अदालत के उस विशाल और शांत कमरे में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। यह सन्नाटा किसी डर का नहीं, बल्कि एक स्तब्ध कर देने वाले सच का था। कटघरे में अट्ठाईस वर्षीय देविका खड़ी थी। उसके चेहरे पर न तो कोई पछतावा था, न कोई खौफ और न ही किसी तरह की घबराहट। उसकी आँखों में एक ऐसी बर्फीली शांति थी, जो किसी बड़े तूफान के गुजर जाने के बाद ही आती है।
उसके ठीक सामने, अदालत के बीचों-बीच एक हाई-टेक व्हीलचेयर पर शहर का सबसे रसूखदार और खूंखार माना जाने वाला उद्योगपति, विक्रम सिंह बैठा था। या यूं कहें कि विक्रम सिंह का ढांचा रखा हुआ था। विक्रम का शरीर गर्दन के नीचे से पूरी तरह लकवाग्रस्त हो चुका था। उसकी आँखों की पुतलियों के अलावा उसके शरीर का एक भी अंग काम नहीं करता था। वह न तो बोल सकता था, न हिल सकता था और न ही अपने चेहरे पर बैठी मक्खी उड़ा सकता था। उसकी आँखों में एक अजीब सा खौफ और बेबसी तैर रही थी, जो बार-बार देविका की तरफ देखकर और गहरी हो जाती थी।
सरकारी वकील ने अपना गला साफ किया और चीखते हुए कहा, “योर ऑनर! इस औरत ने एक बेहद ही खौफनाक और सोची-समझी साजिश के तहत मेरे मुवक्किल विक्रम सिंह की ये हालत की है। इसने एक ऐसी दवा का इस्तेमाल किया जिसने विक्रम जी के नर्वस सिस्टम को हमेशा के लिए तबाह कर दिया। इसने कानून को अपने हाथ में लिया है। यह एक कातिल से भी ज्यादा खतरनाक है!”
जज साहब ने अपना चश्मा ठीक किया और गहरी सांस लेते हुए देविका की तरफ देखा। “देविका, तुम्हारे खिलाफ सारे सबूत मौजूद हैं। तुमने खुद अपने बयान में ये माना है कि विक्रम सिंह की इस हालत की जिम्मेदार तुम हो। क्या तुम अपनी सफाई में कुछ कहना चाहती हो? आखिर तुमने ऐसा भयानक कृत्य क्यों किया? तुम चाहती तो पुलिस के पास जा सकती थी, कानून का दरवाजा खटखटा सकती थी।”
कटघरे में खड़ी देविका ने अपनी नजरें उठाईं। उसने एक बार व्हीलचेयर पर पड़े विक्रम को देखा और फिर जज साहब की आँखों में आँखें डालकर अत्यंत शांत लेकिन चुभती हुई आवाज में कहना शुरू किया।
“योर ऑनर… मैं अपने ऊपर लगे हर एक आरोप को पूरी तरह कुबूल करती हूँ। हाँ, मैंने ही इस इंसान को इस व्हीलचेयर का आजीवन कैदी बनाया है। लेकिन अगर आप मुझसे मेरी सफाई मांग रहे हैं, तो मैं बस इतना कहूंगी कि मैंने कोई जुर्म नहीं किया है, मैंने तो सिर्फ वो किया है जो इस कुर्सी पर बैठकर आपके कानून को बहुत पहले कर देना चाहिए था।”
अदालत में एक हल्की सी कानाफूसी शुरू हो गई, जिसे जज साहब ने हथौड़ा मारकर शांत किया।
“योर ऑनर,” देविका ने आगे कहा, “कानून की बात आप मुझसे मत कीजिए। आज से ठीक दो साल पहले, मैं भी इसी कानून, इन्हीं अदालतों और पुलिस थानों के चक्कर काट रही थी। मेरी छोटी बहन, काव्या, जिसकी उम्र सिर्फ बाइस साल थी… उसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने विक्रम सिंह की कंपनी में हो रहे एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने की धमकी दी थी। विक्रम ने अपनी ताकत और पैसे के नशे में चूर होकर मेरी फूल जैसी बहन को रातों-रात अगवा करवा लिया।”
देविका की आँखों में आंसू थे, लेकिन वो गिरे नहीं। उसने अपनी मुट्ठी भींची और कहा, “इस दरिंदे ने मेरी बहन के साथ जो किया, उसे शब्दों में बयान करने में भी मेरी रूह कांपती है। इसने और इसके आदमियों ने काव्या को जानवरों की तरह नोंचा। और जब उनका मन भर गया, तो उसे एक निर्माणाधीन इमारत की तीसरी मंजिल से नीचे फिंकवा दिया। काव्या मरी नहीं योर ऑनर… लेकिन उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई। वो हमेशा के लिए बिस्तर पर पड़ गई। उसका शरीर सुन्न हो गया, लेकिन उसकी आँखें और उसका दर्द जिंदा था।”
“मैंने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। मैंने हर वो दरवाजा खटखटाया जो आपका ये समाज और आपका ये कानून एक पीड़ित को खटखटाने के लिए कहता है। लेकिन क्या हुआ? पुलिस ने सबूत मिटा दिए। गवाहों को खरीद लिया गया। अस्पताल की रिपोर्ट बदल दी गई और इसे एक ‘दुर्घटना’ करार दे दिया गया। मेरी बहन रोज बिस्तर पर तिल-तिल कर मर रही थी, और ये विक्रम सिंह… ये खुलेआम पार्टियों में शराब पीकर मेरी बेबसी का मजाक उड़ाता था। इसने मेरे पिता को धमकी दी, जिससे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वो हमें छोड़कर चले गए।”
देविका की आवाज अब अदालत की दीवारों से टकराकर गूंज रही थी। “योर ऑनर, आप कहते हैं कि मुझे कानून पर भरोसा रखना चाहिए था? जिस कानून को ये रसूखदार लोग अपनी जेब में रखकर घूमते हैं, उस पर मैं कैसे भरोसा करती? अगर मैं इंतजार करती, तो शायद दस-बीस साल बाद इसे सजा मिल भी जाती। लेकिन क्या सजा मिलती? उम्रकैद? या फांसी?”
