अंशुमन अब पूरी तरह से झुंझला चुका था। उसे लग रहा था कि उसकी माँ उसकी भावनाओं और उसके डर को समझने के बजाय सिर्फ समाज की रीतियों को महत्व दे रही हैं। उसने चिढ़कर कहा, “माँ, आप नहीं समझेंगी। मुझे ऐसे किसी विश्वास की ज़रूरत नहीं है जिसका टूटना मेरी और आपकी बर्बादी का कारण बने। आप दीदियों के बच्चों को खिलाकर ही अपनी ममता पूरी कर लीजिए। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। अगर इस घर में मेरे सुकून से ज़्यादा मेरी शादी ज़रूरी है, तो मेरा यहाँ न आना ही बेहतर है।”
बनारस की सुबह हमेशा की तरह गंगा घाट की आरती और मंदिरों की घंटियों की गूँज के साथ हुई थी। पचपन वर्षीया सावित्री देवी ने तुलसी में जल चढ़ाया और अपनी आँखें मूँद कर ईश्वर से बस एक ही प्रार्थना की— “हे महादेव, मेरे अंशुमन को हमेशा खुश रखना और जल्दी से उसके जीवन में एक संस्कारी जीवनसाथी भेज देना, ताकि मेरा यह सूना घर फिर से आबाद हो सके।” सावित्री देवी के पति का देहांत कई साल पहले हो चुका था। अपनी दोनों बड़ी बेटियों, निशा और मेघा की शादी उन्होंने बहुत धूमधाम से की थी और अब वे दोनों अपने-अपने ससुराल में बेहद खुश थीं। बेटियों के जाने के बाद सावित्री देवी का पूरा जीवन उनके सबसे छोटे बेटे अंशुमन के इर्द-गिर्द ही सिमट गया था।
अंशुमन बचपन से ही पढ़ाई में बहुत होशियार था। बनारस की गलियों से निकलकर उसने दिल्ली के आईआईटी से इंजीनियरिंग की और आज वह गुड़गाँव में अपनी खुद की एक बहुत ही सफल आईटी कंपनी चला रहा था। उसकी मेहनत और लगन ने उसे उस मुकाम पर पहुँचा दिया था, जहाँ पहुँचने का सपना हर युवा देखता है। उसने गुड़गाँव के एक पॉश इलाके में अपना एक शानदार पेंटहाउस खरीद लिया था और सुख-सुविधा की हर चीज़ उसके पास मौजूद थी। दौलत, शोहरत और कामयाबी, सब कुछ अंशुमन के कदम चूम रही थी। लेकिन इन सबके बावजूद, सावित्री देवी के मन में एक ही कसक बाकी थी— उनके बेटे का अकेलापन।
काम की व्यस्तता के कारण अंशुमन बनारस बहुत कम आ पाता था। जब भी वह घर आता, तो सावित्री देवी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। पूरे घर में अंशुमन की पसंद के पकवानों की महक फैल जाती। इस बार दीपावली के अवसर पर जब अंशुमन ने बताया कि वह पूरे चार दिन की छुट्टी लेकर घर आ रहा है, तो सावित्री देवी ने पूरे घर को किसी दुल्हन की तरह सजा दिया। अंशुमन के आने से घर में जैसे फिर से रौनक लौट आई थी। लेकिन हर बार की तरह, इस बार भी माँ-बेटे के बीच उस एक विषय पर चर्चा होना तय था, जिससे अंशुमन हमेशा भागता था।
त्योहार की शाम थी। घर में चारों तरफ दीये जल रहे थे। अंशुमन सोफे पर बैठकर अपने लैपटॉप पर कुछ काम निपटा रहा था। सावित्री देवी उसके पास आईं, उसके माथे को प्यार से सहलाया और उसके बगल में बैठ गईं। थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद, सावित्री देवी ने आखिरकार अपने दिल की बात जुबान पर ला ही दी, “अंशु… अब तूने सब कुछ हासिल कर लिया है। घर है, गाड़ी है, तेरा अपना इतना बड़ा काम है। अब और किस चीज़ का इंतज़ार है बेटा? मेरी उम्र का भी अब क्या भरोसा। आज हूँ, कल नहीं। मैं चाहती हूँ कि मेरे जीते-जी तेरी गृहस्थी बस जाए। इस घर में भी कोई बहू आए, तेरे बच्चे इस आँगन में दौड़ें, तो मुझे भी शांति मिले।”
अंशुमन ने एक गहरी साँस ली। वह यह बात कई बार सुन चुका था और हर बार मुस्कुरा कर टाल देता था। उसने लैपटॉप बंद किया और बोला, “माँ, आप फिर शुरू हो गईं? मैं अभी अपनी ज़िंदगी में बहुत खुश हूँ। मुझे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होती। आप क्यों बिना बात के परेशान होती हैं?”
सावित्री देवी ने थोड़ी भावुक होते हुए कहा, “बेटा, जब तक इंसान जवान रहता है, उसे अकेलेपन का एहसास नहीं होता। लेकिन उम्र ढलने के बाद एक सहारे की ज़रूरत होती है। मैं तेरी शादी करके अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होना चाहती हूँ।”
तभी अंशुमन का ध्यान सामने टेबल पर रखे उसके स्मार्टफोन पर गया, जिस पर एक न्यूज़ नोटिफिकेशन फ्लैश हो रहा था। उसने फोन उठाया और वह खबर पढ़ने लगा। खबर पढ़ते ही अंशुमन के चेहरे के भाव अचानक कठोर हो गए और उसकी आँखों में एक अजीब सी खीज और गुस्सा उतर आया। उसने फोन का स्क्रीन अपनी माँ की तरफ घुमाते हुए कहा, “आप मेरी शादी की बात कर रही हैं ना माँ? ज़रा इस खबर को पढ़िए। आपको पता है ये कौन है? यह बेंगलुरु का एक बहुत बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। इसकी पत्नी ने शादी के मात्र छह महीने बाद इस पर और इसके बूढ़े माँ-बाप पर दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा का झूठा केस ठोक दिया। इस आदमी ने अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई उस लड़की को बतौर एलिमनी (गुज़ारा भत्ता) दे दी, ताकि इसके माता-पिता को जेल न जाना पड़े। अंत में सामाजिक बदनामी और मानसिक तनाव से हारकर कल रात इसने फाँसी लगा ली।”
सावित्री देवी थोड़ा सहम गईं, लेकिन फिर भी अपनी बात रखते हुए बोलीं, “हे भगवान! यह तो बहुत बुरा हुआ। लेकिन बेटा, इसका मतलब यह थोड़ी है कि सारी लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। दुनिया में अच्छे लोग भी तो हैं। हम अच्छी तरह ठोक-बजाकर, किसी अच्छे और संस्कारी परिवार की लड़की ढूँढेंगे।”
अंशुमन का स्वर अब थोड़ा ऊँचा हो गया था। उसमें गुस्सा कम और एक गहरा डर ज़्यादा था। उसने कहा, “माँ, आप आज की दुनिया को नहीं जानतीं। समाज और कानून सब बदल चुका है। आजकल शादी का मतलब एक जुआ हो गया है, जहाँ जीतने की कोई गारंटी नहीं, लेकिन हारने पर इंसान की पूरी ज़िंदगी, उसकी इज़्ज़त, उसकी मेहनत सब कुछ पल भर में खाक हो जाता है। कुछ दिन पहले ही मैंने एक और खबर पढ़ी थी, जहाँ शादी के मंडप से पहले ही लड़की वालों ने लड़के वालों को बंधक बना लिया था। कुछ लड़कियाँ शादी करके आती हैं और सिर्फ पैसों के लिए, अपनी आज़ादी के लिए, लड़कों पर और उनके निर्दोष माँ-बाप पर झूठे मुक़दमे कर देती हैं।”
वह अपनी जगह से उठा और कमरे में टहलते हुए आगे बोला, “माँ, मैंने पिछले बारह सालों तक दिन-रात एक करके यह मुकाम हासिल किया है। मैंने अपने सपनों को मारकर, बारह-बारह घंटे काम करके यह सुकून कमाया है। मैं अपनी इस शांति भरी ज़िंदगी में किसी ऐसी इंसान को नहीं लाना चाहता, जो एक दिन अचानक उठकर मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगा दे और मेरी सालों की मेहनत एक झटके में बर्बाद कर दे। और सबसे बड़ी बात… मैं किसी भी कीमत पर यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कल को किसी झूठे केस की वजह से आपको इस उम्र में पुलिस स्टेशन या कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ें। आप मेरे लिए मेरी मौत का और अपनी बदनामी का सामान इस घर में क्यों लाना चाहती हैं?”
सावित्री देवी ने अंशुमन के इस रूप को पहले कभी नहीं देखा था। वे जानती थीं कि अंशुमन कोई क्रूर या स्त्रियों से नफरत करने वाला इंसान नहीं था। उसकी बातों में जो खटास थी, वह असल में उसका एक गहरा डर था। वह अपनी और अपनी माँ की सुरक्षा को लेकर डरा हुआ था। फिर भी, एक माँ होने के नाते उन्होंने उसे शांत करने की कोशिश की। उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, हर रिश्ता एक विश्वास पर टिका होता है। अगर हम पहले से ही बुरा सोच लेंगे, तो ज़िंदगी कैसे चलेगी? जो गलत करते हैं, उन्हें सज़ा मिलती है, पर कुछ बुरे लोगों की वजह से हम ज़िंदगी जीना तो नहीं छोड़ सकते न!”
