“अगर तुम्हें इस घर की छत के नीचे रहना है, तो मेरी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर रसोई संभालनी होगी। तुम बाहर जाकर महारानी की तरह कुर्सी तोड़ो और मेरी बूढ़ी माँ यहाँ चूल्हे के आगे अपनी हड्डियाँ गलाए, यह तमाशा अब इस घर में और नहीं चलेगा!” विकास की दहाड़ से ड्रॉइंग रूम के शीशे तक जैसे थर्रा उठे थे। उसके चेहरे पर गुस्सा और आँखों में अपनी माँ के लिए अंधा मोह साफ झलक रहा था।
दरवाज़े पर खड़ी पसीने से लथपथ नेहा के हाथ से उसका लैपटॉप बैग नीचे खिसक गया। सुबह छह बजे की उठी नेहा, जिसने दफ्तर जाने से पहले पूरे परिवार का नाश्ता बनाया, दोपहर का टिफिन पैक किया और फिर लोकल ट्रेन के धक्कों से जूझते हुए बैंक की नौकरी की। आज महीने का आख़िरी दिन था, बैंक में ऑडिट चल रहा था, इसलिए घर लौटते-लौटते रात के साढ़े आठ बज गए थे। नेहा की आँखों में थकान के आँसू तैर गए, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, “विकास, तुम्हें पता है आज क्लोजिंग थी। मैं जानबूझकर लेट नहीं आई हूँ। और आते ही मैंने बैग रखकर सबसे पहले आटा ही गूंथा है… तुम बिना सोचे-समझे अपनी माँ की हर बात को पत्थर की लकीर मान लोगे, तो इस घर में कभी शांति नहीं रह पाएगी।”
“चुप रहो तुम!” विकास ने उँगली उठाते हुए कहा। “माँ सुबह से कह रही हैं कि तुम जिस दिन जल्दी भी आती हो, उस दिन भी कमरे में घुसकर फोन पर लगी रहती हो। सारा काम उन्हें अकेले करना पड़ता है। क्या वो तुम्हारी नौकरानी हैं?”
नेहा के सब्र का बाँध अब टूट चुका था। यह रोज़ का नाटक था। उसकी सास, सुमित्रा देवी, मोहल्ले की उन औरतों में से थीं जिन्हें अपनी बहुओं की आज़ादी और उनका नौकरी करना कभी रास नहीं आता था। जब नेहा सुबह काम में जुटी होती, तब सुमित्रा जी पूजा-पाठ के नाम पर दो घंटे कमरे में बंद रहतीं। और जैसे ही नेहा ऑफिस के लिए निकलती, वो पूरे मोहल्ले में ढिंढोरा पीटतीं कि बहू तो सुबह-सुबह तैयार होकर निकल जाती है और घर का सारा बोझ उनके कमज़ोर कंधों पर डाल जाती है।
“विकास,” नेहा की आवाज़ अब कांप नहीं रही थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी दृढ़ता आ गई थी। “तुम सिर्फ वो देखते हो जो तुम्हारी माँ तुम्हें दिखाती हैं। कभी तुमने अपनी आँखें खोलकर हकीकत देखने की कोशिश की है? सुबह तुम्हारे उठने से पहले गैस चूल्हा मैं जलाती हूँ। तुम्हारी और तुम्हारी माँ की पसंद की सब्ज़ी इस घर में मेरी ही कमाई से आती है। मैं ऑफिस में काम करती हूँ, कोई मटरगश्ती नहीं। और जब घर लौटती हूँ, तो चाय का एक कप भी मुझे कोई बनाकर नहीं देता, उल्टे मुझे ही रसोई में घुसना पड़ता है।”
सुमित्रा जी, जो अब तक अपने कमरे के दरवाज़े की ओट से यह तमाशा देख रही थीं, तुरंत बाहर आ गईं और पल्लू से झूठे आँसू पोंछते हुए बोलीं, “देखा बेटा! देख लिया अपनी मेमसाब बीवी का असली रूप? कैसे मुझे ही झूठा साबित कर रही है। मैंने तो पहले ही कहा था, नौकरी वाली बहू मत लाओ, ये घर को धर्मशाला समझेंगी। मेरी तो इस घर में कोई इज़्ज़त ही नहीं बची है।”
सुमित्रा जी के इन वाक्यों ने आग में घी का काम किया। विकास ने तमतमाते हुए कहा, “कल से तुम्हारा ऑफिस जाना बंद! अगर तुम घर और मेरी माँ को नहीं संभाल सकती, तो तुम्हें नौकरी करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरा कमाया हुआ पैसा इस घर को चलाने के लिए काफी है।”
यह सुनकर नेहा सन्न रह गई। उसकी बरसों की मेहनत, उसकी डिग्रियां, उसकी आज़ादी—सब कुछ एक पल में विकास ने अपनी माँ के झूठे अहम की खातिर ख़त्म करने का फरमान सुना दिया था। उस रात नेहा ने खाना नहीं खाया। वो बस सोचती रही कि क्या शादी का मतलब सिर्फ एक बिना पगार की नौकरानी बनना होता है? क्या एक औरत का अपना कोई वजूद नहीं होता?
