मां आपका सूटकेस तैयार है और आपने अपनी दवाइयां रख ली, लेकिन बेटा हम जा कहां रहे हैं, इतना सामान की क्या जरूरत थी हम तो मंदिर में दर्शन करने को जा रहे थे ना, आज वह तेरे पिताजी की वरसी थी तो मैंने सोचा मंदिर में दर्शन कर ले और वहां गरीबों को कुछ दान पुण्य कर देंगे।
अरे मां चलो तो बताता हूं शिवम सुजाता का सामान डिक्की में रखता हुआ बोला। तभी पीछे से सुजाता की 5 वर्षीय पोती दादी दादी की आवाज लगाती बाहर आ गई। दादी मेरी ड्राइंग देखो कैसी लग रही है बहुत अच्छी है बेटा। मां चलो देर हो रही है। दादी आप कहां जा रही हैं, पापा आप दादी को लेकर कहां जा रहे हैं बस अभी आता हूं
बेटा कह कर शिवम मां को लेकर निकल गया । गाड़ी में वह पूरे समय चुपचाप रहा सुजाता जी शिवम की इस गंभीर चेहरे को देखती रहीं और सोचती रही क्या हो गया है शिवम को।
कुछ दूर चलने के बाद एक मंदिर आया शिवम बोला जाओ मां दर्शन कर आओ, तुम नहीं आओगे शिवम नहीं आप हो आओ। शिवम की इस अप्रत्याशित व्यवहार से आज सुजाता जी कुछ ज्यादा ही सोंच में पड़ गई थी। उन्होंने भगवान के दर्शन किए और वहां बैठे भिखारियों को कुछ पैसे दिए और चुपचाप जाकर गाड़ी में बैठ गई
बैठते ही गाड़ी फिर चल पड़ी और कुछ दूर चलने के बाद एक बड़े से बिल्डिंग के सामने रुकी। शिवम ने कहा उतरे मां और शिवम ने मां का सम्मान निकाला और उसे बिल्डिंग में ले गया मां का सामान रखा और बोला मां अब आपका यह नया ठिकाना है।।
सुजाता जी ने सामने नजर डाली तो लिखा था कल्याणी वृद्ध आश्रम वह उसे लिखे हुए बोर्ड को हतप्रभ देखती रह गई। तभी पीछे से शिवम ने कहा चलता हूं मां और बिना सुजाता जी के जवाब का इंतजार किए गाड़ी में बैठा और निकल गया। कुछ देर तो सुजाता जी वहां खड़ी रहीं वो सोच ही नहीं पा रही थी । कि ये क्या हो गया।वृद्धाश्रम के मैनेजर ने चाबी देकर श्यामू से कहा ले जाओ मैडम का उनका कैमरा दिखाओ।
सुजाता भारी कदमों से कमरे की तरफ बढ़ गई। एक छोटे से कमरे में एक पलंग पड़ा था और कुर्सी मेंज एक अलमारी थी। सामान रखते हुए श्यामू कहा माँ जी आप बैठिये मैं आपके लिए पानी लेकर आता हूं । आप आराम से रहिए आपको कोई परेशानी नहीं होगी । सुजाता जी ने रात का खाना नहीं खाया।
और एक गिलास पानी के साथ अपनी कुछ दवाई ली और लेट गई। लेकिन लेटे लेटे सोचती रहीं ऐसी क्या बात हो गई थी जो शिवम चुपचाप मुझे यहां छोड़ दिया, पहले से कुछ ना बताया ना पूछा । घर में भी इस तरह का कोई लड़ाई झगड़ा नहीं था। हां बहू साक्षी कुछ मुझसे कटी कटी सी रहती थी ,मुझसे बात नहीं करती थी।
साक्षी को किसी काम से कोई मतलब नहीं था। किसी बात को लेकर हम सास बहू की तू तू मै मैं भी नहीं हुई । जो कुछ भी घर में खाने पीने को मिल जाता था खा लेती थी। कभी कोई सवाल नहीं किया। घर का सारा काम मेड ही देखती थी । साक्षी को किसी काम से कोई मतलब नहीं था। और ना ही मैंने कभी बेटे से बहू की कोई शिकायत थी ।
हां मुझे अस्थमा की शिकायत थी जिसकी दवा चल रही थी साक्षी की 5 वर्ष की बेटी मेरे पास खेलती रहती थी लेकिन जब मुझे खांसी आती तो साक्षी बेटी प्रियांशी को हाथ पड़कर कमरे में मिल जाती थी और फिर उसे कमरे में डांट लगाती थी।
3 साल पहले सुजाता जी के पति कृष्णकांत जी का देहांत हो गया था। तबसे सुजाता जी अकेली बेटा बहू के साथ जिंदगी बिता रही थी। बेटा बहु अपनी नौकरी में व्यस्त थे। हां उनकी पोती थी प्रियांशी उसी से मन बहलता था सुजाताका।
