रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना।
स्नेहा ने कांपते हाथों से फोन मिलाया। दो घंटी के बाद ही सुमित्रा देवी ने फोन उठा लिया, जैसे वो फोन के पास ही बैठी हों। “हेलो बिटिया! बस दो दिन और, फिर तो तू मेरे सामने होगी। मैंने तेरे लिए कांजीबड़ा भी बना कर रख लिया है।” माँ की चहकती हुई आवाज सुनकर स्नेहा का गला रुंध गया। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी।
मई का आखिरी हफ्ता आ चुका था। कैलेंडर पर लाल रंग के पेन से गोला बनाया हुआ पच्चीस तारीख का दिन जैसे स्नेहा को दूर से ही चिढ़ा रहा था या शायद बुला रहा था। पुणे के अपने इस बहुमंजिला फ्लैट की बालकनी में खड़ी स्नेहा के हाथ में चाय का कप था, लेकिन उसकी आँखों में बनारस के उस पुराने घर का आंगन तैर रहा था।
बनारस का वो घर, जहाँ तुलसी का चौबूतरा था, जहाँ आम के पेड़ पर बँधा झूला आज भी उसी का इंतजार करता था। पूरे ग्यारह महीने, तीन सौ पैंतीस दिन, स्नेहा एक बेहद कुशल डॉक्टर, एक जिम्मेदार पत्नी और एक सख्त माँ की भूमिका निभाती थी। सुबह छह बजे उठने से लेकर, टिफिन बनाने, अस्पताल में मरीजों की भीड़ देखने और रात को थक कर चूर हो जाने
तक, वह एक मशीन की तरह काम करती थी। इन ग्यारह महीनों में वह अपनी इच्छाओं, अपनी थकान और अपनी चिंताओं को अपने मन के सबसे गहरे कोने में दफना कर रखती थी। उसे बस इंतजार होता था तो मई और जून की इन छुट्टियों का।
बनारस में, गंगा के घाट से कुछ दूर उस पुराने मोहल्ले में भी हलचल तेज हो गई थी। स्नेहा की माँ, सुमित्रा देवी, पिछले एक हफ्ते से रसोई में डेरा डाले हुए थीं। कैरी का अचार, पापड़, बेसन के लड्डू और न जाने क्या-क्या डिब्बों में भरा जा रहा था। जब भी कोई डिब्बा बंद होता, सुमित्रा देवी के होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती,
“मेरी बिटिया को मेरे हाथ के लड्डू बहुत पसंद हैं, ससुराल में तो बेचारी को ये सब नसीब ही कहाँ होता होगा।” वहीं दालान में बैठे स्नेहा के बाबूजी, पंडित दीनानाथ, अपने पुराने चश्मे को साफ़ करते हुए बार-बार रेलवे की टिकट देख रहे थे। उन्होंने घर के पुराने कूलर की घास बदलवा दी थी
, स्नेहा के कमरे की चादरें धुलवा दी थीं और बाजार से वो सारी चीजें ला कर रख दी थीं, जो उनकी लाडली को पसंद थीं। दीनानाथ जी अक्सर अपनी पत्नी से कहते, “सुमित्रा, देखना इस बार आएगी तो मैं उसे खुद स्कूटर पर बिठाकर संकट मोचन के दर्शन कराने ले जाऊंगा। बेचारी वहां बड़े शहर में कितना थक जाती होगी।”
ये छुट्टियाँ सिर्फ एक सफर नहीं होतीं, बल्कि एक बेटी का पुनर्जन्म होती हैं। ससुराल में जो लड़की चौबीसों घंटे ‘क्या बनाऊं’, ‘क्या लाऊं’, ‘किसको क्या चाहिए’ के सवालों में उलझी रहती है, मायके की दहलीज पर कदम रखते ही वो सारे सवाल बाहर छोड़ देती है। वहां सुमित्रा देवी पूछती हैं, “बता स्नेहा, आज खाने में क्या बनाऊं?
