अपनों का साथ – मधु वशिष्ठ

मां की मृत्यु का समाचार सुनकर जब उसके दोनों बेटे विदेश से आए तो वह यह देखकर हैरान थे उनकी अकेली रहने वाली माता जी के पास कितने लोग थे। 

पूरा कमरा औरतों से भरा हुआ था आने जाने वाले कम ही नहीं हो रहे थे। लोग आकर ऐसे रो रहे थे कि मानो उन्होंने अपना कोई करीबी खो दिया हो। यूं कहने को तो उनकी माताजी एकदम अकेली ही रहती थी परंतु आज दोनों बेटे देखकर हैरान थे कि वह अकेली नहीं थी उनलके तो कितने अपने थे और उनकी माता जी को तो अपनों का साथ मिला ही हुआ था।

     दोनों बेटों को अक्सर बुरा लगता था और यह सोचकर शर्म भी आती थी कि मम्मी किसी के लिए  कहीं पर भी सहायता करने के लिए चली जाती थी आज के जमाने में जब कोई पड़ोस के घर में भी क्या हो रहा है यह जानने की कोशिश नहीं करता इसके विपरीत मम्मी दूर मोहल्ले तक भी जरूरत होने पर पूरा पूरा दिन उनके लिए खराब कर देती थी।

माधुरी माता जी  को कभी भी घूमते हुए देखा जा सकता है। वह अक्सर रिक्शा पकड़ कर गुरुद्वारे जाती हुई या कभी कामवालियों को लेकर उनका बैंक में अकाउंट खुलवाती हुई देखी जा सकती थी। पति के बाद भी अपने घर में वह एकदम अकेली रहती थी। आसपास के घर में रहने वाले चाचा जी और ताऊ जी के बच्चो को अपने बच्चों जैसा ही प्यार करती थी। ताऊ जी के पोते पोती तो अक्सर मां के साथ ही सो जाते थे।

  उनके दोनों विदेश में रहने वाले बच्चों ने उन्हें अपने पास बुलाया भी लेकिन उनके पास रह रही दादी की बीमारी के कारण उसने बच्चों के साथ जाने को एकदम मना कर दिया । हालांकि दादी को उनके दूसरे बेटे भी रखने को तैयार थे लेकिन ,दादी तो मां के बिना किसी के पास रहना ही नहीं चाहती थी।

माता जी(दादी) की मृत्यु के बाद एक बार वह अपने बेटे के पास विदेश में भी गई थी, वहां पर बच्चों की व्यस्तता भरी जिंदगी उसे बिल्कुल रास ना आई। उसके भारत लौटने पर उनके  विदेश में रहने वाले पोते और पोती भी बेहद दुखी थे। विदेश में भी उसने अपने बच्चों के लिए उनकी पसंद का खाना बनाना नहीं छोड़ा भारत से वह थोड़े से फल और सब्जी के बीज भी ले गई थी।

वहां पर बच्चों के  गार्डन में माधुरी जी ने जब तौरी बोई तो बेशक उनकी बहुरानी बेहद डर रही थी कि कहीं तोरी की बेल बढ़ती बढ़ती पड़ोसियों के घर तक चली गई तो वह क्या बोलेंगे ,लेकिन उस दिन उनकी बहुरानी भी  हैरान हो गई जब उनके पड़ोसी मिस्टर डेविड ने आकर उनसे कहा कि आपकी माताजी ने कितनी अच्छी गार्डनिंग करी है,  यैलो फ्लावर से कवर्ड  होने पर मेरा घर भी सुंदर हो गया।

वहां रहकर भी उन्हें भारत में अपनी गली के कुत्तों और पक्षियों तक की भी बहुत याद आती थी। कुत्तों को दूध पिलाना और पक्षियों को दाना डालना उसकी आदत ही थी।

उन्हें जेठानी देवरानी और पड़ोसियों तक  के बच्चों की भी चिंता बहुत थी। अकेले रहकर भी उसको सबके काम करते हुए कभी भी कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती थी । उसके आते ही खाली घर की सफाई करने के लिए आसपास की कामवालियां भी बेहद खुश हो गई क्योंकि बहुत गर्मियों में उसके घर के बरामदे के पंखे के नीचे ही सब बैठकर खाना खाती थी।

लेकिन दुख तब होता था जब लोग उनकी अच्छाइयों का भी गलत फायदा उठाकर उनसे काम करवाते थे। पड़ोस में रहने वाली उनकी चचेरी  बुआ अनुराधा उनसे लगभग आधी उम्र की थी लेकिन फिर भी जब भी उनकी खाने बनाने वाली नहीं आती तो वह दयनीय सी सूरत बना कर माधुरी  मां को बुलाती और अपना खाना भी उनसे बनवा कर उनके बारे में बात होने पर हमेशा उन्हें फालतू सी औरत ही कहती थी।

उस दिन जब माधुरी जी जब बैंक में अपने पति की पेंशन निकलवाने जा रही थी तो उन्होंने देखा कि  अनुराधा की 10 साल की लड़की को उसके  कुछ सहपाठी कहीं ले जाने के लिए हठ कर रहे थे और वह लड़की रो रही थी। माधुरी जी को देखकर वह उनसे लिपट गई और बोली मैंने इनके कहने पर स्कूल बंक किया था

पहले तो यह है कह रहे थे कि हम पार्क में स्पोर्ट्स की प्रैक्टिस करेंगे ताकि स्पोर्ट्स डे पर हम फर्स्ट आए।अब यह मुझे कहीं होटल में जानें के लिए कह रहे हैं। माधुरी जी बैंक जाने की बजाए उनकी बेटी को लेकर पहले अनुराधा के घर गई जब अनुराधा को सारी बात का पता चला तो उसे अपने विचारों पर बहुत शर्म आई। अगर आज माधुरी जी ना होती तो क्या हो सकता था ?

यह सोच कर ही वह अंदर तक हिल गई थी। क्योंकि उन्हें सब की सहायता करने का शौक था तो कई लोग इनके  इस गुण को नकारात्मक रूप में लेते थे उनका ख्याल था यह एकदम फालतू है और इनके पास में समय बहुत है, बच्चे भी इन्हें बहुत पैसे भेजते हैं इसलिए इनके पास पैसे भी बहुत है इसी कारण यह सब की सहायता कर सकती है।

आज बच्चों के आने के बाद उनको अंतिम विदा करते हुए  लोगों की भीड़ देखकर फालतू कहने वाले लोगों को ऐसा महसूस हो रहा था मानो उनका खुद का जीवन व्यर्थ हो गया हो। फालतू और अकेले तो वह सब खुद थे जो किसी के भी काम ना आ सके।

माता जी के तो सब अपने ही थे और वह तो सब अपनों के साथ थीं।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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