अपनी सगी माँ की सूरत रोहन को ठीक से याद भी नहीं थी। जब वह महज छह साल का था, तभी एक गंभीर बीमारी ने उसकी माँ को उससे छीन लिया था। घर में वैसे तो पिता दिनेश थे, लेकिन रोहन की परवरिश का पूरा जिम्मा उसकी विधवा बुआ, कमला पर आ गया था। बुआ स्वभाव से कटु और पुरानी सोच वाली महिला थीं। उनका मानना था कि दुनिया में खून का रिश्ता ही सब कुछ होता है। जब दिनेश ने अपने बेटे के भविष्य और घर को सँभालने के लिए तीन साल बाद दूसरी शादी करने का फैसला किया, तो कमला बुआ ने रोहन के कोमल मन में जहर घोलना शुरू कर दिया। “देख रोहन, अब जो आएगी वो तेरी अपनी नहीं है। सौतेली माँ है वो, बस तेरे बाप की दौलत और इस घर पर राज करने आ रही है। अपना तो बस अपना होता है, पराया कभी सगा नहीं हो सकता।” बुआ के इन तानों ने रोहन के बालमन पर एक गहरा आवरण डाल दिया था।
जब सुजाता इस घर में नई नवेली दुल्हन बनकर आई, तो उसने अपनी आँखों में एक सुखी परिवार का सपना संजोया था। सुजाता पढ़ी-लिखी, सुलझी हुई और एक बेहद संवेदनशील महिला थी। उसने आते ही रोहन को अपने सीने से लगाना चाहा, लेकिन रोहन, जिसके मन में बुआ ने पहले ही अविश्वास के बीज बो दिए थे, सुजाता से मीलों दूर भागता था। सुजाता जब भी उसके लिए अपने हाथों से खाना बनाती, रोहन कोई न कोई बहाना बनाकर बुआ के हाथ का रूखा-सूखा खा लेता। सुजाता उसके स्कूल के कपड़े इस्तरी करती, तो वह उन्हें पहनकर ऐसे चलता मानो किसी अजनबी ने उस पर कोई एहसान थोप दिया हो।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। सुजाता ने घर के माहौल को भाँप लिया था। वह जानती थी कि रोहन का यह रूखापन उसका अपना नहीं है, बल्कि यह उस परिवेश की देन है जिसमें वह पल रहा है। सुजाता ने कभी रोहन से शिकायत नहीं की और न ही कभी दिनेश से बुआ की चुगली की। वह खामोशी से अपना कर्तव्य निभाती रही। कुछ सालों बाद सुजाता की कोख से दो जुड़वां बच्चों, अंश और परी ने जन्म लिया। बुआ को मानो रोहन के कान भरने का एक और सुनहरा अवसर मिल गया। “अब देख लेना रोहन, अब तो उसके खुद के बच्चे आ गए हैं। अब इस घर में तेरी अहमियत एक नौकर से ज्यादा नहीं रहेगी। तेरा बाप भी अब उसी का होकर रह जाएगा।”
रोहन अब किशोर हो चुका था। बुआ की बातों ने उसे एक ऐसे अंतर्द्वंद्व में धकेल दिया था जहाँ वह हर समय खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करता। उसे लगता कि घर में अब वह एक अनचाहा मेहमान है। लेकिन दूसरी तरफ, उसकी आँखें कुछ और ही देखती थीं। जब भी वह रात को देर तक पढ़ता, तो सुजाता बिना कुछ कहे उसकी टेबल पर एक गिलास गर्म दूध रख जाती थी। जब अंश और परी को नए कपड़े आते, तो रोहन की अलमारी में भी उसकी पसंद की शर्ट चुपचाप रख दी जाती थी। कई बार जब बुआ रोहन को किसी छोटी सी गलती पर बुरी तरह डाँट रही होतीं, तो सुजाता ढाल बनकर उसके सामने खड़ी हो जाती। “दीदी, बच्चा है, सीख जाएगा। आप खामखां अपना बीपी मत बढ़ाइए,” कहकर वह बात को टाल देती। रोहन का दिमाग बुआ की बातों पर यकीन करना चाहता था, लेकिन उसका दिल सुजाता की आँखों में तैरती उस बेबसी और स्नेह को देखकर पिघलने लगता था। इसी कशमकश में वह बड़ा हो रहा था।
रोहन अब उन्नीस साल का हो चुका था और शहर के एक अच्छे कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। घर की आर्थिक स्थिति पिता के छोटे से ट्रांसपोर्ट बिजनेस पर निर्भर थी। सब कुछ एक सामान्य ढर्रे पर चल रहा था कि अचानक एक रात उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। दिनेश को सीने में तेज दर्द हुआ और अस्पताल पहुँचने से पहले ही दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।
