककर सेठ जी के पैर छू लिए। सेठ जी ने उसे उठाया और मैनेजर को आदेश दिया कि रघुनाथ के रहने और खाने का तुरंत अच्छा इंतजाम किया जाए और कल सुबह उसे एडवांस के तौर पर कुछ रुपये दे दिए जाएं ताकि वह अपने परिवार को भेज सके।
उस रात जब रघुनाथ को एक साफ बिस्तर पर लेटने का मौका मिला, तो उसके मन में कोई शिकायत नहीं थी। उसे समझ आ चुका था कि दुनिया में रिश्तेदारी, दया और सहानुभूति के सिक्के भले ही लोगों की चालाकियों के कारण खोटे हो गए हों, लेकिन ‘मेहनत’ और ‘ईमानदारी’ का सिक्का आज भी हर बाजार में सबसे खरा साबित होता है।
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# परिश्रम का अजेय सिक्का
लेखिका : वर्षा मंडल