विशाखा जब से अनुराग के घर ब्याह कर आई थी, पूरे घर में अक्सर उसी के स्वभाव की चर्चा दबी जुबान में होती रहती थी। विशाखा एक बहुत ही शांत, गंभीर और कम बोलने वाली लड़की थी। वह पेशे से एक बैंक अधिकारी थी और उसे फालतू की गपशप, मोहल्ले की औरतों के साथ बैठकर दूसरों की बुराई करना या दिखावे का प्यार जताना बिल्कुल नहीं आता था। उसका मानना था कि रिश्ते शब्दों से ज्यादा कर्मों से निभाए जाते हैं। लेकिन उसके इस शांत स्वभाव को उसकी सास, सुमित्रा जी ने उसका ‘घमंड’ मान लिया था। सुमित्रा जी को लगता था कि विशाखा एक ऊंचे खानदान से है और अच्छी नौकरी करती है, इसीलिए वह अपनी सास और ससुराल वालों को अपने बराबर का नहीं समझती।
घर में अनुराग के छोटे भाई की पत्नी, श्रुति भी थी। श्रुति विशाखा के बिल्कुल विपरीत थी। वह दिन भर सुमित्रा जी के आगे-पीछे घूमती, उनकी झूठी तारीफें करती और मीठी-मीठी बातें करके उनका दिल बहलाती रहती। काम के नाम पर वह अक्सर सिरदर्द या थकान का बहाना बना देती, लेकिन अपनी लच्छेदार बातों से उसने सुमित्रा जी को इस कदर मोह रखा था कि उन्हें श्रुति ही घर की सबसे संस्कारी और अच्छी बहू लगती थी। बात-बात पर सुमित्रा जी विशाखा को ताने देतीं, “अरे श्रुति को देखो, कैसे पूरे घर को अपनी मीठी बोली से बांध कर रखती है। एक हमारी बड़ी बहू है, जिसके मुंह से एक शब्द सुनने के लिए तरस जाओ। लगता है जैसे हमारे घर आकर इस पर कोई बड़ा एहसान कर दिया हो।”
विशाखा ये सब सुनती, उसे बुरा भी लगता, लेकिन वह कभी पलटकर जवाब नहीं देती। वह चुपचाप सुबह उठती, घर का सारा काम समेटती, सबके लिए टिफिन बनाती और बैंक चली जाती। शाम को आकर फिर से बिना थके घर की जिम्मेदारियों में लग जाती। अनुराग भी अपनी मां की बातों में आकर कभी-कभी विशाखा से उखड़ जाता था। वह भी यही सोचता था कि शायद विशाखा सच में इस परिवार को अपना नहीं पाई है और सिर्फ एक फर्ज के तौर पर यहां रह रही है। वह कई बार विशाखा से कहता कि वह घर वालों के साथ बैठकर हंसा-बोला करे, लेकिन विशाखा का स्वभाव ही ऐसा नहीं था कि वह बनावटीपन ओढ़ सके।
वक्त ऐसे ही अपनी रफ्तार से बीत रहा था कि तभी परिवार पर एक ऐसा संकट आया जिसने सारे भ्रम और दिखावे के मुखौटे एक झटके में नोच कर फेंक दिए। एक रात अचानक अनुराग के पिता, दीनानाथ जी के सीने में भयंकर दर्द उठा। दर्द इतना तेज था कि वे बिस्तर पर ही बेहोश हो गए। पूरे घर में कोहराम मच गया। सुमित्रा जी फूट-फूट कर रोने लगीं और श्रुति जो हमेशा बड़ी-बड़ी बातें करती थी, घबराहट के मारे एक कोने में जाकर बैठ गई और सिर्फ रोने का दिखावा करने लगी। अनुराग के छोटे भाई को समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
ऐसे समय में जब घर का हर सदस्य पैनिक कर रहा था, विशाखा की खामोशी ने एक मजबूत चट्टान का रूप ले लिया। उसने बिना एक भी आंसू बहाए या शोर मचाए, तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया। जब तक एम्बुलेंस आती, उसने फर्स्ट-एड किट से जरूरी दवाइयां निकालीं और ससुर जी को प्राथमिक उपचार दिया। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने बताया कि दीनानाथ जी को एक बहुत बड़ा हार्ट अटैक आया है और तुरंत बाईपास सर्जरी करनी पड़ेगी। डॉक्टरों ने बिना किसी लाग-लपेट के कह दिया कि अगर अगले एक घंटे में सर्जरी नहीं हुई, तो जान बचाना नामुमकिन होगा। साथ ही, अस्पताल के काउंटर पर तुरंत पांच लाख रुपये जमा करने का फरमान भी सुना दिया गया।
पैसों का नाम सुनते ही अनुराग के होश उड़ गए। उसने हाल ही में अपने व्यापार में सारा पैसा लगा दिया था। जब उसने अपने छोटे भाई की तरफ देखा, तो उसने और श्रुति ने नजरें चुरा लीं और एफडी टूटने में समय लगने का बहाना बना दिया। सुमित्रा जी ये सब देखकर टूट सी गईं। उन्हें लगा कि आज उनके पति नहीं बचेंगे।
