बदलाव की शुरुआत

शाम का समय था। सुमित्रा जी रसोई में खड़ी अपने और अपने पति के लिए चाय छान रही थीं। घर में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन यह शांति अचानक एक तेज़ और कर्कश आवाज़ से टूट गई। आवाज़ उनके बेटे विकास के कमरे से आ रही थी।

“मैंने तुम्हें तीन बार कॉल किया! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा फोन इग्नोर करने की? अगर अगली बार ऐसा हुआ, तो एक थप्पड़ खींच कर दूंगा, सारा दिमाग ठिकाने आ जाएगा तुम्हारा!”

सुमित्रा जी के हाथ ठिठक गए। चाय छलक कर स्लैब पर गिर गई। उन्होंने जो सुना, उस पर उन्हें एक पल के लिए यकीन ही नहीं हुआ। विकास… उनका पढ़ा-लिखा, एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर काम करने वाला बेटा, अपनी नई-नवेली पत्नी अंजलि से इस तरह बात कर रहा था? महज़ एक कॉल न उठाने पर थप्पड़ मारने की धमकी?

सुमित्रा जी रसोई के दरवाज़े पर बुत बनकर खड़ी रह गईं। उनका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। वह सोच में पड़ गईं कि अगर महज़ कॉल ना उठाने पर वह थप्पड़ की बात कर रहा है, तो बंद कमरे में वह किस हद तक गिरता होगा? यह कैसी दूषित मानसिकता है? और अंजलि… वह बेचारी कैसे इस घुटन भरे और डरावने माहौल में जी रही होगी? सुमित्रा जी का दिल बैठ गया। यह समाज की एक बहुत ही कटु और भयानक सच्चाई थी, जो आज उनके अपने घर की दहलीज लांघ कर अंदर आ चुकी थी।

अखबारों के पन्ने रोज़ ऐसी ही खबरों से रंगे होते हैं—कोई दहेज के लिए जलाई गई, किसी को बात-बात पर पीटा गया, कहीं किसी का मानसिक उत्पीड़न हुआ। हम सब अपने ड्राइंग रूम में बैठकर अफ़सोस जताते हैं और चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा करके भूल जाते हैं। आज देश में महिलाओं और बच्चियों के साथ जो कुछ भी घिनौना हो रहा है, वह कहीं न कहीं इसी दूषित मानसिकता का ही तो परिणाम है। हम मोमबत्तियां निकालते हैं, कड़े कानूनों की मांग करते हैं, लेकिन क्या सिर्फ कुछ लोगों को सज़ा दे देने से यह मानसिकता कम या बंद हो सकती है? सुमित्रा जी का अंतर्मन चीख कर कह रहा था—बिल्कुल नहीं!

कहते हैं ना कि अगर बीमारी को जड़ से खत्म करना है, तो इलाज भी जड़ पर ही करना होगा। यह जो घृणित मानसिकता है, इसका इलाज भी अब जड़ से ही होना ज़रूरी बन चुका है। सुमित्रा जी को अपना अतीत याद आने लगा। जब विकास छोटा था और उसने मोहल्ले की एक बच्ची को धक्का दिया था, तो सुमित्रा जी ने यह कहकर बात टाल दी थी कि “लड़के तो थोड़े नटखट होते ही हैं, उसे मारना मत।” जब कॉलेज में विकास ने अपनी छोटी बहन पर पाबंदियां लगाईं और खुद देर रात तक दोस्तों के साथ बाहर घूमा, तब भी सुमित्रा जी ने ‘बेटे’ के मोह में उसकी गलतियों पर पर्दा ही डाला था।

आज उन्हें अपनी उन तमाम गलतियों का एहसास एक झटके में हो गया। उन्होंने ही अपने लाड़-प्यार में इस ज़हरीले पौधे को सींचा था। अपने बेटों को सही-गलत समझाना, उन्हें महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाना बहुत ज़रूरी था, न कि उनकी गलतियों पर पर्दा डालना, जो अक्सर हमारे समाज में देखा और सुना जाता है। अगर आज़ादी के इतने सालों बाद भी समाज में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, तो यह हम माताओं के लिए भी बेहद शर्म की बात है, क्योंकि हम ही तो इन बेटों की परवरिश करती हैं।

सुमित्रा जी ने तय किया कि वह आज अपनी उस गलती को सुधारेंगी। उन्होंने भारी कदमों से विकास के कमरे की तरफ रुख किया। दरवाज़ा आधा खुला था। अंजलि सिर झुकाए खड़ी थी, उसके हाथों में कपड़े थे जिन्हें शायद वह समेट रही थी, और उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। विकास अभी भी गुस्से में अपनी उंगली अंजलि की तरफ दिखा रहा था।

“विकास!” सुमित्रा जी की कड़क आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।

विकास अपनी माँ को अचानक वहां देखकर थोड़ा सकपकाया। “अरे माँ, आप? कुछ नहीं, बस मैं अंजलि को समझा रहा था कि इसे फोन हमेशा अपने पास रखना चाहिए। पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है इसका।”

“समझा रहे थे? या थप्पड़ मारने की धमकी दे रहे थे?” सुमित्रा जी कमरे के अंदर आईं और सीधे अंजलि के पास जाकर खड़ी हो गईं।

विकास ने नज़रें चुराते हुए अपनी मर्दानगी की ढाल ली और बोला, “माँ, ये पति-पत्नी के बीच की बात है। आप बीच में मत पड़िए। इसने मेरा ज़रूरी कॉल नहीं उठाया, मुझे गुस्सा आ गया।”

“पति-पत्नी के बीच की बात में थप्पड़ और जलालत कहाँ से आ गई?” सुमित्रा जी की आँखों में एक ऐसी आग थी जो विकास ने पहले कभी नहीं देखी थी। “तुम भूल गए विकास कि तुम भी एक औरत के पेट से जन्मे हो। क्या मैंने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं? एक कॉल न उठाने पर तुम्हारा पुरुषार्थ इतना आहत हो गया कि तुम एक लड़की पर हाथ उठाने की बात करने लगे? तुम्हारी इस नीच सोच को देखकर मुझे आज खुद पर और अपनी परवरिश पर घिन आ रही है।”

विकास हक्का-बक्का रह गया। उसने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उसकी माँ उसकी पत्नी का इस तरह साथ देगी। “माँ, आप छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हैं।”

“ये छोटी बात नहीं है विकास!” सुमित्रा जी लगभग दहाड़ उठीं। “ये शुरुआत है उस भयानक मानसिकता की जो आगे चलकर औरतों को पैर की जूती समझने लगती है। आज तुमने थप्पड़ की बात कही है, कल तुम हाथ भी उठाओगे। वो लड़की अपना पूरा परिवार, अपना घर छोड़कर तुम्हारे भरोसे यहाँ आई है, और तुम उसे उसके काम में ज़रा सी चूक होने पर डरा रहे हो? सुन लो मेरी बात कान खोलकर, अगर इस घर में रहना है, तो अंजलि को अपनी बराबरी का सम्मान देना सीखना होगा। अगर तुम्हारी मर्दानगी किसी औरत को डराने में बसती है, तो तुम मेरे बेटे कहलाने लायक नहीं हो।”

सुमित्रा जी ने पलटकर अंजलि के कंधे पर प्यार से हाथ रखा। अंजलि, जो अब तक खामोश थी, अपनी सास का यह रूप देखकर फफक कर रो पड़ी। उसने अपनी सास को कभी इतनी मजबूती से अपने साथ खड़े नहीं देखा था। सुमित्रा जी ने अंजलि के आंसू पोंछे और कहा, “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैंने एक बेटा तो पैदा कर लिया, लेकिन उसे एक अच्छा इंसान बनाना भूल गई। पर आज मैं तुझे वचन देती हूँ, इस घर में तुझे कभी डर कर जीने की ज़रूरत नहीं है। ये घर जितना मेरा है, उतना ही तेरा भी है।”

उन्होंने वापस विकास की तरफ देखा। “तुम अभी और इसी वक्त अंजलि से माफी मांगोगे। और यह याद रखना, अगर भविष्य में तुमने कभी भी अंजलि से या किसी भी औरत से इस लहज़े में बात की, तो मैं खुद तुम्हें इस घर से बाहर निकाल दूंगी। एक औरत का सम्मान करना सीखो, वरना समाज में तुम्हारी उन महँगी डिग्रियों का कोई मोल नहीं है।”

विकास का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया था। अपनी माँ के इस रौद्र और न्यायप्रिय रूप के आगे उसकी एक न चली। उसे अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ। उसने सिर झुकाकर अंजलि से अपनी बदतमीज़ी के लिए माफी मांगी।

सुमित्रा जी जानती थीं कि एक दिन की डांट से सदियों पुरानी मानसिकता रातों-रात नहीं बदलेगी, लेकिन उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी थी। उन्होंने समझ लिया था कि बदलाव की यह शुरुआत हम महिलाएं ही कर सकती हैं। अगर हर माँ अपने बेटे की गलतियों को छुपाने के बजाय उसे वहीं टोक दे, तो शायद किसी भी बेटी को बंद कमरे में थप्पड़ की धमकियां नहीं सुननी पड़ेंगी।

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