“जीवन में कभी कोई भी कठिनाई आए तो याद रखना हम तुम्हारे साथ है ऐसा हमेशा मेरे दादा जी कहते है” कमलेश ने अपने पोते अनंत को बोला।
अनंत जो अभी मात्र ९ वर्ष का था, अपनी मासूम भरी आंखों से अपने दादाजी की बात ऐसे सुन रहा था जैसे ये सुनहरे अक्षर उसने पहली बार सुने हो।
दिन महीने में और साल में कब बदला पता ही नहीं चला और अनंत अब बड़ा हो गया था और समझदार भी।
कुछ दिनों से अनंत अपने पिता सुरेश और दादा जी को देख रहा था कि वो कुछ समय से परेशान से लग रहे है और जब भी अनंत पूछता तो दोनों उसको उसकी पढ़ाई में ध्यान रखने को, उसने अपनी मां से पूछा तो उन्होंने भी बात टाल दी।
अनंत ने अब खुद ही चीजें पता लगाने का सोचा।
कुछ हफ्तों तक जासूसी और आस पास पता करने के बाद उसको घर में कुछ कागज़ात मिले, उसमें जब वो देखा तो वो हैरान हो गया ये देख कर कि उनके बिजनेस जो सुरेश के दादा जी ने शुरू किया था वो खतरें में है और उसको काफी ज्यादा नुकसान भी हो रहा है।
जब शाम को दादा जी और सुरेश आए तो वो सोफे पे बैठा हुआ था और वहां उसकी मा भी थी।
अपने पोते का चेहरा देख कर कमलेश बोला “क्या हुआ बेटा? ऐसे क्यों बैठे हो?”
अनंत ने गहरी लंबी साँस ली और बोला “दादा जी आप मुझे बताए अपने ऐसा क्यों किया? सबने घर में मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाई।”
सुरेश ने अपनी पत्नी तरफ आशंका में देखा और फिर उसकी मां बोली “अनंत को सब पता चल गया है।”
सुरेश बोला “बेटा हम तुझे ये कैसे बता देते, तू अभी छोटा है और तेरा अभी पढ़ाई पर ध्यान देने का समय है, इन सब पर नहीं।”
तभी कमलेश बोला “हा बेटा, तेरे पापा सही कह रहे है, तू इन सब के चक्कर में मत पढ़।”
अनंत ने बोला “दादाजी, जब आप लोग मेरे साथ खड़े हो सकते हो तो मैं क्यों नहीं आपकी मदद कर सकता और आपने ही बचपन से सिखाया है *अपनों का साथ* होना और देना सबसे पहले आना चाहिए और आप लोग तो मेरे अपने है और मां ने भी तो अपने गहने गिरवी रखे है ताकि पैसों का इंतजाम हो जाये और आप देखना मेरी पढ़ाई खत्म होने वाली है उसके बाद सब मैं आराम से कर लूंगा और आप दोनों आराम करेंगे।”
किसी को कुछ बोलने का मौका ना देते हुए अनंत अपने कमरे में गया और अपने कुछ पैसे जो वो कुछ सालों से इक्कठे कर रहा था नई बाइक खरीदने के लिए और अपना गिटार ले कर आया और बोला “ये ज्यादा तो नहीं है, दादा जी पर आप प्लीज़ इनको रख लीजिए मुझे बहुत अच्छा लगेगा कि मैं भी अपनी परिवार की मदद कर पा रहा हू”। ये देख कर कमलेश के आँखें भर आई कि उनका छोटा सा पोता अब इतना बड़ा और समझदार हो गया है। रोते रोते उन्होंने अनंत को गले लगा लिया और बोला “ये संस्कार ही है जो हमें इतना आगे लेकर जाते है। तभी सुरेश ने बोला “बेटा, आज मुझे तुझ पर गर्व है। तूने आज मेरा सिर और गर्व से ऊपर कर दिया है।”
घर में सब एकजुट होकर इस परेशानी से निकलने का हल ढूंढ रहे थे और उनको यकीन था जब अपने है साथ तो डरने की है क्या बात।
*१ साल बाद*
अब उनकी कंपनी पहले से काफी बेहतर काम कर रही थी और इसी बात की खुशी पर कमलेश ने अनंत को नई बाइक खरीद कर दी और उसको नया गिटार भी दिलवाया क्योंकि वो जाने थे कि अनंत को गिटार कितना पसंद है। साथ ही में उन्होंने अपनी बहु के गहने भी वापस लिए क्योंकि वो उसके मायके के थे और साथ ही में अपनी घर की लक्ष्मी के लिए नए गहने और लिए क्योंकि जहाँ बहु की इज्जत वो ही लक्ष्मी का निवास होता है और ऐसे ही उनका बंधन और मजबूत हो गया।
अनंत भी अब अपने पापा और दादाजी के साथ कंपनी में लग गया था और उनको अब ज्यादा काम भी नहीं करने देता था और सारी मीटिंग और सब कुछ वो ही देखता था और घर में बैठ के सब यही सोचते थे कि हमारा छोटा था अनंत इतना बड़ा कब हो गया कि इतनी जल्दी ही उसने सारी जिम्मेदारी अपने सर ले ली ताकि हम सब आराम कर सके और सब आपसे में बैठ कर मुस्कुरा रहे है।
लेखिका
तोषिका