नयी सुबह की मीठी धूप और एक अनकही रीत

 “अरे मीरा बेटा, तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गईं? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। आज तो रविवार है, तुम्हें आराम करना चाहिए था,” निर्मला देवी ने बहुत ही स्नेह से कहा।

मीरा हड़बड़ा गई। उसे लगा कि शायद उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है या फिर उसकी सास उसे ताना मार रही हैं। उसने जल्दी से पल्लू ठीक करते हुए कहा, “नहीं… नहीं माँ जी। मुझे तो आदत है जल्दी उठने की। वो… आज मुझे सबके लिए नाश्ता बनाना था। आप लोग हटिए, मैं अभी सब कुछ संभाल लेती हूँ। बाबूजी, लाइए ये चाकू मुझे दे दीजिए।”

मीरा घबराई हुई सी आगे बढ़ी, लेकिन निर्मला देवी ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया।

विवाह की सारी रस्में, थकान और रिश्तेदारों की चहल-पहल को शांत हुए अभी मुश्किल से दो दिन ही बीते थे। घर में अब सिर्फ परिवार के खास लोग ही बचे थे। मीरा और रोहन की शादी बहुत ही धूमधाम से हुई थी। मायके से विदा होते समय मीरा की माँ ने उसे ढेरों नसीहतें दी थीं— “बेटी, ससुराल में सबकी पसंद का ख्याल रखना। सुबह सबसे पहले उठकर घर के कामों की जिम्मेदारी संभालना। सास-ससुर की सेवा करना और कभी किसी बात पर पलट कर जवाब मत देना।” ये सारी बातें मीरा के दिमाग में किसी टेप-रिकॉर्डर की तरह लगातार बज रही थीं।

शादी के बाद यह पहला रविवार था। मीरा ने रात को ही सोच लिया था कि कल सुबह वह जल्दी उठकर पूरे परिवार के लिए अपनी पसंद का नाश्ता बनाएगी। आखिरकार, नई बहू के तौर पर यह उसकी पहली परीक्षा जो थी। सुबह के पांच बज रहे थे। अलार्म बजने से पहले ही मीरा की आँख खुल गई। उसने जल्दी से स्नान किया, अपनी एक सुंदर सी लाल रंग की सूती साड़ी पहनी, बालों को ठीक किया और सिंदूर की लंबी लाइन मांग में सजा ली। उसकी चूड़ियों की खनक से कहीं किसी की नींद न टूट जाए, इसलिए वह बहुत ही दबे पाँव अपने कमरे से बाहर निकली।

रसोई की तरफ जाते हुए उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे लग रहा था कि पता नहीं उसकी सास, निर्मला देवी, उससे क्या उम्मीदें लगाए बैठी होंगी। क्या उन्हें मीरा के हाथ का बना खाना पसंद आएगा? कहीं उससे कोई गलती तो नहीं हो जाएगी? इन्ही सब उधेड़बुन में वह रसोई के दरवाजे तक पहुँची।

लेकिन रसोई के अंदर का नजारा देखकर मीरा के कदम वहीं ठिठक गए। उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं।

रसोई में कोई और नहीं, बल्कि उसके ससुर जी, रामनाथ जी, खड़े होकर बड़े मजे से गुनगुनाते हुए सब्जियां काट रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, उसका देवर, सुमित, गैस पर चाय का बर्तन चढ़ाए हुए उसमें अदरक कूट कर डाल रहा था। और उसका अपना पति, रोहन, डाइनिंग टेबल पर प्लेटें और कटोरियां सजा रहा था।

मीरा को लगा जैसे वह कोई सपना देख रही है। उसने अपनी आँखें मलीं। यह कैसे हो सकता है? उसने तो आज तक अपने मायके में या किसी भी रिश्तेदार के घर ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। वहां तो सुबह होते ही घर की औरतें मशीन की तरह काम में लग जाती थीं और पुरुष आराम से अखबार पढ़ते हुए चाय की फरमाइश करते थे।

तभी पीछे से किसी ने मीरा के कंधे पर बहुत ही प्यार से हाथ रखा। मीरा ने चौंक कर पीछे मुड़कर देखा, तो उसकी सास, निर्मला देवी, चेहरे पर एक बड़ी सी और सुकून भरी मुस्कान लिए खड़ी थीं। उन्होंने नाईटी पहनी हुई थी और उनके हाथ में सुबह का अखबार था।

“अरे मीरा बेटा, तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गईं? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। आज तो रविवार है, तुम्हें आराम करना चाहिए था,” निर्मला देवी ने बहुत ही स्नेह से कहा।

