वैराग्य

“स्वामी जी, प्रणाम,” कल्याणी ने अत्यंत श्रद्धा के साथ अपनी थाली एक ओर रखी और नित्यानंद के चरणों में झुक कर उन्हें प्रणाम किया। जब वह झुकी, तो उसके माथे की लाल बिंदी और उसकी सूती साड़ी के आंचल से छलकती एक असीम ममता और नारीत्व की उस नैसर्गिक सुंदरता ने नित्यानंद की आँखों को एक पल के लिए जैसे बांध लिया।

हिमालय की तलहटी में बसे उस शांत और प्राचीन आश्रम में भोर की किरणें अभी पूरी तरह से उतरी भी नहीं थीं। आश्रम के प्रांगण में वेद मंत्रों की गूंज और हवन कुंड से उठने वाली पवित्र धुएं की महक ने वातावरण को एक अलौकिक शांति से भर दिया था। स्वामी नित्यानंद अपनी कुटिया के बाहर एक लकड़ी के तख्त पर पद्मासन लगाए बैठे थे। उनके सामने उनके कुछ युवा शिष्य बैठे थे, जिन्हें वे उपनिषदों का ज्ञान दे रहे थे। नित्यानंद की उम्र भले ही बत्तीस वर्ष के आस-पास थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज और गंभीरता थी जो दशकों की कठोर तपस्या के बाद ही आती है।

“यह संसार एक मृगतृष्णा है,” स्वामी नित्यानंद अपनी गहरी और शांत आवाज़ में शिष्यों को समझा रहे थे। “जैसे मरुस्थल में चमकती हुई रेत दूर से जल का आभास देती है, वैसे ही यह संसार और इसके रिश्ते-नाते हमें सुख का आभास देते हैं। लेकिन पास जाने पर केवल दुख, मोह और पीड़ा ही हाथ लगती है। गुरुदेव ने हमेशा यही सिखाया है कि यह जगत मिथ्या है। ज्ञान, वैराग्य और निरंतर अभ्यास ही इस मायाजाल से निकलने का एकमात्र मार्ग है। गृहस्थी और मानवीय भावनाएं वह दलदल हैं जो आत्मा को कभी मुक्त नहीं होने देतीं।” उनके शब्द बिल्कुल सधे हुए थे, जिनमें एक ज्ञानी का आत्मविश्वास और एक संन्यासी की विरक्ति साफ झलक रही थी।

लेकिन तभी, आश्रम के मुख्य द्वार से कल्याणी भीतर आई। कल्याणी पास के ही गाँव की एक अत्यंत साधारण लेकिन बेहद शालीन स्त्री थी, जो हर एकादशी को आश्रम में भगवान के दर्शन और संतों की सेवा के लिए आती थी। आज उसके हाथों में पीतल की एक सुंदर सी थाली थी, जिसमें ताजे खिले हुए पारिजात और कमल के फूल सजे थे। उसने अपने घने और घुंघराले काले बालों को एक साधारण सी चोटी में गूंथ कर उसमें बेले के फूलों की एक छोटी सी गजरा नुमा लड़ी लगा रखी थी। कल्याणी के कदमों की आहट बहुत धीमी थी, लेकिन उसकी पायल की हल्की सी रुनझुन ने स्वामी नित्यानंद के उपदेश को एक पल के लिए जैसे हवा में ही रोक दिया।

कल्याणी जैसे-जैसे करीब आ रही थी, पारिजात और बेले के फूलों की एक बेहद सौंधी और भीनी-भीनी खुशबू हवा में तैरती हुई नित्यानंद की सांसों में घुलने लगी। उनके भीतर कुछ ऐसा हुआ जो पिछले पंद्रह सालों के संन्यास जीवन में कभी नहीं हुआ था। एक अजीब सी सिहरन उनके शांत और स्थिर मन की सतह पर लहरों की तरह उठने लगी।

“स्वामी जी, प्रणाम,” कल्याणी ने अत्यंत श्रद्धा के साथ अपनी थाली एक ओर रखी और नित्यानंद के चरणों में झुक कर उन्हें प्रणाम किया। जब वह झुकी, तो उसके माथे की लाल बिंदी और उसकी सूती साड़ी के आंचल से छलकती एक असीम ममता और नारीत्व की उस नैसर्गिक सुंदरता ने नित्यानंद की आँखों को एक पल के लिए जैसे बांध लिया। वे अपनी पलकें झपकाना भूल गए। कल्याणी का वह रूप किसी वासना को जन्म नहीं दे रहा था, बल्कि वह तो जीवन की उस सजीवता, उस गृहस्थी की मिठास और उस पारिवारिक पूर्णता का प्रतीक लग रहा था, जिसे नित्यानंद ने ‘मिथ्या’ कहकर पंद्रह साल की उम्र में ही पीछे छोड़ दिया था।