देविका ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ विक्रम की तरफ देखा। विक्रम की आँखों में अब आंसू भर आए थे और वो डरी हुई नजरों से जज को देख रहा था।
“अगर आप इसे फांसी दे देते, योर ऑनर… तो ये सिर्फ दस सेकंड में अपने सारे पापों से मुक्त हो जाता। मौत तो इसके लिए एक वरदान साबित होती। और अगर आप इसे उम्रकैद देते, तो ये अपने पैसे के दम पर जेल के अंदर भी वीआईपी सुख-सुविधाएं भोगता। वहां भी ये अपनी ताकत का रुतबा दिखाता। लेकिन इसके किए गए जुर्म की सजा इतनी आसान कैसे हो सकती थी?”
पूरी अदालत सांस रोककर उस युवा लड़की को सुन रही थी।
“इसने मेरी बहन का शरीर तोड़ा था, योर ऑनर। इसने उसे उस हाल में पहुँचाया था जहाँ वो न जी सकती थी, न मर सकती थी। इसलिए मैंने तय किया कि मैं इसे मौत नहीं दूंगी। मौत बहुत सस्ती सजा है। मैंने इसके खाने में वो केमिकल मिलाया, जिसने धीरे-धीरे इसके नर्वस सिस्टम को ब्लॉक कर दिया। मैंने इसका दिमाग एकदम सही सलामत छोड़ा है। इसकी सोचने समझने की ताकत, इसकी याददाश्त, इसके कान और इसकी आँखें बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन इसका शरीर… वो अब एक मरा हुआ पिंजरा है।”
देविका अदालत के कटघरे से थोड़ा आगे की ओर झुकी।
“मैं चाहती थी कि ये हर सुबह उठे, और अपने ही शरीर के अंदर घुटन महसूस करे। मैं चाहती थी कि जिसे कभी अपनी ताकत पर इतना गुरूर था, वो आज अपनी लार पोछने के लिए भी किसी दूसरे का मोहताज हो जाए। मैं चाहती थी कि ये हर पल मेरी बहन की चीखें याद करे और मौत की भीख मांगे, लेकिन मौत इसके पास फटके भी नहीं। आज जब इसकी खुद की बीवी और बच्चे इसे बोझ समझकर इससे नफरत करते हैं, जब इसके नौकर इसे हिकारत की नजर से देखते हैं, तब इसके अंदर का जो गुरूर टूटता है… वो है इसका असली न्याय।”
जज साहब खामोश थे। बचाव पक्ष का वकील भी अवाक रह गया था।
“योर ऑनर,” देविका ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “मैंने इसे मारा नहीं है। मैंने तो सिर्फ इसे वो आईना दिखाया है, जिसमें इसे जिंदगी भर अपनी घिनौनी शक्ल देखनी है। आप चाहें तो मुझे फांसी दे दें या उम्रकैद। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि मुझे जो न्याय चाहिए था, वो मैंने खुद कर लिया है। मेरा काम खत्म हो गया है, और इसका असली नर्क शुरू हो गया है। एक ऐसा नर्क, जहाँ से न तो कोई वकील इसे जमानत दिला सकता है, और न ही कोई कानून इसे आज़ाद कर सकता है।”
अदालत में एकदम सन्नाटा छा गया। विक्रम सिंह की आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे, और उसके गले से घर-घर की एक अजीब सी बेबस आवाज निकल रही थी, मानो वो सच में मौत की भीख मांग रहा हो। लेकिन उसकी सुनने वाला वहां कोई नहीं था। समाज और कानून की नजरों में देविका एक मुजरिम थी, लेकिन वहां मौजूद हर एक इंसान के दिल में, वो एक ऐसी देवी बन चुकी थी जिसने अन्याय के सीने पर पैर रखकर अपना न्याय खुद छीना था।
जज ने फैसला सुनाने के लिए एक लंबी तारीख दे दी, लेकिन एक बात तय थी—कानून की किताबों में भले ही देविका हार गई हो, लेकिन न्याय के तराजू में उसने विक्रम सिंह को वो सजा दी थी, जो सदियों तक हर उस दरिंदे को याद रहेगी, जो किसी औरत की बेबसी का फायदा उठाने की जुर्रत करेगा।
क्या आपको लगता है कि देविका ने जो किया वो सही था? क्या हमारे देश का कानून सच में इतना कमजोर है कि पीड़ितों को खुद ही हथियार उठाना पड़ता है?
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