संस्कार कभी व्यर्थ नहीं जाते – निमिषा गोस्वामी

“सुहानी… ऐ सुहानी! अरे यार, जल्दी करो, देर हो रही है।”

मनु अपनी पत्नी को तेज़ आवाज़ में बुला रहा था।

“आ रही हूँ, बस दो मिनट और इंतज़ार करो।” सुहानी ने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया।

“उफ़! ये महिलाएँ भी…” कहते हुए मनु पास पड़े सोफे पर धम्म से बैठ गया। वह आँखें बंद करके बैठा ही था कि सुहानी ने आकर उसके कंधों पर हाथ रख दिए।

“देखो, मैं आ गई। बताओ, कैसी लग रही हूँ?”

मनु ने आँखें खोलीं और उसे देखते ही सिर पकड़ लिया।

“सुहानी! हम लोग जमीन की रजिस्ट्री करवाने जा रहे हैं, किसी पार्टी में नहीं।”

“हाँ-हाँ, मालूम है जानू,” सुहानी उसका हाथ पकड़ते हुए बोली, “लेकिन लोगों को लगना चाहिए कि मैं एक अधिकारी की बीवी हूँ।”

मनु मुस्कराया, “सरकार, मैं कोई आईएएस या आईपीएस नहीं हूँ। मैं बैंक का मैनेजर हूँ।”

“समझ गई,” सुहानी हँसते हुए बोली।

दोनों खिलखिलाकर हँसने लगे। तभी उनका पाँच वर्षीय बेटा मोंटी अपनी दादी राजेश्वरी जी का हाथ पकड़े वहाँ आ गया।

“मम्मी-पापा, आप दोनों कहाँ जा रहे हो? मैं भी चलूँगा। और दादी को क्यों छोड़ रहे हो? इन्हें भी साथ ले चलो।”

“नहीं बेटा,” मनु ने प्यार से समझाया, “हम लोग जरूरी काम से जा रहे हैं। वहाँ दादी की जरूरत नहीं है। वे घर पर तुम्हारे साथ रहेंगी।”

तभी सुहानी ने भी कहा, “हाँ-हाँ, वहाँ माँ जी का कोई काम नहीं है।”

मनु ने तुरंत उसे आँखों से चुप रहने का इशारा किया। सुहानी खामोश हो गई।

राजेश्वरी जी मुस्कराकर बोलीं, “अरे बेटा, तुम लोग जाओ। मैं और मेरा पोता यहीं रहेंगे।”

बात तो साधारण थी, लेकिन उनके मन को ठेस लगी थी। फिर भी उन्होंने अपने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी।

“अच्छा माँ, हम चलते हैं। आज रजिस्ट्री हो जाए, फिर मुझे एक महीने की ट्रेनिंग के लिए मुंबई जाना है।”

“ठीक है बेटा, जाकर आओ,” राजेश्वरी जी ने कहा।

बेटे-बहू के जाने के बाद वे मोंटी को लेकर अपने कमरे में चली गईं। मोंटी खिलौनों से खेलने लगा और राजेश्वरी जी अपने दिवंगत पति रमेश की तस्वीर के सामने रखी आरामकुर्सी पर बैठ गईं।

आज उन्हें सचमुच बुरा लगा था, जब मनु ने कहा था कि वहाँ दादी की जरूरत नहीं है। लेकिन वे हमेशा की तरह चुप रहीं।

आँखें बंद होते ही यादों का दरवाज़ा खुल गया।

पच्चीस वर्ष पहले जब उन्होंने और उनके पति रमेश ने आगरा में घर खरीदा था, तब उन्होंने अपनी सास को भी रजिस्ट्री के समय साथ ले जाने की जिद की थी। उनका मानना था कि बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद हर शुभ कार्य में आवश्यक होता है।

लेकिन घर खरीदने के एक वर्ष बाद ही एक सड़क दुर्घटना में रमेश का निधन हो गया। जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा हो। कुछ समय बाद उनकी सास भी संसार छोड़ गईं।

