“यह… यह क्या बकवास है!” विकास अपनी जगह से उछल पड़ा। “आप ऐसा नहीं कर सकते पिताजी! यह हमारा हक है! हम आपके खून हैं!”
शिखा भी चीखने लगी, “जरूर इस रमेश मुनीम ने या किसी और ने आपके कान भरे हैं पिताजी! आप बुढ़ापे में अपना दिमागी संतुलन खो बैठे हैं। हम इसे कोर्ट में चुनौती देंगे। आप अपनी मर्जी से हमारी संपत्ति किसी खैराती संस्था को नहीं लुटा सकते!”
सेठ दीनानाथ शहर के उन गिने-चुने रईसों में से थे, जिनकी शोहरत उनकी दौलत से कहीं ज्यादा उनकी इंसानियत और ईमानदारी के लिए थी। शहर का शायद ही कोई ऐसा अनाथालय, अस्पताल या स्कूल हो, जहां सेठ जी का गुप्त दान न पहुंचता हो। मैं, रमेश, पिछले पैंतीस सालों से सेठ जी का मुनीम और उनका सबसे करीबी राजदार रहा हूँ। मैंने उन्हें एक छोटी सी कपड़े की दुकान से शहर की सबसे बड़ी टेक्सटाइल मिल का मालिक बनते देखा था। उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था—अपने चारों बच्चों (दो बेटों, विकास और सुमित, और दो बेटियों, शिखा और रितु) को दुनिया की हर खुशी देना। सेठानी जी के जल्दी गुज़र जाने के बाद, दीनानाथ जी ने कभी अपने बच्चों को मां की कमी महसूस नहीं होने दी। लेकिन पिछले कुछ दिनों से मैं सेठ जी को देखकर बहुत परेशान था।
वे रोज़ सुबह अपनी हवेली से निकलते और शहर के बाहरी किनारे पर बहने वाली नदी के किनारे बने एक पुराने और वीरान शिव मंदिर के चबूतरे पर जाकर बैठ जाते। मैं उनके पीछे-पीछे जाता। वे घंटों वहां शून्य में ताकते रहते, और कभी-कभी उनकी झुर्रियों भरी आंखों से आंसू बहकर उनकी सफेद दाढ़ी में समा जाते। मैं उनके पास जाकर बैठता, उनसे उनके इस दुख का कारण पूछता, लेकिन वे हमेशा एक लंबी आह भरकर रह जाते और कहते, “रमेश, ज़िंदगी की किताब में मैंने जो पन्ने सबसे ज्यादा प्यार से रंगे थे, आज वही पन्ने मुझे सबसे ज्यादा चुभ रहे हैं।”
सेठ जी का भरा-पूरा परिवार था। दोनों बेटे व्यापार संभालते थे और अपनी-अपनी कोठियों में रहते थे। दोनों बेटियों की शादी भी शहर के नामी घरानों में हुई थी। दूर से देखने पर यह एक आदर्श और सुखी परिवार लगता था, लेकिन हवेली की चारदीवारी के अंदर का सच कुछ और ही था।
सेठ जी पिछले महीने गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। मुझे लगा था कि बीमारी की खबर सुनते ही चारों बच्चे अपना सारा काम छोड़कर अपने पिता की सेवा में लग जाएंगे। वे आए भी, लेकिन उनके आने का मकसद कुछ और ही था। अस्पताल के उस वीआईपी कमरे में, जहां सेठ जी ऑक्सीजन मास्क लगाए ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, उनके बच्चे उनके स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि इस बात की चर्चा कर रहे थे कि अगर पिताजी को कुछ हो गया, तो मिल का मालिकाना हक किसे मिलेगा।
जब सेठ जी थोड़े ठीक होकर हवेली वापस आए, तो एक दिन मैंने दबे पांव उनके कमरे के बाहर बच्चों की बातें सुन लीं। बड़ा बेटा विकास कह रहा था, “पिताजी अब काम तो कर नहीं सकते, हवेली भी बहुत बड़ी है, इसे बेचकर हम चारों को अपने-अपने हिस्से का पैसा ले लेना चाहिए।” छोटी बेटी रितु ने भी सुर में सुर मिलाते हुए कहा, “बिल्कुल! और पिताजी को हम लोग बारी-बारी से अपने पास रख लेंगे, एक-एक महीने के लिए। किसी एक पर बोझ भी नहीं पड़ेगा।”
दीनानाथ जी अंदर बिस्तर पर लेटे यह सब सुन रहे थे। जिस पिता ने कभी अपने बच्चों में कोई बंटवारा नहीं किया, आज वही बच्चे उसे एक ‘बोझ’ मानकर महीनों में बांट रहे थे। यह सुनकर उनका हृदय छलनी हो गया। लेकिन हद तो तब हो गई जब कुछ ही दिनों बाद, उनके पास एक कानूनी नोटिस आया। उनके ही बच्चों ने अदालत में अपनी पुश्तैनी और सेठ जी की स्वअर्जित संपत्ति में बंटवारे के लिए दावा ठोक दिया था। उनका तर्क था कि दीनानाथ जी अब मानसिक रूप से इस विशाल साम्राज्य को संभालने लायक नहीं रहे हैं, इसलिए संपत्ति तुरंत उनके नाम कर दी जाए।
यह नोटिस सेठ जी के लिए किसी मौत के फरमान से कम नहीं था। उनका रोम-रोम कांप उठा था। जिस कागज़ के टुकड़े को पढ़कर उन्हें रोना चाहिए था, उसे देखकर वे अजीब सी खामोशी में चले गए। उसके बाद से ही उनका यह रोज़ का नियम बन गया था—मंदिर की सीढ़ियों पर बैठना और खामोशी से आंसू बहाना। मैं उनका दर्द समझ रहा था, लेकिन एक मामूली मुनीम होने के नाते मैं कर भी क्या सकता था?
