मीरा के हाथों में वह कागज का टुकड़ा बुरी तरह से कांप रहा था। वह कोई मामूली कागज नहीं था, बल्कि समीर की कंपनी से आया हुआ ‘रिलीविंग लेटर’ था। कमरे में पसरा सन्नाटा इतना गहरा था कि मीरा को अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं। सामने पलंग पर बैठा समीर नजरें झुकाए अपने मोबाइल की स्क्रीन को ऐसे घूर रहा था, जैसे उसी में सारी दुनिया का सच छिपा हो। मीरा की आँखों से आँसू सूख चुके थे और उनकी जगह एक ठंडे, सुन्न कर देने वाले गुस्से ने ले ली थी।
“तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला समीर?” मीरा की आवाज में कोई चीख नहीं थी, बल्कि एक ऐसी खामोशी थी जो किसी भी शोर से ज्यादा खतरनाक होती है।
समीर ने नजरें उठाईं, कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।
मीरा ने वह कागज पलंग पर फेंकते हुए कहा, “आप लोगों ने हमें, मेरे पूरे परिवार को एक गहरे अंधेरे और धोखे में रखा। शादी वाले दिन से पहले तक मुझे और मेरे पिता को यही बताया गया था कि आप शहर की एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एचआर मैनेजर हैं। आप पढ़े-लिखे हैं, करियर को लेकर गंभीर हैं और जिंदगी में आगे बढ़ने का जज्बा रखते हैं। लेकिन सच्चाई क्या निकली? सच्चाई तो ये है कि आपने वह नौकरी केवल और केवल एक पढ़ी-लिखी, अच्छी पत्नी पाने के लिए की थी! शादी के ठीक डेढ़ महीने बाद ही आपने अपनी वह पैंतीस हजार की नौकरी छोड़ दी और अपने बड़े भाई के साथ उनकी पुरानी परचून की दुकान पर जाकर गल्ले पर बैठ गए।”
समीर झल्लाते हुए बोला, “तो इसमें क्या बुराई है मीरा? दुकान हमारी अपनी है। किसी की गुलामी करने से तो बेहतर है ना कि इंसान अपना पुश्तैनी काम संभाले। और वैसे भी, मैं तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं दे रहा हूँ। तुम्हें जो चाहिए, मैं लाकर देता हूँ।”
“तकलीफ?” मीरा एक कड़वी हँसी हँसी। “तुम्हें लगता है कि मेरी तकलीफ यह है कि तुमने नौकरी छोड़ दी? नहीं समीर। पति और पत्नी का रिश्ता जितना मजबूत होता है, उतना ही नाजुक भी होता है। झूठ उस दीमक के समान होता है जो किसी भी रिश्ते की नींव को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। मुझे तुम्हारे कम पैसे कमाने से या दुकान पर बैठने से कोई दिक्कत नहीं थी। मेरी दिक्कत तुम्हारे उस फरेब से है, जिसे तुमने मेरे साथ खेला है।”
मीरा पुरानी यादों में खो गई। उसे याद आया कि कैसे उसके पिता ने समीर का रिश्ता तय करते हुए गर्व से अपने रिश्तेदारों को बताया था कि उनका होने वाला दामाद एक कॉरपोरेट कंपनी में मैनेजर है। मीरा खुद एक समझदार और पढ़ी-लिखी लड़की थी। वह हमेशा से ऐसा जीवनसाथी चाहती थी जो मेहनती हो, जिसके साथ वह कंधे से कंधा मिलाकर चल सके। जब समीर के परिवार वाले रिश्ता लेकर आए थे, तो उन्होंने समीर की नौकरी, उसकी सैलरी और उसके रुतबे का खूब बखान किया था।
लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही मीरा को घर के माहौल में कुछ अजीब सा लगने लगा। समीर अक्सर सुबह देर से उठता। जब मीरा पूछती कि ऑफिस नहीं जाना, तो वह ‘वर्क फ्रॉम होम’ या ‘तबीयत खराब होने’ का बहाना बना देता। धीरे-धीरे वह दिन के ग्यारह बजे उठकर, नहा-धोकर सीधा अपने बड़े भाई विक्रम के साथ मोहल्ले के नुक्कड़ वाली उस पुरानी परचून और जनरल स्टोर की दुकान पर जाने लगा। घर खर्च के नाम पर समीर की माँ मीरा को ताने देने लगीं। जब मीरा ने समीर से उसकी सैलरी के बारे में पूछा, तो सच सामने आ ही गया।
“हमें दिखाने के लिए तुमने सिर्फ छह महीने वह नौकरी की,” मीरा की आँखों में अब एक तेज आग थी। “और जब शादी हो गई, मकसद पूरा हो गया, तो तुमने नौकरी को लात मार दी और भाई के साथ दुकान पर बैठ गए। तुम मैनेजमेंट की डिग्री तो ले आए समीर, लेकिन सिर्फ पासिंग मार्क्स के साथ। तुममें वह मेहनत करने का जज्बा ही नहीं था कि तुम उस कॉरपोरेट की दुनिया में टिक सको। नौ से पांच की मेहनत तुम्हें रास नहीं आती थी। इसलिए तुमने और तुम्हारे परिवार ने झूठ का सहारा लिया।”
समीर अब अपनी सफाई देने पर उतर आया। “तुम नहीं समझोगी मीरा। तुम जिस परिवार से आई हो, वहाँ सब नौकरी वाले हैं। हमारे यहाँ व्यापार होता है। मेरी ग्रेजुएशन के बाद जब घर वालों ने मेरे लिए लड़की ढूंढनी शुरू की, तो कोई भी अच्छे घर की, पढ़ी-लिखी लड़की मुझे देने को तैयार नहीं था। सब कहते थे कि एक छोटी सी जनरल स्टोर से माता-पिता और दो भाइयों के परिवारों का खर्च कैसे निकलेगा? जो लड़कियां रिश्ते के लिए आतीं, वो यह देखकर मना कर देतीं कि लड़का तो बस दुकान पर बैठता है। समाज में कोई इज्जत नहीं थी। तब बड़े भैया ने ही मुझे सलाह दी कि किसी भी तरह, जुगाड़ लगाकर एक अच्छी कंपनी में नौकरी पकड़ लूँ। एक बार शादी हो जाए, घर में एक संस्कारी और पढ़ी-लिखी बहू आ जाए, फिर नौकरी छोड़ देना। दुकान तो अपनी है ही।”
समीर की बातें सुनकर मीरा को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। “मतलब तुमने मेरी जिंदगी, मेरे सपनों, मेरे पिता के विश्वास को सिर्फ एक ‘जुगाड़’ समझा? मेरे पिता ने अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई तुम्हारी इस झूठी शानो-शौकत को सच मानकर हमारी शादी में लगा दी। उन्होंने सोचा था कि उनकी बेटी एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर इंसान के हाथों में जा रही है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि वह एक ऐसे कायर इंसान को अपनी बेटी सौंप रहे हैं, जिसे मेहनत से डर लगता है।”
“तुम मुझे कायर कैसे कह सकती हो?” समीर की आवाज भी अब तेज हो गई थी। “मैं कमा तो रहा हूँ। दुकान से जो भी हिस्सा मिलता है, मैं घर में देता हूँ।”
“क्या कमा रहे हो तुम?” मीरा ने पलटकर वार किया। “उस दुकान से जो आमदनी होती है, उससे तुम्हारे बड़े भाई के बच्चों की स्कूल की फीस और घर का राशन मुश्किल से आता है। तुम बस वहाँ जाकर एक कुर्सी तोड़ते हो। तुम्हारी खुद की कोई पहचान नहीं है। तुम आज भी अपने भाई के मोहताज हो। अगर कल को तुम्हारे भाई ने तुम्हें उस दुकान से अलग कर दिया, तो तुम मुझे और आने वाले कल में अपने बच्चों को क्या खिलाओगे? तुमने अपने भविष्य के बारे में कुछ सोचा है या बस झूठ की बुनियाद पर पूरी जिंदगी काटने का इरादा है?”
