सच्ची मां

“अंजलि बेटा, जरा बाहर आना।” सुमित्रा जी ने अपनी अलमारी को ताला लगाते हुए अपनी नई नवेली बहू अंजलि को आवाज दी। अगले ही पल अंजलि रसोई से अपने हाथ पोंछती हुई बाहर आ गई। उसकी आंखें थोड़ी सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था। सुमित्रा जी ने अंजलि को हिदायत देते हुए कहा, “बेटा, मुझे मोहल्ले की कुछ औरतों के साथ एक जरूरी काम से पास के मंदिर वाले ट्रस्ट के ऑफिस जाना है। शायद आने में दो-तीन घंटे लग जाएं। तुम अंदर से कुंडी अच्छी तरह लगा लेना। सुबह से तुम्हारे सिर में दर्द है और तुम थकी हुई भी लग रही हो। सारा काम मैंने समेट दिया है, तुम जाकर अपने कमरे में चुपचाप आराम करो।” अंजलि ने धीमी सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया, “जी मां जी, आप फिक्र मत कीजिए, मैं आराम कर लूंगी।”

सुमित्रा जी के जाने के बाद अंजलि ने मुख्य द्वार की कुंडी लगाई और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। उसका शरीर सुबह से ही टूट रहा था। कल रात से उसे हल्की हरारत महसूस हो रही थी, लेकिन नई बहू होने के नाते उसने किसी से कुछ कहना उचित नहीं समझा और घर के सारे कामों में लगी रही। जैसे ही वह बिस्तर पर लेटी, उसकी आंखें बोझिल होने लगीं। दवा का असर था या थकान, उसे गहरी नींद आ गई।

तकरीबन एक घंटे बाद दरवाजे की घंटी लगातार बजने लगी। पहले तो अंजलि को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जब घंटी की आवाज तेज हुई, तो वह हड़बड़ा कर उठी। उसका सिर चकरा रहा था और शरीर भट्टी की तरह तप रहा था। उसे तेज बुखार आ चुका था। वह गिरते-पड़ते दरवाजे तक पहुंची। जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने सुमित्रा जी की बड़ी ननद, यानी अंजलि की विमला बुआ सास खड़ी थीं। विमला बुआ अपने सख्त मिजाज और नुक्ताचीनी के लिए पूरे खानदान में मशहूर थीं। वह बिना बताए ही किसी भी रिश्तेदार के घर धमक पड़ती थीं और फिर वहां कमियां निकालती थीं।

“क्या बात है बहू? दिन के बारह बजे दरवाजे बंद करके घोड़े बेचकर सो रही हो? तुम्हारे ससुर जी और पति तो ऑफिस गए होंगे, सुमित्रा कहां गई?” विमला बुआ ने अंदर घुसते ही सवालों की झड़ी लगा दी।

अंजलि ने लड़खड़ाते हुए उनके पैर छुए और बोली, “बुआ जी, मां जी मंदिर के किसी काम से गई हैं। आप बैठिए, मैं आपके लिए पानी लाती हूं।”

“हां, हां, बैठ ही रही हूं। मेरी तो किस्मत ही खराब है जो बिना बताए आ गई। अब तुम्हारे जैसी नई उम्र की लड़कियों को कहां मेहमानों की कदर होती है,” विमला बुआ सोफे पर धंसते हुए बड़बड़ाईं।

अंजलि रसोई में गई। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। बुखार की वजह से उसे रसोई की गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसने फ्रिज से पानी निकाला और फिर गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह खड़ी कैसे रहे। किसी तरह उसने चाय बनाई और एक प्लेट में कुछ स्नैक्स सजाए। जब वह ट्रे लेकर ड्राइंग रूम की तरफ आ रही थी, तो कमजोरी के कारण उसके हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। अचानक उसका पैर कारपेट के किनारे से उलझा और वह लड़खड़ा गई। चाय के कप से थोड़ी सी चाय छलक कर तश्तरी में गिर गई और चम्मच जमीन पर जा गिरा।

विमला बुआ का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने अंजलि को घूरते हुए कठोर स्वर में कहा, “अरे कैसी फूहड़ लड़की है! मायके वालों ने क्या कोई तमीज नहीं सिखाई? एक चाय भी सलीके से नहीं पकड़ी जाती। चाय प्लेट में गिरा दी और चम्मच जमीन पर। आजकल की लड़कियों को बस सजना-संवरना और आराम करना आता है, सेवा-सत्कार करना भी नहीं आता। हमारी सुमित्रा ने तो बहू को सिर पर चढ़ा रखा है।”

