“अरे कोई है? जरा इस मनहूस को मेरी आँखों के सामने से हटाओ! मैंने तो सोचा था कि इस बार घर में कुल का दीपक जलेगा, लेकिन मेरी किस्मत ही खोट निकली। फिर से पत्थर का जन्म हो गया।”
शांति देवी ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए जैसे ही ये शब्द कहे, पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। प्रसूति गृह के बाहर खड़े उनके बेटे रमेश के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। रमेश की पत्नी, नीता ने कुछ ही मिनटों पहले अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया था। शांति देवी, जो पिछले नौ महीनों से अपने होने वाले पोते के लिए मन्नतें मांग रही थीं, अब निराशा और क्रोध से भर उठी थीं।
रमेश एक साधारण सरकारी कर्मचारी था। विवाह के तीन साल बाद जब उनकी पहली बेटी, अंजलि का जन्म हुआ था, तब भी शांति देवी ने मुँह सिकोड़ लिया था। लेकिन तब उन्होंने खुद को यह कहकर तसल्ली दे दी थी कि ‘चलो, पहली बेटी तो लक्ष्मी होती है, अगली बार भगवान बेटा ही देगा।’ मगर अब, दूसरी बार भी बेटी होने पर उनका धीरज जवाब दे गया था। उन्हें लगता था कि बिना पोते के उनके स्वर्गीय पति का नाम आगे कैसे बढ़ेगा। उनका मानना था कि बेटियां तो पराया धन होती हैं, उन्हें चाहे जितना पढ़ा-लिखा लो, अंत में उन्हें दूसरे के घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना है।
नीता, जो अस्पताल के बिस्तर पर लेटी दर्द से कराह रही थी, अपनी सास के ये कठोर शब्द सुनकर फूट-फूट कर रोने लगी। रमेश ने उसे ढांढस बंधाया और कहा, “माँ की बातों पर ध्यान मत दो नीता। मेरे लिए मेरी बेटियां किसी बेटे से कम नहीं हैं। हम इन्हें इतना काबिल बनाएंगे कि दुनिया देखती रह जाएगी।” रमेश ने अपनी नवजात बच्ची का नाम ‘सृष्टि’ रखा।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। अंजलि और सृष्टि धीरे-धीरे बड़ी होने लगीं। शांति देवी का व्यवहार उनके प्रति हमेशा रूखा ही रहता था। वे दोनों बच्चियों को कभी प्यार से पास नहीं बिठाती थीं। अगर दोनों बहनें कभी खेल-खेल में थोड़ा शोर भी कर देतीं, तो शांति देवी उन्हें बुरी तरह डांट देती थीं। नीता दिन-रात घर का काम करती, अपनी बेटियों को संभालती और सास के ताने सुनती। रमेश अपनी छोटी सी तनख्वाह में घर का खर्च और बेटियों की पढ़ाई का बोझ उठा रहा था।
इस जले पर नमक छिड़कने का काम करती थीं शांति देवी की बड़ी बहन, विमला मासी। विमला मासी पास के ही एक अमीर मोहल्ले में रहती थीं। उनके दो पोते थे— राहुल और कुणाल। विमला जब भी शांति देवी से मिलने आतीं, तो उनके पास बात करने का एक ही विषय होता था— उनके पोते।
“अरे शांति, तूने तो अपने कर्म ही फोड़ लिए। देख मेरे राहुल को, अभी से स्कूल में कितने ईनाम जीत कर लाता है। और कुणाल? वो तो कहता है कि दादी मैं बड़ा होकर आपको हवाई जहाज़ में घुमाऊंगा। तेरे हिस्से में तो बस इन लड़कियों का दहेज जुटाना ही लिखा है। जितना हो सके पैसे बचा ले, वरना आगे चलकर बहुत रोना पड़ेगा।” विमला मासी पान चबाते हुए अपनी पोतियों की तरफ तिरस्कार भरी नज़रों से देखतीं।
शांति देवी ये सब सुनकर और भी कुढ़ जातीं। वो रमेश से अक्सर लड़तीं, “इन लड़कियों को इतने महंगे स्कूल में पढ़ाने की क्या ज़रूरत है? सरकारी स्कूल में डाल दे। आखिर में तो इन्हें रोटियां ही बेलनी हैं। विमला के पोते देखना एक दिन उनका कितना नाम रोशन करेंगे, और तू… तू बस अपनी जिंदगी इन पर लुटा दे।”
रमेश हमेशा एक ही जवाब देता, “माँ, आप चिंता मत कीजिए। मेरी बेटियां मेरा अभिमान हैं।”
अंजलि बचपन से ही बहुत गंभीर और समझदार थी। वो जानती थी कि उसके माता-पिता किन मुश्किलों से उन्हें पढ़ा रहे हैं। वो रात-रात भर जागकर पढ़ाई करती। सृष्टि थोड़ी चुलबुली थी, लेकिन उसका दिमाग बहुत तेज़ था। उसे कानून और राजनीति में बहुत दिलचस्पी थी। दोनों बहनें अपनी दादी के तानों को चुपचाप सुन लेतीं, लेकिन कभी पलटकर जवाब नहीं देती थीं। नीता ने उन्हें यही संस्कार दिए थे कि बड़ों का हमेशा सम्मान करना चाहिए, चाहे वे कितने भी कठोर क्यों न हों।
दस साल बीत गए। रमेश ने अपनी दिन-रात की मेहनत और पाई-पाई जोड़कर अंजलि का दाखिला मेडिकल कॉलेज में करवा दिया। अंजलि डॉक्टर बनना चाहती थी। वहीं दूसरी तरफ, सृष्टि ने वकालत की पढ़ाई के लिए एक नामी यूनिवर्सिटी में प्रवेश परीक्षा पास कर ली थी। शांति देवी अब काफी बूढ़ी हो चुकी थीं, लेकिन उनके स्वभाव में कोई खास बदलाव नहीं आया था। वो अब भी यही मानती थीं कि रमेश अपना पैसा बर्बाद कर रहा है।
इस बीच, विमला मासी का घमंड आसमान छूने लगा था। उनके पोते अब बड़े हो चुके थे। राहुल ने कोई पढ़ाई नहीं की थी और वो पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने के नाम पर दोस्तों के साथ पैसे उड़ाता था। कुणाल तो बुरी संगति में पड़ चुका था। लेकिन विमला मासी अभी भी समाज में अपनी झूठी शान बघारने से बाज़ नहीं आती थीं।
एक दिन अंजलि अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करके घर लौटी। पूरे मोहल्ले में रमेश की बेटी के डॉक्टर बनने की खबर फैल गई। कुछ ही समय बाद, अंजलि को शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में नौकरी मिल गई। घर की आर्थिक स्थिति अब सुधरने लगी थी। नीता के चेहरे पर जो थकान पिछले बीस सालों से छाई हुई थी, वो अब अपनी बेटी की सफलता की चमक से गायब होने लगी थी। अंजलि ने अपनी पहली तनख्वाह लाकर अपनी दादी शांति देवी के हाथों में रख दी।
शांति देवी ने उन पैसों को देखा, उनके हाथ थोड़े कांपे, लेकिन फिर उन्होंने पैसे एक तरफ रख दिए और धीरे से कहा, “पैसे तो ठीक हैं, लेकिन बेटी का पैसा खाना हमारे यहाँ शुभ नहीं माना जाता।”
सृष्टि जो पास ही खड़ी थी, उसने मुस्कुरा कर कहा, “दादी, ये किसी पराए का नहीं, आपकी अपनी पोती की मेहनत की कमाई है। इसमें कोई पाप नहीं है।” सृष्टि भी अब एक होनहार वकील बन चुकी थी और अपनी प्रैक्टिस शुरू कर चुकी थी।
वक्त ने अचानक एक करवट ली। सर्दियों की एक शाम थी। घर में अंजलि और सृष्टि अपने माता-पिता के साथ चाय पी रही थीं। शांति देवी अपनी चारपाई पर बैठी माला फेर रही थीं। तभी दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई।
रमेश ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर विमला मासी खड़ी थीं। उनके बाल बिखरे हुए थे, कपड़े मैले थे और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी। वो दरवाज़े पर ही धम्म से बैठ गईं और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं।
शांति देवी घबराकर उठीं और उनके पास दौड़ीं, “क्या हुआ जीजी? तुम इस हालत में यहाँ कैसे? राहुल और कुणाल कहाँ हैं?”
