जब वह लाल जोड़े में सजी, रोते हुए गाड़ी में बैठ रही थी, तो उसकी नज़रें भीड़ में मुझे ही तलाश रही थीं, लेकिन मैं एक खंभे के पीछे छिप गया था। मैं उसे अलविदा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था।
आज उसकी शादी को छः महीने बीत चुके हैं। कल ही वह पहली बार इतने लंबे समय के लिए अपने मायके वापस आई है। आज सुबह जब वह मंदिर जा रही थी, तो अचानक गली के मोड़ पर हमारा आमना-सामना हो गया। उसके माथे पर सिंदूर था, गले में मंगलसूत्र और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव।
नदी का पानी आज कुछ ज्यादा ही शांत लग रहा था। पुराने किले की इन जर्जर सीढ़ियों पर बैठे-बैठे मुझे लगभग तीन घंटे बीत चुके थे। सूरज कब का क्षितिज के पार जा चुका था और अब आसमान में एक उदास सी लालिमा बची थी, जो धीरे-धीरे स्याह रात में बदल रही थी। नदी की लहरें सीढ़ियों से टकराकर जो धीमी आवाज़ कर रही थीं, वह मेरे अंदर चल रहे तूफ़ान के बिल्कुल विपरीत थी। मेरी नज़रें उस पगडंडी पर टिकी थीं, जो बस्ती से होकर इस खंडहर तक आती थी।
मैं जानता हूँ कि वह नहीं आएगी। मेरे मन का एक कोना बार-बार यही कह रहा था कि उसका न आना ही हम दोनों के हक़ में बेहतर है, लेकिन फिर भी, ये नासमझ आँखें पलक झपकाए बिना उसी रास्ते को निहार रही थीं।
माधवी और मैं, हम दोनों इस पुराने शहर की गलियों में एक साथ ही बड़े हुए थे। हमारे घर एक-दूसरे से चंद कदमों की दूरी पर थे। बचपन में साथ-साथ स्कूल जाना, छतों पर से पतंगें लूटना, और सर्दियों की धूप में बैठकर एक साथ होमवर्क करना—यही हमारी दुनिया थी। कब बचपन की वह नादान दोस्ती, यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही एक गहरी और खामोश मोहब्बत में बदल गई, यह न मुझे पता चला और न माधवी को। हमने कभी एक-दूसरे से प्यार का इज़हार नहीं किया, शायद इसकी कभी ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। उसकी आँखों की चमक और मेरी अनकही फिक्र ही हमारे बीच का संवाद थी। हमने मन ही मन यह तय कर लिया था कि जीवन का यह सफर अब एक साथ ही तय करना है।
हमारे परिवारों के बीच बहुत घनिष्ठता थी। माधवी के बड़े भाई, सुधीर भईया, मुझे अपने छोटे भाई की तरह ही मानते थे। दोनों परिवारों का एक-दूसरे के घर आना-जाना, हर सुख-दुख में साथ खड़े रहना, एक आदर्श पड़ोस की मिसाल था। शायद यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। हम दोनों ही अपने परिवारों की इज्ज़त और उनके दिए गए संस्कारों की बेड़ियों में कुछ इस कदर जकड़े हुए थे कि कभी अपनी हदों को पार करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाए। हमारे बीच का रिश्ता इतना पवित्र और पारदर्शी था कि घरवालों को कभी हम पर रत्ती भर भी संदेह नहीं हुआ।
कई बार सोचता हूँ, काश! काश हम भी आजकल के उन बाग़ी प्रेमियों की तरह होते, जो समाज की परवाह किए बिना अपने प्यार के लिए लड़ जाते हैं। काश किसी दिन सुधीर भईया ने हमें किसी नुक्कड़ पर या कॉलेज के बाहर एक-दूसरे का हाथ थामे देख लिया होता। हो सकता है उस दिन आसमान टूट पड़ता, घर में हंगामा मचता, मुझे दो-चार थप्पड़ भी रसीद कर दिए जाते, लेकिन कम से कम सच तो सबके सामने आ जाता। कम से कम घरवालों को यह तो पता चलता कि हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, और शायद, शायद वे हमारे भविष्य के बारे में कोई फैसला ले लेते।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमारी खामोशी ने ही हमारा गला घोंट दिया।
