रेवती जी ने श्रुति के आँसू पोंछे और रोहन की तरफ पलटकर बोलीं, “सुन ले रोहन, शादी का रिश्ता कोई शक की ज़मीन पर खड़ी इमारत नहीं होती। ये विश्वास की वो डोर है जो एक बार टूट जाए तो लाख कोशिशों के बाद भी उसमें गाँठ रह ही जाती है। मंडप में जलाई गई अग्नि सिर्फ रोशनी के लिए नहीं होती, वो साक्षी होती है दोनों के पवित्र मन की। अगर तुम्हारे मन में इतना ही मैल भरा था, तो तुम्हें ये शादी नहीं करनी चाहिए थी।”
कमरे में गुलाब और रजनीगंधा के फूलों की महक फैली हुई थी। भारी लाल जोड़े में सजी श्रुति आईने के सामने बैठी अपनी धड़कनों को शांत करने की कोशिश कर रही थी। आज ही उसकी शादी रोहन से हुई थी। एक अरेंज मैरिज, लेकिन पिछले छह महीनों की बातचीत में दोनों ने एक-दूसरे को समझने की पूरी कोशिश की थी।
रोहन एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और श्रुति भी बेंगलुरु में पिछले पाँच सालों से एक आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के पद पर काम कर रही थी। श्रुति हमेशा से अपने करियर को लेकर बहुत गंभीर रही थी। आज अपने जीवन के इस नए सफर की शुरुआत पर वह नर्वस भी थी और खुश भी।
दरवाजे की हल्की सी आहट हुई और रोहन कमरे में दाखिल हुआ। उसने मुस्कुराते हुए दरवाजा बंद किया और अपनी शेरवानी का कॉलर ढीला करते हुए बेड के एक किनारे पर बैठ गया।
दिन भर की थकान उसके चेहरे पर साफ दिख रही थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने पास रखी टेबल से पानी का गिलास उठाया, थोड़ा पानी खुद पिया और फिर गिलास श्रुति की तरफ बढ़ा दिया। श्रुति ने पानी लिया और हल्की सी मुस्कान के साथ उसके पास आकर बैठ गई।
“बहुत थक गई हो ना?” रोहन ने श्रुति के हाथ को अपने हाथों में लेते हुए कहा।
“हाँ, रस्में ही इतनी लंबी थीं, लेकिन सब बहुत अच्छे से हो गया,” श्रुति ने सहजता से जवाब दिया।
रोहन कुछ पल चुप रहा, जैसे शब्दों को तौल रहा हो। फिर वह थोड़ा गंभीर होते हुए बोला, “श्रुति, हम दोनों पढ़े-लिखे और समझदार इंसान हैं। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहाँ कोई भी बात छुपाई नहीं जाती। मैं चाहता हूँ कि हमारी जिंदगी की शुरुआत पूरी तरह से पारदर्शी हो। कोई पर्दा नहीं, कोई झूठ नहीं।”
श्रुति को रोहन की यह बात अच्छी लगी। उसने सहमति में सिर हिलाया, “बिल्कुल रोहन, किसी भी रिश्ते की नींव भरोसे पर ही तो टिकी होती है। आप क्या पूछना चाहते हैं?”
“देखो श्रुति, तुम पिछले पाँच साल से बेंगलुरु में रह रही हो। आईटी सेक्टर का माहौल, वीकेंड पार्टीज, ट्रिप्स, फ्लैटमेट्स… मैं सब जानता हूँ क्योंकि मैंने भी अपनी जिंदगी के कई साल दिल्ली और मुंबई में ऐसे ही बिताए हैं,” रोहन ने उसकी आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “मैं बस यह जानना चाहता हूँ कि शादी से पहले तुम्हारी जिंदगी में कौन था? कोई सीरियस रिलेशनशिप? या कोई ऐसा जिससे तुम शादी करना चाहती थी लेकिन बात नहीं बनी? तुम मुझे सच बता सकती हो, मैं बहुत ओपन-माइंडेड हूँ। मैं तुम्हें जज नहीं करूँगा।”
श्रुति को यह सवाल थोड़ा अप्रत्याशित लगा, लेकिन उसने सोचा कि शायद वह सिर्फ अपना मन हल्का करना चाहता है। उसने बेहद शांत और स्पष्ट स्वर में कहा, “रोहन, सच कहूँ तो मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं रहा। मेरा फोकस हमेशा से मेरी पढ़ाई, मेरी जॉब और मेरे परिवार पर ही रहा। हाँ, दोस्त बहुत हैं, लड़के भी और लड़कियाँ भी, लेकिन कोई ऐसा रिश्ता नहीं रहा जिसे अफेयर या रिलेशनशिप कहा जा सके। कभी किसी के लिए ऐसा महसूस ही नहीं हुआ।”
