अनमोल खज़ाना

“राघव, पिछले कुछ दिनों से मेरी कमर और पैरों में बहुत तेज़ दर्द रहता है। सुबह उठते ही चक्कर भी आते हैं,” नीता ने आटा गूंथते हुए बहुत ही धीमी और थकी हुई आवाज़ में अपने पति से कहा।

राघव, जो आईने के सामने खड़े होकर अपनी टाई की गांठ ठीक कर रहा था, बिना मुड़े ही बोला, “अरे तो इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? मौसम बदल रहा है, कोई बाम लगा लो या मेडिकल स्टोर से दर्द की गोली मँगवा लो। सब ठीक हो जाएगा।”

नीता ने एक गहरी सांस ली और हिम्मत जुटाकर कहा, “राघव, मैं सोच रही थी कि बर्तन और झाड़ू-पोछे के लिए किसी कामवाली को रख लूँ। छह लोगों का परिवार है, दिन भर खटते-खटते मेरी हिम्मत जवाब दे जाती है।”

यह सुनते ही राघव के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उसने अपनी कंघी ज़ोर से मेज़ पर पटकी और मुड़कर बोला, “कामवाली? तुम्हें पता भी है आजकल ये कामवालियां कितने नखरे करती हैं और पैसे कितने मांगती हैं? क्या मेरे पास कोई नोट छापने की मशीन लगी है जो हर महीने तीन-चार हज़ार रुपये उस बाई को लुटा दूँ? घर में तुम हो, माँ जी हैं, मिल-जुलकर काम कर लिया करो। वैसे भी घर का काम करने से शरीर चुस्त रहता है। तुम लोगों को तो जिम जाने की ज़रूरत ही नहीं। ये कामवालियों के पैसे बचेंगे, तभी तो बच्चों की एफडी (FD) में काम आएंगे।”

राघव के इन चुभते हुए शब्दों ने नीता के गले में जैसे एक रुलाई का फंदा सा कस दिया। उसने चुपचाप सिर झुकाया और वापस रोटियां बेलने लगी। पिछले चौदह सालों से वह यही सब तो सुनती आ रही थी।

नीता और राघव की शादी को चौदह साल हो चुके थे। घर में राघव के बूढ़े माता-पिता और दो बच्चे थे। राघव स्वभाव से हद दर्जे का कंजूस इंसान था। उसे हर चीज़ में सिर्फ पैसे की बर्बादी नज़र आती थी। जब तक कोई इमरजेंसी न हो, वह डॉक्टर की फीस देने से भी कतराता था। नीता सुबह पांच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक एक कोल्हू के बैल की तरह घर में जुती रहती थी। ससुर जी की सुबह की चाय से लेकर, बच्चों के स्कूल का टिफिन, सास की दवाइयां, राघव के नखरे और घर की साफ-सफाई—सब कुछ नीता के ही कंधों पर था।

नीता के सास-ससुर भी अपने बेटे की ही बोली बोलते थे। वे अक्सर नीता को उसके ‘कर्तव्य’ याद दिलाते रहते, “अरे बहू, हमारे ज़माने में तो औरतें चक्की पीसती थीं, कुएं से पानी लाती थीं। आजकल की बहुओं को तो बस आराम चाहिए।” लेकिन वे यह भूल जाते थे कि मशीन को भी मशीन की तरह चलने के लिए कभी-कभी तेल-पानी और आराम की ज़रूरत होती है, नीता तो फिर भी एक हाड़-मांस की इंसान थी।

दिन बीतते गए। नीता दर्द निवारक गोलियां खाकर घर का सारा बोझ खींचती रही। राघव अपनी ‘बचत’ पर खुश था। उसे लगता था कि उसने अपनी चालाकी से नीता को चुप करा दिया है और हर महीने कामवाली के पैसे बचाकर वह बहुत बड़ा तीर मार रहा है।

लेकिन कुदरत का अपना एक अलग हिसाब होता है। दीवाली का समय नज़दीक था। घर में साफ-सफाई का काम दोगुना हो गया था। जालों को साफ करने और भारी सोफे खिसकाने के दौरान नीता की कमर में कई बार भयंकर टीस उठी, लेकिन उसने उसे अनदेखा कर दिया। एक दोपहर, जब नीता बाथरूम में कपड़ों से भरी भारी बाल्टी उठा रही थी, अचानक उसकी रीढ़ की हड्डी में ऐसा दर्द उठा जैसे किसी ने तेज़ चाकू घोंप दिया हो। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह एक तेज़ चीख के साथ वहीं फर्श पर बेसुध होकर गिर पड़ी।

आवाज़ सुनकर सास-ससुर दौड़े आए। नीता पसीने से लथपथ थी और दर्द से कराह रही थी। पड़ोसियों की मदद से उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। जब राघव ऑफिस से भागता हुआ अस्पताल पहुँचा, तो डॉक्टर ने उसे अपने केबिन में बुला लिया।

डॉक्टर का चेहरा बेहद सख्त था। “मिस्टर राघव, आपकी पत्नी की हालत बहुत नाज़ुक है। उनकी रीढ़ की हड्डी के बीच का गैप खतरनाक स्तर तक कम हो गया है और नसें बुरी तरह दब गई हैं। इसके अलावा उनके शरीर में कैल्शियम और खून की भारी कमी है। वो कुपोषण और भयंकर शारीरिक थकावट का शिकार हैं। क्या आप लोग घर में उनसे मज़दूरों की तरह काम करवाते हैं?”

राघव की बोलती बंद हो गई। उसने हकलाते हुए कहा, “डॉक्टर साहब, वो घर का ही तो काम करती हैं…”

डॉक्टर ने गुस्से से मेज़ पर हाथ मारा, “घर का काम? इंसान की एक क्षमता होती है। उनकी रीढ़ की हड्डी की हालत किसी पैंसठ साल की बूढ़ी औरत जैसी हो गई है। उन्हें तुरंत सर्जरी की ज़रूरत है। सर्जरी और दवाइयों का खर्च करीब तीन से चार लाख रुपये आएगा। और उसके बाद भी उन्हें कम से कम छह महीने तक पूर्ण ‘बेड रेस्ट’ पर रहना होगा। एक बाल्टी तो दूर, वो एक गिलास पानी भी खुद उठकर नहीं ले पाएंगी।”

तीन-चार लाख रुपये और छह महीने का बेड रेस्ट… ये शब्द सुनकर राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वह लड़खड़ाते कदमों से बाहर आया और नीता के वार्ड के शीशे से उसे देखने लगा। नीता को ढेरों ड्रिप लगी थीं और वह दर्द से बेहाल थी। राघव को अचानक अपना वो हिसाब याद आ गया। हर महीने दो हज़ार रुपये बचाने के चक्कर में आज उसने अपनी पत्नी को अस्पताल के बिस्तर पर पहुँचा दिया था, जहाँ चंद दिनों में ही लाखों रुपये पानी की तरह बहने वाले थे।

अगले कुछ दिन राघव के लिए किसी नर्क से कम नहीं थे। नीता अस्पताल में थी और घर की पूरी व्यवस्था चरमरा गई थी। घर में चारों तरफ जूठे बर्तन पड़े थे, बच्चों के कपड़े गंदे थे, और माता-पिता भूख से परेशान थे। राघव को मजबूरन एक नहीं, बल्कि दो फुल-टाइम नौकर रखने पड़े, जो मुँहमांगी कीमत वसूल रहे थे। उस दिन राघव को समझ में आया कि नीता इस घर की मुफ़्त की नौकरानी नहीं, बल्कि इस घर की रीढ़ की हड्डी थी। उसने अपने परिवार के लिए बिना किसी छुट्टी, बिना किसी तनख्वाह के जो कुछ किया, उसकी कीमत दुनिया की कोई दौलत नहीं चुका सकती थी।

सर्जरी के बाद जब नीता को होश आया, तो राघव उसके बिस्तर के पास बैठा रो रहा था। उसने नीता के दोनों हाथ पकड़ लिए और अपने आंसुओं से उन्हें भिगोते हुए बोला, “मुझे माफ कर दो नीता। पैसे के लालच और मेरी घटिया सोच ने मुझे अंधा कर दिया था। मैं बाहर की तिजोरी भरता रहा और मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे घर का सबसे अनमोल खज़ाना अंदर ही अंदर टूट रहा है। अब तुम्हें इस जीवन में कभी कोई काम नहीं करना पड़ेगा। बस तुम ठीक होकर घर लौट आओ।”

नीता ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी आँखों से दो आंसू छलक कर तकिए में समा गए। उसे खुशी थी कि कम से कम इस दर्द ने ही सही, पर उसके पति को एक इंसान होने का असली मतलब तो समझा दिया था।

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