रमा देवी गैस के पास खड़ी होकर अपने पच्चीस साल के बेटे कबीर के लिए टिफिन पैक कर रही थीं। डाइनिंग टेबल पर बैठे उनके पति, आनंद जी, अपने चश्मे को नाक पर टिकाए अख़बार की सुर्ख़ियों में खोए हुए थे। घर का माहौल बिल्कुल वैसा ही था जैसा किसी भी आम मध्यमवर्गीय परिवार का होता है—शांत, सुकून भरा और एक बंधी हुई दिनचर्या में ढला हुआ।
तभी कबीर अपने कमरे से बाहर आया। उसने हल्के नीले रंग की शर्ट पहनी हुई थी, बाल सलीके से संवरे हुए थे और चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो पिछले कुछ हफ्तों से रमा देवी की नज़रों से बच नहीं पा रही थी। कबीर हमेशा से थोड़ा लापरवाह किस्म का लड़का रहा था। कॉलेज के दिनों से लेकर नौकरी के पहले दो सालों तक, उसका रूटीन था कि वो अलार्म बजने के आधे घंटे बाद उठता, हड़बड़ी में नहाता, नाश्ते का एक निवाला मुंह में ठूंसता और अपनी बाइक की चाबी ढूँढते हुए घर से भाग खड़ा होता। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी थी। कबीर अब बिना अलार्म के उठ जाता था, कपड़ों पर इस्त्री एकदम परफेक्ट होती थी, और सबसे बड़ी बात, वो अपनी उस पुरानी विंटेज बाइक को सुबह दस मिनट देकर खुद साफ़ करने लगा था, जिसे वो पहले महीने में एक बार भी हाथ नहीं लगाता था।
“माँ, मेरा टिफिन रेडी है?” कबीर ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए पूछा।
“हाँ बेटा, बस दो मिनट,” रमा देवी ने दूसरा टिफिन बॉक्स भी एक अलग बैग में रखते हुए कहा। कबीर ने जब से ऑफिस जाना शुरू किया था, वो हमेशा एक ही डिब्बा लेकर जाता था। लेकिन पिछले बीस दिनों से उसने जिद करके एक और नया टिफिन बॉक्स खरीदवाया था। उसका तर्क था कि ऑफिस में काम बढ़ गया है, उसे शाम को भी भूख लगती है, इसलिए उसे दो टिफिन चाहिए। एक में लंच और दूसरे में शाम का नाश्ता।
कबीर ने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया, माँ के पैर छुए, पिता को बाय कहा और अपनी बाइक की चाबी घुमाता हुआ बाहर निकल गया। रमा देवी खिड़की से उसे तब तक देखती रहीं जब तक कि वो गली के मोड़ से ओझल नहीं हो गया। उनके चेहरे पर एक हल्की सी, अर्थपूर्ण मुस्कान तैर गई।
उन्होंने रसोई का काम समेटा और आकर आनंद जी के सामने सोफे पर बैठ गईं। आनंद जी ने अख़बार थोड़ा नीचे किया और अपनी पत्नी के चेहरे की उस रहस्यमयी मुस्कान को देखकर पूछा, “क्या बात है भई? आज सुबह-सुबह कौन सा खजाना मिल गया जो इतनी खुश नज़र आ रही हो? या फिर दूध वाले ने आज पानी कम मिलाया है?”
रमा देवी हँसी और बोलीं, “खजाना तो नहीं मिला, लेकिन हमारे घर में जल्द ही एक नया मेहमान आने वाला है। और अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो हमारे इस लापरवाह नवाबजादे ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला कर लिया है।”
आनंद जी ने अख़बार पूरी तरह से मोड़ कर टेबल पर रख दिया। उनके चेहरे पर उलझन साफ दिखाई दे रही थी। “नया मेहमान? फैसला? तुम पहेलियाँ क्यों बुझा रही हो रमा? कबीर की बात कर रही हो क्या? उसने तो मुझे ऐसा कुछ नहीं बताया। कल रात भी हम दोनों क्रिकेट मैच देख रहे थे, तब तो वो बिल्कुल नॉर्मल था।”
रमा देवी ने एक गहरी सांस ली और अपने पति की नासमझी पर प्यार से सिर हिलाते हुए कहा, “यही तो फर्क है आपमें और मुझमें। आप लोग सिर्फ वो सुनते हैं जो लफ्जों में कहा जाता है। और हम माएँ वो भी सुन लेती हैं जो खामोशियों में छुपा होता है।”
आनंद जी अब पूरी तरह से अपनी पत्नी की बातों में दिलचस्पी लेने लगे थे। “अच्छा! तो जरा अपने इस ‘खामोश रेडियो’ का प्रसारण मेरे लिए भी ऑन करो। ऐसा क्या देख लिया तुमने जो मैं नहीं देख पाया?”