अगले दिन रविवार था। नेहा सुबह उठी और हमेशा की तरह काम में नहीं लगी। उसने अपना बैग पैक किया। विकास नींद से जागा तो नेहा को दरवाज़े पर खड़ा पाया। “ये क्या नाटक है? कहाँ जा रही हो सुबह-सुबह?” विकास ने झल्लाते हुए पूछा।
“मैं अपनी आज़ादी और अपने आत्मसम्मान के साथ जीने जा रही हूँ, विकास,” नेहा ने शांत स्वर में कहा। “तुमने कल कहा था कि तुम अकेले इस घर को चला सकते हो। ठीक है, आज से इस घर की ईएमआई, तुम्हारी माँ की महंगी दवाइयाँ और घर का राशन तुम अकेले संभालना। मैं अपना खर्च खुद उठा सकती हूँ। रही बात तुम्हारी माँ की, तो मैं उन्हें खुश करने के लिए अपनी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकती। जिस माँ के लिए तुम मुझसे लड़ रहे हो, कभी उनसे पूछना कि कल शाम जब मैं घर आई थी, तो वो पड़ोसन विमला आंटी से फोन पर क्या कह रही थीं।”
विकास कुछ समझ नहीं पाया। नेहा दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गई।
घर में अजीब सा सन्नाटा छा गया था। विकास जब पानी पीने रसोई की तरफ गया, तो उसने सुना कि उसकी माँ अपनी सहेली विमला से बात कर रही थीं।
“अरे विमला, मैंने तो कल ही सीधा कर दिया अपनी बहू को। ये पढ़ी-लिखी लड़कियों को अगर शुरू से काबू में ना रखो, तो ये सिर पर चढ़ जाती हैं। कल वो ऑफिस से थकी-हारी आई, मैंने विकास के कान ऐसे भरे कि उसने बेचारी को कल से नौकरी छोड़ने का ही हुक्म दे दिया। अब घर में रहकर बर्तन मांजेगी, तब अक्ल ठिकाने आएगी।” सुमित्रा जी की हँसी विकास के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर गई।
विकास के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। जिस माँ को वो देवी मानकर अपनी पत्नी को जलील कर रहा था, उसी माँ ने उसकी गृहस्थी में आग लगाने का काम किया था। उसे नेहा के कहे गए एक-एक शब्द याद आने लगे—कैसे वो सुबह से रात तक मशीन की तरह काम करती थी, कैसे वो अपनी आधी सैलरी सुमित्रा जी के हाथों में रख देती थी, और बदले में उसे सिर्फ ताने मिलते थे।
विकास भारी कदमों से कमरे में लौटा। उसने अपना फोन उठाया और कांपते हाथों से नेहा का नंबर मिलाया। जब नेहा ने फोन उठाया, तो विकास की आँखों से आँसू छलक पड़े। “मुझे माफ़ कर दो नेहा… मुझे सब समझ आ गया है। मैं अपनी ही आँखों पर बंधी पट्टी नहीं खोल पाया। प्लीज़, घर वापस आ जाओ। अब इस घर में तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं होगा।”
क्या विकास का अपनी माँ की बातों में आकर नेहा पर शक करना और उस पर चिल्लाना सही था? अगर आप नेहा की जगह होते तो क्या करते? क्या एक कामकाजी महिला से घर के सारे कामों की शत-प्रतिशत उम्मीद करना जायज़ है? अपने विचार कमेंट करके ज़रूर बताएं, हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
लेखिका : निर्मला शुक्ला