रोहन के चेहरे पर एक अजीब सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उसने श्रुति का हाथ छोड़ दिया और थोड़ा पीछे होकर बैठ गया। “कम ऑन श्रुति! तुम मुझे बेवकूफ बना रही हो। यह कैसे संभव है? इतनी खूबसूरत लड़की, वो भी बेंगलुरु जैसे शहर में, अकेले फ्लैट में रहती हो, रात-रात भर ऑफिस की शिफ्ट्स करती हो… और कोई बॉयफ्रेंड नहीं? ऐसा हो ही नहीं सकता।”
श्रुति को अब रोहन का लहजा चुभने लगा था। जो बात पहले एक खुलापन लग रही थी, अब वह एक आरोप जैसी महसूस हो रही थी। उसने खुद को संयत रखते हुए कहा, “रोहन, मैं सच कह रही हूँ। हर लड़की जो घर से दूर रहती है, उसका अफेयर होना कोई नियम नहीं है। मेरी प्राथमिकताएँ अलग थीं। मैंने कभी इस बारे में नहीं सोचा।”
“श्रुति, मैंने कॉर्पोरेट दुनिया बहुत करीब से देखी है,” रोहन अब अपनी आवाज थोड़ी ऊँची करते हुए बोला। “मुझे पता है कि अकेले रहने वाली लड़कियाँ किस हद तक आज़ादी का मज़ा लेती हैं। मेरे खुद के ऑफिस में, मेरे साथ काम करने वाली लड़कियाँ जो वीकेंड्स पर कितनी ‘फ्री’ होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। एक उम्र के बाद भटकाव आता ही है। तुम बस इसलिए सच छुपा रही हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि मैं हंगामा खड़ा करूँगा। लेकिन सच तो यह है कि हर आज़ाद और नौकरीपेशा लड़की की जिंदगी में कोई न कोई जरूर आता है।”
श्रुति का दिल धक्क से रह गया। यह वह रोहन नहीं था जिससे वह पिछले छह महीनों से फोन पर बातें कर रही थी। यह एक ऐसा इंसान था जो अपनी संकीर्ण मानसिकता को ‘ओपन-माइंडेड’ होने का चोला पहनाकर पेश कर रहा था।
“रोहन, क्या आपको लगता है कि जो लड़कियाँ नौकरी करती हैं या घर से दूर रहती हैं, उनका चरित्र हमेशा संदिग्ध होता है? क्या आप हर कामकाजी महिला को इसी नज़र से देखते हैं?” श्रुति ने अब दृढ़ता से पूछा।
“नज़र की बात नहीं है श्रुति, यही हकीकत है! और मुझे ये शरीफ बनने का नाटक बिल्कुल पसंद नहीं है। तुम लड़कियाँ शादी से पहले दुनिया भर की आज़ादी जीती हो और फिर एक अच्छे खासे बकरे को फंसाकर सती-सावित्री बन जाती हो। लिख कर ले लो, कोई भी लड़की जो हॉस्टल या पीजी में रही हो, वो कभी ‘कोरी’ नहीं हो सकती,” रोहन के शब्द अब पूरी तरह से अपमानजनक हो चुके थे।
श्रुति का खून खौलने लगा। उसने भारी लहंगे की परवाह किए बिना खड़ी हो गई और रोहन की आँखों में आँखें डालकर बोली, “रोहन, आप भी तो पिछले सात सालों से घर से दूर दिल्ली और मुंबई में अकेले रह रहे हैं। तो क्या आपके भी कई अफेयर रहे हैं? क्या आप भी हर वीकेंड किसी नई लड़की के साथ होते थे?”
रोहन झल्ला गया, “दिमाग खराब मत करो! मैं एक मर्द हूँ। मर्दों की दुनिया अलग होती है। और मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूँ, मैं तुम्हारी बात कर रहा हूँ।”
“क्यों रोहन? नियम सिर्फ और सिर्फ लड़कियों के लिए क्यों? अगर आज़ादी और घर से दूर रहने का मतलब चरित्रहीन होना है, तो फिर तो इस घर की हर औरत पर सवाल उठना चाहिए,” श्रुति की आवाज़ अब कांपने लगी थी, लेकिन उसका हौसला अडिग था। “कल ही आपकी छोटी बहन काव्या भी तो अपनी मास्टर्स की पढ़ाई के लिए पुणे जा रही है। वो भी तो वहाँ हॉस्टल में रहेगी। तो क्या आप उसके बारे में भी यही सब सोचेंगे? या फिर जब आपकी माँ अपनी किसी सहेली के साथ बाहर जाती हैं, तब भी आपके मन में यही गंदे खयाल आते हैं?”
‘चटाक!’