पिता की अचानक मौत ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। घर का एकमात्र कमाऊ सदस्य अब इस दुनिया में नहीं था। मातम के दिन जैसे-तैसे गुजरे, लेकिन असली असलियत तो तेरहवीं के बाद सामने आई। दिनेश के बिजनेस में काफी कर्ज था। ट्रांसपोर्ट का काम ठप पड़ गया था और लेनदार दरवाजे पर चक्कर काटने लगे थे। ऐसे समय में, जब परिवार को सबसे ज्यादा अपनों के सहारे की जरूरत थी, कमला बुआ ने अपना असली रंग दिखा दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि वह अपनी बची-खुची जिंदगी इस कर्ज के दलदल में नहीं गुजार सकतीं। उन्होंने घर में अपने हिस्से की मांग कर दी और अपना सामान बाँधकर अपने मायके के एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ चली गईं। जाते-जाते भी वह रोहन से कहना नहीं भूलीं, “मैंने तो पहले ही कहा था, यह औरत इस घर के लिए मनहूस है। अब भुगतो तुम सब।”
बुआ के जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। रोहन, जो अभी खुद एक बच्चा था, अचानक से घर का सबसे बड़ा पुरुष बन गया था। उसने सुजाता को देखा, जो एक कोने में बैठी अपने दोनों छोटे बच्चों को सीने से लगाए शून्य में घूर रही थी। रोहन के भीतर का वह पुरुष जाग उठा जिसे समाज ने बचपन से सिखाया था कि पिता के बाद परिवार की जिम्मेदारी बेटे की होती है। उसने एक कठोर निर्णय लिया। उसने अपनी इंजीनियरिंग की किताबें समेटीं, उन्हें एक पुराने संदूक में बंद किया और पिता के पुराने मैनेजर से जाकर ट्रांसपोर्ट का काम सीखने की बात तय कर ली। उसने सोच लिया था कि अब वह पढ़ाई छोड़ देगा और किसी भी तरह पिता का कर्ज चुकाएगा और इन तीन लोगों का पेट पालेगा।
अगली सुबह, जब रोहन पिता की पुरानी साइकिल निकालकर ट्रांसपोर्ट ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था, तभी पीछे से एक आवाज आई।
“यह बैग कहाँ ले जा रहे हो रोहन?”
रोहन ने पलट कर देखा। सुजाता दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी।
“मैं… मैं ऑफिस जा रहा हूँ छोटी माँ। पापा का काम अब मुझे ही देखना होगा। लेनदारों का बहुत दबाव है और… और घर भी तो चलाना है। मेरी पढ़ाई अब मुमकिन नहीं है।” रोहन ने नजरें झुकाते हुए कहा। उसके मन में आज बुआ की कोई बात नहीं थी, बस एक जिम्मेदारी का बोझ था जिसे वह अकेले उठाना चाहता था।
सुजाता धीरे-धीरे चलकर उसके पास आई। उसने रोहन के हाथ से वह पुराना थैला छीन लिया जिसमें टिफिन रखा था।
“अंदर आओ,” सुजाता का स्वर बहुत शांत लेकिन आदेशात्मक था।
“लेकिन छोटी माँ, शर्मा जी इंतजार कर रहे होंगे, मुझे काम सीखना है…”
“मैंने कहा अंदर आओ रोहन!”
रोहन खामोशी से अंदर आ गया। सुजाता ने उसे सोफे पर बैठाया और खुद उसके सामने कुर्सी खींचकर बैठ गई।
“तुमने कैसे सोच लिया कि तुम्हारे पिता के जाने के बाद तुम अकेले इस घर के कर्ता-धर्ता बन गए हो? क्या मैं इस घर की कुछ नहीं लगती?” सुजाता ने रोहन की आँखों में सीधे देखते हुए पूछा।
“मेरा वो मतलब नहीं था… आप तो जानती हैं, बुआ भी चली गईं। अब मैं ही सबसे बड़ा हूँ। आपका और अंश-परी का ख्याल मुझे ही रखना है,” रोहन ने हिचकिचाते हुए कहा।
सुजाता की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। “रोहन, तुमने मुझे हमेशा ‘छोटी माँ’ या ‘सौतेली माँ’ की नजर से देखा है। बुआ ने तुम्हारे मन में जो जहर घोला, मैं उसे कभी निकाल नहीं पाई क्योंकि मैंने तुम्हें कभी सफाई देने की कोशिश ही नहीं की। मुझे लगा मेरा प्यार एक दिन तुम्हें सब समझा देगा। लेकिन आज वक्त आ गया है कि मैं तुम्हें बताऊँ कि एक माँ क्या होती है।”
सुजाता ने गहरी सांस ली और कहना शुरू किया, “तुम्हारे पिता ने जब मुझसे शादी की थी, तब मैंने उनसे एक ही वादा किया था, कि मैं इस घर में एक पत्नी से पहले तुम्हारे लिए एक माँ बनकर आऊँगी। आज जब वो नहीं हैं, तो क्या मैं तुम्हें ऐसे ही बीच मझधार में डूबने दूँगी? तुम अपनी पढ़ाई छोड़ दोगे? अपने पिता का वो सपना तोड़ दोगे जो उन्होंने तुम्हें एक बड़ा इंजीनियर बनते देखने के लिए बुना था?”
