असली न्याय

“मालिक, ऐसा गज़ब मत बोलिए। वो आपकी भी बेटी जैसी है। अगले महीने उसके हाथ पीले होने वाले हैं। मैं खून-पसीना एक करके आपका एक-एक पैसा चुका दूँगा, बस मेरी बच्ची की तरफ आँख मत उठाइए।” लेकिन समर सिंह ने एक ज़ोरदार लात रामदीन के सीने पर मारी और अपने दोस्तों के साथ भद्दे ठहाके लगाता हुआ अपनी जीप में बैठकर धूल उड़ाता चला गया।

रामदीन जानता था कि समर सिंह जो कहता है, वो करता है। वह दरिंदा पहले भी गाँव की कई गरीब लड़कियों की ज़िंदगी तबाह कर चुका था,

झारखंड के कोयला खदानों से सटे एक छोटे से गाँव चन्दनपुर में शाम का अँधेरा घिरने लगा था। इस गाँव की हवा में कोयले की कालिख के साथ-साथ यहाँ के रसूखदार लोगों का खौफ भी घुला हुआ था। गाँव के किनारे एक कच्ची छत वाले मकान में रामदीन अपनी पत्नी सुहासिनी, अठारह साल की बेटी काव्या और सोलह साल के बेटे शिवा के साथ रहता था। रामदीन एक सीधा-सादा मज़दूर था, जो खदान में दिन-रात पसीना बहाकर अपने परिवार का पेट पालता था। काव्या बहुत ही सुंदर और समझदार लड़की थी, जिसकी शादी अगले ही महीने तय थी। रामदीन ने अपनी बेटी की शादी के लिए गाँव के सबसे बड़े ठेकेदार और खदान मालिक, ठाकुर भवानी सिंह से पचास हज़ार का कर्ज़ लिया था।

सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी उनकी खुशियों को किसी की नज़र लग गई। ठाकुर भवानी सिंह का बेटा, समर सिंह, जो अपनी अय्याशी और गुंडागर्दी के लिए पूरे इलाके में बदनाम था, एक दिन अपनी जीप से रामदीन के घर के सामने आकर रुका। दरअसल वो कर्ज़ की किश्त के लिए रामदीन को धमकाने आया था, लेकिन दरवाज़े पर पानी भरती काव्या पर जब उसकी गिद्ध जैसी नज़र पड़ी, तो उसकी नीयत डोल गई। समर ने पान थूकते हुए रामदीन से कहा, “सुन बे रामदीन, तेरा कर्ज़ा बहुत हो गया है। या तो कल सुबह तक पूरे पचास हज़ार मय सूद के पंचायत में रख देना, या फिर अपनी इस कली को कल रात मेरे फार्म हाउस पर भेज देना। हिसाब भी बराबर हो जाएगा और तेरी बेटी को शादी से पहले कुछ तज़ुर्बा भी मिल जाएगा।”

यह सुनकर रामदीन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह समर सिंह के पैरों में गिर पड़ा और अपनी पगड़ी उसके जूतों पर रख दी, “मालिक, ऐसा गज़ब मत बोलिए। वो आपकी भी बेटी जैसी है। अगले महीने उसके हाथ पीले होने वाले हैं। मैं खून-पसीना एक करके आपका एक-एक पैसा चुका दूँगा, बस मेरी बच्ची की तरफ आँख मत उठाइए।” लेकिन समर सिंह ने एक ज़ोरदार लात रामदीन के सीने पर मारी और अपने दोस्तों के साथ भद्दे ठहाके लगाता हुआ अपनी जीप में बैठकर धूल उड़ाता चला गया।

रामदीन जानता था कि समर सिंह जो कहता है, वो करता है। वह दरिंदा पहले भी गाँव की कई गरीब लड़कियों की ज़िंदगी तबाह कर चुका था, लेकिन किसी की भी उसके खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं होती थी। रामदीन बदहवास हालत में उठा और सीधे शहर के पुलिस स्टेशन की तरफ भागा। उसे लगा कि शायद कानून का रखवाला उसकी मदद करेगा।

थाने में इंस्पेक्टर चौरसिया अपनी कुर्सी पर पैर पसारे बैठा था। रामदीन ने रोते हुए उसके सामने हाथ जोड़े और समर सिंह की पूरी करतूत बताई। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “साहब, मेरी बच्ची की इज़्ज़त बचा लीजिए। वो भेड़िया मेरी बेटी को उठा ले जाएगा। आप मेरी एफआईआर लिख लीजिए साहब।”

इंस्पेक्टर चौरसिया ने रामदीन को ऊपर से नीचे तक देखा और एक कुटिल मुस्कान के साथ बोला, “अरे ओ भिखमंगे! तुझे पता भी है तू किसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आया है? ठाकुर भवानी सिंह का बेटा है वो। इलाके का बच्चा-बच्चा कांपता है उनके नाम से। और रही बात तेरी बेटी की, तो भेज दे न एक रात के लिए। इसमें क्या आफत आ जाएगी? वैसे भी जब तू कर्ज़ा नहीं चुका सकता, तो कोई तो कीमत चुकानी पड़ेगी। चुपचाप जा और उसे भेज दे, वरना पूरे परिवार को गाड़ दूँगा और किसी को खबर भी नहीं लगेगी।”

रामदीन को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। जिस पुलिस से वह न्याय की गुहार लगाने आया था, वो तो पहले से ही ठाकुर के टुकड़ों पर पल रही थी। रामदीन हार मानने वाला नहीं था। वह वहाँ से सीधा डीएसपी साहब के बंगले की तरफ दौड़ा। डीएसपी साहब जिले के बड़े अधिकारी थे। बंगले के बाहर संतरी ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन रामदीन रोता-चीखता हुआ पोर्च तक पहुँच गया। “साहब! मुझे न्याय चाहिए, मेरी बेटी की जान खतरे में है!” रामदीन चिल्लाया।

तभी बंगले का दरवाज़ा खुला और डीएसपी साहब बाहर आए। लेकिन उनके पीछे जो शख्स सिगार पीता हुआ बाहर निकला, उसे देखकर रामदीन का खून सूख गया। वह ठाकुर भवानी सिंह था। डीएसपी साहब ने भवानी सिंह के सामने खुद को बड़ा साबित करने के लिए रामदीन पर अपना गुस्सा उतारा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर में घुसने की? अगर तुम्हारे पास किसी जुर्म का सबूत है तो सुबह कोर्ट में जाना। यहाँ तमाशा किया तो यहीं जेल में सड़ा दूँगा। भागो यहाँ से!”

रामदीन की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। कानून, पुलिस, प्रशासन—सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे। एक गरीब की इज़्ज़त की उनके लिए कोई कीमत नहीं थी। टूटे हुए कदमों और मरे हुए मन से रामदीन देर रात अपने घर पहुँचा।

घर का नज़ारा दिल चीरने वाला था। सुहासिनी और काव्या दोनों डरी-सहमी एक कोने में बैठकर रो रही थीं। रामदीन को खाली हाथ और हताश देखकर वे समझ गईं कि अब उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है। रामदीन ज़मीन पर बैठकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची, तेरा बाप एक कमज़ोर इंसान है। मैं तुझे उस दरिंदे से नहीं बचा सकता। शायद यही हमारी किस्मत है। हम गरीबों को इज़्ज़त से जीने का कोई हक़ नहीं है।”

कमरे के दूसरे कोने में दीवार से सटकर खड़ा सोलह साल का शिवा सब कुछ खामोशी से सुन रहा था। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी आग सुलग रही थी जो सब कुछ भस्म कर देना चाहती थी। वह अपनी बहन से बहुत प्यार करता था और अपने पिता के इस तरह गिड़गिड़ाने और टूटने का नज़ारा उसके खून को उबाल रहा था। शिवा जानता था कि ये पुलिस और नेता कभी न्याय नहीं करेंगे। लेकिन उसे यह भी पता था कि इस गाँव से कुछ दूर पहाड़ियों के उस पार एक ऐसा भी दरबार लगता है, जहाँ से कोई भी गरीब खाली हाथ नहीं लौटता। वो बाग़ियों (नक्सलियों) का इलाका था, जिन्हें गाँव वाले छुपकर ‘लाल सेना’ कहते थे। उनका कमांडर, ‘रुद्र दादा’, अमीरों का दुश्मन और गरीबों का मसीहा माना जाता था।

रात के सन्नाटे में, जब पूरा घर अपने दुख में डूबा था, शिवा दबे पाँव घर के पिछले दरवाज़े से बाहर निकला और घने जंगल की तरफ उस पगडंडी पर दौड़ पड़ा जो पहाड़ियों की तरफ जाती थी। उसे ना जंगली जानवरों का डर था, ना ही अँधेरे का। उसके दिमाग में बस अपनी बहन का रोता हुआ चेहरा और समर सिंह का वो भद्दा ठहाका गूंज रहा था। रामदीन ने जब उसे पुकारने की कोशिश की— “शिवा… बेटा कहाँ जा रहा है इतनी रात को?” तब तक शिवा अँधेरे में गायब हो चुका था। रामदीन अपनी किस्मत को कोसता हुआ वहीं चौखट पर बैठ गया।

रात भर रामदीन अपनी बेटी के सामने पहरा देता रहा। सुबह का सूरज उगा, लेकिन रामदीन के घर के लिए वह सूरज मौत का पैगाम लेकर आया था। सुबह करीब नौ बजे, धूल उड़ाती हुई दो जीपें रामदीन के घर के सामने आकर रुकीं। एक जीप में समर सिंह अपने गुंडों के साथ बैठा था, और दूसरी जीप में खुद इंस्पेक्टर चौरसिया मौजूद था, जो समर सिंह को ‘प्रोटेक्शन’ देने आया था।

समर सिंह अपनी बंदूक हवा में लहराता हुआ नीचे उतरा। “कहाँ है बे रामदीन? ला मेरी अमानत बाहर ला!” उसने दर्प से चिल्लाते हुए कहा।

रामदीन एक कुल्हाड़ी लेकर दरवाज़े पर खड़ा हो गया। उसकी आँखों में खौफ था लेकिन एक पिता की ममता ने उसे मरने के लिए खड़ा कर दिया था। “उसे छूने से पहले मेरी लाश से गुज़रना होगा समर सिंह!” रामदीन ने कांपती आवाज़ में कहा।

यह सुनकर इंस्पेक्टर चौरसिया और समर सिंह ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। चौरसिया ने अपनी रिवॉल्वर निकाली और रामदीन के माथे पर तान दी, “बुड्ढे, ज्यादा हीरो मत बन। एक गोली भेजूँगा भेजे में और तेरी लाश उठाने वाला भी कोई नहीं मिलेगा।” समर सिंह आगे बढ़ा और उसने दरवाज़े को ज़ोर से लात मारी। काव्या अंदर चीख पड़ी।

लेकिन इससे पहले कि समर सिंह एक कदम भी और आगे बढ़ा पाता, अचानक जंगल की तरफ से एक सनसनाती हुई गोली आई और सीधे समर सिंह के घुटने के आर-पार हो गई। समर सिंह एक भयानक चीख मारते हुए ज़मीन पर गिर पड़ा।

इंस्पेक्टर चौरसिया कुछ समझ पाता, उससे पहले ही चारों तरफ से ‘लाल सलाम’ और ‘रुद्र दादा ज़िंदाबाद’ के नारे गूंजने लगे। जंगल की झाड़ियों से दर्जनों हथियारबंद बागी निकल आए। उन्होंने जीपों को चारों तरफ से घेर लिया। गुंडों के हाथों से बंदूकें छूटकर गिर गईं।

रुद्र दादा, जो लाल कपड़े से अपना मुँह बांधे हुए था, धीरे-धीरे चलते हुए आगे आया। उसने ज़मीन पर तड़पते समर सिंह की तरफ देखा और अपनी राइफल की नाल उसके माथे पर रख दी। “हमने सुना है कि तुझे गरीब की बेटियों की बहुत भूख है? आज तेरी सारी भूख मिटा देते हैं।”

इंस्पेक्टर चौरसिया काँपते हुए घुटनों के बल बैठ गया। “मुझे छोड़ दो… मुझे माफ कर दो…” वह गिड़गिड़ाने लगा।

रुद्र दादा ने एक ठंडी नज़र उस पुलिस वाले पर डाली और कहा, “जो रक्षक होकर भी भेड़ियों का साथ दे, उसे जीने का कोई हक़ नहीं।”

अगले ही पल, जंगल का सन्नाटा दो गोलियों की आवाज़ से दहल उठा। समर सिंह और इंस्पेक्टर चौरसिया की लाशें ज़मीन पर लहूलुहान पड़ी थीं। बागियों ने उनके गुंडों को भी बुरी तरह पीटकर भगा दिया। जाते-जाते रुद्र दादा ने रामदीन से कहा, “अपनी बेटी की शादी धूमधाम से करना। अगर कोई फिर आँख उठाए, तो पहाड़ी की तरफ मुँह करके बस एक आवाज़ लगा देना।” इतना कहकर वे लोग जैसे आए थे, वैसे ही जंगल में ओझल हो गए।

रामदीन अभी तक सकते में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कोई सपना था या हकीकत। जिस आफत से बचने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, वो आफत भगवान ने एक झटके में खत्म कर दी थी। रामदीन दोनों हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखते हुए ईश्वर को इस ‘चमत्कार’ और ‘इंसाफ़’ के लिए धन्यवाद दे रहा था।

उसी वक्त, शिवा जंगल की तरफ से धीरे-धीरे चलता हुआ घर लौटा। उसके कपड़ों पर मिट्टी लगी थी और आँखों में रात भर जागने की थकान थी। जब उसने घर के सामने उन दोनों दरिंदों की लाशें देखीं, तो उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। वह चुपचाप अपने पिता के पास आकर खड़ा हो गया।

रामदीन ने शिवा को गले लगा लिया और रोते हुए बोला, “देख बेटा, ऊपर वाले के घर देर है अंधेर नहीं। भगवान ने हमारी सुन ली।”

शिवा ने अपने पिता को कसकर गले लगाया। रामदीन की पीठ के पीछे, शिवा के होंठों पर एक गहरी, शांत और कुटिल मुस्कान तैर गई। वह जानता था कि भगवान ने नहीं, बल्कि न्याय की उस लाल माटी ने उनकी पुकार सुनी थी, जहाँ कानून की नहीं, बल्कि बंदूक की अदालत लगती है।

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