उस समय मनु केवल एक वर्ष का था।

राजेश्वरी जी ने पति की नौकरी पर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त की। नौकरी, घर और छोटे बच्चे की जिम्मेदारी—सब कुछ अकेले संभाला। संघर्ष बहुत थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

उन्होंने मनु को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी दिए।

समय बीतता गया। मनु बड़ा हुआ, पढ़ा-लिखा और बैंक में मैनेजर बन गया। उस दिन राजेश्वरी जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

अब उनकी एक ही इच्छा थी—मनु की शादी।

रिश्ते आने लगे। एक दिन उनकी सहेली मीना और उनके पति रवि अपनी बेटी सुहानी का रिश्ता लेकर आए।

दोनों परिवार वर्षों पुराने मित्र थे। मीना और रवि ने भी अपनी बेटी को अच्छे संस्कार दिए थे। राजेश्वरी जी को लड़की पसंद थी। मनु ने भी हाँ कर दी और धूमधाम से विवाह हो गया।

सुहानी पढ़ी-लिखी, समझदार और संस्कारी लड़की थी। वह घर भी अच्छे से संभाल रही थी। कुछ समय बाद मोंटी का जन्म हुआ और घर में खुशियाँ बढ़ गईं।

सब कुछ अच्छा चल रहा था।

लेकिन आज सुहानी के उन शब्दों ने राजेश्वरी जी के मन को चोट पहुँचा दी थी—”वहाँ माँ जी का कोई काम नहीं है।”

उसी सोच में डूबी उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

तभी किसी ने उनके कंधे हिलाए।

“दादी… दादी… आप रो क्यों रही हो?”

मोंटी उनके आँसू पोंछ रहा था।

राजेश्वरी जी ने मुस्कराकर कहा, “कुछ नहीं बेटा। बस ऐसे ही आँखों में पानी आ गया।”

“क्या आपको दादाजी की याद आ रही है?”

“अरे पगले, जब तू मेरे साथ है तो मुझे किसी की याद क्यों आएगी?”

तभी दरवाजे की घंटी बजी।

“लगता है तेरे मम्मी-पापा आ गए। चल, दरवाजा खोल।”

मोंटी दौड़ पड़ा।

कुछ देर बाद मनु और सुहानी घर लौट आए।

“माँ, रजिस्ट्री हो गई। बहुत थक गया हूँ,” मनु बोला।

“मैं भी,” सुहानी ने कहा।

“तुम दोनों बैठो, मैं चाय बनाकर लाती हूँ,” राजेश्वरी जी बोलीं।

चाय पीते समय मनु ने कहा, “माँ, कल मुझे मुंबई के लिए निकलना है।”

“हाँ बेटा, याद है।”

तभी सुहानी बोली, “मैं आपकी पैकिंग कर दूँगी।”

“एक बात का ध्यान रखना,” मनु ने मुस्कराते हुए कहा, “मेरी माँ का ख्याल अच्छे से रखना।”

“ओके सर,” सुहानी हँस दी।

रात को जब सब बैठे थे, तभी मोंटी अचानक बोला—

“पापा, आज दादी दादाजी को याद करके रो रही थीं।”

मनु तुरंत माँ की ओर देखने लगा।

राजेश्वरी जी ने बात टाल दी, “अरे, कभी-कभी तुम्हारे पिताजी की याद आ जाती है।”

मनु ने उनके हाथ पकड़ लिए।

“माँ, आपको अपने बेटे पर भरोसा नहीं है क्या? आपके संस्कार व्यर्थ नहीं जाएँगे।”

राजेश्वरी जी की आँखें भर आईं।

“मुझे अपने बेटे पर पूरा भरोसा है।”

अगली सुबह मनु मुंबई के लिए रवाना हो गया। सुहानी ने उसकी तैयारी में कोई कमी नहीं छोड़ी।

मनु के जाने के कुछ घंटे बाद ही उसकी सहेली रीना का फोन आया।

“सुनो सुहानी, हम चार सहेलियाँ मसूरी घूमने जा रही हैं। तुम भी चलोगी क्या?”

“मैं कैसे जा सकती हूँ? माँ जी घर पर हैं और मनु भी बाहर गए हैं।”

रीना हँस पड़ी।

“अरे, यही तो सबसे आसान बात है। मोंटी को नाना-नानी के पास छोड़ दो।”

“और माँ जी?”

“उसका भी इंतज़ाम हो जाएगा।”

सुहानी कुछ समझ नहीं पाई।

“तुम बस तैयार रहो। मैं शाम को आती हूँ।”

शाम को रीना घर पहुँची। दोनों बगीचे में बैठकर चाय पीने लगीं।

कुछ देर बाद रीना बोली, “देख सुहानी, एक महीना बहुत होता है। तू अपनी सास को कैसे झेलेगी?”

“क्या मतलब?”

“जब तक मनु बाहर हैं, तब तक उन्हें वृद्धाश्रम भेज दे।”

सुहानी स्तब्ध रह गई।

“क्या? तुम कैसी बातें कर रही हो?”

“अरे, घर से थोड़ी निकाल रही हो। बस कुछ दिनों के लिए भेज रही हो। फिर वापस ले आना।”

सुहानी चुप हो गई। रीना लगातार उसे समझाती रही।

धीरे-धीरे उसके मन में भी यह बात बैठने लगी।

उसी समय मोंटी ने उनकी सारी बातें सुन लीं।

वह चुपचाप अपने नाना-नानी को फोन करके सब बता आया।

मोंटी के नाना ने उसे समझाया, “बेटा, अभी अपनी मम्मी से कुछ मत कहना। हम सब संभाल लेंगे।”

उधर सुहानी ने निर्णय ले लिया था।

रात तक उसकी और राजेश्वरी जी की पैकिंग हो चुकी थी।

जब राजेश्वरी जी ने पूछा, “मैं कहाँ जा रही हूँ?” तो सुहानी ने नजरें चुराते हुए कहा—

“माँ जी, बस कुछ दिनों के लिए एक आरामदायक जगह पर।”

राजेश्वरी जी उसकी ओर देखती रह गईं।

उन्हें अब सब समझ में आने लगा 

रात को सुहानी ने अपनी माँ को फोन करके सारी बात बताई। मीना जी ने उसे बहुत समझाया।

“बेटा, यह ठीक नहीं है। अगर परेशानी है तो राजेश्वरी जी को मेरे पास भेज दो।”

लेकिन सुहानी अपनी जिद पर अड़ी रही।

आखिरकार मीना जी और उनके पति ने निर्णय लिया कि अब बेटी को सबक सिखाना आवश्यक है, वरना उसकी गृहस्थी खतरे में पड़ सकती है।

अगले दिन सुहानी मोंटी और राजेश्वरी जी को लेकर अपने मायके पहुँची। मोंटी को नाना-नानी के पास छोड़कर वह अपनी सहेलियों के साथ घूमने निकल गई।

उसके जाते ही मीना जी ने राजेश्वरी जी को सारी बात बता दी। यह सुनकर उनकी आँखें भर आईं, लेकिन उन्होंने किसी के प्रति कोई शिकायत नहीं की।

मीना जी हाथ जोड़कर बोलीं, “मुझे अपनी बेटी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। मुझे माफ कर दीजिए।”

राजेश्वरी जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“इसमें तुम्हारी क्या गलती है? बच्चे कभी-कभी भटक जाते हैं। उन्हें सही राह दिखाना बड़ों का काम होता है।”

मीना जी बोलीं, “मुझे पूरा विश्वास है कि आपके दिए संस्कार व्यर्थ नहीं जाएँगे।”

