कर्मा लौटता है 

अगर तुम चाहो, तो अम्मा हमारे साथ, हमारे घर में रह सकती हैं। बच्चों को इनसे बेहतर और सुरक्षित हाथ नहीं मिल सकते, और अम्मा को भी उनका खोया हुआ परिवार और बच्चों का साथ वापस मिल जाएगा।”

मीरा ने बिना एक पल गँवाए आगे बढ़कर मालती देवी के हाथ पकड़ लिए। “क्या आप सच में हमारे बच्चों की दादी बनकर हमारे साथ रहेंगी?”

मालती देवी की झुर्रियों भरी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “अगर तुम मुझे ये हक दोगी, तो मैं अपनी आखिरी साँस तक तुम्हारे बच्चों को अपनी पलकों पर बिठाकर रखूंगी।”

बेंगलुरु की सुहानी आबोहवा और आईटी हब की उस दौड़ती-भागती ज़िंदगी को पीछे छोड़े हुए मीरा को लखनऊ आए करीब तीन महीने बीत चुके थे, लेकिन उसके भीतर का उथल-पुथल शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसके पति रोहन का प्रमोशन तो हुआ था, लेकिन इस अचानक हुए ट्रांसफर ने मीरा की बसी-बसाई दुनिया को जैसे किसी तूफ़ान की तरह झकझोर कर रख दिया था। रोहन तो आते ही नए रीजनल ऑफिस के सेटअप और क्लाइंट मीटिंग्स में ऐसा उलझा कि उसे दिन और रात का होश ही नहीं रहा। उनका आठ साल का बेटा आरव और चार साल की बेटी पीहू भी इस नए माहौल में खुद को अजनबी महसूस कर रहे थे। आरव को बहुत मिन्नतों के बाद एक अच्छे स्कूल में एडमिशन तो मिल गया, लेकिन बीच सेशन में जाने की वजह से उसके कोई दोस्त नहीं बन पा रहे थे। पीहू दिन भर चिड़चिड़ी रहती थी।

मीरा की हालत तो उस पंछी जैसी हो गई थी जिसका घोंसला किसी ने रातों-रात दूसरी डाल पर रख दिया हो और वह अपनी पुरानी टहनी को तलाश रही हो। बेंगलुरु में सब कुछ कितना पर्फेक्ट था। मीरा एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एचआर मैनेजर थी। सुबह उठते ही उसकी भरोसेमंद मेड, सुलोचना, घर का सारा काम और नाश्ता संभाल लेती थी। ऑफिस जाते समय वह दोनों बच्चों को सोसाइटी के ही एक बेहद शानदार और सुरक्षित डे-केयर में छोड़ जाती थी। शाम को जब वह और रोहन लौटते, तो घर साफ़ मिलता, बच्चे खुश मिलते और ज़िंदगी एक लय में चलती महसूस होती थी। उसकी अपनी एक पहचान थी, एक आज़ादी थी। लेकिन यहाँ लखनऊ में आने के बाद से, वह महज़ एक हाउसवाइफ बनकर रह गई थी।

मीरा ने अपनी नौकरी से छह महीने का ब्रेक लिया था ताकि वह इस नए शहर में घर सेट कर सके, लेकिन यह ब्रेक अब उसे एक सज़ा लगने लगा था। ना यहाँ आस-पास कोई ऐसा डे-केयर था जिस पर वह आँख मूंदकर भरोसा कर सके, और ना ही अब तक कोई ढंग की मेड मिल पाई थी। जो दो-चार कामवालियाँ आईं, वे या तो छुट्टियाँ बहुत मारती थीं या उनका काम इतना बेतरतीब होता था कि मीरा को खुद ही सारा काम दोबारा करना पड़ता था।

घर के बिखरे हुए सामान, बच्चों की ज़िद और अपने खोते हुए करियर की चिंताओं के बीच एक और चीज़ थी जिसने मीरा की रातों की नींद उड़ा रखी थी—एक अजीब सी दिखने वाली बुज़ुर्ग औरत।

वह औरत पिछले पंद्रह दिनों से मीरा के घर के बाहर मंडराती नज़र आ रही थी। मीरा का घर एक शांत कॉलोनी के कोने पर था, जिसके ठीक सामने एक छोटा सा पार्क था। वह बुज़ुर्ग औरत रोज़ सुबह उस पार्क की बेंच पर आकर बैठ जाती और टकटकी लगाकर मीरा के घर की बालकनी और मेन गेट को घूरती रहती। उसके कपड़े साधारण और थोड़े मैले होते थे, चेहरे पर झुर्रियों का जाल था और आँखों में एक अजीब सी गहराई थी। शुरू में मीरा ने सोचा कि शायद वह कोई भिखारिन है या आस-पास के किसी घर में काम करने वाली कोई बुजुर्ग महिला है। लेकिन जब मीरा ने ध्यान दिया कि वह औरत सिर्फ तभी वहाँ आती है जब आरव स्कूल से लौटता है या जब पीहू बालकनी में खेल रही होती है, तो मीरा के कान खड़े हो गए।