तेरी पसंद की कढ़ी या कटहल की सब्जी?” और बाबूजी बाहर से आते ही पुकारते हैं, “गुड़िया, देख मैं तेरे लिए मलाई गिलौरी लाया हूँ।” मायके में कोई उससे उसकी जिम्मेदारी नहीं पूछता, वहां सब उसकी ख्वाहिशें पूछते हैं। वहां वो डॉक्टर स्नेहा नहीं होती, किसी की पत्नी या माँ नहीं होती,
वो सिर्फ सुमित्रा और दीनानाथ की ‘गुड़िया’ होती है, जो बेफिक्र होकर सुबह नौ बजे तक सो सकती है, जिसके बालों में माँ तेल मालिश करती है और जिसके हर दर्द को सहलाने के लिए माँ का आंचल हमेशा तैयार रहता है।
स्नेहा ने अपना और अपनी पांच साल की बेटी रिया का सूटकेस लगभग पैक कर लिया था। रिया भी अपनी नानी के घर जाने के लिए बेहद उत्साहित थी। लेकिन किस्मत को शायद इस बार कुछ और ही मंजूर था। शाम के वक्त जब स्नेहा अस्पताल से अपनी आखिरी शिफ्ट खत्म करके निकलने ही वाली थी, तभी एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई। शहर और आस-पास के कई जिलों में एक बेहद खतरनाक और जानलेवा वायरस फैलना शुरू हो गया था। हालात बेकाबू हो रहे थे और मेडिकल स्टाफ की भारी कमी महसूस की जा रही थी। सरकार ने आदेश जारी कर दिया था कि सभी डॉक्टरों और मेडिकल कर्मचारियों की छुट्टियां तत्काल प्रभाव से रद्द की जाती हैं। हर किसी को अपनी ड्यूटी पर लौटना था।
मीटिंग रूम में जब यह घोषणा हुई, तो स्नेहा को लगा जैसे किसी ने उसके पैरों तले से जमीन खींच ली हो। उसकी आँखों के सामने अपनी माँ का वो उतरा हुआ चेहरा आ गया, जो दरवाजे पर टकटकी लगाए उसका इंतजार कर रहा होगा। उसे अपने बाबूजी की वो पुरानी डायरी याद आ गई जिसमें उन्होंने उसके आने के एक-एक दिन का हिसाब रखा था। लेकिन सामने एक बहुत बड़ी विपदा थी। सैकड़ों मरीजों की जानें खतरे में थीं। एक तरफ बेटी होने का मोह था और दूसरी तरफ एक डॉक्टर होने का फर्ज। स्नेहा को बचपन की वो बात याद आ गई जब बाबूजी ने उसे मेडिकल कॉलेज भेजने के लिए अपनी जीवन भर की जमापूंजी लगा दी थी। विदाई के समय माँ ने रोते हुए कहा था कि “तू पराई हो गई है”, लेकिन बाबूजी ने कहा था, “तू पराई नहीं हुई है, तू अब इस पूरे समाज की हो गई है। तुम्हारे संस्कार ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। जब भी कभी खुद की खुशी और दूसरों की जिंदगी में चुनना पड़े, तो हमेशा जिंदगी को चुनना।” आज उन संस्कारों की परीक्षा की घड़ी आ गई थी।
रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना। स्नेहा ने कांपते हाथों से फोन मिलाया। दो घंटी के बाद ही सुमित्रा देवी ने फोन उठा लिया, जैसे वो फोन के पास ही बैठी हों। “हेलो बिटिया! बस दो दिन और, फिर तो तू मेरे सामने होगी। मैंने तेरे लिए कांजीबड़ा भी बना कर रख लिया है।” माँ की चहकती हुई आवाज सुनकर स्नेहा का गला रुंध गया। वह कुछ बोल ही नहीं पा रही थी।
“क्या हुआ स्नेहा? सब ठीक तो है ना? तू रो क्यों रही है?” सुमित्रा देवी की आवाज में चिंता झलकने लगी।
स्नेहा ने एक गहरी सांस ली और अपने आंसुओं को पीते हुए बोली, “माँ… इस बार छुट्टियों में मैं घर नहीं आ पाऊंगी। यहां बहुत बड़ी मेडिकल इमरजेंसी आ गई है। छुट्टियां रद्द हो गई हैं और मेरी ड्यूटी स्पेशल रिलीफ वार्ड में लग गई है।”
फोन के दूसरी तरफ एक लंबा सन्नाटा छा गया। स्नेहा महसूस कर सकती थी कि उसकी माँ के हाथों से जैसे सारी खुशियां फिसल गई हों। सुमित्रा देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोंछे और अपनी आवाज को मजबूत बनाते हुए कहा, “पागल लड़की, इसमें रोने की क्या बात है? तू कोई साधारण नौकरी थोड़ी करती है। तू तो लोगों की जान बचाती है। देश पर जब कोई विपदा आती है, तो सबको अपना स्वार्थ छोड़ना पड़ता है। तू अपना फर्ज निभा, हम तो यहीं हैं। अगले साल आ जाना।”
