कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी किसी हथौड़े की चोट की तरह महसूस हो रही थी। विक्रम बेड के किनारे बैठा था, उसके हाथों में एक अस्पताल की फाइल थी और उसकी नजरें सामने ड्रेसिंग टेबल के पास खड़ी काव्या पर टिकी थीं। काव्या अपने बालों में ब्रश कर रही थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। विक्रम की आँखों में आँसू सूख चुके थे, और उनकी जगह एक ऐसे सन्नाटे ने ले ली थी जो किसी बड़े तूफान के गुजर जाने के बाद पीछे छूट जाता है।
“काव्या…” विक्रम की आवाज़ में एक अजीब सा कंपन था। “ये… ये डॉ. सेनगुप्ता की फाइल… इसका क्या मतलब है?”
काव्या ने आईने में से विक्रम को देखा, ब्रश को टेबल पर रखा और बहुत ही सहजता से मुड़ी। “ओह, तो तुमने वो फाइल देख ली। मैं तुम्हें बताने ही वाली थी विक्रम, लेकिन मुझे लगा कि तुम शायद समझ नहीं पाओगे और खामख्वाह बहस करोगे।”
विक्रम अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ। उसके हाथ कांप रहे थे। “बताने वाली थी? क्या बताने वाली थी तुम मुझे? यही कि तुमने हमारी उस खुशी को, हमारे उस आने वाले बच्चे को खत्म कर दिया जिसके सपने मैं पिछले पांच सालों से देख रहा था? काव्या, तुमने एक बार भी मुझसे पूछना जरूरी नहीं समझा?”
“पूछने वाली बात ही नहीं थी इसमें विक्रम,” काव्या ने झुंझलाते हुए कहा। “तुम्हें पता है कि अगले महीने मुझे कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट बनाया जा रहा है। अगर मैं इस वक्त मैटरनिटी लीव पर जाती या प्रेगनेंसी के कॉम्प्लीकेशंस में फँसती, तो मेरा सालों का करियर खत्म हो जाता। मैं अभी इन सब झमेलों के लिए तैयार नहीं हूँ। बच्चे पालने का मतलब है अपनी आज़ादी और अपने सपनों की बलि चढ़ाना, और मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं हूँ।”
विक्रम उसे ऐसे देख रहा था जैसे किसी अजनबी को देख रहा हो। यह वो काव्या नहीं थी जिससे उसने सात साल पहले प्रेम विवाह किया था। शादी के वक्त काव्या ने कहा था कि वह कुछ साल अपने करियर पर फोकस करना चाहती है। विक्रम ने खुशी-खुशी उसका साथ दिया। घर के कामों से लेकर, काव्या के हर फैसले में वह एक ढाल बनकर खड़ा रहा। उसे लगा था कि एक दिन जब काव्या अपने मुकाम पर पहुँच जाएगी, तब वे अपना एक खूबसूरत परिवार बनाएंगे। जब पिछले हफ्ते काव्या ने चिड़चिड़ेपन में चेकअप करवाया और पता चला कि वह प्रेग्नेंट है, तो विक्रम की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने उसी दिन वापसी में एक छोटी सी खिलौने वाली गाड़ी और लाल रंग के छोटे-छोटे मोजे खरीद लिए थे, जिन्हें उसने अपने वॉर्डरोब में छिपा कर रखा था।
“झमेला? तुम्हें अपना ही बच्चा एक झमेला लगता है?” विक्रम की आवाज़ अब भारी हो चुकी थी। “तुम्हारी महत्वाकांक्षा इतनी बड़ी हो गई कि उसके सामने एक जान की, हमारी मोहब्बत की कोई कीमत नहीं रही? तुमने सिर्फ एक बच्चे की जान नहीं ली है काव्या, तुमने मेरे उन सभी सपनों का गला घोंट दिया है जो मैंने तुम्हारे साथ देखे थे। तुमने मेरे भरोसे को मार दिया है।”
“तुम हमेशा हर बात का बतंगड़ बनाते हो विक्रम!” काव्या ने अपनी आवाज़ तेज करते हुए कहा। “मैंने कोई जुर्म नहीं किया है। ये मेरा शरीर है और मैं फैसला कर सकती हूँ कि मुझे क्या करना है। तुम इतने भावुक क्यों हो रहे हो? कुछ सालों बाद हम सरोगेसी से या गोद लेकर बच्चा कर लेंगे, अभी मेरी जिंदगी का सबसे अहम मोड़ है।”