“आप बस अपने अख़बार में डूबे रहते हैं आनंद जी। क्या आपने गौर नहीं किया कि हमारा बेटा पिछले बीस दिनों से बदल गया है? जो लड़का कभी अपने गंदे मोजे सही जगह पर नहीं रखता था, वो आज कल अपने कपड़ों से मैचिंग रुमाल लेकर जाता है। जो कबीर वीकेंड पर देर तक सोता था, वो अब रविवार को भी सुबह-सुबह ‘दोस्तों से मिलने’ के बहाने निकल जाता है। और सबसे बड़ी बात… वो दूसरा टिफिन बॉक्स!”
“अरे तो इसमें क्या है?” आनंद जी ने कंधे उचकाते हुए कहा, “जवान लड़का है, उसे भूख ज्यादा लगती होगी। ऑफिस का स्ट्रेस होता है, शाम को कुछ खाने का मन करता होगा। इसमें तुम्हें बहु कहाँ से नज़र आ गई?”
रमा देवी मुस्कुराईं। उनकी आँखों में एक माँ की वो चमक थी जो अपने बच्चे की हर छोटी से छोटी हरकत को किसी जासूस से बेहतर समझती है। “भूख लगती होगी… ठीक है। लेकिन क्या आपने कभी उस दूसरे टिफिन बॉक्स को वापस आते हुए देखा है?”
“देखा ही होगा… तुम ही तो धोती हो बर्तन।” आनंद जी ने मासूमियत से जवाब दिया।
“यही तो बात है जी!” रमा देवी थोड़ा आगे की ओर खिसकते हुए बोलीं, “कबीर जो पहला टिफिन बॉक्स ले जाता है, जिसमें उसका लंच होता है, वो शाम को जब वापस आता है तो उसमें झूठन होती है, तेल के दाग होते हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे एक आम लड़के का टिफिन होना चाहिए। लेकिन वो जो दूसरा टिफिन बॉक्स है, जो वो शाम के नाश्ते के लिए ले जाता है… वो जब घर लौटता है, तो बिल्कुल धुला हुआ, एकदम साफ होता है। उसमें से साबुन की भीनी-भीनी खुशबू आ रही होती है।”
आनंद जी की आँखें अब थोड़ी बड़ी हो गईं, लेकिन वो अभी भी पूरी बात नहीं समझ पा रहे थे। “तो… तो शायद वो ऑफिस की पैंट्री में उसे खुद धो लेता होगा?”
“आप अपने बेटे को नहीं जानते आनंद जी?” रमा देवी हँस पड़ीं। “जो लड़का तौलिया बिस्तर पर छोड़कर नहाने के बाद सीधा बाहर आ जाता हो, जिसने आज तक अपनी चाय का कप खुद सिंक में नहीं रखा, वो ऑफिस में खड़ा होकर अपना टिफिन धोएगा? और वो भी सिर्फ एक टिफिन? लंच वाला क्यों नहीं धोता? क्योंकि लंच वो अपनी डेस्क पर खाता है, और वो जो शाम का नाश्ता है ना… वो किसी और के साथ बाँटा जाता है। और वही ‘कोई और’ है जो उस डिब्बे को प्यार से धोकर, सुखाकर वापस हमारे बेटे के बैग में रख देती है।”
आनंद जी अवाक रह गए। उनका मुंह खुला का खुला रह गया। रमा देवी की बात में इतना पक्का तर्क था कि उसे काटा नहीं जा सकता था।
“इतना ही नहीं,” रमा देवी ने अपनी बात को और पुख्ता करते हुए कहा, “आपने कबीर की बाइक का वो दूसरा हेलमेट देखा है? जो हमेशा धूल फांकता रहता था? क्योंकि हमारा बेटा कहता था कि उसे अपनी बाइक के पीछे किसी को बिठाना पसंद नहीं है। आजकल वो रोज सुबह एक साफ कपड़े से उस दूसरे हेलमेट को चमकाता है। और कल शाम जब वो ऑफिस से लौटा, तो उस हेलमेट के शीशे पर गुलाब की पंखुड़ी का एक छोटा सा हिस्सा चिपका हुआ था। अब आप ही बताइए, हमारा बेटा कब से गुलाब के फूलों की क्यारियों में बाइक चलाने लगा?”
आनंद जी के चेहरे पर अब एक बड़ी सी, चौड़ी सी मुस्कान फैल गई थी। उन्होंने अपनी पत्नी के हाथ पर अपना हाथ रखा और एक गहरी, संतुष्टि भरी सांस ली। “कमाल हो तुम रमा… सच में कमाल हो। मैं तो सोचता था कि मेरा बेटा मुझसे सारी बातें शेयर करता है, लेकिन तुम्हारी इस ‘माँ वाली जासूसी’ के आगे तो दुनिया की सारी इंटेलिजेंस एजेंसियां फेल हैं।”
“अरे, ये जासूसी नहीं है जी,” रमा देवी की आँखें थोड़ी नम हो गईं, “ये तो ममता है। बच्चा जब पेट में होता है, तब भी माँ उसकी हलचल समझ जाती है। जब वो बोलना नहीं जानता, तब भी माँ उसके रोने के तरीके से समझ जाती है कि उसे भूख लगी है या नींद आ रही है। तो अब जब वो किसी के प्यार में पड़ा है, उसकी जिंदगी में इतनी बड़ी खुशी आई है, तो उसके चेहरे की वो लालिमा, उसकी आँखों का वो सुकून और उसकी रातों की वो मीठी नींद… एक माँ से कैसे छुप सकती है?”