और कोई तो बोलने चलने वाला था नहीं घर में बहु बेटे दोनों नौकरी करते और वहां से आते हैं खाते पीते और अपनी कमरे में घुस जाते।
कभी कोई सुजाता जी से नहीं पूछता था कि आपने खाया पिया की नहीं या आपको कुछ चाहिए तो नहीं, या कुछ देर बैठकर बातें ही करें कोई कुछ नहीं। हां सुजाता जी को अस्थमा की प्रॉब्लम थी इसमें खांसी आती थी इस बात को साक्षी बहुत चढ़ती थी। तो उसने अपनी बेटी को संभालने के लिए एक नैनी रख रखी थी और वह मना करती थी कि प्रियांशी को दादी के पास नहीं जाने देना लेकिन प्रियांशी दादी के पास ही भाग कर जाती थी।
प्रियांशी को ड्राइंग बनाने का बहुत शौक था। और वह ड्राइंग बनाकर दादी को दिखाया करती थी। और दादी को खुश होती थी। और प्रियांशी को शाबाशी देती थी। जिसे प्रियांशी खुश होती थी। ऑफिस से लौटने के बाद साक्षी देखती की प्रिंयाशी दादी के पास है तो उसका पारा चढ़ जाता।
वो सुजाता को तो कुछ न कहती। कमरे में जाकर शिवम से बहुत नाराज होती ।और बोलती शिवम इसका कोई रास्ता निकालो नहीं तो अच्छा नहीं होगा। एक दिन हमारी बेटी भी ऐसी बीमारियों की चपेट में होगी। बस मन ही मन शिवम साक्षी ने कुछ देर निश्चय किया और एक अच्छा सा वृद्ध आश्रम खोजने लगे।
और आखिरी उनकी खोज पूरी हुई। और घर में सुजाता से बिना पूछे बिना बताए कोई राय मशवरा किए बगैर सुजाता जी को वृद्धाश्रम मे छोडने का लिए निश्चय किया । विद्याश्रम अच्छा था इसमें अच्छे-अच्छे घरों के लोग और पैसे वाले लोग यहां रहते थे।
दूसरे दिन सुबह मन में एक गहरा दर्द लेकर सुजाता खिड़की के पास खड़ी थी। एक दर्द का सैलाब मन में उमड रहा था और उनकी आंखों से दो बूंद आंसू उनके गालों पर लुढ़क गई। तभी सुजाता जी की नजर बाहर बगीचे में पर गई जहां कुछ पेड़ों की कटिंग कर रहे एक व्यक्ति पर उनकी नजर टिक गई ।
यह तो जाना पहचाना सा शख्स लग रहा है। लेकिन उसकी पीठ सुजाता की तरफ थी। लेकिन तभी उसे व्यक्ति ने जब इस तरफ को मुंह मोड़ा तो सुजाता जी हतप्रभ रह गई अरे यह तो शर्मन है मेरी कॉलेज का सहपाठी । तभी श्यामू चाय लेकर कमरे में रख दिया मैडम चाय । और सुजाता की तंद्रा टूटी वह चाय का कप उठाकर घूंट भरते हुए सरमन को ही देखे जा रही थी
नाश्ते की टेबल पर सभी को नाश्ता के लिए बुलाया गया वहां भी आमने-सामने बैठे सुजाता और शरमन नजर मिली एक दूसरे से दोनों आश्चर्यचकित से एक दूसरे को देख रहे थे। पहचान में कोई गलती तो नहीं हो रही है, आखिर इतना समय बीत गया है जवानी के बाद अब बुढ़ापे में देख रहे हैं दोनों ।
तभी सुजाता ने कहा तुम शरमन होना और तुम सुजाता हो हां ।।40 साल पहले का आकर्षण दोनों को आपस में आप बीती जानने को मजबूर कर दिया नाश्ते के बाद शरमन ने सुजाता के कमरे का दरवाजा खटखटाया कौन, मैं शरमन अंदर आ सकता हूं ,हां क्यों नहीं बैठो सरमन को देखकर सुजाता कुछ क्षण के लिए बच्चों से मिले दर्द को भूल गई।
और कैसे हो सरमन ठीक हूं और तुम कैसी मैं भी ठीक हूं । यहां कैसे सरवन अरे दो बेटे थे दोनों विदेश में सेटल हो गए पत्नी साथ छोड़ गई तो जीवन का अकेलापन दूर करने के लिए यहां आ गया । और तुम यहां और तुम कैसे यहां बस यही कहानी मेरी भी है शरमन अच्छा।
