बेटियां सिर्फ़ मायके से लेने नहीं आती हैं

दोपहर के तीन बज चुके थे। रितिका ने अभी-अभी घर के सारे काम निपटाए थे और वह अपनी कमर सीधी करने के लिए बिस्तर पर लेटी ही थी कि दरवाजे की घंटी जोर से बज उठी। एक बार, दो बार और फिर लगातार बजती ही रही। ऐसा लग रहा था जैसे बाहर खड़े इंसान ने अपनी उंगली घंटी के बटन पर चिपका दी हो और उसे वापस हटाना भूल गया हो। नींद के आगोश में जा रही रितिका का मिजाज इस कर्कश आवाज से एकदम उखड़ गया। वह बड़बड़ाते हुए उठी, “पता नहीं कौन आ गया इस वक़्त! लोगों को यह भी तमीज नहीं होती कि दोपहर के समय किसी के घर ऐसे घंटी नहीं बजाते। कोई आराम कर रहा होगा, यह तो कोई सोचता ही नहीं।”

उसने झल्लाहट के साथ जैसे ही दरवाजा खोला, सामने अपनी ननद अंजलि को खड़े देखकर उसके चेहरे के भाव और भी ज्यादा कठोर हो गए। रितिका का मूड पूरी तरह से खराब हो गया। उसने तो सोचा था कि आज वह शाम तक सुकून की नींद सोएगी, अपनी मनपसंद वेब सीरीज देखेगी, पर अब अंजलि के आने का मतलब था चाय-नाश्ते का झंझट, घंटों की बातें और फिर रात के लिए किसी खास पकवान की तैयारी। रितिका की सोच हमेशा से यही रही थी कि ननद का घर आना यानी जिम्मेदारियों और खर्चों का बेवजह बढ़ जाना। उसने कभी अंजलि का खुले दिल से स्वागत नहीं किया था।

“अरे… नमस्ते दीदी, आइए,” रितिका ने बेहद ठंडे और रूखे स्वर में कहा। उसके चेहरे पर स्वागत की कोई मुस्कान नहीं थी।

अंजलि, जिसके चेहरे पर सफर की थकान साफ नजर आ रही थी, मुस्कुराते हुए अंदर आई। “कैसी हो भाभी? बहुत दिनों से तुम लोगों की याद आ रही थी, सोचा आज मिल ही आऊं।”

“मैं तो ठीक हूँ, आप बैठिए मैं पानी भिजवाती हूँ,” रितिका ने औपचारिकता निभाते हुए उसे हॉल के सोफे पर बिठाया और खुद पानी लाने के बजाय सीधे अपने बेडरूम में चली गई।

बेडरूम में उसका पति समीर अपना लैपटॉप खोलकर ऑफिस का कुछ काम कर रहा था। रितिका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और व्यंग्यात्मक लहजे में समीर से बोली, “चलो, अपना लैपटॉप बंद करो और बाहर जाओ। तुम्हारे कर्जदार आ गए हैं, जाकर उन्हें हैंडल करो। मुझे बहुत सिरदर्द हो रहा है, मैं तो आराम करने जा रही हूँ।”

समीर ने लैपटॉप से नजरें हटाईं और हैरानी से अपनी पत्नी की ओर देखा। “कर्जदार? कैसे कर्जदार? पागल हो गई हो क्या रितिका? मैंने तो आज तक किसी से एक रुपये का कर्जा नहीं लिया है। कौन आया है बाहर?”

रितिका ने मुंह बनाते हुए कहा, “अरे कर्जदार ही तो हैं। तुम्हारी लाडली बहन अंजलि आई है। जब भी मायके आती है, तो एक कर्जदार की तरह ही तो आती है। उसकी सेवा करो, उसकी पसंद का खाना बनाओ, फिर लौटते वक्त शगुन के नाम पर भारी लिफाफा और महंगे कपड़े दो। हम जैसे उसकी सेवा करने के लिए ही तो बैठे हैं। यह किसी कर्ज को चुकाने से कम है क्या?”

समीर को अपनी पत्नी की यह बात बहुत चुभी। उसने गहरी सांस ली, लेकिन बहस करने के बजाय वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया। रितिका को लगा कि शायद समीर को अंजलि से मिलकर वापस आने में समय लगेगा, इसलिए वह दरवाजे के पीछे खड़ी होकर उनकी बातें सुनने लगी।

“कैसी है मेरी प्यारी बहना?” समीर ने अंजलि के सिर पर हाथ फेरते हुए प्यार से पूछा।

“मैं बिल्कुल ठीक हूँ भैया, आप कैसे हो? आप आजकल बहुत थके-थके और परेशान लग रहे हो। मैंने पिछले हफ्ते भी फोन किया था तो आपकी आवाज से लग रहा था कि आप किसी गहरी चिंता में हैं,” अंजलि ने समीर का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा।

समीर ने झूठी मुस्कान ओढ़ते हुए बात टालने की कोशिश की, “अरे नहीं अंजलि, ऐसी कोई बात नहीं है। बस ऑफिस का काम थोड़ा बढ़ गया है। तू बता, जीजा जी कैसे हैं? बच्चे स्कूल गए हैं?”

