दरवाजा बंद होते ही काव्या और अंजलि की धड़कनें तेज हो गईं। उन्हें लगा कि अब उनकी शामत आने वाली है। बड़ी अम्मा ने पास आकर दोनों व्यंजनों का मुआयना किया। उन्होंने देखा कि लौकी का हलवा तले से लग गया है और फिरनी में चावल पानी की तरह तैर रहे हैं। अंजलि ने अपनी नजरें झुका लीं और उसकी आंखों से दो आंसू छलक कर जमीन पर गिर पड़े। काव्या भी कांपती हुई आवाज में बोली, “माफी चाहते हैं बड़ी अम्मा… हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। सब खराब हो गया।”
बनारस के पुराने घाटों के पास बसे अवस्थी परिवार की पुश्तैनी हवेली में आज एक अलग ही चहल-पहल थी। तीन दिनों तक चली शादी की रौनक, शहनाई की गूंज और ढोलक की थाप अब एक मीठी सी थकान में बदल चुकी थी। मेहमानों की आवाजाही अभी भी जारी थी। आंगन में बिछी दरी पर बैठे बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाते हुए पुरानी शादियों के किस्से सुना रहे थे, तो वहीं दालान में औरतें पान चबाते हुए नई बहुओं के रूप-रंग और उनके मायके से आए दहेज की चर्चा कर रही थीं। इसी हवेली के दो चिराग, समर और विहान, कल ही अपनी-अपनी दुल्हनें लेकर आए थे। बड़ी बहू का नाम अंजलि था, जो स्वभाव से बहुत ही शांत और संकोची थी, जबकि छोटी बहू का नाम काव्या था, जो थोड़ी चुलबुली जरूर थी, लेकिन आज वह भी इस नए माहौल की गंभीरता तले दबी हुई थी। आज घर में एक बहुत ही महत्वपूर्ण रस्म होने वाली थी—’पहली रसोई’। भारतीय परिवारों में यह रस्म सिर्फ खाना बनाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह एक नई बहू के कौशल, धैर्य और परिवार के प्रति उसके समर्पण की पहली परीक्षा मानी जाती है। हवेली में अभी भी कम से कम चालीस से पचास मेहमान मौजूद थे और इन सबके लिए कुछ मीठा बनाने की जिम्मेदारी अंजलि और काव्या के कोमल कंधों पर डाल दी गई थी। दोनों को घर की औरतों ने एक-एक खास मीठा व्यंजन बनाने का निर्देश दिया था। अंजलि को लौकी का हलवा और काव्या को बादाम की फिरनी बनानी थी।
जब अंजलि और काव्या हवेली की उस विशाल रसोई में दाखिल हुईं, तो वहां रखे पीतल के बड़े-बड़े पतीले, कड़ाहियां और राशन के बड़े-बड़े कनस्तर देखकर ही उनका दिल बैठ गया। अपने मायके में उन्होंने कभी इतने बड़े पैमाने पर खाना नहीं बनाया था। ज्यादा से ज्यादा चार-छह लोगों के लिए चाय या मैगी बनाने वाली ये लड़कियां आज पचास लोगों का मीठा बनाने वाली थीं। रसोई की अलमारियों में सजे मसालों और मेवों के डिब्बे उन्हें किसी पहेली की तरह लग रहे थे। काव्या के माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगीं और अंजलि के तो हाथ-पैर ही सुन्न पड़ने लगे। आखिर इतने सारे दूध में कितनी चीनी डलेगी? लौकी कितनी कद्दूकस करनी पड़ेगी? क्या ये सब समय पर हो पाएगा? ऐसे अनगिनत सवाल उनके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। ऊपर से ननदों और देवरानियों की फौज उनके मजे लेने से बाज नहीं आ रही थी। समर की चचेरी बहनें, नीता और शिखा, बार-बार रसोई के दरवाजे पर आ जातीं और तंज कसते हुए कहतीं, “अरे भाभियों! जल्दी हाथ चलाओ, बाहर मेहमानों के पेट में चूहे कूद रहे हैं। और हां, अगर हलवा जल जाए तो बता देना, हम हलवाई को फोन कर देंगे!” यह कहकर वे जोर-जोर से हंसती हुई भाग जातीं। उनकी ये बातें काव्या और अंजलि के डर को और भी ज्यादा बढ़ा रही थीं। दोनों एक-दूसरे का मुंह ताक रही थीं। अंजलि की आंखों में तो जैसे आंसू ही तैरने लगे थे।