इसके बाद उन्होंने मनु को सारी बात बता दी।

पहले तो मनु को बहुत गुस्सा आया, लेकिन माँ और सास के समझाने पर वह शांत हो गया। तय हुआ कि सुहानी को उसकी गलती का एहसास कराया जाएगा।

दिन बीतने लगे।

मनु समय-समय पर फोन करता और माँ के बारे में पूछता। हर बार सुहानी झूठ बोल देती कि माँ उसकी माँ के साथ तीर्थयात्रा पर गई हैं।

उधर राजेश्वरी जी मीना जी के घर सम्मान और स्नेह के साथ रह रही थीं। मोंटी भी वहीं खुश था। उसका स्कूल खुल गया तो नाना जी ने उसका दाखिला पास के स्कूल में करवा दिया और पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली।

लेकिन सुहानी को जैसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। वह सहेलियों के साथ घूमने, किटी पार्टी और मौज-मस्ती में व्यस्त थी।

एक दिन अचानक मनु का फोन आया।

“सुहानी, मैं दो दिन बाद घर लौट रहा हूँ।”

यह सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

“क्या? आप दो दिन बाद आ रहे हैं?”

“हाँ, तुम्हें खुशी नहीं हुई क्या?”

“नहीं… मेरा मतलब…”

मनु ने व्यंग्य से कहा, “समय का पता ही नहीं चला होगा।”

फोन कटते ही सुहानी घबरा गई। सबसे पहले उसने रीना को फोन लगाया।

“रीना, अब क्या करूँ? मनु आने वाले हैं।”

लेकिन रीना ने साफ कह दिया, “यह तुम्हारा मामला है, अब तुम ही संभालो।”

सुहानी ने अपनी माँ को फोन किया।

“मम्मी, जल्दी बताइए माँ जी कहाँ हैं? मैं उन्हें घर लाना चाहती हूँ।”

मीना जी बोलीं, “बेटा, मैंने तो वही किया था जो तुमने कहा था। अब आगे की जिम्मेदारी तुम्हारी है।”

बहुत अनुरोध करने पर उन्होंने उसे एक वृद्धाश्रम का पता और वहाँ के कर्मचारी रीतेश का नंबर दे दिया।

अगले दिन सुहानी वृद्धाश्रम पहुँची। उसने राजेश्वरी जी की तस्वीर दिखाकर कहा—

“मैं इन्हें लेने आई हूँ।”

रीतेश ने तस्वीर देखकर कहा—

“मैडम, ये तो पाँच दिन पहले ही अपने बेटे-बहू के साथ यहाँ से चली गईं।”

“क्या? लेकिन मैं ही उनकी बहू हूँ!”

“माफ कीजिए, मैंने आपको कभी नहीं देखा। और राजेश्वरी जी ने स्वयं अपने बेटे-बहू को पहचाना था।”

सुहानी के चेहरे का रंग उड़ गया।

वह तुरंत अपनी माँ को फोन करके रोने लगी।

“मम्मी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। माँ जी कहीं नहीं मिल रही हैं।”

मीना जी ने उसे ढाढ़स बँधाया और कहा कि वे मोंटी को लेकर घर आ रही हैं।

उधर राजेश्वरी जी भी सब सुन रही थीं। उन्होंने मीना जी से कहा—

“अब उसे और मत सताओ। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है।”

लेकिन मीना जी बोलीं—

“अभी नहीं। एक दिन और। ताकि यह सीख जीवनभर याद रहे।”

अगले दिन वे दोनों मोंटी को लेकर सुहानी के घर पहुँचे।

सुहानी उन्हें देखते ही माँ से लिपटकर रोने लगी।

“मम्मी, कुछ कीजिए। मनु कल आ जाएगा।”

उसके पिता बोले—

“बेटा, उन सहेलियों से मदद माँगो जिन्होंने तुम्हें यह सलाह दी थी।”

सुहानी सिर झुकाकर रोने लगी।

मीना जी ने उसे समझाया—

“शादी के बाद जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं। सास भी माँ जैसी होती है। दूसरों के बहकावे में आकर रिश्ते नहीं तोड़े जाते।”

