स्नेह के बदलते सांचे

कौशल्या देवी आज सुबह से ही अजीब सी खीझ से भरी हुई थीं। रसोई के बर्तन ऐसे खटक रहे थे जैसे वे भी उनकी झुंझलाहट में सुर मिला रहे हों। उनके कदमों की आहट और बड़बड़ाहट पूरे घर में गूंज रही थी। कभी वह दाल के डिब्बे को जोर से रखतीं तो कभी फ्रिज का दरवाजा इस कदर बंद करतीं कि पानी की बोतलें आपस में टकरा जातीं। उनका यह रौद्र रूप देखकर घर का कोई भी सदस्य उनके आस-पास फटकने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

“इस घर में तो मेरी कोई हैसियत ही नहीं रह गई है। सब अपनी मनमर्जी के मालिक बन बैठे हैं। मेरी बात तो जैसे हवा में उड़ जाती है, किसी के कानों तक पहुंचती ही नहीं!” कौशल्या देवी अपने शयनकक्ष में बुदबुदाते हुए दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर गुस्सा और निराशा साफ झलक रही थी।

पलंग पर बैठे उनके पति रघुनाथ जी, जो अब तक शांति से अपना चश्मा टिकाए अखबार पढ़ रहे थे, उन्होंने अखबार को थोड़ा नीचे किया और अपनी पत्नी के तमतमाए चेहरे को देखा। रघुनाथ जी एक बेहद शांत और समझदार स्वभाव के व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी के कई उतार-चढ़ाव बहुत धैर्य के साथ पार किए थे। उन्होंने अपनी आवाज को बिल्कुल नरम रखते हुए पूछा, “क्या बात है कौशल्या? आज सुबह-सुबह कौन सा आसमान टूट पड़ा? किस पर इतना गुस्सा हो रही हो?”

कौशल्या देवी ने अपने हाथ में पकड़ी हुई चादर को जोर से झटकते हुए कहा, “पूछ तो ऐसे रहे हैं जैसे इस घर में क्या हो रहा है, आपको कुछ खबर ही नहीं है! सब जानते हुए भी अनजान बनने की आपकी यह आदत कभी नहीं जाएगी।”

रघुनाथ जी ने अखबार को मोड़कर किनारे रख दिया और पूरी तरह से अपनी पत्नी की ओर ध्यान केंद्रित करते हुए बोले, “अरे भाई, जब तक तुम साफ-साफ बताओगी नहीं, तो मैं कैसे समझूंगा? हुआ क्या है?”

“वही आपकी लाडली बहू, और क्या!” कौशल्या देवी ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, “आज सुबह-सुबह महारानी जी का मन हो गया कि घर में एक नई फुली-ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन आनी चाहिए। वो भी फ्रंट लोड वाली, जो पूरे पचास हजार की आती है! मैंने उसे बहुत समझाया कि बेटा, घर में पहले से ही मशीन है, उसमें कपड़े धुल तो जाते हैं। थोड़ी मेहनत ही तो लगती है। लेकिन नहीं, उन्हें तो कपड़े सुखाने और निकालने में भी कमर दर्द होने लगता है। शाम तक देखना, नई मशीन इस घर के दरवाजे पर खड़ी होगी, वो अपनी जिद मनवा कर ही रहेगी।”

रघुनाथ जी चुपचाप सुनते रहे, जिससे कौशल्या देवी का गुस्सा और परवान चढ़ने लगा। उन्होंने अपनी बात को और जोर देते हुए कहा, “और आपका वो बेटा रोहित… वो तो जैसे अपनी पत्नी का गुलाम ही हो गया है। बहू ने मुंह से बात निकाली नहीं कि बेटा उसे पूरा करने के लिए दौड़ पड़ता है। मैंने रोहित से कहा कि अभी इतने बड़े खर्चे की क्या जरूरत है, पुरानी मशीन दो साल और निकाल देगी, तो जनाब कहते हैं कि ‘मां, नेहा ऑफिस से थक कर आती है, फिर घर का काम करती है, उसे आराम मिलेगा।’ अरे! आराम क्या सिर्फ उसी को चाहिए? क्या हमने अपने जमाने में काम नहीं किया? ये आजकल के लड़के तो बस जोरू के गुलाम बनकर रह गए हैं। पत्नी के आगे मां की बात की कोई कीमत ही नहीं रही।”

