वो मुझसे ज़्यादा मेरी भाभी की माँ है – डॉ आभा माहेश्वरी

जब भी मैं अपनी माँ के बारे में सोचता हूँ, मन में एक अजीब-सी टीस उठती है। बचपन में मैं अक्सर शिकायत किया करता था कि माँ का सारा ध्यान मुझ पर नहीं, बल्कि मेरी भाभी पर रहता है। मुझे लगता था कि शादी के बाद जैसे उन्हें एक बेटी मिल गई हो और मैं कहीं पीछे छूट गया हूँ।

भाभी जब पहली बार इस घर में आई थीं, तो वे बहुत घबराई हुई थीं। नया घर, नए लोग और नई ज़िम्मेदारियाँ। माँ ने उनका हाथ थामकर कहा था, “आज से यह घर तुम्हारा है और मैं तुम्हारी सास नहीं, माँ हूँ।” उस समय मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी। मैं मन ही मन सोचता, “माँ तो मेरी है, फिर ये उन्हें अपनी माँ कैसे कह सकती हैं?”

समय बीतता गया। माँ सुबह उठकर सबसे पहले भाभी की पसंद का नाश्ता बनातीं, उनकी तबीयत पूछतीं, उन्हें आराम करने के लिए कहतीं। अगर भाभी ज़रा-सी भी उदास दिखतीं, तो माँ बेचैन हो जातीं। मैं कई बार मज़ाक में कह देता, “माँ, आप तो मुझसे ज़्यादा भाभी की माँ बन गई हैं।”माँ मुस्कुरा देतीं, लेकिन कुछ कहती नहीं थीं।एक दिन भाभी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। माँ पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहीं। दवा देना, माथा सहलाना, पानी पिलाना—उन्होंने अपनी ज़रा भी परवाह नहीं की। उस रात मैंने पहली बार माँ की आँखों में वही चिंता देखी, जो उन्होंने बचपन में मेरे बीमार होने पर दिखाई थी।

       कुछ दिनों बाद मैंने माँ से पूछ ही लिया, “क्या आपको मुझसे ज़्यादा भाभी की चिंता होती है?”

  माँ ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, “बेटा, तुम तो मेरे अपने हो। तुम्हें पता है कि तुम्हारी माँ हमेशा तुम्हारे साथ है। लेकिन तुम्हारी भाभी अपना पूरा संसार छोड़कर इस घर में आई है। उसके माँ-बाप दूर हैं। अगर मैं उसे माँ का प्यार नहीं दूँगी, तो उसे अपनेपन का एहसास कौन दिलाएगा?”

   माँ की बात सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं। उस दिन मुझे समझ आया कि माँ का प्यार कभी बँटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। उन्होंने मुझे कम नहीं चाहा था; उन्होंने सिर्फ़ एक बेटी को उसकी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी।

  कुछ महीनों बाद भाभी अपने मायके गईं। वहाँ उनकी माँ ने फोन पर मेरी माँ से कहा, “बहन जी, आपने मेरी बेटी को इतना प्यार दिया कि मुझे उसकी चिंता ही नहीं रहती।”

 यह सुनकर मेरी माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने बस इतना कहा, “बेटियाँ चाहे अपनी हों या किसी और की, उन्हें माँ का प्यार मिलना ही चाहिए।”

उस दिन मैंने मुस्कुराकर माँ से कहा, “सच है माँ, आप मुझसे ज़्यादा मेरी भाभी की माँ हैं… और यही आपकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।” माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जिस दिन हर सास अपनी बहू में बेटी देखेगी और हर बहू अपनी सास में माँ, उस दिन हर घर सचमुच स्वर्ग बन जाएगा।”

उस पल मुझे एहसास हुआ कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, बल्कि प्रेम, विश्वास और अपनापन उन्हें जीवनभर के लिए अटूट बना देते हैं। माँ ने मुझे सिर्फ़ यह नहीं सिखाया कि परिवार कैसे निभाया जाता है, बल्कि यह भी सिखाया कि सच्चा प्रेम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—वह हर उस दिल तक पहुँचता है जिसे अपनापन चाहिए।

#वाक्य:वो मुझसे ज़्यादा मेरी भाभी की माँ है

लेखिका: डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ 

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