खोखले हो चुके रिश्ते – गरिमा चौधरी

“अरे कोई है इस घर में या सब बहरे हो गए हैं? मीना… ओ मीना! कहां मर गई?”

ड्राइंग रूम में फाइलों का पुलिंदा बिखेरते हुए राजेंद्र बाबू का पारा सातवें आसमान पर था। उनकी गरजती आवाज से खिड़कियों के कांच भी मानो थर्रा गए हों। रसोई में सुबह के नाश्ते की तैयारी में जुटी मीना के हाथ से हड़बड़ाहट में चाय की छन्नी छूट गई। गैस धीमी करके वह अपने पल्लू से हाथ पोंछती हुई लगभग दौड़ते हुए बाहर आई। उम्र के इस पड़ाव में भी उसके चेहरे पर एक अजीब सा खौफ रहता था, जैसे वह कोई बहुत बड़ी मुजरिम हो।

“जी… आ गई… क्या हुआ?” मीना ने सहमी हुई आवाज में पूछा।

“क्या हुआ? तुम्हें तो कभी कुछ पता ही नहीं होता! मेरा नीला वाला फोल्डर कहां है? सौ बार कहा है कि मेरी मेज की चीजों को हाथ मत लगाया करो, लेकिन तुम्हारे दिमाग में तो जैसे भूसा भरा है। दिन भर घर में खाली बैठी रहती हो, एक काम ढंग से नहीं होता तुमसे!” राजेंद्र बाबू ने अपनी पत्नी को लगभग तिरस्कार भरी नजरों से देखते हुए कहा।

“वो… कल रात आप ही तो उसे अलमारी के लॉकर वाले खाने में रखकर सोए थे। मैं अभी निकाल देती हूं।” मीना ने बिना नजरें मिलाए धीरे से कहा और अलमारी की तरफ बढ़ गई।

राजेंद्र बाबू एक पल के लिए झेंपे, लेकिन अपनी गलती मानना उनके पुरुषवादी अहंकार के खिलाफ था। उन्होंने तुरंत बात घुमाते हुए ताना मारा, “हां, तो जब याद था तो सुबह निकाल कर क्यों नहीं रखा? बस दिन भर टीवी पर वही सास-बहू के रोने-धोने वाले नाटक देखने से फुर्सत मिले तब ना घर का कोई काम याद रहे। जाने किस मनहूस घड़ी में मेरी तुमसे शादी हुई थी, जिंदगी भर मेरा खून ही पिया है तुमने!”

मीना ने चुपचाप फोल्डर लाकर टेबल पर रख दिया। उसके पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन 28 सालों की शादीशुदा जिंदगी ने उसे खामोश रहना सिखा दिया था। उसने बस इतना ही सीखा था कि पलट कर जवाब देने से घर का माहौल और बिगड़ेगा, और फिर राजेंद्र बाबू का गुस्सा उनके स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं था। मीना वापस रसोई में चली गई, उसकी आंखें भर आई थीं, लेकिन उसने आंसुओं को रोटी के आटे में ही गूंथ दिया। यह रोज की कहानी थी। कभी चाय में चीनी कम होने पर, कभी बिजली का बिल ज्यादा आने पर, तो कभी किसी रिश्तेदार के घर जाने में पांच मिनट की देरी होने पर—मीना को हर बात के लिए खरी-खोटी सुननी पड़ती थी।

दिन बीत गया और रात का अंधेरा घिर आया। राजेंद्र बाबू और मीना खाना खाकर सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि तभी दरवाजे की घंटी लगातार बजने लगी। रात के ग्यारह बज रहे थे।

“इस वक्त कौन आ गया?” बड़बड़ाते हुए राजेंद्र बाबू ने दरवाजा खोला। सामने उनकी इकलौती बेटी काव्या खड़ी थी। उसके हाथ में एक छोटा सा सूटकेस था और चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ। काव्या की शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। उसका पति सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और दोनों पास के ही एक पॉश इलाके में रहते थे।

“काव्या! बेटा, तू इस वक्त? क्या हुआ?” मीना पीछे से दौड़ती हुई आई और बेटी को सीने से लगा लिया।

राजेंद्र बाबू का चेहरा चिंता और गुस्से से लाल हो गया। “अंदर आ बेटा। बता मुझे, क्या हुआ है? क्या उस सिद्धार्थ ने कुछ कहा है तुझे?”