लेकिन तभी विशाखा चुपचाप काउंटर पर गई। उसने अपना पर्स निकाला और अपना बैंक कार्ड स्वाइप कर दिया। यह वो पैसा था जो विशाखा ने अपने और अनुराग के भविष्य के लिए, एक छोटा सा आशियाना खरीदने के लिए पाई-पाई जोड़कर सालों से इकट्ठा किया था। उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उसके सपनों के उस पैसे का क्या होगा। उसने तुरंत पूरे पैसे भर दिए और सभी कागजातों पर दस्तखत कर दिए। सिर्फ पैसे ही नहीं, सर्जरी के लिए ‘ओ नेगेटिव’ खून की जरूरत थी जो बहुत मुश्किल से मिलता है। इत्तेफाक से विशाखा का ब्लड ग्रुप भी वही था। बिना किसी को जताए, वह सीधे ब्लड बैंक गई और अपना खून भी दिया।
लगातार अड़तालीस घंटे विशाखा बिना पलक झपकाए आईसीयू के बाहर खड़ी रही। उसने अस्पताल के सारे चक्कर काटे, दवाइयां लाईं, और सुमित्रा जी को जबरदस्ती खाना खिलाया। श्रुति और उसका पति तो अगले दिन अस्पताल में सिर्फ शक्ल दिखाने आए और घर जाकर आराम करने लगे।
तीसरे दिन जब डॉक्टर ने आकर कहा कि दीनानाथ जी अब खतरे से बाहर हैं, तब जाकर विशाखा एक कुर्सी पर निढाल होकर बैठ गई। अनुराग ने जब अस्पताल के बिल और विशाखा के खून देने की बात सुनी, तो वह वहीं फूट-फूट कर रो पड़ा। उसे अपने आप पर भयंकर शर्म आ रही थी कि उसने अपनी पत्नी को पहचानने में कितनी बड़ी भूल की थी।
जब दीनानाथ जी को अस्पताल से छुट्टी मिली और वे सब घर लौटे, तो घर का माहौल बिल्कुल बदला हुआ था। रात के समय, अनुराग विशाखा के पास आया। उसकी आंखें डबडबाई हुई थीं। उसने विशाखा के हाथ अपने हाथों में लिए और रुंधे हुए गले से कहा, “विशाखा, तुम्हारा पति होने के नाते आज तुमने मेरा सिर गर्व से इतना ऊंचा कर दिया है कि मैं उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मैं और यह पूरा घर यही सोचता था कि तुम थोड़ी घमंडी हो, अपने ससुराल वालों को अपनी बराबरी का नहीं समझती, इसीलिए किसी से ज्यादा घुलती-मिलती नहीं। लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि तुम दिखावा नहीं करती, बल्कि सच्चे दिल से हमारी परवाह करती हो। तुमने मेरे पिता की जान बचाकर हम सब पर जो कर्ज चढ़ाया है, उसे मैं सात जन्मों में भी नहीं उतार सकता।”
अनुराग अपनी बात पूरी कर ही रहा था कि तभी दरवाजे पर खड़ी सुमित्रा जी अंदर आईं। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी। वे आगे बढ़ीं और उन्होंने विशाखा के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। विशाखा घबराकर उठी और उनके हाथ पकड़ लिए, “ये क्या कर रही हैं मां जी? आप मुझसे बड़ी हैं।”
सुमित्रा जी रोते हुए बोलीं, “मुझे माफ कर दे बहू। मैं सच में अंधी हो गई थी। मैं उम्र भर कांच के टुकड़ों को हीरा समझती रही और जो असली हीरा मेरे घर में था, उसे कंकड़ समझकर ठोकरें मारती रही। तुम हमेशा से हम सबकी ढाल बनकर खड़ी थीं, लेकिन मैं ही तुम्हारी खामोशी को तुम्हारा अहंकार समझ बैठी। मुझे हमेशा ताने देने वाली एक बुरी सास समझकर माफ कर देना बेटी।”
विशाखा ने प्यार से सुमित्रा जी के आंसू पोंछे और उन्हें गले लगाते हुए बहुत ही शांत स्वर में कहा, “मां जी, अनुराग… बस बहुत हुआ। खुद को इस तरह ग्लानि और पछतावे से मत भरिए। इसमें आपका कोई कसूर नहीं है। हमारी दुनिया का दस्तूर ही कुछ ऐसा है। वह कहते हैं ना कि बाजार में हमेशा वही सामान बिकता है जिसमें चमक ज्यादा हो। फीकी और खामोश चीजों को कोई जल्दी पसंद नहीं करता। मैं क्या करूं, मेरा स्वभाव ही ऐसा है। मुझे प्यार का दिखावा करना या शब्दों की चाशनी में रिश्ते घोलना नहीं आता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरे दिल में आप लोगों के लिए सम्मान नहीं है। शांत पानी भले ही शीशे की तरह चमके नहीं, लेकिन आग बुझाने के काम वही आता है।”
उस रात विशाखा की खामोशी ने घर के हर सदस्य के दिल में ऐसी गूंज पैदा कर दी थी, जिसने सारे रिश्तों को हमेशा के लिए एक अटूट और सच्चे धागे में पिरो दिया था।
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