बात कुछ महीनों पहले की है। सुधीर भईया के एक बहुत करीबी दोस्त, जो शहर के एक बड़े बैंक में मैनेजर थे, उन्होंने अपने छोटे भाई देवांश के लिए माधवी का हाथ मांग लिया। देवांश एक सुलझा हुआ, पढ़ा-लिखा और बहुत अच्छे पद पर काम करने वाला नौजवान था। माधवी के माता-पिता के लिए यह ऐसा रिश्ता था, जिसे वे सपने में भी नहीं ठुकरा सकते थे। सुधीर भईया की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। जब यह खबर हमारे घर पहुंची, तो मेरी माँ भी मिठाई का डिब्बा लेकर उनके घर बधाई देने दौड़ पड़ी।
उस दिन जब मैं उनके घर के आँगन में पहुँचा, तो मैंने माधवी को दालान में खड़े देखा। उसकी आँखें लाल थीं और वह मुझे ही देख रही थी। उन आँखों में एक मूक प्रश्न था, एक गुहार थी, कि मैं कुछ कहूँ, कोई कदम उठाऊँ, इस रिश्ते को रोक दूँ। लेकिन मैं… मैं बस एक बुज़दिल की तरह वहाँ खड़ा रहा। मेरे सामने सुधीर भईया का हँसता हुआ चेहरा था, जिन्होंने मुझ पर हमेशा इतना भरोसा किया था। मेरे सामने मेरे और उसके पिता की सालों पुरानी दोस्ती थी। अगर मैं उस वक्त कुछ कहता, तो न केवल दो परिवारों की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाती, बल्कि सुधीर भईया का अपने दोस्त के सामने सिर झुक जाता।
मैंने अपनी नज़रें चुरा लीं। और मेरी उस नज़र चुराने की क्रिया को माधवी ने मेरा फैसला मान लिया। उसने भी एक आदर्श बेटी और बहन की तरह, बिना कोई सवाल किए, बिना एक भी आंसू छलकाए, उस रिश्ते के लिए हाँ कह दी।
शादी की तैयारियों में मैंने ही सबसे ज़्यादा काम किया। कार्ड बांटने से लेकर टेंट वाले को निर्देश देने तक, हर जगह मैं आगे था। लोग मेरी तारीफें कर रहे थे कि ‘पड़ोसी हो तो रोहन जैसा’। लेकिन कोई नहीं जानता था कि मैं काम के बोझ तले इसलिए दब जाना चाहता था ताकि मुझे सोचने की फुरसत ही न मिले। माधवी की विदाई के वक्त मैं सबसे पीछे खड़ा था। जब वह लाल जोड़े में सजी, रोते हुए गाड़ी में बैठ रही थी, तो उसकी नज़रें भीड़ में मुझे ही तलाश रही थीं, लेकिन मैं एक खंभे के पीछे छिप गया था। मैं उसे अलविदा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था।
आज उसकी शादी को छः महीने बीत चुके हैं। कल ही वह पहली बार इतने लंबे समय के लिए अपने मायके वापस आई है। आज सुबह जब वह मंदिर जा रही थी, तो अचानक गली के मोड़ पर हमारा आमना-सामना हो गया। उसके माथे पर सिंदूर था, गले में मंगलसूत्र और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव। हम दोनों ठिठक गए। मैंने बिना कुछ कहे, उसके हाथ में एक पुरानी डायरी थमा दी, जिसमें हम बचपन में सुलेख लिखा करते थे। उस डायरी के पन्नों के बीच मैंने एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा रखा था।
उस पर सिर्फ इतना लिखा था— “शाम ढलने के बाद, पुराने किले की सीढ़ियों पर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा। मुझे पता है बहुत देर हो चुकी है, पर मन में कुछ बातें भारी हो गई हैं। सिर्फ एक आखिरी बार आ जाना।”
