वो भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि काश बाबूजी का आना किसी तरह टल जाए। वो नहीं चाहती थी कि जिन बाबूजी को कस्बे में इतना सम्मान मिलता है, उन्हें अपनी ही बेटी के घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़े। लेकिन सुबह हो चुकी थी। ट्रेन का समय हो गया था। मीरा ने सोचा कि वो खुद जाकर मेन गेट पर बाबूजी का इंतजार करेगी और उन्हें सीधे अपने कमरे में ले आएगी, ताकि उनका सामना घर के बाकी लोगों से कम से कम हो।
शहर के सबसे पॉश इलाके में बने अपने आलीशान बंगले के विशाल और वातानुकूलित ड्रॉइंग रूम में बैठी मीरा की निगाहें बार-बार अपने फोन की स्क्रीन पर जा रही थीं। घर के नौकर-चाकर दिवाली की सफाई और सजावट में लगे हुए थे, लेकिन मीरा का मन इन सब से कोसों दूर था।
अभी कुछ देर पहले ही उसने अपने पिता, मास्टर दीनानाथ जी से बात की थी, और उस एक छोटी सी फोन कॉल ने उसके मन में उथल-पुथल मचा दी थी। फोन पर उसके पिता ने बड़े उत्साह से बताया था कि वो कल सुबह की ट्रेन से आ रहे हैं और साथ में दिवाली का शगुन लेकर आ रहे हैं।
मीरा के पिता, मास्टर दीनानाथ, एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड शिक्षक थे। उम्र भर उन्होंने चाक और डस्टर के सहारे अपनी जिंदगी एक छोटे से कस्बे में गुजार दी थी। वो उन सिद्धांतों वाले इंसानों में से थे, जो मानते थे कि असली दौलत बैंक के खाते में नहीं, बल्कि इंसान के चरित्र और उसके संस्कारों में होती है।
अपनी तीन बेटियों और एक बेटे में मीरा उनकी सबसे छोटी और लाडली बेटी थी। मास्टर जी ने अपनी सीमित आय में भी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी थी। बड़ी बहनों की शादी उनके स्तर के ही मध्यमवर्गीय, लेकिन संस्कारी परिवारों में हुई थी। पर मीरा के भाग्य में कुछ और ही लिखा था।
मीरा स्वभाव से बहुत शांत, समझदार और बेहद खूबसूरत थी। एक बार शहर के जाने-माने रियल एस्टेट बिजनेसमैन, राजशेखर जी, मास्टर दीनानाथ के स्कूल में किसी वार्षिक समारोह के मुख्य अतिथि बनकर आए थे। वहीं उन्होंने मीरा को देखा था, जो उस दिन मंच का संचालन कर रही थी।
राजशेखर जी को उस लड़की की सादगी, उसकी बोली की मिठास और उसकी आंखों की चमक इतनी भा गई कि उन्होंने उसी वक्त अपने इकलौते बेटे रोहन के लिए मीरा को बहू बनाने का मन बना लिया था। जब राजशेखर जी का प्रस्ताव मास्टर जी के पास पहुंचा, तो वो घबरा गए थे।
कहां राजशेखर जी का करोड़ों का साम्राज्य, शहर में दर्जनों प्रॉपर्टीज, लग्जरी गाड़ियां, और कहां मास्टर जी का टिन की छत वाला छोटा सा पुश्तैनी मकान। लेकिन राजशेखर जी के बहुत जोर देने और समाज के कुछ प्रतिष्ठित लोगों के समझाने पर मास्टर जी को झुकना पड़ा।
शादी बहुत धूमधाम से हुई। मास्टर जी ने अपनी हैसियत से बढ़कर दामाद और समधियों का सत्कार किया था, लेकिन राजशेखर जी ने रिसेप्शन में जो पानी की तरह पैसा बहाया, उसे देखकर मास्टर जी के परिवार वाले बस आंखें फाड़े रह गए थे। शादी के बाद मीरा इस महल जैसे घर में आ गई।
ससुराल में उसे कभी किसी ने ऊंचे स्वर में कुछ नहीं कहा। उसे हर वो सुख-सुविधा मिली, जिसके बारे में उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। लेकिन, फिर भी मीरा के दिल के किसी कोने में एक अजीब सा खालीपन पसरा रहता था।
