आपसी समझ भी जरूरी है – डॉ बीना कुण्डलिया 

ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन कॉलवेल की बजती आवाज सबके कानों को बेध रही थी। मगर आज भोर सवेरे जबकि सन्डे की छुट्टी का दिन और फिर सर्दियों की सुबह जब कि सूरज भी निकलने को तैयार नजर नहीं आ रहा, ऐसे में बिस्तर को छोड़कर बाहर आने की हिम्मत कौन करता भला ? 

जयंत बाबू बोले- अरे भई देखो जाकर, कौन आया है ?

 इतनी सर्दी में तो कोई जरूरत मंद ही आया होगा अभी तो सूरज भी ठीक से नहीं निकाला।

 माधुरी जी ने तो रजाई से ही अपना सर मुंह सब ढंक लिया बड़बड़ाते हुए कौन हो सकता है भला? 

रहने दो घर के तो सभी सदस्य अपने अपने बिस्तर में घुसे हुए हैं। होगा कोई न कोई आलतू फालतू अड़ोसी-पड़ोसी । 

तभी दरवाजे पर चहल पहल सी सुनाई दी लगता बहु ने खोल दिया दरवाजा कहते हुए माधुरी जी बहार आवाज पर ध्यान केंद्रित करने लगीं। तभी चारू माधुरी जी की बड़ी बेटी चहचहाते कमरे में प्रवेश करती है। अरे माँ पापा कब से दरवाजे पर बैल बजा रही हूँ,आज तो आपने बहार ही खड़ा करने का इरादा कर लिया था क्या ?

 बेटी चारू को देखते ही माधुरी जी खुशी से चहक पड़ी अरे बेटा चारू…तुरंत रजाई एक तरफ फैंक उठ बैठी अरे चारू तू बिना फोन किये और सुबह सुबह कैसे ? 

अरे माँ सुबह पहुंची फ्लाइट, रात को निकली मैं…. सोचा इस बार चलकर आपको सरप्राइज दिया जाये । कहते हुए चारू ने माँ पापा को प्रणाम किया। 

जयंत बाबू बहुत ही प्रसन्नचित्त मुद्रा में मुस्कुराते हुए बोले बेटा सरप्राइज तो बहुत अच्छा लगा मगर इस सर्दी में रात की फ्लाइट और बच्चों का साथ… छुट्टी नहीं थी ज्यादा तो शाम ऑफिस के बाद सीधे चली आई। और दामाद जी नहीं आये माधुरी जी बोली। आयेंगे दो दिन बाद लेने । अभी उनको ऑफिस का कुछ जरूरी काम था । दोनों बच्चे भाभी के साथ उनके बच्चों के कमरे में पहुंच गये। तब तक बहु मीनाक्षी गर्म गर्म चाय बना लाई । लो चारू दीदी चाय और फिर जयंत बाबू और माधुरी को भी देतीं हुई बोली- चलिए सभी फ्रेश हो जाये मैं नाश्ते की तैयारी करती हूँ । अरे भाभी क्यूं परेशान होती हो इतनी सर्दी में, रूको मैं बाहर से आर्डर कर देती हूँ दोपहर में बना लेंगे घर का कुछ कहकर चारू जल्दी- जल्दी चाय की चुस्कियां लेने लगी यह कहते हुए, मस्त चाय बनाई है भाभी आपने , बढ़िया मसाले वाली बहुत खूब बनाती हो । अच्छा दीदी…मीनाक्षी मुस्कुराते हुए किचन की तरफ चल पड़ी। 

तभी माधुरी जी बोली बाहर से नाश्ता मंगवाने की क्या जरूरत है भला ? बना तो रही थी बहु अरे घर का खालो, दो चार दिन, ये बहार के खाने का भी… तब तक बच्चों की टोली आ गई नानी नानाजी नमस्ते। अरे ऽ मेरे बच्चे कहकर दोनों बच्चों को गले से लगाते हुए माधुरी जी तो फूलों नहीं समा रहीं थीं।