कल्याणी प्रणाम करके और प्रसाद की थाली रखकर वहां से चली गई। उसके साथ आई उसकी चार साल की नन्ही बच्ची ने जाते-जाते स्वामी जी को देखकर एक निश्छल मुस्कान बिखेरी और अपनी माँ की उंगली पकड़कर मंदिर की ओर दौड़ गई।

वे दोनों तो वहां से चली गईं, लेकिन स्वामी नित्यानंद के भीतर एक भयंकर तूफान छोड़ गईं। उनके होंठ सूख रहे थे और हृदय की धड़कनें उनकी अपनी ही चेतना में हथौड़े की तरह बज रही थीं। वे वेदांत के उस ‘रज्जु में सर्प’ (रस्सी में सांप का भ्रम) वाले सिद्धांत में बुरी तरह उलझ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि भ्रम क्या है। क्या कल्याणी का वह पारिवारिक और स्नेहपूर्ण जीवन भ्रम है, जो इतना सजीव, इतना सुंदर और इतना जीवंत है? या फिर उनका यह शुष्क संन्यास भ्रम है, जो उन्हें एक इंसान के रूप में अपनी ही प्राकृतिक भावनाओं को दबाने पर मजबूर कर रहा है?

वे शिष्यों को बीच में ही छोड़कर अपनी कुटिया के भीतर चले गए और दरवाजा बंद कर लिया। कुटिया के एकांत में कल्याणी के बालों से आई बेले की वह महक अब भी जैसे उनके आस-पास ठहरी हुई थी। उन्हें अचानक अपनी माँ की याद आ गई। जब वे पंद्रह साल के थे, तब मुक्ति की चाह में घर से भाग गए थे। पीछे छूट गई थी एक रोती हुई माँ, एक सूना आंगन और एक ऐसा जीवन जो शायद प्रेम, बच्चों की किलकारियों और एक पत्नी के निस्वार्थ समर्पण से भरा हो सकता था। आज कल्याणी को देखकर उनके भीतर का वह पुरुष, वह इंसान जो एक पति, एक पिता और एक गृहस्थ हो सकता था, अचानक अपनी समाधि से जाग उठा था।

वे खुद से सवाल करने लगे कि क्या ईश्वर ने यह संसार इसलिए बनाया है कि हम इसे मिथ्या कहकर इससे भाग जाएं? क्या उस नन्ही बच्ची की मुस्कान और कल्याणी की निश्छल आंखों में कोई ईश्वरीय तत्व नहीं था? क्या अपने जिम्मेदारियों से भागकर जंगलों में छिप जाना ही सच्चा वैराग्य है? आज उन्हें वो सारी पोथियां, वो सारे उपदेश बेमानी लग रहे थे। उनका मन चीख-चीख कर कह रहा था कि असली ज्ञान संसार से भागने में नहीं, बल्कि संसार के बीच रहकर, इन मानवीय बंधनों को प्रेम से जीने में है। कल्याणी की उस क्षणिक उपस्थिति ने उनके वैराग्य के उस मजबूत किले की नींव हिला दी थी, जिसे उन्होंने सालों की तपस्या से खड़ा किया था।

उस रात स्वामी नित्यानंद सो नहीं पाए। वैराग्य और मानवीय संवेदनाओं के बीच यह एक ऐसा युद्ध था, जहाँ हार भी उनकी होनी थी और जीत भी। सुबह जब आश्रम का द्वार खुला, तो उन्होंने अपने गेरुआ वस्त्र उतारे नहीं, लेकिन उनके भीतर की कठोरता हमेशा के लिए उतर चुकी थी। उन्होंने समझ लिया था कि संसार और इसके रिश्ते विष नहीं हैं, बल्कि ईश्वर की ही एक सुंदर रचना हैं। वैराग्य का अर्थ भावनाओं को मारना नहीं, बल्कि बिना मोह के सबसे प्रेम करना है। कल्याणी ने अनजाने में ही उन्हें उस दिन जीवन का वह पाठ पढ़ा दिया था, जो बड़े-बड़े ग्रंथ उन्हें नहीं सिखा पाए थे।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!