सुलोचना जी आज सुबह से ही थोड़ी परेशान और घबराई हुई थीं। घर में सब कुछ सामान्य था, लेकिन उनका मन एक अजीब सी उलझन में फंसा था। उन्होंने अपने पति रमेश जी को आवाज़ दी, “सुनिए जी, कल छोटी बहू अंजलि के मम्मी-पापा आ रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि नाश्ते और खाने में क्या बनाऊँ। वे लोग इतने बड़े बिल्डर हैं, पता नहीं हमारा सादा खाना उन्हें पसंद आएगा भी या नहीं।”
रमेश जी ने अखबार से नज़रें हटाए बिना ही जवाब दिया, “अरे सुलोचना, इतना क्यों सोच रही हो? जो तुम हमेशा बनाती हो, वही बना लेना। वे लोग कोई आसमान से थोड़े ही उतरे हैं।”
तभी बाहर से गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। छोटी बहू अंजलि और बेटा कुणाल ऑफिस से वापस आ गए थे। सुलोचना जी तुरंत बाहर गईं। “अंजलि बेटा, तुम्हारे मम्मी-पापा कल आ रहे हैं न? तुमने बताया नहीं कि उन्हें खाने में क्या पसंद है?”
अंजलि ने अपना बैग सोफे पर रखते हुए कहा, “माँ जी, मुझे तो खुद नहीं पता था कि वे कल आ रहे हैं। आज दोपहर में ही उनका फोन आया था। और परेशानी की बात तो यह है कि मुझे और कुणाल को आज रात ही एक ज़रूरी कॉन्फ्रेंस के लिए हैदराबाद निकलना है। हमारा तो टिकट भी बुक हो गया है।”
सुलोचना जी का चेहरा उतर गया। “क्या? तुम लोग आज ही जा रहे हो? और तुम्हारे मम्मी-पापा कल आ रहे हैं? हे भगवान, अब मैं उन बड़े लोगों को अकेले कैसे संभालूँगी?”
बड़ी बहू राधिका, जो रसोई से पानी लेकर आ रही थी, उसने सास की परेशानी भांप ली। “माँ जी, आप चिंता क्यों करती हैं? मैं हूँ ना। मैं सब संभाल लूँगी।”
अंजलि ने राधिका के हाथ से पानी का गिलास लेते हुए कहा, “थैंक यू दीदी। आप ही मुझे इस मुश्किल से निकाल सकती हैं। मैं तो पैकिंग में ही उलझ जाऊँगी।”
सुलोचना जी की दोनों बहुओं में गज़ब का तालमेल था। राधिका एक साधारण मास्टर जी की बेटी थी, जो शादी के बाद से ही घर की धुरी बन गई थी। वहीं अंजलि शहर के एक नामी बिल्डर की इकलौती बेटी थी। जब कुणाल ने अंजलि से शादी करने की बात घर में बताई थी, तो सुलोचना जी और रमेश जी के पसीने छूट गए थे। उन्हें लगा था कि इतने अमीर घर की लड़की उनके मिडिल-क्लास परिवार में कैसे एडजस्ट करेगी। कहीं वह घमंड में आकर घर न तोड़ दे। लेकिन अंजलि ने अपनी सादगी और समझदारी से सबका दिल जीत लिया था। वह राधिका को अपनी बड़ी बहन मानती थी और घर के हर काम में हाथ बंटाती थी। सुलोचना जी अक्सर मन ही मन भगवान को धन्यवाद देती थीं कि उनके घर को किसी की नज़र न लगे।
लेकिन आज अंजलि के माता-पिता के आने की खबर ने सुलोचना जी की पुरानी चिंताएँ फिर से जगा दी थीं। वे अमीर समधियों के सामने किसी भी तरह की कमी नहीं छोड़ना चाहती थीं।
रात को कुणाल और अंजलि हैदराबाद के लिए निकल गए। अगली सुबह जब सुलोचना जी रसोई में नाश्ते की तैयारी कर रही थीं, तभी राधिका का पति, बड़ा बेटा सुमित, हड़बड़ाता हुआ अंदर आया।
“माँ, एक बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है,” सुमित ने माथा पीटते हुए कहा। “आज हमारे ऑफिस की तरफ से एक फैमिली पिकनिक रखी गई है। सभी को अपने परिवार के साथ जाना अनिवार्य है। मैं आपको और राधिका को बताना ही भूल गया था।”
सुलोचना जी के तो हाथ से करछुल ही छूट गई। “सुमित, यह क्या कह रहा है तू? आज ही पिकनिक? अरे, आज अंजलि के मम्मी-पापा आ रहे हैं। अगर तू और राधिका भी चले गए, तो मैं और तेरे पापा उन बड़े लोगों की खातिरदारी कैसे करेंगे?”