एक सुबह, सेठ जी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। उनकी आंखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी। उन्होंने मुझसे कहा, “रमेश, शहर के सबसे बड़े वकील सिंघानिया जी को बुलाओ। मुझे अपनी वसीयत में कुछ बदलाव करने हैं और कुछ नए दस्तावेज़ तैयार करवाने हैं।” मैंने बिना कुछ पूछे सिंघानिया जी को बुलवा लिया। दोनों के बीच कई घंटों तक बंद कमरे में बातचीत हुई। मैं नहीं जानता था कि अंदर क्या खिचड़ी पक रही है, लेकिन उस दिन के बाद से सेठ जी का मंदिर जाकर रोना बंद हो गया। वे अचानक से बहुत शांत और गंभीर हो गए थे।
दो हफ्ते बाद, दीनानाथ जी के चारों बच्चे, उनके जीवनसाथी और उनके वकील हवेली के बड़े से ड्रॉइंग रूम में इकट्ठा हुए। अदालत के नोटिस के बाद आज संपत्ति का बंटवारा होना तय था। बच्चों के चेहरे पर एक छिपी हुई मुस्कान और आंखों में लालच साफ झलक रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनका बूढ़ा और बीमार बाप उनके कानूनी दांव-पेंच के आगे घुटने टेक चुका है।
मैं एक कोने में खड़ा सब देख रहा था। दीनानाथ जी अपनी कुर्सी पर शांत बैठे थे। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। विकास ने गला साफ करते हुए कहा, “पिताजी, आप जानते हैं कि यह सब हम आपकी भलाई के लिए ही कर रहे हैं। आप अब आराम कीजिए, व्यापार और इस हवेली की चिंता हम पर छोड़ दीजिए। वकील साहब ने सारे कागज़ात तैयार कर लिए हैं, बस आपके हस्ताक्षर की ज़रूरत है।”
सुमित ने भी आगे बढ़कर एक फाइल मेज़ पर रख दी, “हां पिताजी, इसमें हवेली को बेचने और मिल के शेयर्स को हम चारों में बराबर बांटने का एग्रीमेंट है। और रही आपकी बात, तो हमने तय किया है कि आप पहले तीन महीने मेरे पास रहेंगे, फिर विकास भइया के पास… इस तरह आपको भी कोई परेशानी नहीं होगी।”
दीनानाथ जी ने वह फाइल उठाई, उसे एक नज़र देखा और फिर मुस्कुरा दिए। यह मुस्कान बहुत ठंडी और चुभने वाली थी। उन्होंने फाइल वापस मेज़ पर फेंक दी और अपने कुर्ते की जेब से एक दूसरी फाइल निकालकर सिंघानिया जी की तरफ बढ़ा दी।
सिंघानिया जी ने चश्मा ठीक किया और फाइल खोलकर पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे वे पढ़ते जा रहे थे, कमरे में सन्नाटा गहराता जा रहा था और बच्चों के चेहरों का रंग उड़ता जा रहा था। दस्तावेज़ में लिखा था कि सेठ दीनानाथ ने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति—हवेली, मिल, बैंक बैलेंस और सारे शेयर्स—शहर के सबसे बड़े अनाथालय और एक धर्मार्थ अस्पताल के नाम कर दिए हैं। बच्चों के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं छोड़ी गई थी। हवेली को एक वृद्धाश्रम में तब्दील करने का आदेश दे दिया गया था, जिसके वे खुद आजीवन ट्रस्टी रहेंगे।
“यह… यह क्या बकवास है!” विकास अपनी जगह से उछल पड़ा। “आप ऐसा नहीं कर सकते पिताजी! यह हमारा हक है! हम आपके खून हैं!”
शिखा भी चीखने लगी, “जरूर इस रमेश मुनीम ने या किसी और ने आपके कान भरे हैं पिताजी! आप बुढ़ापे में अपना दिमागी संतुलन खो बैठे हैं। हम इसे कोर्ट में चुनौती देंगे। आप अपनी मर्जी से हमारी संपत्ति किसी खैराती संस्था को नहीं लुटा सकते!”