खैर, जैसे-तैसे दोनों ने भगवान का नाम लेकर काम शुरू किया। अंजलि ने लौकी कसकर कड़ाही में भूनना शुरू किया और काव्या ने एक बड़े पतीले में दूध उबलने के लिए रख दिया। लेकिन घबराहट में अक्सर चीजें बिगड़ ही जाती हैं। अंजलि ने ध्यान नहीं दिया और आंच तेज होने के कारण लौकी कड़ाही के तले में लग गई। हलवे से जलने की एक अजीब सी महक उठने लगी। उधर, काव्या की फिरनी का भी बुरा हाल था। उसने चावलों को बिना ठीक से पीसे ही दूध में डाल दिया था, जिसकी वजह से चावल दूध में घुले नहीं, बल्कि ऊपर तैरने लगे और दूध बिल्कुल पानी जैसा पतला ही रहा। दोनों को जब अपनी-अपनी डिश की हालत का अहसास हुआ, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। काव्या रोने जैसी हो गई और अंजलि ने तो गैस बंद करके अपना सिर ही पकड़ लिया। उन्हें लगा कि आज तो पूरे परिवार के सामने उनकी भारी बेइज्जती होने वाली है। सास के ताने और मेहमानों की बातें सोचकर ही उनका दिल कांपने लगा।
तभी रसोई के दरवाजे पर एक भारी और रौबदार आवाज गूंजी, “क्या तमाशा बना रखा है इस रसोई को?” यह आवाज हवेली की सबसे बुजुर्ग और सबसे सख्त महिला, ‘बड़ी अम्मा’ (सावित्री देवी) की थी। बड़ी अम्मा समर और विहान की दादी थीं। सफेद सूती साड़ी पहने, कमर में चाबियों का गुच्छा लटकाए और आंखों पर मोटा चश्मा लगाए बड़ी अम्मा का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि घर के बड़े-बड़े मर्द भी उनके सामने ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे। उनका अनुशासन फौज के किसी जनरल से कम नहीं था। बड़ी अम्मा को देखते ही रसोई में खड़ी नीता और शिखा के चेहरे का रंग उड़ गया। बड़ी अम्मा ने अपनी छड़ी जमीन पर ठोकते हुए कड़क आवाज में कहा, “तुम लड़कियां यहां क्या मटरगश्ती कर रही हो? चलो बाहर जाओ और जाकर मेहमानों के लिए पत्तल बिछाओ। जब देखो बहुओं के सिर पर नाचती रहती हो!” नीता और शिखा बिना एक शब्द बोले वहां से रफूचक्कर हो गईं। अब रसोई में सिर्फ बड़ी अम्मा, अंजलि और काव्या थे। बड़ी अम्मा ने रसोई का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
दरवाजा बंद होते ही काव्या और अंजलि की धड़कनें तेज हो गईं। उन्हें लगा कि अब उनकी शामत आने वाली है। बड़ी अम्मा ने पास आकर दोनों व्यंजनों का मुआयना किया। उन्होंने देखा कि लौकी का हलवा तले से लग गया है और फिरनी में चावल पानी की तरह तैर रहे हैं। अंजलि ने अपनी नजरें झुका लीं और उसकी आंखों से दो आंसू छलक कर जमीन पर गिर पड़े। काव्या भी कांपती हुई आवाज में बोली, “माफी चाहते हैं बड़ी अम्मा… हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। सब खराब हो गया।” बड़ी अम्मा ने कुछ पल तक उन दोनों के डरे और उतरे हुए चेहरों को देखा। फिर उनके कठोर चेहरे पर अचानक एक बेहद नरम और ममतामयी मुस्कान उभर आई, जिसे देखकर दोनों बहुएं हैरान रह गईं। बड़ी अम्मा ने अंजलि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “अरे पगली, इसमें रोने की क्या बात है? जब मैं इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थी, तो मैंने पहली बार दाल बनाई थी और उसमें नमक की जगह चीनी डाल दी थी। गलतियों से ही तो इंसान सीखता है। चलो, अब आंसू पोंछो, बिगड़ी हुई चीज को संवारना ही तो असली हुनर है। और तुम्हारी ये अम्मा अभी जिंदा है।”