रघुनाथ जी समझ गए कि यह केवल एक वाशिंग मशीन का मुद्दा नहीं है। यह मुद्दा है एक मां के उस डर का, जहां उसे लगता है कि बेटे की जिंदगी में उसके अधिकार कम हो रहे हैं। यह मुद्दा जनरेशन गैप यानी दो पीढ़ियों के बीच की उस सोच का है, जहां पुरानी पीढ़ी मेहनत और बचत को महत्व देती है, और नई पीढ़ी सुविधा और समय को। रघुनाथ जी यह भी जानते थे कि अगर इस छोटी सी बात को सही तरीके से नहीं संभाला गया, तो यह सास-बहू की आपसी खींचतान पूरे घर की शांति को निगल जाएगी।

उन्होंने बहुत ही आत्मीयता से अपना हाथ आगे बढ़ाया और कौशल्या देवी से कहा, “कौशल्या, यहां मेरे पास आकर बैठो। मुझे तुमसे कुछ बहुत जरूरी बात करनी है।”

कौशल्या देवी अभी भी बड़बड़ा रही थीं, लेकिन पति के इस तरह बुलाने पर वह शांत होकर उनके समीप पलंग पर बैठ गईं। उनके चेहरे पर अभी भी नाराजगी की लकीरें थीं, लेकिन रघुनाथ जी के स्पर्श ने उनकी उद्विग्नता को थोड़ा कम कर दिया था।

रघुनाथ जी ने कौशल्या के हाथों को अपने हाथों में लिया। वे हाथ जो सालों की मेहनत से खुरदुरे हो गए थे, जिनमें इस परिवार का पूरा इतिहास और संघर्ष छिपा था। रघुनाथ जी ने मुस्कुराते हुए कहना शुरू किया, “कौशल्या, क्या तुम्हें हमारे बीते हुए कल का वो दौर याद है? जब हमारी शादी को बमुश्किल दो या तीन साल ही हुए थे और हम उस पुराने पुश्तैनी मकान में रहा करते थे?”

कौशल्या देवी थोड़ा झिझकीं, उन्हें समझ नहीं आया कि अचानक रघुनाथ जी पुरानी बातें क्यों छेड़ रहे हैं। उन्होंने धीरे से कहा, “हां, याद है। क्यों नहीं याद होगा। वो भी क्या दिन थे, कितनी कम आमदनी में हम पूरा घर चलाते थे।”

रघुनाथ जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “तुम्हें वो कड़ाके की सर्दियां याद हैं? जब दिसंबर और जनवरी के महीने में कड़ाके की ठंड पड़ती थी और कोहरे के कारण कई-कई दिनों तक सूरज देवता के दर्शन नहीं होते थे। हमारे उस घर में नल का पानी बर्फ की तरह ठंडा होता था। अम्मा जी (रघुनाथ जी की मां) बहुत सख्त मिजाज की थीं और उनके नियम भी बहुत कड़े थे। रोज सुबह-सुबह पूरे घर के कपड़े धोना, वो भी उस बर्फीले पानी में… तुम्हारा काम हुआ करता था।”

कौशल्या देवी की आंखों में पुरानी स्मृतियां तैरने लगीं। उनका गुस्सा अब कहीं पीछे छूटने लगा था। उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा, “हां जी, वो ठंड तो जैसे हड्डियों को कंपा देती थी। और अम्मा जी का हुक्म था कि कपड़े सुबह नहाने से पहले ही धुल जाने चाहिए। उस ठंडे पानी में कपड़े धोते-धोते मेरे हाथों की उंगलियां नीली पड़ जाती थीं। त्वचा फट जाती थी और कई बार तो दरारों से खून तक रिसने लगता था। लेकिन उस समय बहुओं को अपनी तकलीफ बयां करने का अधिकार कहां था? सब कुछ चुपचाप सहना पड़ता था।”

रघुनाथ जी की आंखों में एक अजीब सी चमक और स्नेह उभर आया। उन्होंने कहा, “तुम्हें लगता था कि तुम्हारी वो तकलीफ कोई नहीं देखता? कौशल्या, मुझे आज भी याद है कि तुम्हारे वो फटे हुए, खून रिसते हाथ देखकर मेरे सीने में कैसा दर्द उठता था। उन दिनों वाशिंग मशीन का तो हमने नाम भी नहीं सुना था, और अगर होती भी, तो मेरी इतनी हैसियत नहीं थी कि मैं तुम्हारे लिए उसे खरीद पाता। लेकिन मैं तुम्हें उस तकलीफ में भी तो नहीं देख सकता था न?”

कौशल्या देवी अचरज से रघुनाथ जी की तरफ देखने लगीं। रघुनाथ जी ने मुस्कुराते हुए उस राज पर से पर्दा उठाया जो बरसों से उनके सीने में दफ्न था।

“तुम्हें याद है, उन सर्दियों में मैं सुबह चार बजे उठकर टहलने के बहाने घर से निकल जाया करता था? असल में मैं टहलने नहीं जाता था। मैं उस कड़ाके की ठंड में, अम्मा के उठने से पहले, आंगन में कोयले की अंगीठी जलाता था और उस पर बड़े से पतीले में पानी गर्म करता था। फिर मैं तुम्हारे हिस्से के वो भारी-भरकम सूती कपड़े, चादरें और मोटे तौलिये खुद अपने हाथों से उस गर्म पानी में धोता था और उन्हें सुखाकर वापस अपने कमरे में आ जाता था, ताकि जब तुम सुबह उठो तो तुम्हें धोने के लिए सिर्फ मेरे और तुम्हारे चंद हल्के कपड़े ही मिलें और तुम्हें उस बर्फीले पानी में ज्यादा देर तक हाथ न डालना पड़े।”

कौशल्या देवी यह सुनकर स्तब्ध रह गईं। उनकी आंखें डबडबा आईं। वे हमेशा सोचती थीं कि सर्दियों में कपड़े कम क्यों हो जाते हैं, लेकिन उन्होंने कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि उनका पति, जो दिन भर दफ्तर में खटता है, वह सुबह चार बजे उठकर उनकी तकलीफ कम करने के लिए कपड़े धोता था।

रघुनाथ जी ने कौशल्या के आंसू पोंछते हुए आगे कहा, “और सिर्फ इतना ही नहीं, मैं अपनी छोटी सी तनख्वाह में से कुछ पैसे बचाकर, शहर जाकर तुम्हारे लिए वो खास ग्लिसरीन वाला साबुन और बोरिक एसिड का मलहम लेकर आता था। मैं अम्मा से छिपाकर रात को सोते समय वो मलहम तुम्हारे फटे हुए हाथों पर लगाता था, ताकि तुम्हें आराम मिल सके। अगर उस जमाने में अम्मा जी को यह पता चल जाता कि उनका बेटा अपनी पत्नी के कपड़े धोता है या उसके हाथों में मलहम लगाता है, तो सोचो वो क्या कहतीं? क्या वो भी मुझे ‘जोरू का गुलाम’ नहीं कहतीं?”