काव्या सिसकते हुए सोफे पर बैठ गई। मीना तुरंत जाकर एक गिलास पानी ले आई। पानी पीने के बाद काव्या ने रोते हुए बताया, “पापा, मैं अब वहां नहीं जाऊंगी। सिद्धार्थ बहुत बदल गए हैं। आज शाम को हम लोग मॉल गए थे। वहां मैंने घर के लिए एक महंगा सा एंटीक लैंप खरीद लिया। इस बात पर उन्होंने सबके सामने मुझे डांट दिया। कहने लगे कि मुझे पैसों की कोई कद्र नहीं है और मैं बहुत गैर-जिम्मेदार हूं। जब मैंने विरोध किया तो उन्होंने बहुत ऊंची आवाज में बात की… पापा, उन्होंने मुझे बेइज्जत किया है। मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकती।”

यह सुनते ही राजेंद्र बाबू भड़क उठे। उनका खून खौलने लगा। “क्या? उस दो कौड़ी के छोकरे की इतनी हिम्मत कि वो मेरी फूल सी बच्ची पर चिल्लाए? उसे गैर-जिम्मेदार कहे? मैंने अपनी बेटी को इसलिए नहीं पाला था कि कोई ऐरा-गैरा आकर उसका अपमान करे। अभी फोन लगाता हूं उसे, आज तो मैं उसे उसकी औकात याद दिला दूंगा!”

राजेंद्र बाबू ने फोन उठाया ही था कि मीना ने डरते-डरते उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। “रुक जाइए ना जी। बच्चे हैं, दोनों पति-पत्नी हैं। बर्तन साथ रहेंगे तो खटकेंगे ही। आप इतनी रात को फोन करके बात का बतंगड़ मत बनाइए। सुबह ठंडे दिमाग से बात कर लेंगे।”

“तुम चुप रहो!” राजेंद्र बाबू जोर से दहाड़े। “तुम्हें क्या पता आत्मसम्मान क्या होता है? तुम तो जिंदगी भर पैरों की जूती बनकर रही हो, लेकिन मैं अपनी बेटी को तुम्हारी तरह घुट-घुट कर नहीं जीने दूंगा। जिस घर में मेरी बेटी की इज्जत नहीं, वहां वो हरगिज नहीं जाएगी। मैं अभी जिंदा हूं उसे पालने के लिए!”

राजेंद्र बाबू के मुंह से निकले ये शब्द किसी नुकीले तीर की तरह मीना के सीने में चुभ गए, लेकिन वह फिर भी खामोश रही। उसने काव्या के सिर पर हाथ फेरा और उसे अपने कमरे में ले जाकर सुला दिया।

अगली सुबह का सूरज एक अजीब सी खामोशी लेकर उगा। काव्या जब सोकर उठी तो उसने देखा कि उसकी मां रसोई में उसी तन्मयता से काम कर रही थी। रात की किसी भी कड़वाहट का असर उनके चेहरे पर नहीं था। अचानक डोरबेल बजी। काव्या ने दरवाजा खोला तो सामने सिद्धार्थ खड़ा था। उसकी आंखों में रात भर न सोने की थकान और पछतावा साफ झलक रहा था।

“काव्या… मुझे माफ कर दो। कल ऑफिस में बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मेरे हाथ से निकल गया था, मैं बहुत फ्रस्ट्रेशन में था। मेरा वो मतलब बिल्कुल नहीं था। मुझे तुम पर ऐसे नहीं चिल्लाना चाहिए था।” सिद्धार्थ ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

तभी राजेंद्र बाबू अखबार हाथ में लिए बाहर आ गए। सिद्धार्थ को देखते ही उनकी त्योरियां चढ़ गईं। “आ गए दामाद जी? बहुत जल्दी याद आ गई अपनी पत्नी की? कान खोलकर सुन लीजिए, मेरी बेटी अब आपके घर नहीं जाएगी। जिसे आप सम्मान नहीं दे सकते, उसे साथ रखने का आपको कोई हक नहीं है।”

सिद्धार्थ सिर झुकाए खड़ा रहा। “पापा जी, मुझसे गलती हुई है। मैं शर्मिंदा हूं…”

“शर्मिंदगी से क्या होता है?” राजेंद्र बाबू ने बीच में ही बात काट दी। “औरत के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाकर आप सोचते हैं कि एक सॉरी बोलने से सब ठीक हो जाएगा?”

“बस कीजिए पापा!”

अचानक काव्या की तेज आवाज से पूरा घर गूंज उठा। राजेंद्र बाबू और मीना, दोनों हैरानी से काव्या की तरफ देखने लगे। काव्या की आंखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी।

“पापा, आप किस आत्मसम्मान की बात कर रहे हैं?” काव्या धीरे-धीरे चलते हुए अपने पिता के सामने आकर खड़ी हो गई। “कल रात जब आपने मां को ‘पैरों की जूती’ कहा, तब उनका आत्मसम्मान कहां गया था? आप बात-बात पर उन्हें जलील करते हैं, उनके मायके वालों को कोसते हैं, उनके बनाए खाने में कमियां निकालकर थाली फेंक देते हैं… तब उनका आत्मसम्मान आहत नहीं होता क्या?”

राजेंद्र बाबू अवाक रह गए। उनके होंठ हिले पर कोई आवाज नहीं निकली।

काव्या ने आगे कहा, “पापा, कल रात जब मैं रो रही थी, तब सिद्धार्थ ने मुझे दसियों मैसेज किए थे माफी मांगते हुए। वो मेरी फिक्र कर रहे थे, लेकिन मेरा अहंकार इतना बड़ा था कि मैं घर छोड़कर आ गई। पर रात भर जागते हुए मैंने इस घर को देखा। मैंने अपनी मां को देखा। आप मां को इस घर की लक्ष्मी कहते हैं ना? लेकिन क्या कोई अपनी लक्ष्मी से ऐसे बात करता है जैसे आप करते हैं? आप दुनिया के सामने मेरे रक्षक बन रहे हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि मां की रक्षा कौन करेगा… आपसे?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। मीना कांपते हुए आगे आई, “काव्या बेटा, ये क्या कह रही है तू? वो तेरे पिता हैं, बड़ों से ऐसे बात नहीं करते।”

“नहीं मां, आज मुझे बोलने दो।” काव्या ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया। “पापा को लगता है कि आपकी खामोशी आपकी कमजोरी है। उन्हें लगता है कि चूंकि आप जवाब नहीं देतीं, इसलिए आपको दर्द नहीं होता। पापा, अगर सिद्धार्थ ने मुझे गैर-जिम्मेदार कहा, तो वो उसकी एक दिन की कुंठा थी जिसके लिए वो माफी मांग रहा है। लेकिन आपने तो मां को पूरी जिंदगी एक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं समझा। फिर आपको क्या हक है सिद्धार्थ पर उंगली उठाने का?”

राजेंद्र बाबू के हाथ से अखबार छूटकर जमीन पर गिर पड़ा। उन्हें लगा जैसे किसी ने उन्हें आईना दिखा दिया हो। उनके जीवन भर का वो पुरुषवादी घमंड, वो खोखला आदर्शवाद, सब एक झटके में चकनाचूर हो गया था। उन्होंने अपनी पत्नी मीना की तरफ देखा। उसकी झुकी हुई आंखें, माथे की सिलवटें और साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ी हुई उंगलियां—आज उन्हें वो सब कुछ साफ-साफ दिख रहा था जिसे वो 28 सालों से नजरअंदाज करते आ रहे थे।

सिद्धार्थ ने आगे बढ़कर काव्या का हाथ थाम लिया। “काव्या सही कह रही है। हम दोनों बराबर हैं और हमारा रिश्ता एक-दूसरे की इज्जत पर टिका है। मैं वादा करता हूं कि आगे से कभी तुम्हारे आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुंचाऊंगा।”

काव्या मुस्कुराई और उसने सिद्धार्थ को माफ कर दिया। दोनों जाने के लिए मुड़े, लेकिन तभी राजेंद्र बाबू की रुंधी हुई आवाज आई।

“मीना…”

सब ठिठक गए। राजेंद्र बाबू धीरे-धीरे चलकर मीना के पास आए। उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपनी पत्नी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।

“मुझे माफ कर दो मीना। मुझे अपनी बेटी का दर्द तो एक पल में दिख गया, लेकिन तुम्हारा वो दर्द जिसे तुम रोज पीती हो, मैं कभी नहीं देख पाया। तुमने चुप रहकर इस घर को बचाए रखा और मैं तुम्हारी उस चुप्पी को तुम्हारी बेवकूफी समझता रहा। मुझे माफ कर दो…”

मीना फफक कर रो पड़ी। आज उसके वो आंसू बह निकले थे जो ना जाने कितने सालों से उसकी छाती में जमे हुए थे।

काव्या और सिद्धार्थ दरवाजे से ही यह सब देखकर मुस्कुरा दिए। काव्या को तसल्ली थी कि आज उसके एक छोटे से कदम ने ना सिर्फ उसकी शादीशुदा जिंदगी को सही राह पर ला दिया था, बल्कि उसके माता-पिता के खोखले हो चुके रिश्ते में भी एक नई जान फूंक दी थी।

उस सुबह जब नाश्ते की मेज सजी, तो राजेंद्र बाबू ने खुद अपने हाथों से मीना के लिए चाय की प्याली बनाई और कुर्सी खींचकर उसे अपने बराबर में बिठाया। एक पिता हार गया था, लेकिन एक पति और एक इंसान आज जीत गया था।

दोस्तों, क्या आपको क्या लगता है? क्या काव्या ने अपने पिता को आईना दिखाकर सही किया? या उसे अपने माता-पिता के बीच में नहीं बोलना चाहिए था? अपने विचार हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं!

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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