माटी का कर्ज और स्वाभिमान

“क्या? तुम पागल हो गए हो समीर?” शिखा लगभग चीख पड़ी। “तुम उन लोगों के लिए अपना घर छोड़ोगे?”

“हाँ शिखा,” समीर की आवाज में अब एक अजीब सा दर्द था। “क्योंकि बात मेरे वजूद की है, मेरी जड़ों की है। मैं आज जो भी हूँ, जिस घर में तुम ये किटी पार्टियां करती हो, जिस सोफे पर बैठकर रोहन गेम खेलता है, वो सब इन्हीं की बदौलत है। जब मेरे पास छत नहीं थी, तब इन्होंने मुझे अपने घर का सबसे अच्छा कमरा दिया था। आज मैं उन्हें उनकी इस हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता।”

 आज समीर के कदम अचानक भारी हो गए थे। रोज ऑफिस से लौटकर जिस घर का दरवाजा खोलने के लिए वह बेताब रहता था, आज उसी दरवाजे के बाहर खड़े होकर वह गहरी सांसें ले रहा था। अंदर से आती हल्की-हल्की आवाजों ने ही उसे बता दिया था कि घर का माहौल सामान्य नहीं है। उसने जैसे ही स्मार्ट लॉक पर अपना फिंगरप्रिंट लगाया और दरवाजा खुला, सामने का नजारा देखकर वह ठिठक गया। उसकी पत्नी शिखा सोफे पर हाथ बांधे बैठी थी और उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। पास ही पंद्रह साल का बेटा रोहन अपने हेडफोन गले में लटकाए मुँह बनाए खड़ा था।

समीर ने अभी अपना लैपटॉप बैग सोफे के किनारे रखा ही था कि रोहन अपनी जगह से झल्लाते हुए बोला, “डैड! आप प्लीज जाकर देखिए गेस्ट रूम का क्या हाल है। पूरे कमरे में अजीब सी सरसों के तेल की महक आ रही है और वॉशरूम का तो पूछिए ही मत! मैंने आपको पहले ही कहा था कि मेरे एग्जाम्स आ रहे हैं, मुझे घर में शांति चाहिए, लेकिन नहीं…”

“क्या हुआ रोहन? शांत हो जाओ,” समीर ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। “वे बुजुर्ग हैं, गाँव से पहली बार इतने बड़े शहर में आए हैं। थोड़ा समय लगेगा उन्हें…”

“कितना समय समीर?” शिखा अब अपनी जगह से उठ खड़ी हुई थी। उसकी आवाज में अब तक दबा हुआ गुस्सा फूट पड़ा था। “कल सुबह मेरी किटी पार्टी की सहेलियां आने वाली हैं। क्या मैं उन्हें यह बताऊँगी कि मेरे घर में ऐसे लोग ठहरे हैं जिन्हें डाइनिंग टेबल पर खाना खाना नहीं आता? जो फर्श पर आसन बिछाकर बैठ जाते हैं? आज सुबह उन्होंने मेरे इटैलियन मार्बल पर चाय गिरा दी और उसे पोंछने के लिए अपना पुराना गमछा इस्तेमाल कर रहे थे! और वॉशरूम… हे भगवान! उन्हें यह तक नहीं पता कि शावर कैसे बंद करते हैं और वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल कैसे होता है। पूरा वॉशरूम पानी-पानी कर रखा है।”

समीर ने एक गहरी सांस ली। उसे पता था कि शिखा अपनी जगह शायद गलत नहीं थी, उसका रहन-सहन हमेशा से ऐसा ही रहा था, लेकिन समीर का दिल कहीं और ही अटका था। “शिखा, मैंने तुम्हें बताया था ना कि मास्टर दीनानाथ जी की पत्नी, काकी का हृदय का ऑपरेशन है। कल ही तो उनका एम्स में चेकअप है। मैंने ही तो उन्हें जिद करके यहाँ बुलाया था। गाँव के सीधे-सादे लोग हैं, उन्हें होटलों में रुकने की आदत नहीं है।”

“तो इसका मतलब यह है कि हम अपना घर धर्मशाला बना लें?” शिखा ने तीखे स्वर में कहा। “समीर, मैं साफ कह रही हूँ, तुम उन्हें कल ही किसी गेस्ट हाउस या धर्मशाला में शिफ्ट कर दो। मुझसे यह सब और बर्दाश्त नहीं होगा। मेरी भी एक लाइफस्टाइल है, मेरी भी कोई प्राइवेसी है।”

समीर चुपचाप वहाँ से हटकर गेस्ट रूम की तरफ चला गया। दरवाजा हल्का सा खुला था। उसने देखा, सफेद धोती-कुर्ते में मास्टर दीनानाथ फर्श पर बैठे थे और बेड पर लेटी अपनी बीमार पत्नी के पैर दबा रहे थे। कमरे के एक कोने में उनकी एक पुरानी लोहे की पेटी रखी थी, जिस पर जंग लग चुका था। पेटी के ऊपर कुछ पुरानी फाइलों में अस्पताल के कागज रखे थे। मास्टर जी की आँखों पर मोटा चश्मा था और उनके चेहरे पर उम्र और थकान की गहरी लकीरें थीं। समीर को दरवाजे पर देखते ही मास्टर जी के चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान आ गई। उन्होंने तुरंत उठने की कोशिश की, “अरे समीर बाबू, आ गए तुम दफ्तर से? आज बहुत देर कर दी बेटा।”

समीर का मन अपराधबोध से भर गया। “हाँ मास्टर जी, बस अभी आया। काकी की तबीयत अब कैसी है? कल सुबह हमें डॉक्टर के पास चलना है।”

“हाँ बेटा, सब ठीक है,” मास्टर जी ने एक झिझक के साथ कहा, “वो… आज हमसे थोड़ी गलती हो गई। तुम्हारी उस मशीन (शावर) से पानी बंद ही नहीं हो रहा था, तो थोड़ा फर्श गीला हो गया। बहू रानी शायद नाराज हो गईं। हम गाँव के गँवार ठहरे बेटा, हमें तुम्हारे इस शीशे के महल में रहना कहाँ आता है।”

“नहीं मास्टर जी, ऐसी कोई बात नहीं है। आप आराम कीजिए,” समीर ने नजरें चुराते हुए कहा और वापस अपने बेडरूम में आ गया।

बेडरूम में आते ही शिखा फिर से शुरू हो गई। “समझाया तुमने उन्हें? या फिर मैं खुद जाकर बात करूँ? समीर, मेरी सहेलियां कल मेरा मजाक उड़ाएंगी। तुम समझ क्यों नहीं रहे हो?”

शिखा की इन बातों ने समीर को आज से पच्चीस साल पीछे धकेल दिया। वह उस समय एक दस साल का बच्चा था। गाँव के धूल भरे रास्तों पर नंगे पैर दौड़ने वाला समीर। उसके पिता की अचानक हैजे से मौत हो गई थी। घर में खाने के लाले पड़ गए थे। तब मास्टर दीनानाथ ही थे, जिन्होंने उस अनाथ बच्चे का हाथ थामा था। मास्टर जी की खुद की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने समीर को अपने बेटे की तरह पाला। जब समीर के पास पढ़ने के लिए किताबें नहीं होती थीं, तो मास्टर जी अपनी आधी तनख्वाह से उसके लिए किताबें लाते थे। और सबसे बड़ी बात, जब समीर को शहर के बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला था और उसके पास फीस के पैसे नहीं थे, तब इन्हीं काकी ने बिना एक पल सोचे अपने पैरों की चाँदी की भारी पाजेब और हाथों के कड़े मास्टर जी को दे दिए थे ताकि समीर का भविष्य बन सके।

मास्टर जी ने अपना पुश्तैनी खेत गिरवी रखकर समीर को शहर भेजा था। उस दिन गाँव के बस स्टैंड पर मास्टर जी ने नम आँखों से कहा था, “खूब पढ़ना बेटा, और इतना बड़ा आदमी बनना कि कोई तुम्हारी गरीबी पर हँस ना सके।”

आज समीर बहुत बड़ा आदमी बन गया था। उसके पास करोड़ों का घर था, महंगी गाड़ियाँ थीं, समाज में रुतबा था। लेकिन आज उसी घर में, उन लोगों के लिए जगह नहीं थी जिन्होंने इस सफलता की नींव रखी थी। समीर को शिखा की बातें अब कांटों की तरह चुभ रही थीं।

“क्या सोच रहे हो?” शिखा ने उसे झकझोरा। “मैंने कहा ना, उन्हें कल ही यहाँ से भेजो।”

समीर ने एक गहरी ठंडी सांस ली, अपनी आँखों में आए आंसुओं को रोका और अपना फोन निकाल कर एक नंबर डायल किया।

“हैलो, विकास? यार तुम्हारा जो गुड़गाँव वाला सर्विस अपार्टमेंट है, वो खाली है क्या? मुझे पंद्रह दिनों के लिए चाहिए।”

