मम्मी जी जब आपका मन क्रोधित होता है तो उस वक्त आप मुझे कुछ भी सुनाने से पीछे नहीं हटती है। यह घर आपका है उतना ही मेरा भी है ।जब आप मुझे प्यार नहीं दे पा रही हो तो मुझसे आप सम्मान की उम्मीद कैसे कर सकती है
मैं आपकी जितनी अनुभवी तो नहीं हूं मगर इतना जरूर जानती हूं की प्यार करने से ही सम्मान मिलता है और जिस रिश्ते में कुछ भी कहने से पहले सोचा ना जाए । वह रिश्ते टिकते कहां है और वैसे मम्मी जी मैं आपकी देवरानी जेठानी नहीं हूं । जो जीवन भर आपकी कड़वी बातें सुनती रहूंगी ।
मैंने जमुना ताईजी और रोहिणी काकी के साथ होने वाला आपका व्यवहार देखा है । आपने कभी ना बड़ों को सम्मान दिया ना छोटों को प्यार किया।
मैं सब कुछ जानती हूं आपने उनको कितना सताया है। वैसे तो आपने मेरे साथ भी वही व्यवहार करने की कोशिश बहुत की मगर मम्मी जी मैं अब आपके दबाव में आने वाली नहीं हूं कहकर रूही वहां से चली गई।
दूर बैठे रमाशंकर जी सास बहू की बातें सुन रहे थे। उन्हें आज ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनकी गहरे ज़ख्म पर हाथ रख दिया हो इसीलिए जैसे ही बहू रूही वहां से चली गई तो रमा शंकर जी सुनंदा जी के पास आकर बैठ गए और कहने लगे।
सुनंदा यह तुम्हारी बहू जो कुछ भी कह रही है ।
वह बिल्कुल सही कह रही है। यह तो तुम भी जानती हो । तुम्हारे क्रूर स्वभाव की वजह से ही मैं अपने भाइयों से दूर हो गया। उनकी पत्नियों दूर हो गई । उनके बच्चे दूर हो गए। आज मेरा ही परिवार मुझसे पूरी तरह दूर हो बैठा है।
यहां तक की इसकी वजह से तुम्हारा अपना बेटा रवि भी तुमसे दूर हो चुका है। आज कहने को हम तन से साथ है मगर मन से नहीं। उसकी वजह सिर्फ तुम हो क्योंकि तुमने सभी को काठ की कठपुतलियां समझकर सदा अपने इशारों पर नचाना चाहा।
तुम्हारी बातों में आकर मैंने अपने भाइयों को भी बहुत सताया है। उसका नतीजा तुम आज अच्छी तरह देख रही हो ।
आज मेरे भाइयों के परिवार बहुत खुश है और एक तुम और मैं हूं। जो हम जिंदगी से इस तरह लड़ रहे हैं। आज मैं मेरी ऐसी स्थिति में उन्हें किस तरह पुकारू….. अब तो मुझे वह हक भी नहीं रहा।
किसी ने सच ही कहा है। हम जैसा व्यवहार करते हैं। वैसा ही तो पाते हैं । आज बेशक हमारे पास धन की जमा पूंजी है,
मगर हमारे रिश्तों की जमा पूंजी बिल्कुल खाली हो चुकी है कहते कहते रमाशंकर जी बिल्कुल निराश हो गए।
अपने पति रमाशंकर जी की बात सुनकर सुनंदा जी बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचने लगी । उनकी बहू रूही और पति रमा शंकर जी ठीक ही तो कह रहे है। आज जाने अनजाने में उनके अतीत के पन्ने उनके सामने पलट कर आने लगे ।
सुनंदा को जी को जब भी मौका मिलता खुद गलत होते हुए भी अपनी जेठानी देवरानी किसी को भी चार बातें सुनाने से बाज नहीं आती थी। परिवार के फर्ज के नाम पर खुद थोड़ा और बाकी दोनों देवरानी जेठानी पर छोड़ देती थी और बड़ी खुश होती। सुनंदा जी की कड़वी बोली से पूरा परिवार परेशान था मगर कोई भी उनके सामने कुछ इसीलिए नहीं कहता था क्योंकि उनके क्रूर स्वभाव से सभी कोई भली-भांति परिचित थे इसी तरह समय गुजरते गया और धीरे-धीरे करके उनके अपने ही परिवार के सदस्य उनसे दूर होते चले गए।
अब सुनंदा जी की भी उम्र हो चली थी और वह बीमार भी रहने लगी थी मगर उनके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया था इसीलिए अब उनकी बहू रूही भी उनसे कटी कटी सी रहने लगी। सुनंदा जी को अपनी बहू रूही पर गुस्सा तो बहुत आता था पर अब इस कमरे की चार दिवारी के अलावा उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं होता था।
सुनंदा तुम सुन रही हो ना…. मैं क्या कह रहा हूं अचानक अपने पति रमाशंकर जी की बातें सुनकर सुनंदा की अतीत से लौट आई और धीमे से बोल उठी।
आप और रुही दोनों बिल्कुल सही कह रहे हैं। मैंने अपने परिवार के सदस्यों के साथ बहुत दुर्व्यवहार किया है । जिसकी सजा मुझे ईश्वर दे रहे है ।
आप ठीक कह रहे हैं… हमारे पास धन दौलत की पूंजी तो है मगर रिश्तो की जमा पूंजी हमारी बिल्कुल खाली हो चुकी है । मुझे क्षमा कर दीजिए। आज के बाद मैं ऐसा दुर्व्यवहार कभी किसी के साथ नहीं करूंगी।
अपनी पत्नी सुनंदा की बात सुनकर रमाशंकर की सोचने लगे ।
आज इतने बरस बाद जब सुनंदा को अपनी गलती का एहसास हुआ है तो क्या फायदा। काश जब रिश्ते बिखेर रहे थे। तभी समेटने की तुरंत कोशिश करते तो शायद आज इस तरह हमारे रिश्तों की जमा पूंजी खाली न हुई होती ।
#रिश्तो की जमा पूंजी
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम