“मम्मी, वो जो बनारसी सिल्क की साड़ी आपने दिखाई थी, वही भिजवाना मेरे लिए। और हाँ, काजू-बादाम, पिस्ता के साथ वो इंपोर्टेड चॉकलेट्स का बड़ा वाला पैक भी रख देना। मेरी जेठानी के मायके से बहुत भारी सामान आया है इस बार दिवाली पर। उनके रिश्तेदारों के सामने मेरा इम्प्रेशन डाउन नहीं होना चाहिए। आपको तो पता है ना कि वहाँ लोग कैसे हर चीज़ को तौलते हैं।” फोन के स्पीकर से गूंजती अपनी इकलौती बेटी रिया की फरमाइशें सुनकर नीता के चेहरे पर एक गर्व और संतुष्टि भरी मुस्कान तैर गई।
“तू बिल्कुल चिंता मत कर मेरी बच्ची। तेरी सास और जेठानी देखती रह जाएंगी कि रिया के मायके से क्या आया है। मैंने तेरे पापा से कहकर चांदी का वो बड़ा वाला सिक्का भी मंगवा लिया है जिस पर लक्ष्मी-गणेश बने हैं और साथ में तेरे ससुर जी के लिए एक बेहतरीन सफारी सूट भी। कल सुबह ही हम दोनों आकर सब दे जाएंगे। तू बस तैयार रहना।” नीता ने बेटी को तसल्ली दी और प्यार से फोन काट दिया।
फोन रखते ही नीता फिर से पैकिंग में जुट गई। दीवान पर तरह-तरह के चमकीले रैपर, रिबन, मेवे के डिब्बे और मखमली साड़ियों के बक्से बिखरे पड़े थे। वह बहुत बारीकी से हर डिब्बे को सजा रही थी। उसका बस नहीं चल रहा था कि अपनी बेटी के ससुराल वालों को खुश करने के लिए और क्या-क्या उसमें भर दे। तभी उसके पति रजत कमरे में दाखिल हुए। काम से थके-हारे रजत की नज़र जैसे ही उस फैले हुए सामान पर पड़ी, उनके कदम ठिठक गए।
“यह सब क्या है नीता? मानो किसी की शादी का शगुन जा रहा हो। दिवाली के त्योहार पर इतना सारा सामान और इतने महंगे कपड़े? मुझे लगता है रिया ने फिर से कोई लंबी-चौड़ी लिस्ट थमा दी है तुम्हें,” रजत ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा और पास ही कुर्सी पर बैठ गए।
नीता ने पैकिंग वाले डिब्बे पर टेप लगाते हुए थोड़ी झुंझलाहट से जवाब दिया, “अरे आप भी ना… आदमियों को इन घर-गृहस्थी की बारीकियों की क्या समझ! आप नहीं जानते कि लड़कियों के ससुराल में इन बातों का कितना मोल होता है। उसकी जेठानी के मायके से कल ही दो गाड़ियां भरकर सामान आया है। अब अगर अपनी रिया के मायके से दो-चार डिब्बे कम गए, तो क्या उसकी सास ताने नहीं मारेगी? वो नई-नई ब्याही है, उसके ससुराल में उसकी नाक का सवाल है। आखिर एक ही तो बेटी है हमारी, उसके लिए इतना भी नहीं करेंगे तो क्या फायदा हमारी इस कमाई का?”
रजत कुछ देर तक नीता को देखते रहे। उनकी आँखों में एक अजीब सी खामोशी थी। वे उठे, अलमारी खोली और उसमें से दो बेहद साधारण लेकिन सलीके से पैक किए गए बैग निकालकर नीता के सामने रख दिए।
नीता ने हैरानी से उन बैग्स की तरफ देखा। “यह क्या है? और इसमें क्या रखा है?”
“यह सूती चंदेरी की साड़ियां, जीजा जी के लिए कुर्ते का कपड़ा और कुछ घर की बनी मिठाइयां हैं,” रजत ने बेहद शांत स्वर में कहा।
“लेकिन यह सब किसके लिए है? आपने मुझे तो नहीं बताया कि आप किसी के लिए दिवाली का तोहफा ला रहे हैं,” नीता ने माथा सिकोड़ते हुए पूछा।
“यह दीदी के लिए है… मेरी बड़ी बहन सुमेधा दीदी के लिए,” रजत ने कहा और वापस अपनी जगह पर बैठ गए।
यह सुनते ही नीता के हाथ रुक गए। उसके चेहरे के भाव अचानक से बदल गए। वह थोड़ा तल्ख स्वर में बोली, “दीदी के लिए? पर क्यों भला? मेरा मतलब है, जब तक बाबूजी और माँ जी जीवित थे, तब तक हर त्योहार पर उनके यहाँ से शगुन जाता था, कपड़े जाते थे। वो बात अलग थी, तब इस घर के बड़े-बुजुर्ग जिंदा थे। अब तो बाबूजी को गुजरे हुए भी चार साल से ऊपर हो गए हैं। दीदी अब अपने घर में पूरी तरह से सेटल हैं, उनके बच्चे बड़े हो गए हैं। हम एक डिब्बा मिठाई भिजवा देंगे या फोन पर बधाई दे देंगे, वही बहुत है। इतनी महँगी साड़ियां और ये सब भेजने का अब क्या तुक है? और वैसे भी, हमारे अपने खर्चे भी तो हैं। रिया के ससुराल में इतना कुछ देना है, और आप हैं कि…”
रजत ने बीच में ही नीता की बात काट दी। उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसी पीड़ा थी जो सालों से कहीं दबी हुई थी।
“बाबूजी गए हैं नीता, सुमेधा दीदी का मायका नहीं,” रजत की आवाज़ कमरे के सन्नाटे में गूंज उठी। “क्या एक बेटी के लिए उसका मायका सिर्फ तब तक होता है जब तक उसके माता-पिता की सांसें चलती हैं? क्या पिता की चिता के साथ बेटी के मायके की चौखट भी जल जाती है?”
नीता अवाक रह गई। उसने रजत को कभी इस तरह से बात करते नहीं सुना था।
रजत आगे बोले, “तुम रिया के लिए इतना सब कुछ कर रही हो ताकि ससुराल में उसका सिर ऊँचा रहे, कोई उसे ताना ना मारे। क्या सुमेधा दीदी का ससुराल में सिर ऊँचा रखने का मन नहीं करता होगा? क्या उनकी ननदें या जेठानियां यह नहीं देखती होंगी कि सुमेधा के पिता के जाने के बाद उसके मायके से अब कोई पूछने वाला नहीं रहा? तुम कहती हो कि वो सेटल हैं… तो क्या जो बेटियां सेटल हो जाती हैं, उन्हें मायके के प्यार और हक की जरूरत नहीं होती?”
नीता खामोश खड़ी थी। उसके हाथ से पैकिंग का रिबन छूटकर नीचे गिर गया था।
रजत की आँखें नम हो गई थीं। “रिया आज हमारी बेटी है, कल जब हम नहीं होंगे, तब उसका भी कोई भाई होगा। क्या तुम चाहोगी कि हमारे जाने के बाद रिया का भाई भी उसे सिर्फ एक डिब्बा मिठाई भेजकर अपना फर्ज पूरा कर ले और कहे कि अब बाबूजी नहीं रहे? दीदी भी इसी घर के आँगन में खेल कर बड़ी हुई हैं। जिन दीवारों पर आज हमारा हक है, उन पर कभी दीदी की पायल गूंजती थी। जब यह घर उन दोनों बेटियों में कोई भेद नहीं करता, तो तुम और मैं कौन होते हैं यह तय करने वाले कि किसका हक खत्म हो गया और किसका बाकी है? मैं रिया की फरमाइशें पूरी करने से मना नहीं कर रहा, वो मेरी भी जान है। पर मुझे मेरे उस फर्ज से मत रोको जो एक भाई के रूप में मुझे मेरी बहन के प्रति निभाना है।”
कमरे में भारी सन्नाटा छा गया। रजत की एक-एक बात नीता के सीने में तीर की तरह चुभ रही थी। उसे अचानक वो दिन याद आ गया जब वह इस घर में नई-नई दुल्हन बनकर आई थी। कैसे सुमेधा दीदी ने उसे हर कदम पर संभाला था, कैसे उसकी हर गलती पर पर्दा डाला था। और आज, सिर्फ अपनी बेटी के मोह और दुनियादारी के दिखावे में वह इतनी अंधी हो गई थी कि उसी दीदी को इस घर से बेदखल मान बैठी थी।
उसे एहसास हुआ कि एक औरत होकर भी वह दूसरी औरत, दूसरी बेटी के दर्द और उसके अधिकारों को कैसे भूल गई। एक तरफ वह अपनी बेटी का घर भर देना चाहती थी और दूसरी तरफ अपने पति की बहन का मायका छीन रही थी। ग्लानि और पछतावे के आँसू नीता की आँखों से छलक पड़े। वह अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ी रही।
कुछ देर बाद, उसने धीरे से अपने आँसू पोंछे। वह उठी, अपनी अलमारी खोली और उसमें से एक बेहद खूबसूरत सोने की चेन निकाली जो उसने अपने लिए बनवाई थी। उसने वह चेन और अपनी एक नई पश्मीना शॉल सुमेधा दीदी वाले बैग में रख दी।
रजत हैरानी से उसे देख रहे थे।
नीता ने चाबियों का गुच्छा उठाया, रजत के हाथ में रखा और रुंधे हुए लेकिन दृढ़ स्वर में बोली, “चलिए, उठिए।”
“कहाँ?” रजत ने पूछा।
“इस घर की बड़ी बेटी के यहाँ… दीदी के घर,” नीता के होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान थी और आँखों में मायके के उस पवित्र रिश्ते का सम्मान, जो अब कभी मरने वाला नहीं था।
कैसी लगी आपको यह कहानी? क्या नीता का अपनी गलती सुधारना सही था? अपने विचार हमें जरूर बताएं।
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