शाम के साढ़े छह बज रहे थे। छह साल की मिस्टी अपनी छोटी सी गुड़िया लिए दरवाज़े की चौखट पर टकटकी लगाए बैठी थी। उसके पिता, सिद्धार्थ, पिछले एक महीने से अपने किसी ज़रूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में दूसरे शहर गए हुए थे और आज लौट रहे थे। मिस्टी ने पूरे घर को अपने छोटे-छोटे हाथों से सजाया था। उसने अपनी ड्राइंग बुक में एक तस्वीर बनाई थी, जिसमें एक बड़ा सा घर था, मम्मी-पापा थे और वह खुद थी।
तभी बाहर एक ऑटो रुकने की आवाज़ आई। मिस्टी के चेहरे पर करोड़ों की मुस्कान खिल उठी। दरवाज़ा खुलते ही सामने सिद्धार्थ खड़े थे। उनके चेहरे पर थकान थी, आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, और कंधों पर एक भारी बैग था। लेकिन मिस्टी को इससे क्या मतलब? उसने तो अपने पिता को देखा और एक झटके में दौड़कर उनके पैरों से लिपट गई। वह उन्हें अंदर जाने ही नहीं दे रही थी। उसने सिद्धार्थ के पैरों को इतनी ज़ोर से जकड़ रखा था जैसे कोई अपना सबसे कीमती खज़ाना छुपा रहा हो।
सिद्धार्थ के चेहरे पर एक फीकी सी लेकिन प्यार भरी मुस्कान आ गई। उन्होंने अपना भारी बैग ज़मीन पर रखा और मिस्टी के माथे को चूमते हुए बोले, “अरे मेरी राजकुमारी, पापा को अंदर तो आने दो। देखो मेरे कपड़े कितने गंदे हो रहे हैं, पसीने से भीग गया हूँ। मुझे बस पाँच मिनट दो, मैं जल्दी से कपड़े बदलकर और मुँह धोकर आता हूँ, फिर हम दोनों बहुत सारी मस्ती करेंगे।”
मिस्टी ने थोड़ा मुँह बनाते हुए उन्हें छोड़ा और बोली, “प्रॉमिस? सिर्फ पाँच मिनट ना?” सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए हामी भरी और अपने कमरे की तरफ चले गए।
मिस्टी बाहर सोफे पर बैठ गई और दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयों को घूरने लगी। रसोई में उसकी माँ, काव्या, सिद्धार्थ की पसंद की चाय और पकौड़े बना रही थी। एक मिनट बीता, दो मिनट बीते… मिस्टी ने अपनी ड्राइंग बुक सीने से लगा रखी थी। जब पाँच की जगह दस मिनट हो गए और सिद्धार्थ बाहर नहीं आए, तो मिस्टी का बाल-मन बेचैन हो उठा। पापा तो कभी अपना प्रॉमिस नहीं तोड़ते, फिर आज क्या हुआ?
“पापा! पापा, पाँच मिनट हो गए!” मिस्टी चिल्लाती हुई कमरे की तरफ भागी।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। मिस्टी ने जैसे ही अंदर कदम रखा, उसके छोटे-छोटे कदम वहीं ठिठक गए।
सिद्धार्थ फर्श पर घुटनों के बल बैठे थे। उनका चेहरा उनके दोनों हाथों में छुपा हुआ था और उनके कंधे बुरी तरह कांप रहे थे। वह रो रहे थे। सिद्धार्थ, जो हमेशा मिस्टी के लिए एक सुपरहीरो थे, जो उसे अपने कंधों पर बिठाकर पूरी दुनिया घुमाते थे, आज इस तरह ज़मीन पर टूट कर बिखरे हुए थे।
मिस्टी समझ नहीं पाई कि क्या हुआ है। उसने तो कभी अपने पापा को रोते हुए नहीं देखा था। वह धीरे-धीरे उनके पास गई और अपने छोटे-छोटे हाथों से सिद्धार्थ के कंधे को छुआ। “पापा… क्या आपको चोट लगी है?” उसकी मासूम और कांपती हुई आवाज़ ने सिद्धार्थ को चौंका दिया।
सिद्धार्थ ने तुरंत अपने आँसू पोंछने की कोशिश की और एक झूठी मुस्कान ओढ़ने का प्रयास किया। पर एक पिता अपनी बेटी की नज़रों से अपना दर्द कैसे छुपा सकता था?