अंजलि की आंखों में आंसू आ गए। वह चुपचाप तश्तरी को साफ करने लगी। बुखार और अपमान के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी। वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही दरवाजे पर चाबी घूमने की आवाज आई और सुमित्रा जी अंदर दाखिल हुईं।

सुमित्रा जी ने अपनी ननद को देखा तो मुस्कुरा कर आगे बढ़ीं, लेकिन तभी उनकी नजर जमीन पर बैठी अंजलि पर पड़ी। अंजलि का चेहरा एकदम पीला पड़ चुका था और आंखों से आंसू बह रहे थे। सुमित्रा जी तुरंत अंजलि के पास गईं और जैसे ही उन्होंने उसे उठाने के लिए उसका हाथ पकड़ा, वह सिहर उठीं। अंजलि का शरीर आग की तरह तप रहा था।

“अंजलि! तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है बेटा। तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?” सुमित्रा जी ने घबराते हुए कहा और अंजलि को सहारा देकर सोफे पर बिठाया।

विमला बुआ ने मुंह बनाते हुए कहा, “अरे सुमित्रा, यह बुखार-वुखार सब बहाने होते हैं काम से बचने के। मैं आई हूं तो इसे बुखार चढ़ गया। एक चाय तक ठीक से नहीं ला सकी। मायके में कुछ सीखा ही नहीं है।”

यह सुनते ही सुमित्रा जी का चेहरा गंभीर हो गया। वह हमेशा अपनी ननद का सम्मान करती थीं, लेकिन आज बात एक बेटी जैसी बहू के आत्मसम्मान की थी। सुमित्रा जी ने मुड़कर विमला बुआ की तरफ देखा और बेहद शांत लेकिन दृढ़ आवाज में बोलीं, “बुआ जी (दीदी), क्षमा कीजिएगा, लेकिन मेरी बहू में सेवा और संस्कारों की कोई कमी नहीं है। मैं घर से जाते वक्त इसे आराम करने को कह कर गई थी क्योंकि इसकी तबीयत सुबह से नासाज थी। इसके बावजूद, इतने तेज बुखार में, जब इंसान से खड़ा भी नहीं हुआ जाता, यह आपके लिए चाय-नाश्ता बनाकर लाई। यह फूहड़पन नहीं, इसका समर्पण है।”

विमला बुआ अवाक रह गईं। सुमित्रा जी ने अपनी बात जारी रखी, “दीदी, रिश्ते सिर्फ इस बात से नहीं चलते कि कोई कितनी अच्छी तरह ट्रे सजाकर लाता है। रिश्ते संवेदनाओं से चलते हैं। अगर मेरी अपनी बेटी की ऐसी हालत होती, तो क्या मैं उससे चाय बनवाती? जब हम बेटियों को तकलीफ में आराम दे सकते हैं, तो बहुओं से मशीन की तरह काम करने की उम्मीद क्यों करते हैं? मेरी बहू को सेवा-सत्कार भी आता है और घर जोड़ना भी। कमी इसके संस्कारों में नहीं, शायद हमारे देखने के नजरिए में है।”

सुमित्रा जी के इन शब्दों ने विमला बुआ के भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें अचानक अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने देखा कि अंजलि वाकई बुखार से तप रही थी और फिर भी उनके सामने हाथ जोड़े बैठी थी। विमला बुआ का कठोर दिल मोम की तरह पिघल गया। वह अपनी जगह से उठीं और उन्होंने अंजलि के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “मुझे माफ कर दे बेटी। मैं पुराने ख्यालों की हूं, बिना समझे ही तुझे इतना कुछ कह गई। सुमित्रा बिल्कुल सही कह रही है। तू तो सचमुच अन्नपूर्णा है।”

सुमित्रा जी ने अंजलि को अपने गले से लगा लिया। अंजलि को उस दिन सिर्फ एक सास नहीं, बल्कि एक सच्ची मां मिल गई थी, जिसने दुनिया के सामने उसकी ढाल बनकर उसके सम्मान की रक्षा की थी।

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