सुमित ने बेबसी से कहा, “माँ, मैं क्या करूँ? अगर मैं नहीं गया तो बॉस बहुत नाराज़ होंगे। आप ऐसा कीजिए, खाने का आर्डर बाहर से कर दीजिए। बर्तन धोने वाली कमला बाई को रोक लीजिए, वह मदद कर देगी।”
सुलोचना जी के पास अब कोई चारा नहीं था। सुमित, राधिका और उनका छोटा बेटा आरव सुबह 9 बजे ही घर से निकल गए। घर में अब सिर्फ सुलोचना जी और रमेश जी बचे थे।
रमेश जी अपनी पत्नी की हालत देखकर मुस्कुरा रहे थे। “तुम नाहक ही परेशान हो रही हो सुलोचना। सब ठीक हो जाएगा।”
तभी रमेश जी का फोन बजा। उन्होंने फोन उठाया और बात करने लगे। फोन रखने के बाद उन्होंने एक और बम फोड़ दिया। “लो भई, आज तो मेहमानों की लाइन लगी है। राधिका के बाबूजी यानी मास्टर जी का फोन था। वे और उनकी पत्नी आज दोपहर के खाने पर हमारे घर आ रहे हैं।”
सुलोचना जी ने माथा पकड़ लिया। “हे भगवान! एक तरफ अमीर समधी और दूसरी तरफ मास्टर जी। मैं तो पागल ही हो जाऊँगी। अब जल्दी से बाहर रेस्टोरेंट में फोन करके मास्टर जी और उनकी पत्नी का खाना भी बढ़वा दीजिए।”
दोपहर के 12 बज रहे थे। सुलोचना जी बेचैनी से दरवाज़े की तरफ देख रही थीं। तभी एक बड़ी सी गाड़ी उनके घर के सामने रुकी। सुलोचना जी और रमेश जी मेहमानों के स्वागत के लिए बाहर आए। लेकिन गाड़ी का दरवाज़ा खुलते ही वे दोनों हैरान रह गए।
गाड़ी में से अंजलि के माता-पिता के साथ राधिका के माता-पिता (मास्टर जी और उनकी पत्नी) भी मुस्कुराते हुए बाहर निकले। चारों समधी-समधन एक ही गाड़ी से और एक साथ!
“सरप्राइज़!” अंजलि की माँ ने हँसते हुए कहा।
सुलोचना जी को तो अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था। “आप लोग… एक साथ?”
मास्टर जी ने हँसते हुए रमेश जी को गले लगाया। “अरे भई, हम समधी हैं, कोई दुश्मन थोड़े ही हैं। चलिए, अंदर चलिए, बहुत भूख लगी है।”
ड्राइंग रूम में चारों समधी-समधन ऐसे बैठे थे जैसे बरसों पुराने दोस्त हों। न कोई अमीरी का घमंड, न कोई गरीबी का संकोच। सुलोचना जी ने राहत की सांस ली। बाहर से मंगवाए खाने के साथ अंजलि और राधिका की माताएँ अपने-अपने घर से भी कुछ खास डिशेज़ बनाकर लाई थीं। खाने की मेज़ पर हँसी-मज़ाक और पुरानी यादों का ऐसा दौर चला कि कब शाम के 5 बज गए, किसी को पता ही नहीं चला।
तभी दरवाज़े पर सुमित और राधिका हँसते हुए अंदर आए।
“तो माँ जी, हमारी यह योजना आपको कैसी लगी?” राधिका ने शरारत से पूछा।
सुलोचना जी की आँखें खुली की खुली रह गईं। “योजना? मतलब तुम लोग পিকনিক (picnic) नहीं गए थे?”
अंजलि की माँ ने बात संभालते हुए कहा, “सुलोचना जी, मुझे माफ़ कीजिएगा। दरअसल, जब अंजलि ने मुझे बताया कि आप हमारे आने की खबर सुनकर बहुत तनाव में आ जाती हैं और आपको लगता है कि हम अमीर लोग बहुत अलग हैं, तो मुझे लगा कि इस ग़लतफ़हमी को दूर करना बहुत ज़रूरी है। मैंने ही राधिका से उसके माता-पिता का नंबर लिया था। आज सुबह हम लोग पहले मास्टर जी के घर गए, वहाँ नाश्ता किया और फिर सब साथ मिलकर यहाँ आ गए। राधिका और अंजलि ने ही यह सारा नाटक रचा था ताकि हम सब बिना किसी झिझक के एक साथ समय बिता सकें।”
सुलोचना जी की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने राधिका के सिर पर हाथ फेरा। “तुम दोनों बहुओं ने तो मुझे आज सचमुच एक बहुत बड़ा सबक दे दिया। रिश्ते पैसों से नहीं, प्यार और अपनेपन से निभाए जाते हैं।”
रमेश जी ने हँसते हुए कहा, “तो फिर इसी बात पर राधिका के हाथ की एक-एक कप बढ़िया चाय हो जाए!”
पूरा घर एक बार फिर से हँसी के ठहाकों से गूंज उठा। सुलोचना जी ने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की, “मेरे परिवार की इस मिठास और इन खूबसूरत रिश्तों को कभी किसी की नज़र न लगे।”
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के समय में भी अमीरी और गरीबी रिश्तों के बीच दीवार बन सकती है? या फिर प्यार और समझदारी से हर दीवार को गिराया जा सकता है? अपनी राय कमेंट करके ज़रूर बताएँ।
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