इस घर में सब कुछ था, बस फुर्सत नहीं थी। ससुर जी, राजशेखर जी, सुबह सात बजे से जो फोन पर बिजनेस की बातें शुरू करते, तो रात के बारह बजे तक वो सिलसिला चलता रहता। पति रोहन भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए हर वक्त लैपटॉप और मीटिंग्स में उलझा रहता। यहां तक कि मीरा की सास, कामिनी जी भी अपनी किटी पार्टीज, क्लब की मीटिंग्स और एनजीओ के कामों में इतनी व्यस्त रहती थीं कि घर में सब लोग दिन में बस एक आध बार ही डाइनिंग टेबल पर टकरा पाते थे। कोई किसी की जिंदगी में ज्यादा दखल नहीं देता था। सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त थे।
मीरा को अपना वो छोटा सा मायका बहुत याद आता था। सर्दियों की रातों में मूंगफली छीलते हुए पूरे परिवार का एक ही रजाई के अंदर बैठकर टीवी देखना, मास्टर जी के स्कूल से लौटते ही उनके हाथ से थैला लेना, मां के हाथ की बनी अदरक वाली चाय के साथ दिन भर की बातें साझा करना। वहां पैसे कम थे, लेकिन समय और अपनेपन की कोई कमी नहीं थी। यहां पैसा बहुत था, लेकिन सुकून भरी दो बातें करने वाला कोई नहीं था।
आज जब मास्टर जी ने फोन करके बताया कि वो दिवाली का शगुन लेकर आ रहे हैं, तो मीरा खुश होने के बजाय चिंता में पड़ गई थी। फोन पर उसकी मां ने चहकते हुए बताया था, “मीरा, तुम्हारे बाबूजी तुम्हारे लिए बहुत सारा सामान लेकर आ रहे हैं। मैंने अपने हाथों से बेसन के लड्डू और मठरी बनाई है। तुम्हारे ससुर जी के लिए खादी का कुर्ता और सासू मां के लिए एक सूती साड़ी रखी है। और हां, दामाद जी के लिए मैंने खुद अपने हाथों से एक स्वेटर बुना है। तुम्हारे बाबूजी बड़े चाव से ये सब लेकर आ रहे हैं।”
मीरा ने बस ‘ठीक है मां’ कहकर फोन रख दिया था। उसे पता था कि उसके ससुराल वालों का स्तर क्या है। यहां दिवाली पर ड्राई फ्रूट्स चांदी के बर्तनों में आते थे। सासू मां जो साड़ियां पहनती थीं, उनकी कीमत हजारों-लाखों में होती थी। रोहन सिर्फ ब्रांडेड और इम्पोर्टेड कपड़े पहनता था। ऐसे में मां के हाथ के बुने स्वेटर और सूती साड़ी की यहां क्या कीमत होगी? क्या उसके ससुर और पति, जो हर वक्त करोड़ों की डील्स में व्यस्त रहते हैं, मास्टर जी की इन छोटी-छोटी, साधारण सी चीजों का मोल समझ पाएंगे?
मीरा को डर था कि कहीं अनजाने में ही सही, उसके सीधे-सादे पिता का अपमान न हो जाए। उसे याद था कि एक बार रोहन के किसी दूर के रिश्तेदार ने साधारण सी मिठाई का डिब्बा भिजवाया था, तो कैसे सासू मां ने उसे नौकरों में बांट दिया था। क्या उसके पिता के लाए हुए बेसन के लड्डू भी नौकरों के कमरे में रख दिए जाएंगे? क्या कोई उसके पिता के पास बैठकर दो पल बात करेगा, या फिर सब उन्हें ड्रॉइंग रूम में अकेला छोड़कर अपने-अपने कमरों और मीटिंग्स में चले जाएंगे?
इसी उधेड़बुन में मीरा की पूरी रात आंखों में कट गई। वो भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि काश बाबूजी का आना किसी तरह टल जाए। वो नहीं चाहती थी कि जिन बाबूजी को कस्बे में इतना सम्मान मिलता है, उन्हें अपनी ही बेटी के घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़े। लेकिन सुबह हो चुकी थी। ट्रेन का समय हो गया था। मीरा ने सोचा कि वो खुद जाकर मेन गेट पर बाबूजी का इंतजार करेगी और उन्हें सीधे अपने कमरे में ले आएगी, ताकि उनका सामना घर के बाकी लोगों से कम से कम हो।
सुबह के आठ बज रहे थे। मीरा ने नोटिस किया कि आज घर में एक अजीब सी शांति थी। रोज सुबह-सुबह गोल्फ खेलने जाने वाले ससुर जी आज घर पर ही थे, लेकिन वो कहीं नजर नहीं आ रहे थे। रोहन भी अपने कमरे में नहीं था। सासू मां भी अपने बेडरूम से बाहर नहीं आई थीं। मीरा थोड़ी हैरान हुई, लेकिन उसने सोचा कि शायद आज वीकेंड होने की वजह से सब देर से उठ रहे होंगे। वो जल्दी से तैयार होकर मेन गेट की तरफ जाने लगी। उसे लग रहा था कि बाबूजी स्टेशन से कोई ऑटो या टैक्सी लेकर बस पहुंचने ही वाले होंगे।