“हाँ, तुम्हारा शरीर है। तुम्हारा करियर है। तुम्हारी जिंदगी है,” विक्रम ने एक ठंडी सांस ली। “लेकिन वो बच्चा सिर्फ तुम्हारा नहीं था काव्या। उसमें मेरा भी अंश था। अगर तुम तैयार नहीं थीं, तो कम से कम मुझसे बात तो करतीं। हम कोई रास्ता निकालते। लेकिन तुमने तो मुझे इस लायक ही नहीं समझा कि मेरे बच्चे की जिंदगी और मौत के फैसले में मेरी कोई राय हो। तुमने मुझे पूरी तरह से बेगाना कर दिया।”
विक्रम की आँखों के सामने वो सारे पल किसी फिल्म की तरह गुजरने लगे, जब उसने काव्या की हर जिद को, उसके हर गुस्से को सिर्फ इसलिए बर्दाश्त किया था क्योंकि वह उससे बेइंतहा प्यार करता था। उसे लगता था कि काव्या बाहर से कितनी भी सख्त क्यों न हो, अंदर से वह भी एक कोमल दिल रखती है। लेकिन आज उस फाइल के चंद पन्नों ने उसे सच्चाई का वो आईना दिखा दिया था, जिसे वह अब तक अनदेखा कर रहा था।
“मुझे लगा था कि तुम्हारे अंदर कहीं न कहीं कोई भावना, कोई ममता होगी। लेकिन आज समझ आया कि तुम्हारे अंदर सिर्फ एक मशीन धड़कती है, जिसे सिर्फ सफलता और पैसों की भूख है,” विक्रम ने ड्रॉर से वो लाल रंग के छोटे मोजे निकाले और उन्हें बेड पर रख दिया।
काव्या उन मोजों को देखकर एक पल के लिए ठिठकी, लेकिन फिर उसने अपने चेहरे के भावों को कठोर कर लिया। “विक्रम, मैं तुम्हें पहले ही बता चुकी हूँ कि मैं वैसी टिपिकल हाउसवाइफ नहीं बन सकती जो बच्चे और पति के इर्द-गिर्द अपनी दुनिया समेट ले। अगर तुम मुझे समझ नहीं सकते, तो ये मेरी गलती नहीं है।”
“नहीं, ये तुम्हारी गलती नहीं है,” विक्रम ने अपना सूटकेस निकाला और उसमें अपने कपड़े डालने लगा। “ये मेरी गलती है कि मैंने एक ऐसी औरत से उम्मीदें लगा लीं जिसके लिए रिश्ते सिर्फ सीढ़ियां हैं, जिन पर पैर रखकर वह ऊपर चढ़ना चाहती है। प्यार, ममता, त्याग… ये शब्द तुम्हारी डिक्शनरी में हैं ही नहीं।”
“ये तुम क्या कर रहे हो?” काव्या ने सूटकेस देखकर पूछा, उसकी आवाज़ में अब हल्की सी घबराहट थी।
“मैं जा रहा हूँ काव्या। हमेशा के लिए।” विक्रम ने सूटकेस बंद किया और उसकी चेन खींचते हुए कहा।
“सिर्फ एक अबॉर्शन के लिए तुम घर छोड़कर जा रहे हो? आर यू सीरियस?” काव्या को यकीन नहीं हो रहा था।
“सिर्फ एक अबॉर्शन? नहीं काव्या। मैं इसलिए जा रहा हूँ क्योंकि आज मैंने उस औरत को हमेशा के लिए खो दिया है जिससे मैंने प्यार किया था। मैं ऐसे घर में नहीं रह सकता जो अंदर से खाली हो, और मैं उस इंसान के साथ एक पल भी नहीं गुजार सकता जिसके अंदर भावनाओं की जगह पत्थर ने ले ली हो। तुम्हें तुम्हारा करियर मुबारक हो, तुम्हारी आज़ादी मुबारक हो। तुम्हें जो खालीपन चाहिए था, अब वो हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा।”
विक्रम ने सूटकेस उठाया और कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। काव्या उसे देखती रही, उसे लगा कि विक्रम दरवाजे पर रुक कर पलट कर देखेगा, जैसा कि वह हर बार लड़ाई के बाद करता था। लेकिन इस बार विक्रम के कदमों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। वह बाहर निकला, और कुछ ही सेकंड बाद मुख्य दरवाजे के बंद होने की भारी आवाज़ पूरे घर में गूंज उठी।
घर में अब सिर्फ सन्नाटा था। वही सन्नाटा जिसे काव्या हमेशा शांति कहती थी, लेकिन आज वह सन्नाटा उसे डराने लगा था। बेड पर रखे वो लाल मोजे उसे चिढ़ा रहे थे। विक्रम जा चुका था, अपने साथ उस घर की रूह को भी ले गया था। काव्या ने अपनी आज़ादी तो पा ली थी, लेकिन उस आज़ादी की कीमत उसे एक ऐसे अकेलेपन से चुकानी थी, जिसका दर्द उसे जिंदगी भर सहना था।
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लेखिका : गरिमा चौधरी