आनंद जी ने हामी में सिर हिलाया। घर के उस शांत कमरे में अब एक अनकही खुशी गूंज रही थी। दोनों पति-पत्नी ने तय किया कि वो कबीर से इस बारे में सीधे नहीं पूछेंगे, बल्कि उसे खुद बताने का मौका देंगे। लेकिन वो उसे थोड़ा परेशान जरूर करेंगे, आख़िर माता-पिता होने का ये हक़ तो उनका बनता ही था।
अगले दिन रविवार था। छुट्टी का दिन। दोपहर के खाने पर तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठे थे। रमा देवी ने कबीर की पसंद की गाजर की खीर बनाई थी। कबीर बड़े चाव से खा रहा था। आनंद जी ने रमा देवी की तरफ देखा और एक हल्की सी आँख मारी।
“कबीर बेटा,” आनंद जी ने गला साफ करते हुए कहा, “मैं सोच रहा था कि तुम्हारी वो जो पुरानी बाइक है, उसे अब बेच देते हैं। तू अब बड़ा हो गया है, अच्छी खासी नौकरी है। कोई अच्छी सी कार ले ले। वैसे भी बाइक पर पीछे बैठने वाले को बड़ी तकलीफ होती है।”
कबीर के हाथ से चम्मच छूटते-छूटते बचा। उसने हड़बड़ाते हुए पिता की ओर देखा। “नहीं पापा! बाइक क्यों बेचनी है? वो तो मेरी फेवरेट है। और पीछे बैठने वाले को कोई तकलीफ नहीं होती, मैंने उसकी सीट के सस्पेंशन एकदम स्मूथ करवा दिए हैं।”
रमा देवी ने अपनी हँसी को बड़ी मुश्किल से होंठों के पीछे दबाया। “अच्छा? लेकिन तू तो कहता था कि तुझे अपने पीछे किसी को बिठाना पसंद नहीं है? फिर ये सस्पेंशन किसके लिए स्मूथ करवाए जा रहे हैं?”
कबीर का चेहरा एकदम लाल हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या जवाब दे। उसने नजरें चुराते हुए अपनी खीर की कटोरी की तरफ देखा।
“और हाँ बेटा,” आनंद जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “वो जो तुम्हारा दूसरा टिफिन बॉक्स है, उसका साबुन कौन सा है? मुझे भी ऑफिस में अपने चश्मे धोने के लिए वही साबुन चाहिए। बड़ी अच्छी खुशबू आती है उसमें से।”
अब कबीर को समझने में देर नहीं लगी कि उसके माता-पिता सब जान चुके हैं। उसने एक नजर अपनी माँ की तरफ देखी, जिनके चेहरे पर एक विजयी, लेकिन प्यार भरी मुस्कान थी। कबीर ने गहरी सांस ली, अपने दोनों हाथ टेबल पर रखे और थोड़ा शर्माते हुए बोला, “माँ… पापा… उसका नाम स्नेहा है। मेरे ही प्रोजेक्ट में काम करती है। हम दोनों पिछले छह महीने से एक-दूसरे को जानते हैं… और… और मैं आपको बताना चाहता था, बस सही समय का इंतज़ार कर रहा था।”
रमा देवी अपनी कुर्सी से उठीं और कबीर के पास जाकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा। “पागल लड़के, माँ से बात करने के लिए सही समय नहीं ढूँढना पड़ता। हमें बहुत खुशी है कि तूने अपनी जिंदगी का साथी चुन लिया है। और हाँ, उसे कहना कि वो जो शाम वाले टिफिन में घर का बना ढोकला लाती है ना, वो बहुत अच्छा होता है। मैंने एक दिन डिब्बे के कोने में लगा हुआ छोटा सा टुकड़ा चख लिया था।”
कबीर अब खुलकर हँस पड़ा। घर का कोना-कोना उन तीनों की हंसी से खिलखिला उठा। पिता ने भी उठकर बेटे को गले लगा लिया। कबीर को लगा जैसे उसके कंधों से दुनिया का सबसे बड़ा बोझ उतर गया हो। उसे समझ में आ गया था कि हमारे माता-पिता हमारे शब्दों के मोहताज नहीं होते। वो हमारे हाव-भाव, हमारी आदतों और हमारी खामोशियों की भाषा को हमसे बेहतर समझते हैं।
कबीर के मन में अपनी माँ के लिए सम्मान और भी गहरा हो गया। सच ही है, दुनिया में अगर कोई ऐसा रडार है जो बिना किसी फ्रीक्वेंसी के आपके दिल की धड़कन को पकड़ सकता है, तो वो सिर्फ और सिर्फ एक माँ का दिल है।
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