आत्मसम्मान – खुशी

रितु एक सीधी साधी लड़की थी।घर में पिताजी श्याम मां सुनीता थे।पिता जी की इच्छा सुपुत्र की थी परंतु वो नहीं हो पाया ।मां सुनीता रितु के बाद दो बार गर्भवती रही पर दोनों बार लड़कियां होने के कारण दादी ने गर्भपात करवा दिया।फिर चौथी बार बेटा था परंतु सातवें महीने में सीढ़ियों से गिरने के कारण वो चल बसा और सुनीता  कभी दोबारा मां बनने के काबिल नहीं

रही।पिताजी का गुस्सा मां और रितु पर फूटता।घर है पैसा है पर वारिस नहीं। रितु बचपन से ही खौफ के साए में जीती रही ।श्याम आते ही पीने बैठ जाता सुनीता को गंदी गालियां देता।रितु को भी उल्टा सीधा बोल कर खाना खा सो जाता।यही नियम था उस घर का सुनीता और रितु हँसना भूल चुकी थी।

एक शाम श्याम जल्दी आ गया।सुनीता को बोला मै 4 दिन बाहर जा रहा हूं मेरा सामान पैक कर दे।सुनीता ने सामान पैक किया खाना खा कर वो निकलने वाला था।सुनीता ने कहा कुछ पैसे दे दो।रितु की फीस भरनी है।श्याम ने एक घूमा कर सुनीता को दिया क्या पैसा पैसा करती है।क्या करेगी ये पढ़ कर तेरे जैसी गवार ही तो बनेगी। हट दफा हो मनहूस कही की।श्याम चला गया।

रितु ने आ कर मां को उठाया कोई नहीं मां मै नहीं पढूंगी तुम कुछ मत कहो बस मेरे साथ रहो।सुनीता के पड़ोस में सुशीला चाची रहती थी। वो सब जानती थी अगली सुबह वो 100 रुपये लेकर सुनीता के पास आई बोली ले बेटी रितु को स्कूल भेज दे।नहीं चाची रहने दो पता चला तो गुस्सा करेंगे।

कुछ पता नहीं चलेगा वो घर में होता ही कब है? बच्ची को भेज स्कूल सुशीला ने कहा ।रितु स्कूल चली गई।सुशीला ने सुनीता को चाय पिलाई और कुछ खिलाया। सुनीता ने जल्दी से घर का काम निपटाया और खिचड़ी बना दी। रितु के लिए ।खाना खा कर दोनों मां बेटी सो गई।कुछ दिन श्याम घर नहीं आया दोनो मां बेटी जरा पुरसुकून हो गई।

फिर एक शाम श्याम एक औरत को लेकर आया और बोला ये मेरी नई पत्नी रजनी है ये अब यही रहेगी। सुनीता ने खाना बनाया और रजनी और श्याम ने अपने कमरे में खाना खाया।रितु और सुनीता ने रसोई में खाया।रजनी पूरे घर की मालकिन बन गई सुनीता नौकरानी  उस  बिचारी की पहले ही कोई कीमत नहीं थी और अब तो कहने ही क्या?

रितु बस स्कूल पढ़ पा रही थी यही बहुत था।रजनी ने एक बेटे को जन्म दिया तो उसका रुतबा बढ़ गया। घर जमीन जायदाद सब रजनी और उसके बेटे वरुण का हो रहा।सुनीता और रितु के नसीब में दो वक्त की रोटी ही थी और मेहनत मजदूरी 12 वी होते ही रितु की शादी अमित से हो गई।

अमित के घर में मां बाप अमित एक बड़ा भाई विजय उसकी पत्नी आशा उनका बेटा मयंक रहते थे।विजय और आशा दोनों बैंक में काम करते थे अमित भी एक अच्छी नौकरी करता था पढ़ा लिखा स्मार्ट था।रितु से शादी तो मां बाप की जिद का परिणाम था क्योंकि दहेज मिलना था जो नहीं मिला इसलिए यहां भी रितु एक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं थी।

अमित तो उसे पास भी खड़ा नहीं करता था ।शादी की पहली रात ही उसने बता दिया कि मेरी पसंद कोई और है तुम जैसी गवार नहीं पड़ी रहो एक कोने में या जाओ अपने बाप के घर।बाप का घट उसका तो कोई घर था ही नहीं।मां शादी होते ही गुजर गई अब वो अकेली थी।

ससुराल में काम करती और ताने सुनती ।जब कभी अकेली होती तो क्रोशिया बुनती उससे कपड़े बनाती ये उसे अपनी मां से विरासत में मिला था। सुनीता भी क्रोशिए का काम कर कुछ पैसा कमा लेती थी तभी रितु की फीस और कभी घर में कुछ सब्जी ले आती क्योंकि श्याम तो उसके हाथ में दो रुपए भी नहीं रखता था।