अंजलि ने अपने पर्स की चेन खोली और उसमें से एक मोटा सा खाकी रंग का लिफाफा निकालकर समीर के हाथों में रख दिया। समीर ने अचरज से लिफाफे की ओर देखा। “यह क्या है अंजलि?”

अंजलि की आंखें नम हो गईं। उसने कहा, “भैया, मुझसे छुपाने की कोशिश मत करो। मुझे पता चल गया है कि आपके बिजनेस में पिछले महीने बहुत भारी नुकसान हुआ है और आप लोग बैंक का कर्ज चुकाने के लिए यह घर बेचने की सोच रहे हैं। उस दिन जब आप मां के कमरे में अकेले रो रहे थे, तो मैंने फोन पर आपकी और मां की बात सुन ली थी। आपने मुझे एक बार भी बताने की जरूरत नहीं समझी?”

समीर की आंखें भी भर आईं। वह कुछ बोल नहीं पाया।

अंजलि ने लिफाफे को खोलकर उसमें से कुछ कागजात और एक चेक निकाला। “भैया, यह मेरे हिस्से की एफडी और मेरे गहनों को गिरवी रखकर मिला हुआ पैसा है। जब मेरी शादी हुई थी, तो आपने अपनी दिन-रात की नींद बेचकर मेरी खुशियों का इंतजाम किया था। क्या एक बहन का मायके पर सिर्फ तभी तक हक होता है जब तक उसे कुछ लेना हो? क्या भाई की परेशानी में उसके कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने का हक मुझे नहीं है? यह पैसे बैंक में जमा करवा देना। हमारा यह घर, जिसमें हमारा बचपन बीता है, कहीं नहीं बिकेगा।”

कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ी रितिका के कानों में अंजलि का एक-एक शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहा था। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई थी। जिस ननद को वह आज तक एक ‘कर्जदार’ और एक ‘बोझ’ समझती आ रही थी, वह ननद आज अपने मायके को बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाकर आई थी। रितिका को अपने लालची और संकीर्ण विचारों पर इतनी घिन आई कि वह अपनी ही नजरों में गिर गई। उसे याद आया कि कैसे उसने अंजलि के आने पर एक गिलास पानी तक नहीं पूछा था और उसे बाहर अकेले बैठाकर अंदर आ गई थी।

रितिका से और छुपा नहीं गया। वह रोते हुए बाहर आई और सीधे अंजलि के पैरों के पास बैठ गई।

“मुझे माफ कर दो दीदी… मुझे माफ कर दो,” रितिका फफक कर रो पड़ी। “मैं कितनी अंधी हो गई थी। मैंने हमेशा आपके मायके आने को एक खर्चे की तरह देखा। मैंने कभी आपके दिल के उस प्यार को नहीं समझा जो आज आप इस घर के लिए लुटाने आई हैं। मैं आपको कर्जदार समझ रही थी, जबकि सच तो यह है कि आज आपने हमें हमेशा के लिए अपने प्यार और एहसान का कर्जदार बना दिया है।”

अंजलि ने तुरंत झुककर रितिका को उठाया और अपने गले से लगा लिया। “अरे भाभी, ये आप क्या कर रही हैं? आप तो इस घर की लक्ष्मी हैं। परिवार में कभी कोई किसी का कर्जदार नहीं होता। रिश्ते तो प्यार और एक-दूसरे के साथ खड़े होने के लिए होते हैं।”

समीर भी अपनी बहन और पत्नी को इस तरह गले मिलते देखकर अपने आंसू नहीं रोक पाया। उस दिन रितिका के मन से ननद नाम का वह सारा कड़वा भ्रम हमेशा के लिए मिट गया था। उसने अंजलि के लिए खुद अपने हाथों से उसका सबसे मनपसंद खाना बनाया और उस रात उस घर में लंबे समय बाद एक सच्ची और सुकून भरी हंसी गूंजी।

दोस्तों, क्या हमें भी कई बार लगता है कि बेटियां या बहनें सिर्फ मायके से कुछ लेने आती हैं? क्या हमने कभी उनके उस अनकहे प्रेम को समझने की कोशिश की है जो वे हर पल अपने मायके के लिए अपने सीने में संजोकर रखती हैं? इस कहानी के बारे में अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!