मम्मा चाइनीज मंगवाये उसके दोनों बच्चे मचलते हुए बोले ।

नहीं नहीं बुआ छोले भटूरे खाने है भतीजे भतीजी चहचहाये ।

चारू ने सभी बच्चों को आश्वस्त किया चिंता मत करो सब की पसंद का आर्डर कर दिया । अब जल्दी से फ्रैश हो जाओ नाश्ता आता ही होगा गर्म गर्म खाकर सभी फिर घूमने भी निकलना है की नहीं ।

सभी बच्चे एकसाथ चिल्लाते हुए वाशरूम की तरफ चल पड़े।

सभी ने मिल जुलकर चटकारे लेते हुए नाश्ता किया। घर भर में खुशी का माहौल बच्चों की चहचहाहट सभी बड़ों का आपसी वार्तालाप, बहसबाजी, बीच-बीच में माधुरी जी का बात बेबात पर हल्की मीठी सी फटकार सबमें ऐसा जोश भर रही भूल गये सभी कड़ाके की सर्दी ठरठहराहट ।

चारू बराबर भाभी मीनाक्षी के हर काम में सहयोग करती रही जबकि माधुरी जी की कोशिश रहती चारू हर समय उनके ही साथ बैठी रहे और वो अपनी बहु मीनाक्षी को आदेश देतीं रहें ये बना दे, वो बना दे ये करो वो करे लेकिन चारू माँ पापा के साथ साथ झटपट बीच बीच में भाभी को भी सहयोग करती जा रही थी। माधुरी जी चारू को अपने पास बैठा लेती और हालचाल बातचीत कर बातों में ही फंसाये रखने की लाख कोशिश के बावजूद भी सफल नहीं हो रहीं होती है। दोपहर का खाना निपटा सभी अपने अपने कामों में मस्त नजर आ रहे ।

माधुरी जी चारू को अपने पास बैठने का कह फिर उससे कहतीं हैं – चारू पता है…लड़कियां मायके आराम करने आतीं हैं, दो पल सुकून के प्राप्त करने, और एक तुम हो मायके आकर भी चैन से नहीं रहती हो । इतना लम्बा सफर तय करके आई हो थक गई होगी तनिक आराम से बैठ,खा पी लो शरीर को थोड़ा आराम भी देना चाहिए। लेकिन चारू माँ की बात अनसूनी कर नये- नये प्लान बनाने में लगी रहती है। अपनी माँ को समझाती है माँ आराम ही तो कर रही हूँ मैं …ससुराल में भी मेरी सासुमां हर काम में मेरी बहुत सहायता करतीं हैं। मैं तो सुबह नाश्ते की तैयारी कर देती हूँ । कभी जल्दी ऑफिस के लिए निकलना हो तो मैं मेड को फोन कर देती हूँ वो जल्दी आकर सासूमां की मदद कर देती है बाकि मेरी सासूमां सब सम्भाल लेती है। बच्चों को मेरे पति रवि तैयार कर स्कूल भेज देते हैं। दोपहर में स्कूल बस आती है बस का स्टाप बिल्डिंग के सामने ही है वहां से लाने का काम ससुरजी बखूबी निभा लेते हैं। मेड दोपहर के लिए सब्जी बगैरा भी बना जाती है। जिससे सास ससुर को कोई तकलीफ़ नहीं होती। शाम को मैं आकर देख लेती हूँ । मिलजुल सभी काम पूरे हो जाते हैं। आराम से ज़िन्दगी का सफर आगे चल रहा है। छुट्टी के दिन जी भरकर आराम कर लेती हूँ ।

लेकिन तेरी सास बच्चों को संभालने में आनाकानी तो नहीं करती स्कूल से आने के बाद तो उनको देखना ही पड़ता होगा । माधुरी जी बोली।