“मम्मी, मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है।”

उस रात सुहानी बेचैनी में सो गई।

दूसरी ओर मीना जी ने मनु को फोन करके सारी स्थिति बता दी और कहा कि वह घर आते समय राजेश्वरी जी को साथ लेकर आए।

अगली सुबह मनु का फोन आया।

“मैं एक घंटे में घर पहुँच रहा हूँ।”

सुहानी की घबराहट बढ़ गई। वह बार-बार पूछ रही थी—

“पापा, माँ जी मिलीं क्या?”

लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

तभी दरवाजे की घंटी बजी।

मोंटी दरवाजा खोलने दौड़ा और उसी क्षण सुहानी बेहोश होकर गिर पड़ी।

सब घबरा गए।

मनु भी अंदर आ चुका था। उसने सुहानी को संभाला। कुछ देर बाद उसे होश आया।

मनु को देखते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी।

“मुझे माफ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं आपकी माँ की जिम्मेदारी नहीं निभा पाई। माँ जी नहीं मिल रही हैं।”

मनु ने शांत स्वर में पूछा—

“आखिर हुआ क्या है?”

सुहानी ने रोते-रोते सारी बात सच-सच बता दी।

फिर उसके पैरों पर बैठकर बोली—

“मुझे माफ कर दो। अब ऐसी गलती कभी नहीं होगी।”

तभी दरवाजे पर खड़ी राजेश्वरी जी की आँखें भर आईं। वे अब और नहीं रुक सकीं।

अंदर आकर उन्होंने सुहानी को अपने सीने से लगा लिया।

“बस बेटा, अब और मत रो।”

सुहानी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

“माँ जी! आप कहाँ थीं?”

तभी मीना जी मुस्कराईं।

“यहीं, मेरे पास।”

इसके बाद उन्होंने शुरू से अंत तक पूरा सच बता दिया।

यह सुनकर सुहानी स्तब्ध रह गई।

“मतलब आप सब मिले हुए थे?”

“हाँ,” सभी एक साथ बोले।

मोंटी भी हँस पड़ा।

“और मैं भी।”

सुहानी ने उसे प्यार से थपकी दी।

“तुमने भी मुझे नहीं बताया!”

“अगर बता देता तो आपकी अक्ल कैसे ठिकाने आती?” मीना जी ने हँसते हुए कहा।

सभी के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखें नम थीं।

राजेश्वरी जी बोलीं—

“मीना, अगर हर माँ तुम्हारी तरह समझदारी से काम ले तो कितने परिवार टूटने से बच जाएँ।”

मनु ने भी कहा—

“मम्मी जी, आपने हमारा घर बिखरने से बचा लिया।”

मीना जी ने मुस्कराकर उत्तर दिया—

“मैंने कोई एहसान नहीं किया। माता-पिता का कर्तव्य है कि बच्चों को गलत रास्ते से वापस सही राह पर लाएँ।”

सुहानी ने राजेश्वरी जी के चरण छुए।

“माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए।”

राजेश्वरी जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

“बेटा, रिश्ते माफी से नहीं, प्यार से चलते हैं।”

घर का माहौल फिर से खुशियों से भर गया।

राजेश्वरी जी ने बेटे-बहू की नजर उतारी और उन्हें ढेरों आशीर्वाद दिए।

कुछ देर बाद सुहानी फिर अपने पुराने अंदाज में बोली—

“मैं बहुत थक गई हूँ, अब अपने कमरे में आराम करने जा रही हूँ।”

उसकी बात सुनकर सभी खिलखिलाकर हँस पड़े।

सच ही तो है—माता-पिता की समझदारी, धैर्य और संस्कार किसी भी बिखरते हुए परिवार को बचा सकते हैं।

संस्कार कभी व्यर्थ नहीं जाते।

— निमिषा गोस्वामी

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