मीरा हड़बड़ा गई। उसे लगा कि शायद उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है या फिर उसकी सास उसे ताना मार रही हैं। उसने जल्दी से पल्लू ठीक करते हुए कहा, “नहीं… नहीं माँ जी। मुझे तो आदत है जल्दी उठने की। वो… आज मुझे सबके लिए नाश्ता बनाना था। आप लोग हटिए, मैं अभी सब कुछ संभाल लेती हूँ। बाबूजी, लाइए ये चाकू मुझे दे दीजिए।”

मीरा घबराई हुई सी आगे बढ़ी, लेकिन निर्मला देवी ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया।

“रुक जाओ मेरी बच्ची,” निर्मला जी ने उसे पास पड़े एक सोफे पर बिठाते हुए कहा, “घबराओ मत। यहाँ कोई तुमसे नाराज नहीं है और न ही तुमने कोई गलती की है। मुझे पता है कि तुम्हारी माँ ने तुम्हें बहुत सी बातें समझाकर भेजी होंगी। हर माँ भेजती है। लेकिन इस घर का एक नियम है, जो शायद रोहन तुम्हें बताना भूल गया।”

मीरा ने सवालिया नजरों से अपनी सास की तरफ देखा। “नियम? कैसा नियम माँ जी?”

निर्मला देवी मीरा के पास ही बैठ गईं और उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बहुत ही इत्मीनान से बोलीं, “मीरा, हमारे समाज में हमेशा से यही माना जाता है कि घर का सारा काम सिर्फ और सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है। सुबह उठने से लेकर रात को सबके सोने तक, एक औरत बिना थके, बिना रुके काम करती है। लेकिन इस घर में ऐसा नहीं होता। हमारे यहाँ रविवार का मतलब ‘सबका रविवार’ होता है, सिर्फ पुरुषों का नहीं।”

मीरा ध्यान से उनकी बातें सुन रही थी। रसोई से रामनाथ जी की आवाज आई, “हाँ बहू! आज के दिन इस घर की देवियों को रसोई में आने की सख्त मनाही है। आज का पूरा जिम्मा हम तीनों बाप-बेटों का होता है। और वैसे भी, मेरे हाथ के बने पोहे और जलेबी के सामने किसी भी हलवाई की कला फीकी है!”

रामनाथ जी की इस बात पर सुमित और रोहन जोर से हंस पड़े। मीरा के होठों पर भी एक हल्की सी मुस्कान आ गई, लेकिन उसके मन की उलझन अभी पूरी तरह सुलझी नहीं थी।

निर्मला देवी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “बेटा, जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तब माहौल ऐसा नहीं था। मेरे सास-ससुर बहुत सख्त थे। घर में पुरुषों की संख्या ज्यादा थी। मैं सुबह से लेकर रात तक कोल्हू के बैल की तरह काम करती थी। कोई बीमार हो या थका हुआ, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था। एक दिन मेरी तबीयत बहुत खराब थी, तेज बुखार था, फिर भी मुझे पच्चीस लोगों का खाना बनाना पड़ा। उस दिन मैं रसोई में ही गश खाकर गिर गई थी।”

निर्मला देवी की आँखों में एक पल के लिए अतीत का वो दर्द छलक आया। मीरा ने अनजाने में ही अपनी सास के हाथों को कसकर पकड़ लिया।

“जब मुझे होश आया,” निर्मला जी ने आगे कहा, “तो तुम्हारे ससुर जी मेरे पास बैठे रो रहे थे। उस दिन उन्होंने मुझसे माफी मांगी और कहा कि उन्होंने कभी इस बात पर गौर ही नहीं किया कि एक इंसान पर इतना बोझ डालना कितना गलत है। उसी दिन रामनाथ जी ने फैसला किया कि वो अपने बच्चों को ऐसा नहीं बनाएंगे। उन्होंने तय किया कि इस घर में काम को जेंडर (लिंग) के आधार पर नहीं बांटा जाएगा।”

रोहन, जो अब तक टेबल सेट कर चुका था, अपनी माँ के पास आकर खड़ा हो गया और बोला, “हाँ मीरा, माँ सही कह रही हैं। बचपन से ही पापा ने हमें अपना काम खुद करना सिखाया है। चाहे वो अपने कपड़े धोना हो, प्रेस करना हो, या फिर अपना कमरा साफ करना हो। और रविवार के दिन तो किचन पूरी तरह से हमारे हवाले होता है। माँ को उस दिन चाय भी बिस्तर पर ही मिलती है।”

सुमित ने रसोई से झांकते हुए चुटकी ली, “भाभी, आप बस ये दुआ करो कि आज पोहे में नमक ज्यादा न हो, वरना पापा अपनी गलती मानने के बजाय कहेंगे कि आज नमक ही नमकीन ज्यादा हो गया है!”