“चुप रहो!” दीनानाथ जी की गरजती हुई आवाज़ ने पूरे कमरे में कंपन पैदा कर दिया। वे अपनी कुर्सी से उठे, उनका झुका हुआ शरीर अचानक एकदम सीधा और तन गया था।
“किसी ने मेरे कान नहीं भरे हैं,” उन्होंने अपनी उंगली विकास की तरफ उठाते हुए कहा। “मैं कोई नासमझ बच्चा नहीं हूँ जिसे कोई भी बेवकूफ बना दे। दिमागी संतुलन मैंने नहीं, तुम लोगों के लालच ने खो दिया है। तुम लोग मुझे कोर्ट में चुनौती दोगे? वह संपत्ति जो मैंने अपने पसीने से बनाई है, जिसे मैंने दिन-रात एक करके खड़ा किया ताकि तुम लोग मखमल के गद्दों पर सो सको, उस पर तुम अपना हक जता रहे हो?”
दीनानाथ जी की आंखों में अब वह पिता नहीं, बल्कि एक आहत इंसान बोल रहा था। “तुम सबने मुझे कितना खून के आंसू रुलाया है, यह सिर्फ मेरा दिल जानता है और वह मंदिर की सीढ़ियां। जिस औलाद के लिए मैंने अपनी जवानी जला दी, अपनी इच्छाओं का गला घोंट दिया, उन्हीं के लिए मैं आज एक ‘बोझ’ बन गया? तुम लोगों को प्रॉपर्टी का बंटवारा तो बहुत जल्दी समझ आ गया, लेकिन मेरी देखभाल का बंटवारा करते वक्त तुम मुझे महीनों में तौल रहे थे?”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सुमित ने कुछ बोलने की कोशिश की, “पिताजी, हमारा वो मतलब…”
“तुम्हारा वही मतलब था सुमित!” दीनानाथ जी ने उसकी बात काटते हुए कहा। “प्रॉपर्टी तो तुम सबको चाहिए थी, हवेली का कोना-कोना तुम नाप रहे थे, लेकिन इस बूढ़े बाप को दो वक़्त की इज़्ज़त की रोटी देने और प्यार से पास बिठाने के लिए तुममें से कोई तैयार नहीं था। मुझे तुम लोगों की खैरात नहीं चाहिए। मैं तुम्हारी रोटियों का मोहताज नहीं हूँ।”
वे थोड़ा रुके और एक गहरी सांस लेकर बोले, “तुम लोगों को यह एहसास दिलाना बहुत ज़रूरी था कि जो माँ-बाप अपनी औलाद को आसमान तक पहुंचाने के लिए दुनिया की किसी भी परेशानी से लड़ सकते हैं, वो उसी औलाद के मगरूर होने पर उन्हें ज़मीन पर पटकना भी जानते हैं। मैं तुम्हें यह संपत्ति दे भी देता, लेकिन तुमने सिर्फ अपने अधिकारों के बारे में सोचा, अपने कर्तव्यों के बारे में नहीं। अगर अधिकार के साथ-साथ एक बार भी तुमने अपने कर्तव्य के बारे में सोचा होता, अगर मेरे बीमार होने पर तुमने प्रॉपर्टी की जगह मेरा हाथ थामा होता, तो आज यह नौबत नहीं आती।”
चारों बच्चे, जो कुछ देर पहले तक वकीलों और कानूनों की धौंस दे रहे थे, अब मूक होकर एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे। उनकी सारी चालाकियां, सारा लालच धरे का धरा रह गया था। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने दौलत के लालच में वह खजाना खो दिया है जो बिना मांगे उन्हें मिलने वाला था। अपनी करनी पर पछताने के सिवाय अब उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था।
दीनानाथ जी ने सिंघानिया जी से कहा, “वकील साहब, आप अपना काम शुरू कीजिए। और आप लोग…” उन्होंने अपने बच्चों की तरफ देखा, “अब आप जा सकते हैं। इस हवेली के दरवाज़े अब आपके लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। मैं अपने आखिरी दिन उन अनाथों और बेसहारा बुजुर्गों के साथ गुजार लूंगा, जिन्हें कम से कम मेरी दौलत से नहीं, मुझसे प्यार होगा।”
मैं रमेश, यह सब देखकर अंदर तक हिल गया था। एक पिता का यह कठोर रूप मैंने पहली बार देखा था, लेकिन यह कठोरता किसी क्रूरता से नहीं, बल्कि एक गहरे विश्वासघात की कोख से जन्मी थी। बच्चे सर झुकाए हवेली से बाहर निकल गए। उस दिन के बाद से दीनानाथ जी फिर कभी उस मंदिर की सीढ़ियों पर रोते हुए नहीं दिखे। वे अब उस वृद्धाश्रम के बच्चों और बुजुर्गों के बीच हंसते-मुस्कुराते नज़र आते थे, जहां असली रिश्ते दौलत से नहीं, बल्कि दिलों से जुड़े थे।
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