कमरे में फिर से एक भारी सन्नाटा छा गया। समीर के पास मीरा के इन तीखे लेकिन सच्चे सवालों का कोई जवाब नहीं था। वह जानता था कि मीरा जो कह रही है, वह शत-प्रतिशत सच है। दुकान की आमदनी इतनी नहीं थी कि दो परिवारों का भविष्य सुरक्षित हो सके। उसने नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ी थी क्योंकि उसे दफ्तर की राजनीति, टारगेट का प्रेशर और रोज सुबह जल्दी उठकर भागदौड़ करना पसंद नहीं था। उसे अपनी दुकान की वह गद्दी पसंद थी जहाँ वह आराम से बैठकर चाय पी सकता था और मोबाइल पर वीडियो देख सकता था।
मीरा पलंग के किनारे बैठ गई। उसकी आवाज अब शांत लेकिन बेहद दृढ़ थी। “समीर, एक औरत गरीबी में खुशी-खुशी रह सकती है। अगर तुम सच बताकर मुझसे शादी करते, कहते कि तुम्हारी एक छोटी सी दुकान है और तुम उसी में खुश हो, तो शायद मैं तुम्हारे साथ उस दुकान को बड़ा करने में मदद करती। मैं खुद नौकरी करती और हम दोनों मिलकर अपना आशियाना बनाते। लेकिन तुमने मुझसे वह हक छीन लिया। तुमने मुझे चुनने का मौका ही नहीं दिया। तुमने मुझे धोखे से हासिल किया है।”
समीर घुटनों के बल मीरा के पास बैठ गया। “मुझे माफ कर दो मीरा। मैं जानता हूँ कि मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। मैं वादा करता हूँ कि मैं फिर से नौकरी ढूंढ लूंगा। मैं बदल जाऊंगा।”
मीरा ने समीर की तरफ देखा। उन आँखों में अब प्यार नहीं, बल्कि एक अजनबीपन था। “भरोसा कांच की तरह होता है समीर। एक बार टूट जाए, तो उसे कितना भी जोड़ लो, उसमें दरारें हमेशा नजर आती हैं। तुमने मेरी नजरों में अपना सम्मान खो दिया है। तुमने सिर्फ मुझे ही नहीं छला है, तुमने अपने आप को भी छला है।”
मीरा उठी और अपनी अलमारी की तरफ गई। उसने अपना एक सूटकेस निकाला। समीर घबरा गया, “मीरा, तुम घर छोड़कर जा रही हो? प्लीज ऐसा मत करो। समाज क्या कहेगा? परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।”
“इज्जत?” मीरा ने सूटकेस में अपने कपड़े रखते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। “जिस परिवार ने एक लड़की की जिंदगी के साथ इतना बड़ा फरेब किया हो, उसे इज्जत की बात नहीं करनी चाहिए। लेकिन डरो मत, मैं घर छोड़कर नहीं जा रही हूँ।”
समीर ने राहत की सांस ली। “तो फिर यह सूटकेस?”
“मैं कल से अपने लिए नौकरी ढूंढने जा रही हूँ,” मीरा ने दृढ़ता से कहा। “मेरे पास मास्टर्स की डिग्री है। मैं घर की चारदीवारी में बैठकर तुम्हारी तरह अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करूंगी। मैं आत्मनिर्भर बनूंगी। और हाँ, जब तक तुम खुद अपनी मेहनत से, बिना किसी झूठ और बिना अपने भाई के सहारे के, अपनी एक पहचान नहीं बना लेते… हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कोई रिश्ता नहीं रहेगा। मैं इस घर में एक किरायेदार की तरह रहूंगी। मेरा खर्च मैं खुद उठाऊंगी।”
समीर स्तब्ध रह गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी सीधी-सादी दिखने वाली पत्नी इतना बड़ा कदम उठा सकती है। उसने सोचा था कि शादी के बाद लड़कियां अपने मायके की इज्जत के खातिर हर समझौता कर लेती हैं, हर झूठ को अपना नसीब मानकर सिर झुका लेती हैं। लेकिन मीरा उन लड़कियों में से नहीं थी।
अगले दिन से मीरा ने सच में अपनी जिंदगी की बागडोर अपने हाथों में ले ली। उसने शहर के कई स्कूलों और कंपनियों में इंटरव्यू दिए। कुछ हफ्तों की कड़ी मेहनत के बाद उसे एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। सुबह आठ बजे वह शान से तैयार होकर घर से निकलती। घर वाले ताने देते, लेकिन मीरा ने अपने कानों को उन तानों के लिए बहरा कर लिया था।
दूसरी तरफ, समीर को रोज अपनी पत्नी को एक सफल और स्वाभिमानी महिला के रूप में देखकर अंदर ही अंदर ग्लानि महसूस होती। उसे अब समझ आने लगा था कि सिर्फ पैसे या दिखावे से रिश्ते नहीं चलते। रिश्ते चलते हैं बराबरी से, सम्मान से और सबसे बढ़कर, सच्चाई से। मीरा ने उसे जो सबक सिखाया था, वह जिंदगी भर उसके कानों में गूंजने वाला था। झूठ की उम्र भले ही लंबी लगे, लेकिन सच का एक पल उस पूरे झूठ के महल को ढहाने के लिए काफी होता है।
अंत… या शायद एक नई शुरुआत।
क्या आपको लगता है कि मीरा ने समीर को जो सजा दी, वह सही थी? अगर आप मीरा की जगह होते या होतीं, तो आप क्या करते/करतीं? क्या किसी भी रिश्ते में सिर्फ शादी कर लेने के लिए बोला गया झूठ माफ किया जा सकता है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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लेखिका : वर्षा मंडल