दूसरी तरफ से आवाज आई, “हाँ समीर भाई, खाली तो है, पर तुम्हें क्यों चाहिए? तुम्हारा तो खुद का इतना बड़ा पेंटहाउस है।”

समीर ने शिखा की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “घर तो बहुत बड़ा है विकास, पर शायद दिल बहुत छोटे हो गए हैं। कुछ अपने आए हैं, जिन्हें मैं इस घर में सहेज कर नहीं रख पा रहा हूँ। तुम बस कमरा तैयार रखो, पैसे मैं पूरे एक महीने का एडवांस दे दूँगा।”

समीर ने फोन काटा। शिखा और रोहन दोनों उसे हैरानी से देख रहे थे।

“कल सुबह मैं मास्टर जी और काकी को लेकर उस सर्विस अपार्टमेंट में शिफ्ट हो जाऊँगा,” समीर ने बहुत शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। “और जब तक काकी का ऑपरेशन होकर वो ठीक नहीं हो जातीं, मैं भी वहीं उनके साथ रहूँगा। तुम लोगों को यहाँ कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

“क्या? तुम पागल हो गए हो समीर?” शिखा लगभग चीख पड़ी। “तुम उन लोगों के लिए अपना घर छोड़ोगे?”

“हाँ शिखा,” समीर की आवाज में अब एक अजीब सा दर्द था। “क्योंकि बात मेरे वजूद की है, मेरी जड़ों की है। मैं आज जो भी हूँ, जिस घर में तुम ये किटी पार्टियां करती हो, जिस सोफे पर बैठकर रोहन गेम खेलता है, वो सब इन्हीं की बदौलत है। जब मेरे पास छत नहीं थी, तब इन्होंने मुझे अपने घर का सबसे अच्छा कमरा दिया था। आज मैं उन्हें उनकी इस हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता।”

अभी शिखा कुछ बोलने ही वाली थी कि दरवाजे के पास एक हल्की सी आहट हुई। समीर ने पलट कर देखा। मास्टर दीनानाथ दरवाजे की चौखट पकड़ कर खड़े थे। उनकी बूढ़ी आँखों से आंसू गालों पर बह रहे थे, लेकिन चेहरे पर एक अजीब सा तेज था।

“तुम्हें देख कर आज छाती चौड़ी हो गई समीर बाबू,” मास्टर जी की आवाज में एक गहरा कंपन था। “आज हमें यकीन हो गया कि हमने जिस पौधे को सींचा था, वो आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा है। मिट्टी की खुशबू नहीं भूला है हमारा बेटा।”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। शिखा की भी बोलती बंद हो गई थी।

मास्टर जी ने अपने कांपते हाथों से अपनी कुर्ते की जेब से एक पुरानी कपड़े की थैली निकाली और उसे समीर की ओर बढ़ाते हुए बोले, “पर बेटा, हम कल सुबह ही उस किराए वाले घर में चले जाएंगे। और हाँ, उस घर का और अस्पताल का सारा खर्च हम खुद उठाएंगे।”

समीर तड़प उठा, “ये आप क्या कह रहे हैं मास्टर जी? आप मुझे पराया कर रहे हैं? मेरे होते हुए आप खर्च करेंगे?”

मास्टर जी आगे बढ़े और उन्होंने अपना कांपता हुआ हाथ समीर के सिर पर रख दिया। “नहीं मेरे बच्चे, तू तो मेरी जान है। पर हमने गाँव का अपना वो आधा बीघा खेत बेच दिया है बेटा। हम जानते थे कि शहर बहुत बड़ा है और यहाँ के खर्चे भी बड़े हैं। हम तुम्हारे इस खूबसूरत घर में कोई दाग नहीं लगाना चाहते थे और ना ही तुम्हारे परिवार पर कोई बोझ बनना चाहते थे। हमने बुढ़ापे के लिए उतना इंतजाम कर लिया था बेटा… जितने से हम तुम्हारे सामने अपना स्वाभिमान बचा सकें।”

‘स्वाभिमान’ शब्द सुनकर समीर वहीं मास्टर जी के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। शिखा का सिर भी शर्म से झुक गया था। उसे एहसास हो गया था कि उसने अपने झूठे रुतबे के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकानी चाही थी। आधुनिकता और दिखावे की इस अंधी दौड़ में, इंसानियत और कृतज्ञता आज फिर से एक पुराने, जंग लगे स्वाभिमान के सामने बौनी साबित हो गई थी।

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