तभी फोन बाबूजी ने ले लिया। “गुड़िया, सुन रही है? तेरी माँ ने जो लड्डू बनाए हैं, वो मैं कोरियर से भिजवा दूंगा। तू वहां लोगों का ख्याल रख, लेकिन अपना भी ध्यान रखना। वक्त पर खाना खा लेना, कुछ समझ ना आए तो बाहर से मंगवा लेना। हमें तेरी बहुत याद आएगी, लेकिन हमें तुझ पर गर्व है कि हमारी बेटी आज देश के काम आ रही है।”
बाबूजी की बात सुनकर स्नेहा फूट-फूट कर रो पड़ी। उसे पता था कि उसके माता-पिता ऊपर से चाहे कितने भी मजबूत दिखें, लेकिन अंदर से वो टूट गए हैं। बूढ़े होते शरीर के साथ माता-पिता की बस एक ही ख्वाहिश बचती है – अपनी संतानों के साथ कुछ पल बिताना। जब भी कोई बेटी ससुराल से मायके आती है, तो वो घर फिर से जी उठता है, और जब वो जाती है, तो वो घर फिर से एक लंबा इंतजार करने लगता है।
पच्चीस तारीख का वो दिन भी आ गया। बनारस के उस घर में आज अजीब सी शांति थी। कूलर बंद पड़ा था। सुमित्रा देवी ने अचार के डिब्बे वापस छज्जे पर रख दिए थे। दोनों पति-पत्नी चुपचाप दालान में बैठे थे। आज ही के दिन उनकी बेटी आंगन में चहक रही होती, लेकिन आज वहां सिर्फ खामोशी थी।
वहीं दूसरी तरफ, पुणे के एक खचाखच भरे अस्पताल में स्नेहा पीपीई किट पहने, पसीने से लथपथ, एक मरीज से दूसरे मरीज के पास भाग रही थी। वह लगातार बारह घंटे से ड्यूटी पर थी। उसे ना खाने का होश था, ना पीने का। तभी एक बुजुर्ग मरीज, जो ठीक होकर डिस्चार्ज हो रहा था, उसने स्नेहा के सिर पर हाथ रखा और कहा, “भगवान तुम्हें खुश रखे बेटा। तुम ना होती तो आज मैं अपने परिवार से नहीं मिल पाता। तुम्हारी माँ ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं।”
उस बुजुर्ग के स्पर्श में स्नेहा को अपने बाबूजी का आशीर्वाद महसूस हुआ। उसे लगा जैसे उसकी माँ का आंचल उसी अस्पताल के वार्ड में कहीं लहरा रहा हो और उसे राहत दे रहा हो। उसने मुस्कुराकर आकाश की तरफ देखा। उसे समझ आ गया था कि भले ही वो इस बार अपने मायके नहीं जा पाई, भले ही वो अपनी माँ की गोद में सिर रखकर नहीं सो पाई, लेकिन उसने अपने फर्ज को निभाकर उन संस्कारों को जीवित रखा है जो उसके माता-पिता ने उसे दिए थे।
रात को जब स्नेहा को दस मिनट का ब्रेक मिला, तो उसने अपनी माँ को वीडियो कॉल किया। स्क्रीन पर सुमित्रा देवी और दीनानाथ जी का चेहरा देखते ही स्नेहा मुस्कुरा दी। उसने थके हुए चेहरे के साथ कहा, “तुम दोनों अपना ख्याल रखना, मैं भी यहां मुस्कुराऊंगी। और हां माँ, मैं तुम्हारे हाथ का खाना बहुत मिस कर रही हूँ। कोई भी पकवान खा लूं, तुम्हारे हाथ का स्वाद कहीं नहीं मिलता। पर वादा करती हूँ, अगले साल जून में जरूर आऊंगी, तब तक मैं यूं ही अपना फर्ज निभाऊंगी।”
सुमित्रा देवी भी मुस्कुरा दीं, उनकी आँखों में आंसू थे, लेकिन वो आंसू अब दुख के नहीं, बल्कि अपनी बेटी के साहस और उसके बलिदान पर गर्व के आंसू थे। एक बेटी ने अपने बचपन, अपनी चाहतों और अपनी उस एक महीने की जन्नत को, समाज की भलाई के लिए हंसते-हंसते कुर्बान कर दिया था। मायके का वो आंगन भले ही इस साल सूना रह गया हो, लेकिन स्नेहा के फर्ज ने न जाने कितने आंगनों को सूना होने से बचा लिया था।
आप सभी पाठकों से एक सवाल – क्या आपने भी कभी अपने फर्ज, अपनी नौकरी या देश के लिए अपनी किसी सबसे प्यारी खुशी या परिवार के साथ बिताए जाने वाले पलों का त्याग किया है? कहानी पढ़कर आपको कैसा लगा, कमेंट में अपनी कहानी और अपने विचार जरूर साझा करें। अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।
#देहरी की सूनी आस
लेखिका : नीना गर्ग