लखनऊ के इस नए इलाके में वैसे भी मीरा किसी को जानती नहीं थी। अखबारों और न्यूज़ चैनल्स पर बच्चों की चोरी, अपहरण और फिरौती की ख़बरें पढ़कर उसका दिल पहले ही दहल जाता था। “कहीं ये बुढ़िया किसी गिरोह की सदस्य तो नहीं? कहीं ये हमारे घर की रेकी तो नहीं कर रही?” ऐसे भयानक खयाल मीरा के दिमाग में भिनभिनाने लगे। एक दिन तो हद ही हो गई। मीरा अपनी बालकनी से कपड़े उतार रही थी, तभी उसने देखा कि पीहू अपना रबर का खिलौना गेट के बाहर फेंक चुकी है और वह बुज़ुर्ग औरत उस खिलौने को उठाकर गेट के अंदर झाँक रही है। मीरा बदहवास होकर नीचे दौड़ी, लेकिन तब तक वह औरत खिलौना वहीं ज़मीन पर रखकर जा चुकी थी।

इन घटनाओं ने मीरा को मानसिक रूप से बुरी तरह थका दिया था। वह हर समय दरवाज़े की कुंडी चेक करती, बच्चों को एक पल के लिए भी आँखों से ओझल नहीं होने देती और खुद भी घर में एक कैदी की तरह रहने लगी थी। उसकी चिड़चिड़ाहट अब रोहन पर भी निकलने लगी थी।

करीब हफ्ते भर बाद जब रोहन अपने लंबे ऑफिशियल टूर से लौटा, तो मीरा ने रोते हुए उसे सारी बात बताई। उसने बताया कि कैसे उसकी नौकरी छूटने का दर्द उसे खाए जा रहा है और ऊपर से इस रहस्यमयी औरत ने उसका जीना मुहाल कर दिया है। रोहन ने मीरा को गले लगाया और उसे शांत करते हुए कहा, “तुम नाहक ही इतना परेशान हो रही हो। नए शहर में एडजस्ट होने में वक्त लगता है। रही बात उस औरत की, तो मैं कल ही सिक्योरिटी गार्ड से बात करता हूँ। अगर ज़रूरत पड़ी तो हम पुलिस में कंप्लेंट भी कर देंगे। तुम रिलैक्स करो, मैं आ गया हूँ ना।”

रोहन के आने से मीरा को थोड़ी तसल्ली तो मिली, लेकिन उसके दिल का डर पूरी तरह से नहीं गया था। अगले दो-तीन दिन रोहन घर पर ही रहा और उसने घर को व्यवस्थित करने में मीरा की मदद की। इस बीच वह बुज़ुर्ग औरत भी पार्क में नज़र नहीं आई। मीरा को लगा कि शायद गार्ड ने उसे डांट कर भगा दिया होगा। ज़िंदगी थोड़ी पटरी पर आती दिख रही थी, लेकिन मीरा को ये नहीं पता था कि असली कहानी तो अभी शुरू होने वाली थी।

शनिवार की सुबह थी। मीरा किचन में सबके लिए पोहा बना रही थी। तभी उसे बाहर से कुछ आवाज़ें आईं। उसने गैस धीमी की और डाइनिंग एरिया की खिड़की से बाहर झाँका। जो दृश्य उसने देखा, उससे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

कॉलोनी का गार्ड और वह रहस्यमयी बुज़ुर्ग औरत उनके मेन गेट के ठीक अंदर खड़े थे, और रोहन बहुत ही आत्मीयता से उस औरत से बात कर रहा था। रोहन के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी इज्ज़त और मुस्कान थी। करीब से देखने पर मीरा को अचानक लगा कि उसने इस बुज़ुर्ग औरत को कहीं देखा है। वह चेहरा पूरी तरह से अनजान नहीं था। दिमाग के किसी कोने में कोई धुंधली सी याद दस्तक दे रही थी, लेकिन लाख ज़ोर डालने पर भी वह पहचान नहीं पा रही थी कि आखिर ये औरत है कौन और रोहन इससे ऐसे क्यों बात कर रहा है?

मीरा से और रहा नहीं गया। वह अपने एप्रन को उतारती हुई तेज़ी से दरवाज़ा खोलकर बाहर पोर्च में आ गई। बुज़ुर्ग औरत अभी भी वहीं खड़ी थी, उसकी नज़रें ज़मीन पर झुकी हुई थीं।

“रोहन! ये… ये वही औरत है! जिसके बारे में मैंने तुम्हें बताया था। ये हमारे गेट के अंदर क्या कर रही है? और तुम इससे ऐसे…?” मीरा का स्वर चिंता, डर और गुस्से से काँप रहा था।

रोहन ने गार्ड को जाने का इशारा किया और फिर मीरा के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “शांत हो जाओ मीरा। मैं जानता हूँ तुम पिछले कई दिनों से डरी हुई हो। लेकिन मैं तुम्हें कुछ बताऊंगा तो तुम आश्चर्यचकित रह जाओगी। जैसा तुम इस अम्मा के बारे में सोच रही थी, या जो शक तुम्हारे दिमाग में चल रहा था, वैसा कुछ भी नहीं है।”