तभी मेन गेट खुला। ऑटो की जगह ससुर जी की चमचमाती मर्सिडीज कार अंदर दाखिल हुई। मीरा ठिठक गई। कार का दरवाजा खुला और ड्राइविंग सीट से रोहन बाहर निकला। दूसरी तरफ से ससुर राजशेखर जी बाहर आए। और फिर रोहन ने लपक कर पीछे का दरवाजा खोला और बड़े ही आदर के साथ जिस शख्स को सहारा देकर बाहर निकाला, वो कोई और नहीं, बल्कि मास्टर दीनानाथ जी थे।
मीरा की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। बाबूजी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी। राजशेखर जी ने खुद बाबूजी का एक बैग पकड़ा हुआ था और रोहन के हाथ में वो कपड़ों वाला थैला था, जिसमें मां ने शगुन का सामान रखा था।
मीरा दौड़कर उनके पास गई। “बाबूजी… आप? और आप लोग…”
राजशेखर जी हंस पड़े, “अरे बहू, मास्टर जी ने कल ही मुझे मैसेज कर दिया था कि वो आ रहे हैं। मैंने सोचा, जब हमारे इतने सम्मानित मेहमान, हमारे समधी जी खुद चलकर हमारे घर आ रहे हैं, तो क्या हम उन्हें स्टेशन लेने भी नहीं जा सकते? आज मैंने और रोहन ने अपने सारे काम, सारी मीटिंग्स कैंसिल कर दी हैं। आज का पूरा दिन सिर्फ मास्टर जी के नाम।”
रोहन ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “हां मीरा, मैं तो कब से इंतजार कर रहा था कि बाबूजी आएं और हम बैठकर खूब बातें करें। और हां, मैंने तो रास्ते में ही बाबूजी से पूछ लिया था कि मां ने बेसन के लड्डू भेजे हैं या नहीं!”
तभी सासू मां कामिनी जी भी सज-धज कर बाहर आ गईं। उन्होंने बड़े ही आदर से मास्टर जी को नमस्ते किया। “आइए भाई साहब, आपका ही इंतजार हो रहा था।”
सब लोग ड्रॉइंग रूम में आकर बैठे। नौकरों ने चाय-नाश्ता लगाया, लेकिन राजशेखर जी ने कहा, “नहीं, आज ये बाजार का नाश्ता नहीं चलेगा। बहू, जरा अंदर से वो डिब्बे लेकर आओ जो मास्टर जी लाए हैं।”
मीरा की आंखों में आंसू थे, लेकिन ये खुशी के आंसू थे। उसने जल्दी से जाकर बेसन के लड्डू और मठरी निकाली। करोड़ों का व्यापार करने वाले राजशेखर जी और रोहन बच्चों की तरह उन लड्डुओं को खा रहे थे।
“वाह! मास्टर जी, जो स्वाद बहन जी के हाथ के इन लड्डुओं में है, वो दुनिया की किसी महंगी से महंगी मिठाई में नहीं,” राजशेखर जी ने सचमुच आनंदित होते हुए कहा।
कामिनी जी ने वो सूती साड़ी निकालकर अपने कंधों पर रखकर देखी। “भाई साहब, बहन जी से कहिएगा कि मुझे उनका आशीर्वाद मिल गया। इतनी मुलायम और प्यार से खरीदी हुई साड़ी मैंने आज तक नहीं पहनी।” रोहन ने भी तुरंत वो हाथ से बुना हुआ स्वेटर पहन लिया, जो उस पर थोड़ा ढीला था, लेकिन उसके चेहरे की खुशी बता रही थी कि वो उसके लिए किसी भी डिज़ाइनर जैकेट से ज्यादा कीमती था।
मास्टर जी के चेहरे पर जो सुकून और सम्मान का भाव था, उसे देखकर मीरा के सीने से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। पूरा परिवार मास्टर जी के इर्द-गिर्द ऐसे बैठा था, जैसे सदियों से प्यासे किसी रेगिस्तान को मीठे पानी का झरना मिल गया हो। राजशेखर जी, जो हमेशा तनाव में दिखते थे, आज मास्टर जी से जीवन के फलसफे और सुकून की बातें कर रहे थे।
मीरा समझ गई कि दौलत चाहे कितनी भी हो, इंसान का दिल हमेशा सच्चे प्यार, सादगी और अपनेपन का ही भूखा रहता है। उसके ससुराल वालों ने आज सिर्फ उसके पिता का ही नहीं, बल्कि उसके उन संस्कारों का भी सम्मान किया था, जिन्हें वो अपना सबसे बड़ा गहना मानती थी। आज उस आलीशान बंगले में पहली बार, मीरा को अपने मायके वाले छोटे से घर की गर्माहट महसूस हो रही थी।
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#रिश्तों की असली पहचान
लेखिका : निधि सहाय