अब रोज बातें होने लगी सुजाता और शरमन की, अपनी अपनी अनकही सुनाने लगे एक दूसरे को। कॉलेज के समय की बातें, बातें ही खत्म न होती थी। सरमन सुजाता को पसंद करता था और शादी करना चाहता था। कॉलेज खत्म होने पर आज कॉलेज में फेयरवेल पार्टी थी।
शरमन सुजाता का प्रपोज करने के लिए एक लाल गुलाब और बालों में लगाने को गजरा लेकर आया था। सुजाता को गजरा बहुत पसंद था अक्सर बालों में लगाया करती थी। हल्की म्यूजिक में कुछ लोग थिरक रहे थे ,तभी सुजाता को तीन-चार लड़कियों ने घेर लिया और पूछने लगी कौन है वह हमें भी बताओ।
तभी सुजाता ने हाथ की इंगेजमेंट रिंग दिखाएं हाथ ऊपर करके और कृष्णकांत नाम है उसका। सरमन के हाथ से वह गुलाब और गजरा हाथ से छूटकर नीचे गिर गया। और टूटे हुए दिल को लेकर पार्टी से चला गया शरमन।
कॉलेज छूटने के बाद दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए। और आज मिले तो उजड़े हुए बगीचे की तरह इस वृद्ध आश्रम में। एक बार फिर से सरमन की मन में प्यार के अंकुर फूटने लगे । अब साथ-साथ घूमने बातें करना बागवानी करना होने लगा दोनों का। ऐसे ही एक दिन शाम की ठंडी हवा चल रही थी और सुजाता को अस्थमा का अटैक आ गया
खांसी से बुरा हाल हो गया। शरमन ने मैनेजर से कहकर डॉक्टर को बुलाया दबा दी इंजेक्शन दिया तब जाकर आराम मिला सुजाता को।सरमन खूब देखभाल की सुजाता की ,सुजाता भी कृतज्ञता व्यक्त करने लगी तभी सरमनका। अरे नहीं सुजाता इस तरह से शरमिदा न करो एक दूसरे का ख्याल रखना हमारा फर्ज बनता है। और फिर हम दोनों अनजान तो नहीं है।
कुछ दिनों बाद सरमन एक गुलाब और गजरा लेकर आया और सुजाता को देते हुए बोला क्या यह तुम्हें स्वीकार है ।हम जवानी में एक ना हो सके तो क्या जीवन के इस मोड़ पर एक दूसरे पर साथ दे सकते हैं क्या।।
इस उम्र में तुम्हें क्या मिलेगा सरमन कुछ नहीं तुम्हारा साथ और कुछ नहीं चाहिए। ठीक है फिर हम शादी कर लेते हैं। शादी के पहले शरमन ने पूछा बच्चों से पूछना है क्या ,नहीं जिन बच्चों ने हमें यहां छोड़ दिया उनसे क्या पूछना तो फिर ठीक है।
एक मंदिर में जाकर दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद सुजाता एक बार अपनी पोती से मिलना चाहती थी। सरमन और सुजाता प्रियांशी की स्कूल गए मिले और उससे साथ एक फोटो खिंचवाई। फिर विद्याश्रम को छोड़कर नए आशियाने को ओर चल दिए।सरमन का अपना घर था जो किराए पर उठा था उसी घर में शरमन और सुजाता आ गए रहने के लिए।सारे दर्द मिट गए जो कभी अपने ही बच्चे मां-बाप को दे जाते है।
प्रियांशी घर आई तो बताया कि पापा आज दादी स्कूल में मिलने आई थी। और एक अंकल भी थे साथ में। अच्छा शिवम सोच मे पड़ गया कि कौन अंकल थे । उसने वृवृद्धाश्रम मे फोन किया तो पता लगा सुजाता और शरमन जो कॉलेज समय पर सहपाठी थे दोनों ने शादी कर ली।
और वृद्ध आश्रम छोड़कर चले गए । और बता दे कि बच्चे पूछे तो हमारा पता उन्हें ना दे । अब जो दर्द शिवम ने मां सुजाता को दिया था इस दर्द से आज उसका मन बोझिल था। बच्चों के इस तरह की व्यवहार से कभी-कभी उन्ही की भाषा में जवाब देना पड़ता है ।
दर्द देने के अधिकारी सिर्फ बच्चे ही नहीं होते मां-बाप भी होते हैं। मां-बाप बच्चों को तभी सजा देते हैं जब यह मजबूर हो जाते हैं । तो प्लीज मां-बाप को ऐसा दर्द ना दे कि वह कुछ कठोर कदम उठाने पर मजबूर हो जाए । कुछ खुशियों के अधिकारी तो माँ बाप भी होते है ना।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
29 जून