मीरा की साँसें तेज़ हो गई थीं। उसका विस्मित चेहरा आगे की बात सुनने को बेक़रार था। उसने सवालिया नज़रों से रोहन को देखा।

रोहन ने उस बुज़ुर्ग औरत की तरफ इशारा करते हुए कहा, “जानती हो ये कौन हैं? याद करो मीरा, जब हम बेंगलुरु में थे, तो तुम हर महीने अपनी सैलरी का एक हिस्सा लखनऊ के एक अनाथालय ‘ममता कुटीर’ को डोनेट करती थी। तुम हमेशा कहती थी कि उस संस्था की संचालिका कोई मालती देवी हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन बेसहारा बच्चों को पालने में लगा दिया। तुमने मुझे उनकी एक पुरानी मैगज़ीन की तस्वीर भी दिखाई थी।”

मीरा की आँखें फटी की फटी रह गईं। यादों के धुंधले बादल अचानक छंट गए। “मालती देवी?” मीरा के मुँह से अविश्वास से भरा एक शब्द निकला।

रोहन ने हामी में सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ मीरा। ये वही मालती देवी हैं। मैंने गार्ड से और आस-पड़ोस के कुछ पुराने लोगों से बात की। पता चला कि कोविड के दौरान फंड्स की कमी और इनकी बढ़ती उम्र की वजह से ‘ममता कुटीर’ को बंद करना पड़ा। इनके अपनों ने भी इनका साथ छोड़ दिया। अब ये इसी कॉलोनी के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर्स में एक छोटी सी कोठरी में रहती हैं।”

मीरा को अब भी समझ नहीं आ रहा था, “लेकिन… लेकिन ये रोज़ हमारे घर के बाहर क्यों खड़ी रहती थीं? बच्चों को ऐसे क्यों घूरती थीं?”

इस बार मालती देवी ने खुद भारी और कांपती आवाज़ में बोलना शुरू किया, “मुझे माफ़ कर देना बेटी। मैंने तुम्हें डरा दिया। असल में, जब से मेरा आश्रम बंद हुआ है, मेरी तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई। मैं जीवन भर बच्चों के बीच रही हूँ। उनकी किलकारियाँ, उनका रोना, उनका खेलना… यही मेरी ज़िंदगी थी। जब तुम लोग यहाँ आए, तो मैंने तुम्हारे बच्चों को बालकनी में देखा। पीहू की आवाज़ सुनकर मुझे मेरे आश्रम की एक बच्ची की याद आ गई। मैं रोज़ बस उन बच्चों को देखने चली आती थी। मुझे उन्हें देखकर सुकून मिलता था। उस दिन पीहू का खिलौना बाहर गिर गया था, मैं उसे देने आई थी, लेकिन तुम्हें देखकर डर गई कि कहीं तुम मुझे चोर न समझ लो।”

ये सुनते ही मीरा की आँखों से आँसू छलक पड़े। कहाँ वो इस ममतामयी औरत को एक अपहरणकर्ता समझ रही थी, और कहाँ ये वही महिला निकली जिसके सेवा-भाव की वह सालों से मुरीद थी। उसके मन का सारा डर, सारा गुस्सा एक पल में किसी मोम की तरह पिघल गया।

रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, “मीरा, तुम एक अच्छी मेड और एक भरोसेमंद डे-केयर की तलाश में अपना करियर दांव पर लगा रही थी ना? मैंने अम्मा से बात की है। अगर तुम चाहो, तो अम्मा हमारे साथ, हमारे घर में रह सकती हैं। बच्चों को इनसे बेहतर और सुरक्षित हाथ नहीं मिल सकते, और अम्मा को भी उनका खोया हुआ परिवार और बच्चों का साथ वापस मिल जाएगा।”

मीरा ने बिना एक पल गँवाए आगे बढ़कर मालती देवी के हाथ पकड़ लिए। “क्या आप सच में हमारे बच्चों की दादी बनकर हमारे साथ रहेंगी?”

मालती देवी की झुर्रियों भरी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “अगर तुम मुझे ये हक दोगी, तो मैं अपनी आखिरी साँस तक तुम्हारे बच्चों को अपनी पलकों पर बिठाकर रखूंगी।”

उस दिन के बाद, मीरा के घर की तस्वीर ही बदल गई। मालती देवी के आने से घर में एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा आ गई थी, जिसने मीरा की सारी चिंताएं सोख लीं। आरव अब स्कूल से आकर अपनी नई ‘दादी’ से ढेरों कहानियाँ सुनता, और पीहू उनके पल्लू से बंधी पूरे घर में घूमती रहती। मीरा ने वापस अपनी कंपनी में बात करके अपनी जॉब ज्वाइन कर ली। जिस अनजान शहर और जिस घर से उसे घुटन होने लगी थी, वही घर अब मालती देवी के रूप में मिली एक नई छाँव से स्वर्ग बन गया था। एक अजनबी साया, अब उनके जीवन का सबसे खूबसूरत और अपना हिस्सा बन चुका था।

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लेखिका : रमा शुक्ला

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