कौशल्या देवी के पास कोई शब्द नहीं थे। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उनके मन में जो कड़वाहट और गुस्सा था, वह रघुनाथ जी के इस अथाह प्रेम और समर्पण की यादों के आगे मोम की तरह पिघल गया।

रघुनाथ जी ने बात को पूरा करते हुए बहुत ही गहराई से समझाया, “कौशल्या, समय बदल गया है, साधन बदल गए हैं, लेकिन पति-पत्नी के प्रेम और एक-दूसरे की फिक्र करने का भाव आज भी वही है। उस समय मेरे पास पैसे नहीं थे, तो मैंने अपनी शारीरिक मेहनत से तुम्हारी तकलीफ को कम करने की कोशिश की। आज रोहित के पास साधन हैं, पैसे हैं, तो वह अपनी पत्नी की कमर का दर्द कम करने के लिए एक मशीन खरीद रहा है। रोहित भी तो वही कर रहा है जो मैंने तुम्हारे लिए किया था। क्या अपनी जीवनसंगिनी की तकलीफ को समझना, उसकी सहूलियत का खयाल रखना, उसे प्यार करना… गुलामी कहलाता है? अगर रोहित जोरू का गुलाम है, तो इसका मतलब है कि सालों पहले तुम्हारा पति भी जोरू का गुलाम था।”

कौशल्या देवी को अब अपनी सोच पर पछतावा होने लगा था। उन्हें समझ आ गया था कि जिसे वह बेटे का अपनी पत्नी के प्रति अंधापन समझ रही थीं, वह असल में एक पति का अपनी पत्नी के प्रति कर्तव्य और प्रेम था, जो उसने अपने पिता को देखकर ही तो सीखा था। रोहित ने वही संस्कार पाए थे जो रघुनाथ जी ने इस घर की नींव में सींचे थे—एक-दूसरे का सम्मान और फिक्र।

कौशल्या देवी ने अपने आंसू पोंछे और रघुनाथ जी के हाथ को चूम लिया। उनके चेहरे पर अब एक सुकून भरी मुस्कान थी। उन्होंने उठते हुए कहा, “आप सच कहते हैं जी। मैं भी उम्र के साथ सठिया गई हूं। पुरानी बातों को पकड़ कर बैठी थी और नए वक्त की सहूलियत को समझ ही नहीं पा रही थी। मेरी बहू भी तो दिन भर बाहर काम करती है, फिर घर संभालती है। अगर एक मशीन से उसे थोड़ा आराम मिल जाएगा, तो इसमें बुराई ही क्या है।”

कौशल्या देवी तुरंत कमरे से बाहर निकलीं और सीधे रोहित के कमरे में गईं। रोहित इंटरनेट पर मशीन के मॉडल देख रहा था और नेहा उदास मन से कपड़े प्रेस कर रही थी। कौशल्या देवी ने जाकर नेहा के हाथ से प्रेस ले ली और रोहित से मुस्कुराते हुए बोलीं, “अरे बेटा! मशीन देख रहा है तो कोई अच्छी सी देखना, जिसमें कपड़े एकदम सूख कर निकलें। और हां, वो फ्रंट लोड वाली ही मंगवाना, मेरी बहू को कपड़े निकालते हुए झुकना न पड़े, उसकी कमर में दर्द रहता है।”

रोहित और नेहा दोनों आश्चर्य से मां की तरफ देखने लगे। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो मां सुबह से इस बात पर नाराज थीं, वो अचानक इतनी बदल कैसे गईं। नेहा ने भावुक होकर सास को गले लगा लिया और रोहित के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई। दूर खड़े रघुनाथ जी इस बदलते और निखरते हुए रिश्ते को देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। उन्हें खुशी थी कि उनके घर की नींव में जो प्यार उन्होंने बोया था, वह आज भी एक मजबूत पेड़ बनकर पूरे परिवार को अपनी ठंडी छांव दे रहा है।

दोस्तों, रिश्तों की यही खूबसूरती होती है। कभी-कभी जनरेशन गैप के कारण हमारी सोच टकराती जरूर है, लेकिन अगर संवाद सही हो और नजरिया प्रेम से भरा हो, तो हर गलतफहमी को दूर किया जा सकता है। एक खुशहाल परिवार वही है जहां पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की जरूरतों को समझे और नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के तजुर्बे का सम्मान करे।

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लेखिका : निधि गुप्ता

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