रितु के पड़ोस में आकृति रहती थी जो कॉलेज में पढ़ती थी एक दोपहर रितु आंगन में बैठी क्रोशिया कर रही थी तभी आकृति आई बोली दीदी क्या कर रही हो इतना सुंदर काम है तुम्हारा मेरे कॉलेज में हस्तशिल्प मेला लग रहा है तुम चलो इसका बहुत पैसा मिलेगा।मै ना बाबा ना तुम ले जाओ ।

आकृति वो सब सामान ले गई और उसकी अच्छी कमाई हुई ऑर्डर भी मिले वो शाम को अपने घर पहुंची।तो रितु के घर से आवाज आ रही थी आशा रितु पर चिल्ला रही थी तू चोर है मुफ़्त की रोटियां तोड़ती है मेरे पैसे तूने ही चुराए है।रितु बोल रही थी मैंने पैसे नहीं देखे पर उसकी किसी ने नहीं सुनी अमित ने भी दो हाथ जमा दिए।

सब लोग ख़ाना खा कर सो गए किसी ने भी रितु से पूछा भी नहीं।रात को रितु रसोई समेट आँगन में आकर बैठ गई और रोने लगी तभी अपनी दीवार पर आकृति आई बोली दीदी ये आपकी अमानत आपका सारा सामान बिक गया और दो तीन ऑर्डर भी आए है।

नहीं आकृति ये अपने पास ही रखो कभी चहिये होंगे तो मै ले लूंगी बिना कुछ किए तो चोरी का नाम लग गया इसलिए तो मै तुम्हे जो सामान चाहिए वो ला दूंगी तुम ऑर्डर बना देना।रितु अगले दिन से आकृति के लिए सामान से सामान बना कर देने लगी।

आकृति ने घर बैठे ही रितु का बैंक अकाउंट खुलवा दिया ताकि पैसा उसके अकाउंट में आता रहे। एक शाम तो हद हो गई आशा रितु का हाथ पकड़ घर से निकाल रही थी कि इसने मेरे 5000 रूपये चुराये है तलाशी हुई रितु के पास धागों के अलावा कुछ नहीं था।

अमित तो चाहता ही था कि रितु उसकी जिन्दगी से निकल जाए उसने रितु का सामान भी बाहर फेंक दिया और दरवाजा बंद कर दिया।रितु रात भर बाहर बैठी रही ।देर रात आकृति का परिवार बाहर से आया तो रितु को सड़क पर बैठे देखा।आकृति बोली कब तक आत्मसम्मान खो कर जीएगी आप ।आप के पास कला है दिखाइये इन लोगों को आप क्या कर सकती हैं।

चलिए आकृति अपने पापा के साथ अपनी सहेली के पीजी गयीं और रितु को रात वही रुकवाया।अगले दिन सब तरफ हाहाकार था रितु भाग गई।पड़ोसियों ने कहा रात को तो सड़क पर देखा था पता नहीं अब कहा है? अमित बोला चलो बला टली।

उधर आकृति ने एक ngo में जहां महिलाएं अपना लघु उद्योग करती हैं वहां रितु को एडमिट करवा दिया रहना खाना और अपने काम में मदद इस तरह आकृति की मदद से कुछ समय बाद रितु के क्रोशिए का सामान हाट ,दुकान और ऑनलाइन बिकने लगा वो ngo की मदद करती और गरीब औरतों को भी क्रोशिया सिखाती अब उनका 5 औरतों का उपक्रम था

जो एक फ्लैट में मिलकर रहती थी और अलग अलग काम करती थी।उधर अमित की गर्लफ्रेंड उसे धोकl दे कर चली गई क्योंकि  उसकी नौकरी चली गई थी।आशा का बेटा ही उसके पैसे चुराता था गेम खेलने के लिए।आज विमेंस डे था सब तरफ औरतों का जिक्र उनकी तारीफ इसी संदर्भ में रितु के ngo में भी ndtv वाले आए उन औरतों का इंटरव्यू लेने रितु बोली आज महिला दिवस पर महिलाओं को सम्मान है

मेरे पिता ने मेरी मां का सम्मान नहीं किया ना ही मेरे पति ने बकौल उनके हम गवार थी और  शायद मैं भी ऐसी ही रहती यदि मुझे एक रोशनी की किरण नहीं मिलती जिसने मुझे आत्मसम्मान से जीना सिखाया मेरे हुनर को पहचाना और मुझे आज इस मकाम तक पहुंचाया उस फरिश्ते का मैं जितना शुक्रिया अदा करूँ वो कम है।

रितु आकृति के  गले लग गई।टीवी न्यूज में ये टेलीकास्ट हो रहा था अमित का परिवार और बिस्तर पर पड़ा श्याम देख रहा था।श्याम एक सरकारी अस्पताल में था कोई पूछने नहीं आता था और अमित रोज़ भाभी के ताने सुनता मुफ़्त की रोटी तोड़ता है।

आज रितु को पुरस्कार मिल रहा है गरीब महिलाओं की सहायता के लिए वो अपनी मां की तस्वीर के सामने खड़ी सोच रही है आत्मसम्मान होना कितना जरूरी बात यदि आत्मसम्मान ना हो तो एक जानवर से ज्यादा आपकी कोई कीमत नहीं है।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

error: Content is protected !!