काश… मेरा अपना कोई घर होता

विकास भी हमेशा अपने माता-पिता का ही पक्ष लेता। धीरे-धीरे बच्चों के मन में भी यह बात बैठ गई कि घर में असली सत्ता दादा-दादी और पापा की है, माँ तो बस घर का काम करने के लिए है। जैसे-जैसे शशांक और नव्या बड़े हुए, उन्होंने भी अंजलि की बातों को अनदेखा करना शुरू कर दिया। अगर अंजलि उन्हें कुछ समझाती, तो वे चिढ़कर कहते, “मम्मी, आपको इन चीजों की समझ नहीं है, प्लीज आप रहने दीजिए।” अंजलि रात-रात भर अपने कमरे में चुपचाप रोती रहती। जिस घर को वह अपना मानकर उसमें दिन-रात खटती थी, उस घर के लोग ही उसके वजूद को नकार रहे थे। मायका पहले ही पराया हो चुका था, और ससुराल कभी उसका हो नहीं पाया।

बचपन की वो सुनहरी गर्मियां अंजलि को आज भी याद हैं। लखनऊ के उस पुराने पुश्तैनी मकान का बड़ा सा आँगन, जहाँ वह पूरे दिन तितलियों के पीछे भागती रहती थी। उस आँगन के बीचों-बीच लगा अमरूद का पेड़ जैसे उसका सबसे अच्छा दोस्त था। लेकिन जब भी घर में कोई मेहमान आता, या कोई दूर की बुआ-मौसी आतीं, तो अंजलि को खेलते हुए देखकर अक्सर एक ही बात कहतीं, “अरे हमारी बिटिया तो पराया धन है। आज यहाँ खेल रही है, कल को अपने घर चली जाएगी। बेटियाँ तो चिड़ियों जैसी होती हैं, पंख आते ही अपने असली घोंसले की तरफ उड़ जाती हैं।”

छोटी सी अंजलि को ये बातें बहुत चुभती थीं। वह दौड़कर अपनी माँ के पास जाती और उनके गले लगकर रोने लगती, “माँ, ये लोग ऐसा क्यों कहते हैं? क्या ये मेरा घर नहीं है? मैं कहीं नहीं जाऊंगी, मैं यहीं रहूंगी।” माँ हमेशा की तरह अपने आँचल से उसके आँसू पोंछती, उसे सीने से लगाती और प्यार से समझाती, “पागल लड़की, तू उन लोगों की बातों में क्यों आती है? वो तो तुझे बस ऐसे ही चिढ़ा रहे थे। ये तेरा ही घर है, और हमेशा तेरा ही रहेगा।” माँ की ये बातें सुनकर अंजलि को तसल्ली तो मिल जाती, लेकिन बाल-मन के किसी गहरे कोने में यह बात हमेशा के लिए बैठ गई थी कि शायद ये घर उसका नहीं है, कोई और घर है जो सिर्फ उसका होगा, जहाँ उसे कभी पराया महसूस नहीं होगा।

समय अपनी रफ़्तार से भागता रहा। अंजलि बड़ी हो गई। पढ़ाई पूरी होते ही, परिवार वालों ने एक अच्छा सा लड़का देखकर उसकी शादी तय कर दी। विकास एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर था और उसका परिवार कानपुर में रहता था। विदाई के वक्त जब अंजलि अपने मायके की दहलीज पार कर रही थी, तो उसकी आँखों में आँसू जरूर थे, लेकिन दिल के एक कोने में एक उम्मीद भी थी। उसे लगा कि बचपन से जिस ‘अपने घर’ की तलाश उसे थी, वो अब पूरी होने वाली है। अब वह अपने ससुराल जा रही है, जो उसका अपना साम्राज्य होगा, जहाँ उसकी पसंद चलेगी, जहाँ वह खुद फैसले लेगी।

लेकिन कानपुर पहुँचते ही अंजलि के सपनों का महल दरकने लगा। विकास का घर बहुत बड़ा और आलीशान था, लेकिन उस घर की चाबियों का गुच्छा उसकी सास, सुमित्रा देवी की कमर में झूलता रहता था। घर में सुमित्रा देवी का शासन ऐसे चलता था जैसे कोई सख्त राजा अपना दरबार चलाता हो। रसोई में क्या बनेगा, कौन से रंग के पर्दे लगेंगे, यहाँ तक कि किस रिश्तेदार को क्या उपहार दिया जाएगा—यह सब सुमित्रा देवी ही तय करती थीं। शुरुआत में अंजलि ने कुछ चीजों में अपनी राय देनी चाही, लेकिन उसे तुरंत चुप करा दिया जाता।