कमरे में एक जोरदार आवाज़ गूंजी। रोहन ने गुस्से में अपना आपा खो दिया और श्रुति के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। श्रुति का सिर झन्ना गया और वह लड़खड़ाकर बेड पर गिर पड़ी।
“तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी माँ और मेरी बहन को इस गटर जैसी बातचीत में घसीटने की?” रोहन बुरी तरह फुंफकार रहा था। “तेरा अपना चरित्र खराब है इसलिए तू मेरे परिवार की औरतों पर उंगली उठा रही है। मैंने तो पहले ही कहा था कि इन इंडिपेंडेंट लड़कियों के दिमाग खराब होते हैं!” रोहन गालियाँ बकने लगा।
तभी कमरे का दरवाज़ा झटके से खुला।
दरवाजे पर रोहन की माँ, रेवती जी, और उसकी बड़ी भाभी खड़ी थीं। दोनों के चेहरे पर सदमा और गुस्सा साफ झलक रहा था। रोहन की तेज़ आवाज़ ने पूरे घर की शांति भंग कर दी थी। रेवती जी तेजी से अंदर आईं। रोहन कुछ सफाई देने के लिए आगे बढ़ा, “माँ, आप अंदर कैसे… ये श्रुति बहुत बदतमीज़ी कर रही थी…”
इससे पहले कि रोहन अपनी बात पूरी कर पाता, रेवती जी ने अपना हाथ उठाया और पूरी ताकत से रोहन के गाल पर एक तमाचा रसीद कर दिया। रोहन अवाक रह गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी माँ उस पर हाथ उठाएंगी।
“बदतमीज़ी ये कर रही थी या तू कर रहा है, रोहन?” रेवती जी की आवाज़ में एक ऐसी कड़क थी जो किसी को भी खामोश कर दे। “मुझे शर्म आ रही है कि तू मेरा बेटा है। बाहर से तो तूने बहुत मॉडर्न कपड़े पहन लिए, बड़ी डिग्रियाँ ले लीं, लेकिन तेरा दिमाग आज भी उसी सड़ी-गली मानसिकता में फंसा है।”
“माँ, आप समझ नहीं रही हैं… मैं तो बस…”
“चुप रह!” रेवती जी ने उसे डपटते हुए कहा। फिर उन्होंने आगे बढ़कर श्रुति को गले लगा लिया जो अब फफक कर रोने लगी थी।
“रोहन, क्या सोचकर तूने एक नई नवेली लड़की से ये सब पूछा? क्या तू खुद को दूध का धुला मानता है? अगर तूने अपनी जिंदगी में कुछ गलतियाँ की हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया की हर लड़की वैसी ही हो। श्रुति गलत कहाँ कह रही थी? अगर आज़ादी का मतलब चरित्र का गिरना ही है, तो कल जब तेरी छोटी बहन काव्या पुणे जाएगी, तो क्या तू उसके चरित्र पर भी पहरा बिठाएगा? तूने सिर्फ श्रुति पर नहीं, बल्कि मुझ पर, तेरी भाभी पर, तेरी बहन पर और इस दुनिया की हर उस लड़की पर उंगली उठाई है जो अपने पैरों पर खड़ी होने की हिम्मत करती है।”
रोहन नजरें चुराने लगा। उसकी भाभी भी अब बोल पड़ीं, “रोहन, तुमने जो आज किया है वो कोई भी संस्कारी इंसान नहीं करता। शादी से पहले तुम्हें जो पूछना था, पूछ सकते थे। आज जब ये लड़की अपना सब कुछ छोड़कर, सात फेरे लेकर तुम्हारे पास आई है, तब तुम उसके वजूद को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हो?”
रेवती जी ने श्रुति के आँसू पोंछे और रोहन की तरफ पलटकर बोलीं, “सुन ले रोहन, शादी का रिश्ता कोई शक की ज़मीन पर खड़ी इमारत नहीं होती। ये विश्वास की वो डोर है जो एक बार टूट जाए तो लाख कोशिशों के बाद भी उसमें गाँठ रह ही जाती है। मंडप में जलाई गई अग्नि सिर्फ रोशनी के लिए नहीं होती, वो साक्षी होती है दोनों के पवित्र मन की। अगर तुम्हारे मन में इतना ही मैल भरा था, तो तुम्हें ये शादी नहीं करनी चाहिए थी।”
कमरे में भारी सन्नाटा छा गया। रोहन को अपनी गलती का अहसास होने लगा था। उसका झूठा पुरुषार्थ अब अपनी ही माँ की खरी-खोटी के सामने चूर-चूर हो गया था।
“बेटा,” रेवती जी ने अपनी आवाज़ थोड़ी नरम करते हुए, लेकिन सख्त लहजे में कहा, “एक औरत जब अपना घर छोड़कर आती है, तो वो अपना गुरूर नहीं, बल्कि अपना प्यार लेकर आती है। उसे जज करना बंद करो और उसका सम्मान करना सीखो। अगर तुम्हें लगता है कि कोई लड़की सिर्फ इसलिए खराब है क्योंकि वो हॉस्टल में रही है, तो याद रखना… काव्या भी कल से उसी हॉस्टल की जिंदगी जीने जा रही है!”
रेवती जी ने श्रुति के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और उसे सांत्वना दी। रोहन वहीं सिर झुकाए खड़ा रहा, शायद उस अंधेरे से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था जो उसकी अपनी ही सोच ने पैदा किया था। कमरे में अब फूलों की महक के साथ-साथ एक नई समझ और आत्मसम्मान की खुशबू भी घुलने लगी थी।
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#विश्वास की कसौटी
लेखिका : नीलू थापर