दरअसल, सिद्धार्थ का वह अहम प्रोजेक्ट बुरी तरह फेल हो गया था और कंपनी ने आज ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया था। एक महीने की दिन-रात की मेहनत, परिवार से दूर रहने का दर्द और फिर अंत में यह विफलता। सिद्धार्थ के दिमाग में घर की ईएमआई, मिस्टी की स्कूल की फीस और बूढ़े माता-पिता की दवाइयों का खर्च हथौड़े की तरह वार कर रहा था। जब वह घर की चौखट पर पहुंचे थे, तो उनके अंदर का आत्मसम्मान पूरी तरह टूट चुका था। वह सोच रहे थे कि वह अपनी पत्नी और बच्ची से नज़रे कैसे मिलाएंगे। वह मिस्टी के सामने कमज़ोर नहीं पड़ना चाहते थे, इसलिए कपड़े बदलने के बहाने कमरे में आकर फूट-फूट कर रोने लगे। वह भगवान से शिकायत कर रहे थे कि आख़िर उनके साथ ही ऐसा क्यों हुआ।
मिस्टी ने अपनी छोटी सी उँगलियों से सिद्धार्थ के गालों पर गिरे आँसुओं को पोंछा। “पापा, आप रो क्यों रहे हो? क्या किसी ने आपको डांटा? मैं उससे कट्टी कर लूंगी।”
सिद्धार्थ अपनी बेटी की इस मासूमियत पर फफक पड़े। उन्होंने मिस्टी को कसकर अपने सीने से लगा लिया। “कुछ नहीं बेटा… पापा बस थोड़े थक गए हैं। बहुत दिनों बाद आपको देखा ना, इसलिए खुशी के आँसू हैं।”
मिस्टी ने उनकी छाती से अपना सिर निकाला और अपनी ड्राइंग बुक उनके सामने कर दी। “देखिए पापा, मैंने आपके लिए क्या बनाया है। इसमें आप, मैं और मम्मा हैं। हमारी टीचर ने कहा था कि दुनिया में सबसे ताक़तवर चीज़ हमारा परिवार होता है। जब तक हम सब साथ हैं, हमें कोई नहीं हरा सकता। है ना पापा?”
छह साल की बच्ची के मुँह से निकले इन शब्दों ने सिद्धार्थ के अंदर के जमे हुए तूफ़ान को एक पल में शांत कर दिया। मिस्टी की बनाई उस टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग में सिद्धार्थ को अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी दौलत नज़र आ रही थी। नौकरी, पैसा, करियर… ये सब तो फिर से हासिल किए जा सकते थे, लेकिन जो बिना शर्त प्यार उन्हें इस छोटे से कमरे में मिल रहा था, उसकी कीमत दुनिया की कोई करेंसी नहीं चुका सकती थी। उन्हें लगा जैसे ईश्वर ने मिस्टी के रूप में उन्हें यह संदेश दिया है कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, परिवार की डोर अगर मज़बूत है तो हर तूफ़ान से लड़ा जा सकता है।
तभी काव्या भी चाय की ट्रे लेकर कमरे में आ गई। सिद्धार्थ की लाल आँखें और बिखरी हुई हालत देखकर काव्या का दिल बैठ गया। वह पिछले आठ सालों से सिद्धार्थ की जीवनसंगिनी थी, उसने उनके चेहरे की हर लकीर को पढ़ना सीख लिया था। उसने चाय की ट्रे मेज़ पर रखी और बिना कोई सवाल किए सिद्धार्थ के पास ज़मीन पर बैठ गई। उसने सिद्धार्थ के कांपते हुए हाथ को अपने हाथों में लिया और बेहद कोमल आवाज़ में बोली, “मुझे नहीं पता कि बाहर क्या हुआ है, और न ही मैं अभी पूछना चाहती हूँ। पर मैं इतना जानती हूँ कि तुम अकेले नहीं हो। जो भी परेशानी है, हम मिलकर उसका सामना कर लेंगे। हमने पहले भी तो किया है ना?”
काव्या के इस भरोसे ने सिद्धार्थ की रही-सही पीड़ा को भी धो दिया। मिस्टी ने अपनी माँ को देखा और फिर अपने पिता को चूमते हुए बोली, “देखा पापा, मम्मा भी मेरे साथ है। अब तो आप बिल्कुल नहीं रोओगे ना? चलो बाहर चलते हैं, मुझे भूख लगी है।”
तीनों एक-दूसरे के गले लगे हुए थे। सिद्धार्थ को अब किसी बात का डर नहीं था। जो पाँच मिनट पहले उनका सबसे बड़ा अँधेरा था, अब वह एक नई सुबह की उम्मीद में बदल चुका था। मिस्टी के उस इंतज़ार के पाँच मिनटों ने सिद्धार्थ को जीवन का सबसे बड़ा फलसफा सिखा दिया था। इंसान कभी बाहर की चुनौतियों से नहीं टूटता, वह तब टूटता है जब उसे लगता है कि वह अकेला है। और सिद्धार्थ के पास तो उनकी पूरी दुनिया उनके सीने से लगी बैठी थी।
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