जब अंजलि ने विकास से इस बारे में बात की, तो विकास का रटा-रटाया जवाब होता, “अंजलि, माँ इस घर को सालों से चला रही हैं। उन्हें हर चीज का तजुर्बा है। तुम क्यों इन झंझटों में पड़ती हो? तुम्हें जो चाहिए मुझे बताओ, लेकिन घर के फैसलों में माँ से ही पूछ लिया करो। मैं उन्हें नाराज नहीं कर सकता।”

अंजलि मन मसोस कर रह जाती। उसे एहसास होने लगा था कि वह इस घर में एक बहू तो है, लेकिन इस घर की मालकिन नहीं। वह सिर्फ एक ऐसी सदस्या थी जिसे दूसरों के बनाए नियमों पर चलना था।

वक्त के साथ अंजलि दो बच्चों, शशांक और नव्या की माँ बन गई। उसे लगा कि शायद बच्चों के आने से घर में उसकी अहमियत बढ़ेगी। लेकिन यहाँ भी उसके हाथ निराशा ही लगी। बच्चों की परवरिश का पूरा जिम्मा भी दादा-दादी ने अपने हाथों में ले लिया। बच्चों को क्या खिलाना है, किस स्कूल में भेजना है, उनके कपड़े कैसे होंगे—हर फैसला बुजुर्गों का होता। अगर अंजलि कभी बच्चों को किसी बात पर डांट भी देती, तो सास तुरंत टोक देतीं, “अरे रहने दो, तुम बच्चों को डरा रही हो। तुम्हें नहीं पता बच्चों को कैसे संभालते हैं।”

विकास भी हमेशा अपने माता-पिता का ही पक्ष लेता। धीरे-धीरे बच्चों के मन में भी यह बात बैठ गई कि घर में असली सत्ता दादा-दादी और पापा की है, माँ तो बस घर का काम करने के लिए है। जैसे-जैसे शशांक और नव्या बड़े हुए, उन्होंने भी अंजलि की बातों को अनदेखा करना शुरू कर दिया। अगर अंजलि उन्हें कुछ समझाती, तो वे चिढ़कर कहते, “मम्मी, आपको इन चीजों की समझ नहीं है, प्लीज आप रहने दीजिए।” अंजलि रात-रात भर अपने कमरे में चुपचाप रोती रहती। जिस घर को वह अपना मानकर उसमें दिन-रात खटती थी, उस घर के लोग ही उसके वजूद को नकार रहे थे। मायका पहले ही पराया हो चुका था, और ससुराल कभी उसका हो नहीं पाया।

शादी के पंद्रह साल बाद एक दिन अचानक विकास को बहुत बड़ा प्रमोशन मिला और उसका ट्रांसफर पुणे हो गया। विकास के माता-पिता ने कानपुर छोड़ने से मना कर दिया, इसलिए यह तय हुआ कि विकास, अंजलि और बच्चे ही पुणे जाएंगे। जब अंजलि को यह पता चला, तो उसके अंदर वर्षों से सोई हुई एक उम्मीद अचानक जाग उठी। उसे लगा कि आखिरकार भगवान ने उसकी सुन ली है। अब पुणे में उनका अपना घर होगा, जहाँ कोई सास उसे टोकने वाली नहीं होगी। वहाँ वह अपनी मर्जी की मालकिन होगी।

पुणे पहुँचकर शुरुआत में वे किराए के मकान में रहे, लेकिन जल्द ही विकास ने एक पॉश सोसाइटी में एक शानदार 3BHK फ्लैट खरीद लिया। जब घर की रजिस्ट्री हुई, तो अंजलि की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने सोच लिया था कि वह इस घर के कोने-कोने को अपने सपनों के अनुसार सजाएगी।

फ्लैट का पजेशन मिलते ही अंजलि ने अपने उत्साह में विकास से कहा, “विकास, ड्रॉइंग रूम में हम हल्के पीले रंग के पर्दे लगाएंगे, उससे घर में बहुत रोशनी लगेगी। और बालकनी में मैं ढेर सारे मिट्टी के गमले रखूंगी, वहाँ हम एक छोटा सा झूला भी लगाएंगे।”