रोहन हैरान था। “पर हम घर कैसे चलाएंगे? कर्ज कैसे चुकाएंगे?”
सुजाता ने अलमारी खोली और उसमें से एक लिफाफा निकालकर रोहन के हाथों में रख दिया। रोहन ने लिफाफा खोला, उसमें एक नियुक्ति पत्र था।
“तुम्हारे पिता से शादी करने से पहले मैं शहर के सबसे बड़े स्कूल में वरिष्ठ शिक्षिका थी। मैंने कल ही स्कूल के प्रिंसिपल से बात की है। मेरे पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए उन्होंने मुझे कल से ही नौकरी पर वापस बुला लिया है। मेरी तनख्वाह इतनी है कि हम आराम से घर चला सकें।”
सुजाता रुकी नहीं, उसने अपने गले से सोने की वह भारी चेन उतारी जो दिनेश ने उसे मुंह दिखाई में दी थी। इसके साथ ही उसने अपने हाथों के कंगन भी निकाल दिए।
“यह जेवर मेरे लिए अब किसी काम के नहीं हैं। इन्हें बेचकर हम बाजार का आधा कर्ज तुरंत चुका देंगे। बाकी जो बचेगा, उसे मैं और तुम मिलकर धीरे-धीरे उतार देंगे। लेकिन तुम अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ोगे। ट्रांसपोर्ट का काम शर्मा जी अपनी ईमानदारी से देख लेंगे, जब तक तुम अपनी डिग्री पूरी करके उसे खुद संभालने लायक नहीं हो जाते।”
रोहन के हाथ कांप रहे थे। जिस औरत को उसने जिंदगी भर एक बाहरी व्यक्ति माना, जिससे वह हमेशा दूर भागता रहा, जिसे बुआ ने हमेशा घर तोड़ने वाली ‘डायन’ कहा, आज वह औरत अपने सुहाग की निशानियां और अपनी पूरी जिंदगी उसकी और इस परिवार की नींव बचाने के लिए दांव पर लगा रही थी।
“पर… पर आप मेरे लिए इतना सब क्यों कर रही हैं? मैं तो आपका सगा खून भी नहीं हूँ…” रोहन के गले में रुलाई अटक गई थी।
सुजाता ने आगे बढ़कर पहली बार रोहन के सिर पर हाथ फेरा और उसे अपने सीने से लगा लिया। “खून का रिश्ता शरीर से होता है रोहन, लेकिन ममता का रिश्ता आत्मा से होता है। जिस दिन मैंने तुम्हारे पिता के साथ फेरे लिए थे, उसी दिन मैंने तुम्हें अपनी आत्मा से जन्म दे दिया था। तुम मेरे बड़े बेटे हो। और एक माँ अपने जीते जी अपने बच्चे के सपनों की बलि कभी नहीं चढ़ने देती। तुम्हें अंश और परी की कसम है, तुम कल से अपने कॉलेज जाओगे। इस घर की ढाल मैं हूँ, जब तक मैं जिंदा हूँ, तुम बेफिक्र होकर अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ो।”
रोहन, जो बचपन से अपने आंसुओं को पीता आया था, आज फफक-फफक कर रो पड़ा। बुआ द्वारा बनाया गया वह नफरत और शक का महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया था। उसने सुजाता के पैर छुए और रुंधे हुए गले से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए… माँ! मैंने आपको पहचानने में बहुत देर कर दी।”
“देर कभी नहीं होती मेरे लाल,” सुजाता ने उसे उठाते हुए कहा।
अगले दिन रोहन एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ कॉलेज के लिए निकला। घर के दरवाजे पर सुजाता खड़ी थी, उसके माथे पर दही-चीनी का तिलक लगाते हुए। रोहन ने अपनी माँ की तरफ देखा और उसे लगा कि जैसे उसे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गई हो। रिश्तों की उधेड़बुन, सौतेलेपन का कलंक और बुआ के बोए गए सारे कांटे अब सुजाता के इस निस्वार्थ प्रेम के आगे दम तोड़ चुके थे। अब वह एक अधूरा या अनाथ बच्चा नहीं था, बल्कि एक ऐसी माँ का बेटा था जिसने ममता की एक नई परिभाषा गढ़ी थी।
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