नदी के उस पार से अब ठंडी हवाएं आने लगी हैं। किले के पीछे वाले प्राचीन पीपल के पेड़ के पत्ते हवा में सरसरा रहे हैं। बचपन में माधवी कहती थी कि इस पेड़ पर भूत रहते हैं, और मेरे पीछे छिप जाती थी। मैं उसे चिढ़ाता था कि भूत तो उन लोगों को पकड़ते हैं जो डरपोक होते हैं। आज मैं खुद को इस पूरी दुनिया का सबसे बड़ा डरपोक महसूस कर रहा हूँ।
क्या कहूंगा मैं उससे अगर वह आ गई? क्या यह कि मैं आज भी उसे भूल नहीं पाया हूँ? क्या यह कि देवांश के साथ उसकी तस्वीरें देखकर मेरा दिल आज भी दर्द से भर जाता है? नहीं, ये सब कहना तो एक शादीशुदा औरत का अपमान होगा। शायद मैं बस उसे एक बार जी भरकर देखना चाहता हूँ। शायद मैं उस अपराधबोध से मुक्ति चाहता हूँ कि मैंने उसके लिए कोई स्टैंड नहीं लिया।
रात के नौ बज चुके हैं। अब पगडंडी पर दूर-दूर तक किसी के आने की कोई आहट नहीं है। नदी की लहरें अब मुझे शांत नहीं लग रहीं, बल्कि ऐसा लग रहा है जैसे वे मुझ पर हंस रही हों।
अचानक मुझे एहसास होता है कि माधवी कितनी समझदार हो गई है। उसका न आना ही मेरे उस सवाल का जवाब है, जो मैंने उस चिट्ठी में पूछा था। अगर वह आज यहाँ आ जाती, तो इसका मतलब होता कि वह आज भी अतीत की उन्हीं गलियों में भटक रही है जहाँ से निकलने का रास्ता मैंने ही बंद कर दिया था। उसका यहाँ न आना इस बात का प्रमाण है कि उसने अपने वर्तमान को स्वीकार कर लिया है। उसने उस अजनबी पुरुष को, जिसके साथ उसने सात फेरे लिए हैं, अपना मान लिया है।
और यही तो सही है। मर्यादा की जिस चादर को ओढ़कर हमने अपने प्यार का गला घोंटा था, उस चादर को अब तार-तार करने का क्या फायदा? जो रिश्ता कभी जुड़ ही नहीं पाया, उसकी राख कुरेदने से सिर्फ हाथ काले होते हैं, आग नहीं मिलती।
आसमान में चाँद पूरी तरह खिल चुका है। उसकी रुपहली रोशनी नदी के बहते पानी पर एक खूबसूरत रास्ता बना रही है। मैं अपनी जगह से उठता हूँ। मेरे कपड़ों पर लगी धूल को झाड़ता हूँ। मन पर जो एक भारी बोझ था, वह अजीब सी शून्यता में बदल गया है। दुख है, लेकिन एक ठहराव भी है।
मैं जानता हूँ कि कल सुबह जब मैं अपने घर की छत पर जाऊंगा, तो हो सकता है वह सामने वाली छत पर कपड़े सुखाते हुए दिख जाए। हम एक-दूसरे को देखेंगे, शायद एक बहुत ही औपचारिक सी मुस्कान का आदान-प्रदान करेंगे, और फिर अपने-अपने कामों में लग जाएंगे।
मैं अब घर लौट रहा हूँ। अपनी उस दुनिया में, जहाँ मुझे अब उसके बिना जीना सीखना है, और वह… वह लौट चुकी है अपनी उस नई दुनिया में, जिसे उसने मेरे हिस्से की खामोशी से सींचा है। प्यार हमेशा पाने का नाम नहीं होता, कभी-कभी किसी की जिंदगी को उलझनों से बचाने के लिए, खुद को हमेशा के लिए एक किनारे पर समेट लेना भी प्यार ही होता है।
दोस्तों, क्या आपको लगता है कि माधवी का किले पर न आना उसका सही निर्णय था? या उसे अपने बचपन के प्यार, रोहन से एक आखिरी बार मिलकर उसे हमेशा के लिए अलविदा कहना चाहिए था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं, मुझे आपके जवाबों का इंतज़ार रहेगा।
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