लेकिन विकास ने उसकी तरफ ध्यान दिए बिना अपने फोन में देखते हुए कहा, “अंजलि, मैंने एक इंटीरियर डिजाइनर हायर कर लिया है। अब वो पुराने जमाने वाले पीले पर्दे और मिट्टी के गमले अच्छे नहीं लगते। घर का लुक एकदम मॉडर्न और मिनिमलिस्टिक होना चाहिए। डिजाइनर ने ग्रे और वाइट थीम सजेस्ट की है, वही फाइनल हो गई है।”

अंजलि ठगी सी रह गई। “लेकिन विकास, कम से कम मेरी पसंद तो पूछ लेते? ये हमारा घर है।”

विकास ने झल्लाते हुए कहा, “तुम्हारी पसंद बहुत पुरानी हो चुकी है। और प्लीज, इन सब में बहस मत करो, जो मैं कह रहा हूँ वही ठीक है।”

अंजलि का दिल एक बार फिर टूट गया। जब घर सजने लगा, तो उसने किचन में अपनी सहूलियत के हिसाब से डिब्बे और बर्तन रखने चाहे, लेकिन वहां भी शशांक और नव्या ने टोक दिया। नव्या ने मुँह बनाते हुए कहा, “मम्मी, ये क्या कबाड़खाना बना रही हो आप किचन को? ऐसे डिब्बे बाहर अच्छे नहीं लगते। पापा ने मॉड्यूलर किचन बनवाया है, सब कुछ अंदर छुपकर रहना चाहिए। आप प्लीज इसे खराब मत करो।”

शशांक ने भी बहन का साथ दिया, “हाँ मम्मी, हमारे फ्रेंड्स आएंगे तो क्या सोचेंगे? आप हर चीज को वैसे ही पुराने तरीके से मत किया करो।”

अंजलि चुपचाप किचन से बाहर आ गई। उस दिन उसे पूरी तरह से एहसास हो गया कि वह सिर्फ एक मुगालते में जी रही थी। पुणे का यह नया घर भी उसका अपना घर नहीं था। यहाँ भी वह सिर्फ एक केयरटेकर थी, जिसकी ड्यूटी घर की सफाई करना, खाना बनाना और सबके कपड़े धोना था। इस नए घर के रंग-रूप, इसके माहौल और इसके फैसलों पर उसका रत्ती भर भी अधिकार नहीं था। विकास अपनी मर्जी चलाता था, और बच्चे अपनी।

उस शाम अंजलि ग्रे थीम वाली उस ठंडी और बेजान बालकनी में खड़ी होकर दूर शहर की जगमगाती रोशनियों को देख रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन आज उन आँसुओं में शिकायत नहीं, बल्कि एक गहरा पछतावा था।

उसे अपने कॉलेज के वो दिन याद आ रहे थे जब वह अपनी क्लास में टॉप करती थी। लेकिन सिर्फ एक अच्छी शादी के लालच में उसने कभी अपने करियर के बारे में नहीं सोचा। उसने सोचा था कि पति की कमाई और पति का घर ही उसकी दुनिया होगी। आज उसे समझ आ रहा था कि जो औरत आर्थिक रूप से आज़ाद नहीं होती, उसकी अपनी कोई पहचान, अपना कोई घर नहीं होता।

“काश!” अंजलि ने मन ही मन सोचा, “काश मैंने इतनी जल्दी शादी के लिए हाँ न कहा होता। काश मैंने अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दिखाई होती। अगर आज मैं नौकरी कर रही होती, मेरे पास अपनी खुद की कमाई होती, तो शायद मेरा अपना एक छोटा सा घर होता। बहुत बड़ा नहीं, बस एक कमरा और एक बालकनी। लेकिन उस घर पर मेरा ‘पूर्ण अधिकार’ होता। वहाँ मैं अपनी मर्जी के रंग-बिरंगे पर्दे लगाती, अपनी पसंद का एक छोटा सा बगीचा बनाती जिसमें गुलाब और मोगरे महकते। वहाँ मैं एक लकड़ी का झूला लगाती, जिस पर बैठकर, बिना किसी की इजाजत लिए, मैं अपनी पसंद की कोई किताब पढ़ती और गुनगुनाती। काश… मेरा अपना कोई घर होता।”

अंजलि की वह काश, आज भी उस आधुनिक फ्लैट की दीवारों के बीच कहीं सिसक रही है, इस सच्चाई के साथ कि औरत का अपना घर तब तक नहीं होता, जब तक वह खुद उसे अपनी मेहनत और स्वावलंबन की नींव पर खड़ा न करे।

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मूल लेखिका : मंगला श्रीवास्तव

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