बड़ी अम्मा के इन शब्दों ने जैसे दोनों के सूखते हुए प्राणों में अमृत का संचार कर दिया। बड़ी अम्मा ने तुरंत मोर्चे को अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने अंजलि से कहा, “अंजलि बेटी, एक साफ पतीला निकालो।” फिर बड़ी अम्मा ने बहुत ही सावधानी से कड़ाही के ऊपर-ऊपर का हलवा, जो जला नहीं था, एक बड़े चम्मच से निकालकर नए पतीले में डाल दिया और नीचे का जला हुआ हिस्सा कड़ाही में ही छोड़ दिया। जलने की महक को खत्म करने के लिए उन्होंने अंजलि से उसमें थोड़ा सा केवड़ा जल, एक चम्मच इलायची पाउडर और ढेर सारा भुना हुआ मावा (खोया) मिलवा दिया। ऊपर से शुद्ध देसी घी का एक बड़ा चम्मच डालकर उसे धीमी आंच पर पांच मिनट तक भूनने को कहा। देखते ही देखते लौकी के हलवे से जलने की गंध बिल्कुल गायब हो गई और उसकी जगह घी, इलायची और केवड़े की इतनी शानदार खुशबू उठी कि पूरे रसोईघर महक उठा।
अब बारी काव्या की फिरनी की थी। बड़ी अम्मा ने काव्या को एक कटोरी में ठंडे दूध के साथ दो चम्मच कस्टर्ड पाउडर और थोड़ा सा कॉर्नफ्लोर घोलने को कहा। फिर उस घोल को उबलते हुए पतले दूध में धीरे-धीरे मिला दिया। कुछ ही मिनटों में दूध गाढ़ा और मखमली हो गया। जो चावल ऊपर तैर रहे थे, वे भी अब उस गाढ़ेपन के साथ मिलकर एक बेहतरीन टेक्सचर दे रहे थे। स्वाद को और बढ़ाने के लिए बड़ी अम्मा ने उसमें थोड़ा सा कंडेंस्ड मिल्क (मिल्कमेड) और मुट्ठी भर कटे हुए पिस्ते और बादाम डाल दिए। रंगत के लिए केसर के कुछ धागे भी दूध में घोलकर डाल दिए गए। कुछ ही देर में वह बिगड़ी हुई फिरनी एक शाही केसरिया डेजर्ट में बदल गई, जिसे देखकर किसी के भी मुंह में पानी आ जाए। दोनों व्यंजनों को चखकर बड़ी अम्मा ने संतोष से सिर हिलाया। मिठास और स्वाद बिल्कुल लाजवाब था।
अंजलि और काव्या की आंखों में अब डर नहीं, बल्कि कृतज्ञता के आंसू थे। अंजलि ने आगे बढ़कर तुरंत बड़ी अम्मा के पैर छू लिए। काव्या ने भी भावुक होकर उनके पैर छुए। बड़ी अम्मा ने दोनों को उठाकर अपने गले से लगा लिया और धीमे से बोलीं, “अब जल्दी से इन्हें अच्छे से सजाकर बाहर ले चलो, और हां… बाहर किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि अंदर क्या हुआ। ये हम तीनों का राज है।” जब दोनों बहुएं चांदी के बड़े-बड़े थालों में हलवा और फिरनी लेकर दालान में पहुंचीं, तो सबकी निगाहें उन पर टिक गईं। जैसे ही मेहमानों और घर के बुजुर्गों ने पहला निवाला खाया, चारो तरफ से तारीफों के पुल बंधने लगे। समर और विहान के चेहरों पर भी गर्व की मुस्कान थी। घर के सबसे बड़े ससुर जी ने खुश होकर दोनों को शगुन के तौर पर सोने की एक-एक अंगूठी दी। नीता और शिखा भी उस लाजवाब स्वाद को चखकर हैरान थीं और चुपचाप कोने में खड़ी थीं।
जब अंजलि और काव्या शगुन ले रही थीं, तो उनकी नजरें दूर बैठी बड़ी अम्मा पर गईं, जो उन्हें देखकर अपनी आंखें झपकाते हुए मुस्कुरा रही थीं। आज उन दोनों लड़कियों ने सिर्फ एक बेहतरीन डिश ही नहीं बनाई थी, बल्कि एक नए घर में अपनी सबसे बड़ी ढाल और एक मां जैसी छाया को पा लिया था। यह एक ऐसी पहली रसोई थी, जिसने पकवानों से ज्यादा रिश्तों में मिठास घोल दी थी।
क्या आपके साथ भी आपकी पहली रसोई में या ससुराल के शुरुआती दिनों में कुछ ऐसा ही खट्टा-मीठा अनुभव हुआ था, जब किसी अपने ने आपको मुश्किल से निकाला हो? अपने अनुभव और अपनी कहानी नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
लेखिका : निधि गुप्ता