अरे ‘माँ …स्कूल से आकर बच्चे खाना पीना खाकर सो जाते हैं। इसी बीच सासूमां ससुर जी भी आराम कर लेते हैं। शाम को दो घंटे बच्चों को पढ़ाने के लिए मैंने एक टीचर रखी है वो होमवर्क और रोज की पढ़ाई करवा देती है। अब ऐसा नहीं की मैं उसी टीचर के भरोसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई छोड़ कर बैठी हूँ । मैं और मेरे पति समय समय पर बारी बारी से नित्य ही उनकी पढ़ाई देखते रहते हैं। हां होमवर्क टीचर करवा देती है जिससे हमारा समय बच जाता है । और मैं ऑफिस से घर आकर दूसरे काम देख लेती हूँ । बाकी ‘माँ.. देखो, तुम्हारी अपनी जिंदगी है तुम जैसा चाहो बना लो चाहे बिगाड़ लो । चाहो तो अच्छे से संवार लो जैसा चाहो वैसे गुजार लो । लेकिन ये घर परिवार आपसी समझ समझोते से चलते हैं। यहां एक दूसरे की जरूरत का ध्यान रखना पड़ता है। तभी परिवार का सुख मिलता है। वरना तो जिंदगी कीच खींच में ही निकल जाती है।

“सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचने से ज्यादा जरूरी है वहां टिके रहना “। चारू ने माँ को समझाया ।

माधुरी जी बेटी की बात पर बोली- लेकिन मैं तो कुछ नहीं करती घर में, तेरी भाभी सुबह ऑफिस जाने से पहले नाश्ता बना जाती है। सब्जी ज्यादा बना फ्रीज में रख देती है तेरे पापा चावल बना लेते हैं। मै कभी कभार फुल्के बना देती हूँ बस । बहु शाम आकर सारा काम देख लेती है। मुझे करने के लिए नहीं कहती बहुत कुछ कामवाली से भी करवा लेती है। मगर मुझे पसंद नहीं उस निखोटी कामवाली का काम मरी सफर सफड़ जल्द बाजी से ही निपटाने में लगी रहती है। इसलिए मैं गुस्सा भी करती हूँ और बहु से कहती हूँ खुद ही करा करे ।

देखो ‘माँ… भाभी भी कामकाजी हैं। रोज नौकरी पर जाती है। अच्छा कमाती है, दिनभर काम से थक जाती होगी। अब कामवाली से काम करवा भी लिया तो कौन सी बुराई है इसमें ? भाभी ही उसको कामका पैसा देती है। आप को परेशानी हो तो आप वो काम जो कामवाली का आपको पसंद नहीं आप खुद भी कर सकती है। भाभी को जो जरूरत वहीं काम तो वो कामवाली से करवाती हैं । इसमें गुस्सा करने की क्या बात हुई भला ? काम वाली जल्दी जल्दी निपटाती क्योंकि उसको और घर भी जाना होता होगा।

देखो… ‘माँ अभी भाभी आपकी कितनी इज्जत करतीं हैं। वो आपके डर से आपको खुश रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा काम खुद करने की कोशिश करतीं हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन भाभी परेशान होकर आपका विरोध भी कर सकती है। तब आप क्या करेंगी ? बेकार की टेंशन लड़ाई झगड़े से घर में अशान्ति पैदा हो सकती है। जिससे इंसान घर में खुद को परेशान महसूस करने लगता है। घर से बहार भागने के बहाने ढूंढने लगता है। इसलिए माँ घर में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी है आपसी प्रेम सद्भाव एक दूसरे को समझना। 

अभी मां बेटी बातों में ही मशगूल होते हैं तभी सभी बच्चे शौर करते हुए अन्दर प्रवेश करते हैं । और घूमने चलने की जिद पर अड़ जाते हैं। चारू कहती हैं ठीक है अपने मामा मामी से पूछो आज शाम सभी बाहर घूमने चल रहे हैं क्या ? अगर चल रहे हैं तो रात का खाना भी बहार खाकर ही लौटेंगे। 

तब तक मीनाक्षी उसके पति सभी को खेंचकर बच्चे कमरे में ले आते हैं। सभी की आपसी रजामंदी घूमने का प्रोगाम बन जाता है। पूरा परिवार शाम को घूमने निकलता है।घर के वृद्ध दम्पति बच्चों के साथ एक गाड़ी में दूसरे में,और चारू मीनाक्षी और भाई रवि दूसरी गाड़ी में बैठेंगे ऐसा तय होता है । खूब सैर सपाटा, खरीददारी एक दूसरे के लिए तोहफे फिर रात का खाना बहार ही खाकर पूरा परिवार हंसी खुशी लौट आता है। फिर आधी से ज्यादा रात-भर एक दूसरे के दुख सुख की बातें रिश्ते दारों के किस्से आपसी बातचीत का आदान प्रदान होता रहता है।

माधुरी जी की आँखें नींद से बोझिल होने लगती है तो वो सभी को मीठी सी डांट लगाते हुए जल्दी सोने के लिए कहतीं हैं। चलो अब सभी आराम करो रातभर जागरण करने का विचार है क्या ? फिर दो दिन ऐसे ही मस्ती में बीत जाते हैं।

ट्रिन ट्रिन ट्रिन दूसरे दिन फिर भोर सबेरे दरवाजे पर कॉलवेल बजती है। आज माधुरी जी को जरा भी आलस्य नहीं वो दौड़कर दरवाजा खोलतीं है। जहां हाथ में बैग लिए उनका दामाद सुलभ खड़ा होता है । जो झटपट माधुरी जी के पैर छुकर कहता है प्रणाम मांजी कैसी हैं आप ? 

माधुरी जी प्रसन्न चित्त होकर कहती हैं खुश रहो बेटा ।

आ गये तुम हम सभी को तुम्हारा बेसब्री से इंतजार था । आओ बैठो बेटा माधुरी जी बोली।

तब तक घर के सभी सदस्य भी आ जाते हैं। एक बार घर भर में दुबारा से आज फिर चहल-पहल शुरू हो जाती है। माधुरी जी बहु से कहती हैं – भई दामाद जी आये है घर पर ही अच्छा सा नाश्ता बनाओ आज बहार का नहीं चलेगा । 

दामाद जी खाने पीने के बहुत शौकीन हैं। सब अच्छा अच्छा बनना चाहिए।

फिर माधुरी जी चहक कर कहती हैं…ऐसा करते हैं.. चलो मैं भी किचन में चलती हूँ और सुलभ की पसंद का हलवा तो मैं ही बनाऊंगी। उसको मेरे हाथ का हलवा बहुत पसंद है । 

सुलभ मुस्कुराकर कहते हैं अच्छा मांजी बना रहीं हैं हलवा तो मैं पूरी दो प्लेट भरकर खाने वाला हूँ इतना ध्यान रखिएगा।

हां हाँ बिल्कुल खाना, जी भरकर खाना कहते हुए, माधुरी जी बहु मीनाक्षी के संग किचन में जुट जाती हैं ।

नाश्ता, खाना सबका पूरा परिवार एक साथ बैठकर आनन्द लेते हैं। फिर सभी मिलकर शाम को घूमने निकल पड़ते हैं। हंसी खुशी मजाक चहल-पहल में कब रात गुजर जाती है पता ही नहीं चलता।

आज सुबह की फ्लाइट से बेटी चारू को अपने घर वापस जाना होता है। एक दिन पहले से बुक की गई कैब, बहार इंतजार कर रही । माधुरी जी और सारा परिवार बड़े ही भावविभोर होकर उसको व उसके परिवार को विदा करता है। बहु मीनाक्षी चारू को गले लगाती हुई कहती हैं – “ जल्दी ही दुबारा आइयेगा दीदी हमें तुम्हारे आने का बड़ी ही बेसब्री से इन्तजार रहेगा “ । चारू एक नजर अपनी माँ को एक नजर भाभी को देखकर कहती हैं…  हाँ,मैं बहुत जल्दी ही आऊंगी । माँ माधुरी जी के चेहरे पर आत्मीयता से भरपूर सन्तुष्ट भाव नजर आ रहे होते हैं। सभी हसरत भरी निगाहों से एकटक खड़े चारू की कैब को दूर तक जाते देखते रहते हैं।

लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया 

        3,7,2026

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