मैं घर की सबसे छोटी बेटी थी। उस समय मेरी उम्र लगभग नौ वर्ष थी। पिताजी को गुज़रे चार वर्ष हो चुके थे। उनके जाने के बाद माँ ने अकेले ही हम बहनों का पालन-पोषण किया। आर्थिक तंगी थी, जीवन संघर्षों से भरा था, फिर भी माँ ने कभी हमें प्रेम, संस्कार और आत्मसम्मान की कमी महसूस नहीं होने दी।
इन्हीं कठिन दिनों के बीच एक खुशखबरी आई—मेरी बड़ी दीदी का विवाह तय हो गया। वर्षों बाद हमारे घर में फिर से खुशियों ने दस्तक दी। आँगन में रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो गया। कहीं गीत गाए जा रहे थे, कहीं हँसी की फुहारें थीं, तो कहीं शादी की तैयारियों की चहल-पहल। माँ के चेहरे पर लंबे समय बाद संतोष की मुस्कान दिखाई दे रही थी।
शादी से एक दिन पहले दीदी की ससुराल से शगुन का सामान आया। उन्हीं उपहारों में एक लाल रंग की रेशम की साड़ी भी थी। उस पर सुनहरे ज़री की महीन कढ़ाई थी। जैसे ही दीदी ने वह साड़ी पहनकर आईने में स्वयं को देखा, पूरा कमरा उनकी सुंदरता से जैसे जगमगा उठा। मैं मंत्रमुग्ध होकर उन्हें निहारती रह गई। मुझे लगा, उस दिन मेरी दीदी सचमुच किसी राजकुमारी से कम नहीं थीं।
मैं धीरे-धीरे उनके पास गई, साड़ी का पल्लू अपने गाल से लगाया और मासूमियत से बोली, “दीदी, आप दुनिया की सबसे सुंदर दुल्हन लग रही हैं।”
दीदी मुस्कुराईं। उन्होंने मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा, “जब तू बड़ी होगी, मैं तुझे भी ऐसी ही एक रेशम की साड़ी दूँगी।”
उनकी बात सुनकर मेरा मन खुशी से भर गया। उस समय मैं नहीं जानती थी कि वह साड़ी केवल रेशम के धागों से नहीं बुनी गई थी, बल्कि उसमें माँ का संघर्ष, दीदी के सपने और पूरे परिवार की उम्मीदें भी गुँथी हुई थीं।
विवाह का दिन आ पहुँचा। शहनाई की मधुर धुन, मंत्रों की पवित्र गूँज और अपनों की शुभकामनाओं के बीच दीदी ने जीजाजी के साथ सात फेरे लिए। माँ बार-बार उन्हें देखतीं और उनकी आँखें भर आतीं। शायद हर खुशी के बीच उन्हें पिताजी की कमी सबसे अधिक महसूस हो रही थी। फिर भी उनके चेहरे पर यह संतोष साफ दिखाई देता था कि उन्होंने अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी पूरी कर दी।
विदाई का समय आया तो पूरा घर भावुक हो उठा। माँ ने दीदी को गले लगाया और फूट-फूटकर रो पड़ीं। मैंने भी दीदी को कसकर पकड़ लिया। उनकी रेशम की साड़ी का पल्लू मेरे आँसुओं से भीग गया। उन्होंने मेरे कान में धीरे से कहा, “खूब पढ़ना-लिखना… और माँ का सहारा बनना।”
दीदी की डोली जैसे ही घर से निकली, लगा मानो हमारे आँगन की चहल-पहल भी उनके साथ चली गई हो। कुछ ही क्षण पहले जो घर हँसी से गूँज रहा था, वहाँ अब गहरा सन्नाटा था। उसी दिन पहली बार मैंने महसूस किया कि बेटी की विदाई केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पूरे परिवार की भावनाओं की सबसे कठिन परीक्षा होती है।
आज उस घटना को लगभग पचास वर्ष बीत चुके हैं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया। कई चेहरे इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन मेरी स्मृतियों में एक दृश्य आज भी उतना ही जीवंत है—लाल रेशम की साड़ी पहने मेरी दीदी की मुस्कान।
आज भी जब किसी दुकान, किसी विवाह या किसी समारोह में लाल रेशम की साड़ी देखती हूँ, तो अनायास वही दिन आँखों के सामने उतर आता है। वह साड़ी अब शायद कहीं नहीं होगी, पर उसकी स्मृति आज भी मेरे हृदय में सुरक्षित है। वह मेरे लिए केवल एक परिधान नहीं, बल्कि माँ के संघर्ष, पिता की अधूरी याद, बहन के स्नेह और हमारे परिवार के अटूट प्रेम का अमर प्रतीक है।
कुछ वस्तुएँ समय के साथ पुरानी हो जाती हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं। मेरी दीदी की वह लाल रेशम की साड़ी भी ऐसी ही एक अमर स्मृति है, जिसकी चमक आज भी मेरे मन को उसी तरह आलोकित कर देती है, जैसे उस दिन पहली बार उसे देखकर हुई थी।
लेखिका : लीनू अहलूवालिया
#सिल्क की साड़ी