पूरे कमरे में एक बार फिर हंसी गूंज उठी। मीरा की आँखों में जो आंसू मायके की याद और डर की वजह से जमे हुए थे, वो अब खुशी और सुकून के आंसुओं में बदल गए थे। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि कोई ससुराल ऐसा भी हो सकता है। जहाँ सास एक खौफनाक पहरेदार नहीं, बल्कि एक समझदार और सुरक्षा देने वाली दोस्त जैसी हो। जहाँ ससुर एक सख्त हुक्मरान नहीं, बल्कि घर के कामों में बराबर का हिस्सेदार हो।

मीरा को अचानक अपनी माँ की कही बात याद आई— ‘ससुराल में अपनापन खुद बनाना पड़ता है।’ लेकिन यहाँ तो परिवार ने पहले से ही उसके लिए प्यार और सम्मान की एक खूबसूरत दुनिया सजा कर रखी थी।

“माँ जी,” मीरा ने भावुक होते हुए कहा, “मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है कि मैं इतनी खुशनसीब हूँ। हमारे समाज में जहाँ आज भी औरतें सिर्फ रसोई और जिम्मेदारियों के बीच पिस कर रह जाती हैं, वहां आपने और बाबूजी ने मिलकर एक इतनी सुंदर रीत शुरू की है।”

निर्मला जी ने मीरा के माथे को चूमते हुए कहा, “बेटा, बदलाव रातों-रात नहीं आते। हमने शुरुआत की, बच्चों ने उसे अपनाया। अब तुम इस घर की बेटी हो। तुम्हें यहाँ कोई काम जबरदस्ती या डर के मारे नहीं करना है। हम सब मिलकर इस घर को चलाएंगे। अगर तुम नौकरी करना चाहोगी, तो उसमें भी हम सब तुम्हारा साथ देंगे। घर किसी एक के पसीने से नहीं, बल्कि सबके सहयोग और प्यार से चलता है।”

इतने में सुमित ट्रे में गर्म चाय के कप लेकर आ गया। रामनाथ जी भी पोहे की खुशबूदार प्लेटें लेकर डाइनिंग टेबल पर आ गए। “चलिए भाई, बहुत बातें हो गईं सास-बहू की। अब जरा मेरे हाथों का जादू भी चख कर बताइए,” रामनाथ जी ने उत्साह से कहा।

मीरा जब उस डाइनिंग टेबल पर बैठी, तो उसे लगा जैसे उसने एक बहुत लंबी और थका देने वाली यात्रा के बाद किसी ठंडी छांव में कदम रखा हो। उस दिन उस पोहे और चाय का स्वाद दुनिया के सबसे महंगे और स्वादिष्ट पकवानों से भी कहीं ज्यादा मीठा था। यह स्वाद सिर्फ मसालों का नहीं था, बल्कि बराबरी, सम्मान और उस नएपन का था, जिसकी दरकार आज हर घर को है।

नाश्ते के बाद मीरा ने जब अपनी प्लेट उठानी चाही, तो रोहन ने तुरंत उसके हाथ से प्लेट ले ली। “अरे महारानी जी, आज संडे है। आज आप सिर्फ हुक्म चलाइए। बर्तन धोने की ड्यूटी आज मेरी है,” रोहन ने आँख मारते हुए कहा।

मीरा खिलखिला कर हंस पड़ी। उस दिन मीरा को यह समझ में आ गया कि रिश्ते सिर्फ रीति-रिवाजों और थोपी गई जिम्मेदारियों से नहीं निभाए जाते। रिश्ते तब मजबूत होते हैं जब उनमें एक-दूसरे के लिए सम्मान हो, एक-दूसरे की तकलीफ को समझने का जज्बा हो।

निर्मला देवी ने जो बीज सालों पहले बोया था, आज वह एक ऐसा घना पेड़ बन चुका था जिसकी छांव में मीरा को अपने पूरे जीवन का सुकून नजर आ रहा था। उसने मन ही मन तय किया कि वह भी इस घर की इस खूबसूरत रीत को कभी टूटने नहीं देगी और आने वाले समय में इसे और भी निखारेगी। उस सुबह की मीठी धूप मीरा के जीवन में सिर्फ उजाला ही नहीं, बल्कि एक ऐसी नई सुबह लेकर आई थी, जिसकी गर्माहट उसके दिल में हमेशा के लिए बस गई।

क्या आपको लगता है कि आज के समय में हर घर में मीरा के ससुराल जैसे बदलाव और एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना होनी चाहिए? आपके घर में रविवार का दिन कैसे बीतता है? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं!

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 लेखिका : रीमा साहू 

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