अंशुमन अब पूरी तरह से झुंझला चुका था। उसे लग रहा था कि उसकी माँ उसकी भावनाओं और उसके डर को समझने के बजाय सिर्फ समाज की रीतियों को महत्व दे रही हैं। उसने चिढ़कर कहा, “माँ, आप नहीं समझेंगी। मुझे ऐसे किसी विश्वास की ज़रूरत नहीं है जिसका टूटना मेरी और आपकी बर्बादी का कारण बने। आप दीदियों के बच्चों को खिलाकर ही अपनी ममता पूरी कर लीजिए। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। अगर इस घर में मेरे सुकून से ज़्यादा मेरी शादी ज़रूरी है, तो मेरा यहाँ न आना ही बेहतर है।”
यह कहते हुए अंशुमन तेज़ी से अपने कमरे की तरफ गया और अपना सूटकेस निकालकर उसमें अपने कपड़े ठूँसने लगा। उसे लग रहा था कि घर में अब वह शांति नहीं रही जिसकी तलाश में वह बनारस आता था।
सावित्री देवी दरवाज़े पर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनका दिल धक से रह गया। वे एक बेहद समझदार और ज़मीनी हकीकत से जुड़ी महिला थीं। उन्होंने पल भर में महसूस कर लिया कि उनका बेटा किसी काल्पनिक डर से नहीं, बल्कि समाज में रोज़ घट रही वास्तविक घटनाओं के कारण मानसिक तनाव में है। उन्होंने यह भी समझ लिया कि एक माँ की ज़िद से ज़्यादा अहम एक बच्चे की मानसिक शांति है। अगर उनका बेटा इसी हाल में खुश है, तो उसे समाज की बेड़ियों में बाँधकर घुटन की तरफ धकेलना कहाँ का न्याय है?
वे तुरंत कमरे के अंदर गईं और सूटकेस की ज़िप बंद कर रहे अंशुमन का हाथ मज़बूती से पकड़ लिया।
अंशुमन ने हैरानी से माँ की तरफ देखा। सावित्री देवी की आँखों में एक अजीब सी नमी थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक गहरी शांति और समझदारी झलक रही थी। उन्होंने बेहद कोमल, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “तुझे शादी नहीं करनी है… तो मत कर। मैं आज के बाद कभी तेरे सामने यह ज़िक्र नहीं करूँगी। तेरा सुकून, तेरी खुशी और तेरी मुस्कान से बढ़कर मेरे लिए इस दुनिया में और कुछ नहीं है। लेकिन… इस तरह अपनी माँ को छोड़कर मत जा। कुछ दिन तो अपनी इस बूढ़ी माँ के पास रुक जा बेटा। तेरी दीदियों के जाने के बाद, यह घर वैसे ही बहुत खाली हो गया है, अब तू भी चला जाएगा तो मैं किससे लड़ूँगी?”
माँ के मुँह से ये शब्द सुनकर अंशुमन का सारा गुस्सा, सारी झुंझलाहट जैसे छूमंतर हो गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि वह अपनी माँ से कितनी रूखाई से बात कर रहा था। उसने सूटकेस का हैंडल छोड़ दिया और अपनी आँखें नीची कर लीं।
सावित्री देवी ने माहौल का भारीपन कम करने के लिए एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “लो, अब सूटकेस किनारे रख दो। और यह बताओ… खाने में आज तुम्हारे लिए गरमा-गरम आलू के पराठे और खीर बना रही हूँ। खाएगा ना?”
अंशुमन की आँखों में भी नमी तैर गई। उसने सूटकेस को पैर से खिसका कर बेड के नीचे धकेला और माँ के गले लगते हुए बच्चों जैसी मासूमियत से मुस्कुरा कर बोला, “हाँ माँ, लेकिन खीर में बादाम और पिस्ता ज़्यादा डालना… और पराठे के साथ वो तीखी वाली हरी चटनी भी चाहिए।”
सावित्री देवी ने उसे पुचकारते हुए कहा, “इतनी बड़ी कंपनी का मालिक बन गया, लेकिन तेरी फरमाइशें और तेरा ये बचपना आज भी नहीं गया।”
वे प्यार से बुदबुदाती हुई रसोई की तरफ चल दीं और अंशुमन एक गहरी शांति और सुकून के साथ वापस अपने सोफे पर बैठ गया। आज उसे महसूस हुआ कि दुनिया की कोई भी चिंता या डर उस चौखट के अंदर नहीं आ सकता, जहाँ एक माँ अपने बच्चे के सुकून को दुनिया के हर नियम से ऊपर रखती है।
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