विमला मासी ने शांति देवी को गले लगा लिया और दहाड़ मार कर रोने लगीं, “लुट गई शांति… मैं पूरी तरह से बर्बाद हो गई! जिन पोतों पर मुझे इतना गुमान था, उन्होंने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। मेरे बेटे के मरने के बाद, दोनों ने मिलकर सारी संपत्ति अपने नाम करवा ली। राहुल ने बिज़नेस में इतना बड़ा नुकसान किया कि घर तक गिरवी रख दिया। और जब मैंने विरोध किया… तो… तो कुणाल ने मुझे धक्का मार दिया। मेरी बहू ने मेरे कपड़े एक बैग में ठूंसे और मुझे घर से बाहर निकाल दिया। कह रही थी कि बुढ़िया यहाँ पड़ी-पड़ी रोटियां तोड़ती है। मेरा तो कोई ठिकाना ही नहीं रहा…”
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। शांति देवी हक्की-बक्की रह गईं। जिन पोतों की मिसालें देकर वो अपनी पोतियों को कोसती थीं, आज वही पोते अपनी सगी दादी को सड़क पर ले आए थे।
तभी सृष्टि आगे आई। उसने विमला मासी को सहारा देकर उठाया और सोफ़े पर बैठाया। अंजलि तुरंत अंदर गई और अपनी मेडिकल किट ले आई। उसने विमला मासी का ब्लड प्रेशर चेक किया और उन्हें एक दवा दी। “आप शांत हो जाइए मासी जी, सब ठीक हो जाएगा,” अंजलि ने प्यार से उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
सृष्टि ने एक गिलास पानी उन्हें दिया और दृढ़ आवाज़ में बोली, “मासी जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। उन्होंने आपको घर से ऐसे कैसे निकाल दिया? सीनियर सिटिजन एक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत मैं उन दोनों भाइयों को ऐसा सबक सिखाऊंगी कि वो ज़िंदगी भर याद रखेंगे। आपका घर, आपका सम्मान, सब आपको वापस मिलेगा। कल ही मैं कोर्ट में उनके खिलाफ पिटीशन फाइल करूंगी। आप अब हमारे साथ, इसी घर में रहेंगी।”
विमला मासी ने नम आँखों से दोनों बहनों को देखा। उन्हें अपने वो सारे ताने याद आने लगे जो उन्होंने कभी इन दोनों के जन्म पर दिए थे। वो हाथ जोड़कर नीता और रमेश के सामने रोने लगीं, “मुझे माफ़ कर दो रमेश, नीता। मैंने हमेशा तुम्हारी बेटियों को बोझ समझा, अपनी झूठी शान के आगे तुम्हारी असली दौलत को कभी नहीं पहचान पाई। आज जिन बेटों ने मुझे ठुकरा दिया, वही बेटियां मुझे सहारा दे रही हैं।”
शांति देवी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनका मन आत्मग्लानि और पछतावे की आग में जल रहा था। उन्होंने जीवन भर जिस ‘कुल के दीपक’ की आस में अपने घर की लक्ष्मी को दुत्कारा था, आज उसी लक्ष्मी ने उनके परिवार का मान बढ़ाया था।
शांति देवी धीरे-धीरे चलकर अंजलि और सृष्टि के पास आईं। उन्होंने अपने दोनों हाथ फैलाए और अपनी दोनों पोतियों को कसकर अपने सीने से लगा लिया। शांति देवी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे।
“मुझे माफ़ कर दो मेरी बच्चियों,” शांति देवी की आवाज़ भर्राई हुई थी। “मैं अंधी हो गई थी। पुरानी सोच ने मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। मैं समझती थी कि वंश तो सिर्फ बेटों से चलता है, लेकिन तुम दोनों ने साबित कर दिया कि घर की असली बुनियाद, घर की असली रौशनी बेटियां ही होती हैं। मेरा गुरूर टूट गया। सच में, मेरी तकदीर तो बहुत अच्छी थी जो भगवान ने मुझे तुम जैसी पोतियां दीं।”
रमेश और नीता की आँखों में भी खुशी के आँसू थे। सालों का दर्द आज हमेशा के लिए धुल गया था। विमला मासी का केस सृष्टि ने लड़ा और कुछ ही महीनों में उन्हें उनका हक वापस दिला दिया। शांति देवी का बचा हुआ जीवन अब अपनी पोतियों के गर्व और प्यार की छाँव में बीत रहा था। उन्हें अब किसी कुल के दीपक की कोई तलाश नहीं थी, क्योंकि उनके घर को रोशन करने के लिए उनकी दो बेटियां ही काफी थीं।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता