शालिनी जी एक सुलझी हुई महिला थी और उनके पति किशन जी भी सीधे साधे थे जिन्हें अपने परिवार और दुकान से ही लेना देना था हफ्ते के 6 दिन पर मंगलवार उनकी मार्केट बंद होतीं तो वो अपने दोस्तों को टाइम देते । परिवार में तीन बच्चे थे श्रुति , श्रवण और गगन ।तीनों अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे।
शालिनी सारा घर अच्छे से संभालती बच्चों को पढ़ाना सब वही देखती।बच्चे सात बजे स्कूल चले जाते और किशन दस बजे दुकान पर फिर घर शालिनी और उसकी रजनी जिसे उसने कभी कामवाली नहीं समझा ।रजनी सारा काम करती तब तक शालिनी दिन का खाना बना लेती
और रजनी को भी गरम खाना देती।फिर रजनी चली जाती और शालिनी अपनी कढ़ाई या पेंटिंग का काम करती जो उसका शौक था वो इस काम को बड़े स्तर पर करना चाहती थीं पर किशन को यह सब पसंद नहीं था इसलिए वो उसकी एब्सेंस में ये सब करती।फिर बच्चे स्कूल से आते उनका खाना दिन भर की बातें इन सब में वक्त निकल जाता
फिर शालिनी उनको पढ़ाती बच्चे शाम को दूध पी कर पार्क जाते रजनी आती शाम को खाने की तैयारी करवा देती बर्तन साफ करती और शालिनी उसे शाम के लिए भी सब्जी दे देती इसलिए रजनी शालिनी को बहुत मान देती थी।शालिनी उसका ध्यान भी रखती थी।
फिर बच्चों को खाना खिला साढ़े आठ तक किशन भी आ जाते फिर शालिनी किशन खाना खा दिन भर की बातें करते थोड़ा किशन बच्चों को टाइम देते और 10:00 बजे सब सोने चले जाते ।धीरे धीरे समय बीता बच्चे बड़े हो गए।श्रुति कॉलेज के तृतीय वर्ष में थी और श्रवण द्वितीय वर्ष में बी.कम ऑनर्स कर रहा था और गगन बारहवीं में था।
श्रुति ने टेक्सटाइल डिजाइनिंग में डिप्लोमा किया और उसका ग्रेजुएशन भी डिजायनिंग में ही हुआ।उसने 6 महीने नौकरी की फिर उसकी शादी वैभव से हो गई जो मैकेनिकल इंजीनियर था और बैंगलोर में था।श्रुति बैंगलोर चली गई ससुराल में सास ससुर और देवर राकेश यही रहते थे।
श्रवण बैंक की तैयारी कर रहा था उसका चयन बैंक अधिकारी के पद पर सरकारी बैंक में हो गया।उसके लिए सुरभि का रिश्ता आया।सुरभि स्कूल में अध्यापिका थी जो गणित पढ़ाती थी।उसके परिवार में माता पिता और एक बहन मधु थी जिसका विवाह नरेन के साथ हुआ था जिनका भोपाल में अपना व्यापार था।
सुरभि मिलनसार थी और जब उसे शालिनी जैसी सुलझी हुई महिला का साथ मिला तो घर स्वर्ग बन गया। सुबह का काम शालिनी और सुरभि मिल कर करते।ज्यादा तर तैयारी तो रात को सुरभि रजनी से करवा लेती थी।फिर भी शालिनी एक मां की तरह उठ कर चाय नाश्ता बना देती और फ्रूट बॉक्स और लंच पैक कर के देती।सात बजे सुरभि की बस आ जाती।
फिर शालिनी श्रवण किशन और गगन का नाश्ता बनाती ।गगन iit दिल्ली में था वही उसकी दोस्ती निशा से हो गई।पढ़ाई में अच्छा होने के कारण उसको अच्छी कंपनी में जॉब लग गई और फिर उसने निशा के बारे में घर पर बताया।सब खुश थे सुरभि बोली चलो देवर जी अब मेरी पोस्ट भी बढ़ जाएगी।
शालिनी बोली अगले हफ्ते हम उनके घर चलेंगे। निशा के पिता जज थे और उसकी मां रश्मि सोशल सर्कल का खास नाम थी जो घर में कम बाहर ज्यादा पाई जाती थी। इसलिए निशा की परवरिश नौकरों के हाथों ही हुई थी।घर बहुत आलीशान था जिसमें दिखावे की सभी चीजें मौजूद थी।
निशा की जिद की खातिर मां बाप मिलने को तैयार हुए पर जज साहब को पढ़ा लिखा परिवार पसंद आया और गगन महत्त्वाकांक्षी है ये भी दिख गया इसलिए यह विवाह सम्पन्न हुआ।शादी से पहले ही शालिनी ने किशन से कह घर तिमंजिला करवा लिया था।हर फ्लोर पर हॉल ,किचेन डाइनिंग एरिया और 3 बेडरूम थे ताकि किसी को परेशानी नहीं हो।
सुरभि ने पहले ही कह दिया था कि मै ऊपर नहीं रहूंगी आप दोनों के साथ यही रहूंगी।गगन बोला हा मा नीचे तीन कमरे तो है फिर ये फ्लोर क्यों बनवा रही हो । अरे कल तुम्हारे बाल बच्चे होंगे तो सब नीचे रहेंगे क्या? फिर मां ये रसोई क्यों श्रवण बोला अरे कल को तुम्हे कुछ और खाना हो तो तुम्हारी पत्नियां बनाएगी।
सब कुछ अच्छे से हो गया और निशा घर आ गई उसका दहेज शानदार आया था जबकि शालिनी और किशन ने साफ शब्दों में मना किया था पर वो नहीं माने ।निशा अपने अपने में ही रहती जहां शालिनी और सुरभि मां बेटी जैसी लगती श्रुति भी कहती मुझे पराया कर दूसरी बेटी ले आई ।
निशा को ये सब बचकाना लगता ।उसने गगन को पहले ही बोल दिया था मेरा फर्नीचर ऊपर है मै ऊपर ही रहूंगी।इसलिए मज़बूरी में गगन को भी ऊपर रहना पड़ता ।निशा ने हनीमून से आते ही दो नौकर बुला लिए।एक कुक और दूसरी फुलटाइम मेड । सुरभी तभी स्कूल से आई थी तो बोली अपने यहां रजनी आंटी है तो फिर कुक की और मेड कि क्या जरूरत। निशा को वैसे भी सुरभि पसंद नहीं थी क्योंकि हर कोई उसके नाम की माला जपता था ।
निशा उसे बोली भाभी जी आप तो मास्टर की बेटी है आपको क्या पता क्लास क्या होती हैं या अमीरी क्या होती हैं।पहली बार ये चकाचौंध देख जलन हो रही है। आगे से मेरे मामले में टांग मत अड़lना।सुरभि अपना सा मुंह लिए नीचे आ गई।शालिनी और किशन उस दिन घर पर नहीं थे। डॉक्टर के यहां गए थे वो आए तो खाने का टाइम था।
सुरभि ने टेबल लगाया शालिनी ने कहा बेटा निशा को भी बुला लो।जी मां सुरभि बोली रजनी बोली बेटा तुम रुको मैं बुलाती हूं क्योंकि रजनी सारा तमाशा देख चुकी थी।इसलिए वो खुद ऊपर गई तो मेड ने बाहर ही रोक दिया मैडम ने कहा है कि कोई डिस्टर्ब ना करे वो बड़ी दीदी खाना खाने बुला रही है।उनका खाना हो गया है।रजनी नीचे आई और बोली निशा बेटी खाना खा चुकी हैं अच्छा आज पहले ही खा लिया।
रजनी ने कहा निशा बेटी के घर से दो नौकर आए हैं उन्होंने ही बनाया है।क्या क्यों नौकर की क्या जरूरत पड़ गई। चलो खाना खाओ ।खाना खा कर किशन दुकान पर चले गए।शाम को शालिनी ने चाय बनाई तभी ऑफिस से श्रवण और गगन भी आ गए।अरे वाह आज मां के हाथ की चाय भाभी कहा है गगन बोला ।अरे आज उसकी तबियत ठीक नहीं है वो सो गई इसलिए मैने नहीं उठाया।
गगन बोला निशा कहा है।निशा अपने रूम में है।निशा को गगन को फोन करता है निशा कहती है मैं ऊपर वेट कर रही हूं तुम वहां बैठे हो ऊपर अभी आता हूं चाय पी कर।निशा पैर पटकती नीचे आ गई मैने तुम्हे ऊपर बुलाया तुम यहां चाय पी रहे हो मै तुम्हारा ऊपर वेट कर रही हूं।ऊपर क्यों सब यहां है तो तुम वहां क्यों हो? आओ बेटा बैठो चाय पियो तुमने दिन में भी खाना नहीं खाया।ओह प्लीज़ शट अप ये मेलो ड्रामा बंद करो।आपकी वो अच्छाई की पुतली कहा है जिसकी माला सारा
खानदान जपता है उसने नहीं बताया कि मैने ऊपर कुक और मेड लगा ली है।मुझे घुटन होती हैं यहां।क्या बोल रही हो निशा तुम क्या गलत कह रही हूं मैं भाभी ये भाभी वो सुरभि बेटा ये अच्छा है वो अच्छा है उसका घर है तो मुझे क्यों लाए पता नहीं सब पर क्या जादू किया है।मै साफ़ साफ बता रही हूं कि अगर इनलोगों से संबंध रखना है तो मुझसे रिश्ता तोड़ दो।
क्या कह रही हो तुम शालिनी बोली बेटा तुम ऊपर जाओ हम बाद में बात करेंगे।गगन ऊपर चला गया पर वह बहुत ही ज्यादा उदास था। जिस परिवार के बिना वह एक पल नहीं रहा उस पल भर में निशा ने अलग कर दिया। निशा ने गगन को साफ धमकी दी यदि वह चाहता है
कि मैं इस घर में रहूं दुनिया में तमाशा ना हो तो तुम नीचे नहीं जाओगे। गगन की आंखों में आंसू आ गए और वह अपने कमरे में चला गया। अगले दिन सुबह गगन ऑफिस के लिए निकला तो उसी के साथ निशा भी चली गई। गगन 2 घंटे बाद घर आ गया और आकर शालिनी
के पैरों में बैठकर रोने लगा मां मैंने गलत किया मैंने गलत लड़की को चुना जिसने मेरे परिवार को ही अलग कर दिया मैं आप लोगों के बिना नहीं जी सकता। शालिनी और किशन बोले बेटा संस्कार तो खून में होते हैं। पैसे से नहीं खरीदे जाते । रिश्ते संस्कारों से चलते हैं पैसे से नहीं निशा को पैसे का अहंकार है
उसके परिवार में कोई था ही नहीं जो रिश्तों के मायने समझाता इसलिए वो ऐसी है।तभी सुरभि और श्रवण भी अंदर आए भाई आप ऑफिस नहीं गए और भाभी आप स्कूल अरे कल से इसकी तबियत ठीक नहीं है।क्या बोला डॉक्टर शालिनी ने पूछा मां गुड न्यूज है आप दादी दादा बनने वाले हैं और मैं चाचू कितनी बड़ी खुशखबरी है।
शाम को शालिनी के कहने पर गगन निशा को ले आया घर आकर शालिनी ने निशा को भी मिठाई दी।निशा बोली सॉरी मैं मिठाई नहीं खाती
।ऊपर आते ही उसके नौकरों ने उसके कान भर दिए निशा नीचे आकर लड़ने लगी उसने सुरभि को धक्का दिया वो गिरते गिरते बची।गगन भागता हुआ आया उसने निशा को एक थप्पड़ लगाया।निशा तुम पागल हो गई हो क्या कर रही हो तुमने इस औरत के लिए मुझे मारा मुझे शुरू से ही लगता था तुम्हारा इसके साथ कुछ है।
तुम पागल हो वो मेरी भाभी है तुम्हारा दिमाग खराब है कोई संस्कार है या नहीं भाभी मां जैसी होती हैं सिर्फ तुम्हे पैसे की अकड़ है मुझे तुम्हारी और तुम्हारे पैसे की कोई जरूरत नहीं है।जाओ यहां से निशा वहां से चली गई।गगन और उसके परिवार ने बहुत कोशिश की कि सुलह हो जाए।पर नहीं दोनो के बीच आपसी सहमति से तलाक हो गया।निशा ने गंदे गंदे इल्ज़ाम लगाये।और 1 साल कोर्ट कचहरी के बाद तलाक हो गया।
निशा सामने खड़ी थी अपनी मां के साथ शालिनी वहां आई और बोली बहन जी एक बात कहूंगी यदि आपने पैसे की जगह इसे संस्कारों की अहमियत समझाई होती तो आज इसका घर बसता उजड़ता नहीं।शालिनी सपरिवार घर आ गई।निशा का सारा सामान उन्होंने अगले दिन भिजवा दिया।सुरभि को बेटा हुआ और 3 महीने बाद वो स्कूल जाने लगी।उसने शालिनी से अपनी सहेली ऋतु की शादी गगन से करने के लिए कहा गगन तो ना ही कर रहा था
पर सुरभि ने समझाया ऋतू भी मन मिलाऊं लड़की थी जिसने सारे परिवार को अपना लिया ।गगन भी अब खुश था और भाभी को धन्यवाद देता।गगन एक दिन ऑफिस से आ रहा था उसे उसका दोस्त समित मिला वो बोला निशा का दूसरा तलाक हो गया।गगन बोला मैं क्या करूं वो जिद्दी और घमंडी है इसी लिए उसका घर नहीं बस सकता।
गगन घर पहुंचा तो ऋतु दरवाजे पर खड़ी थी।क्या हुआ आज लेट हो गए ह्म्म थोड़ा काम था गगन बोला।जल्दी आया कीजिए मां वेट करती है।गगन देख रहा था दोनो बहुएं मां बाप के आगे पीछे घूम रही है और कहा निशा अंधेरे में पड़ी है उसने सोचा किसी को संस्कार प्यारे और किसी को पैसा वो भी आगे बढ़ अपनी मां की गोद में सिर रख बैठ गया।सब खिलखिलाने लगे और चाय का आनंद लेने लगे।
स्वरचित कहानी
आपकी सखी
खुशी