सरोज के लिए दिवाली की वह रात खुशियों की रात थी,जब उसका बेटा, बहू और पोती चार वर्ष बाद विदेश से लौटे थे।कब से बेचारी इस घड़ी का इंतजार कर रही थी। कहने को वह भरे-पूरे परिवार में रह रही थी, पर पिछले कई वर्षों से हर दिवाली पर खुद को बहुत अकेला महसूस कर रही थी।
बड़ी जेठानी के बेटे-बहू और बेटी-दामाद आसपास ही रहते थे और छोटी देवरानी की बेटियाँ भी उसी शहर में थीं।त्योहार आते ही सबके बच्चे घर पहुँच जाते और घर में रौनक छा जाती।लेकिन सरोज का बेटा और बहू अच्छी नौकरी और अधिक वेतन के लिए विदेश चले गए थे।उन्हें लगा था कि अधिक पैसा और बेहतर जीवन ही भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा है।
पोती के जन्म के समय सरोज और उसके पति विदेश गए थे और कुछ समय वहाँ रहकर लौट आए थे।उसके बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि कई वर्षों तक बच्चे भारत नहीं आ सके।समय के साथ सरोज और उसके पति त्योहारों पर और अधिक अकेले होते चले गए।
हर दिवाली पर सरोज पूरे परिवार के साथ मिलकर घर की साफ-सफाई करती, पकवान बनाती और सभी के लिए काम करती लेकिन जब दूसरे बच्चों को अपनी-अपनी माँ के साथ हँसते-बोलते देखती तो उसकी आँखें भर आतीं।उसके पति उसे समझाते,पर माँ का मन कहाँ मानता है।
उधर विदेश में बेटा और बहू भी धीरे-धीरे एक अलग तरह के अकेलेपन का अनुभव करने लगे।बड़ी तनख्वाह,सुंदर घर,गाड़ी और सभी सुविधाएँ होते हुए भी त्योहारों के दिनों में घर की याद उन्हें बेचैन कर देती।दिवाली पर जब वे वीडियो कॉल पर सबको साथ देखते तो उनकी आँखें नम हो जातीं।
उन्हें महसूस होने लगा,कि पैसा बहुत कुछ दे सकता है लेकिन अपनों का साथ नहीं।एक दिन सरोज के बेटे रोहन का फोन आया-“माँ, इस बार हम दिवाली पर घर आ रहे हैं।”यह सुनते ही सरोज की खुशी का ठिकाना न रहा।उसने बच्चों के स्वागत की तैयारियाँ शुरू कर दीं।
धनतेरस के दिन बेटा,बहू और चार वर्षीय पोती घर पहुँच गए।कुछ देर बाद पोती भी दादा-दादी से घुल-मिल गई।सरोज बच्चों के लिए चाय नाश्ता बनाने रसोई में गई तो पीछे पीछे उसकी बहु नेहा आ गई और बोली-“अरे माँ,आप बैठो दिवाली की सफाइयां करके थक गई होंगीं।
मैं चाय बनाती हूं।” “तुम बैठो बहु,सफर करके आई हो पहले चाय नाश्ता कर लो।”सरोज बड़े प्यार से बोली।रोहन ने भी पिता का हाथ पकड़कर कहा-“पापा, इन वर्षों में बहुत कुछ कमाया,लेकिन आप लोगों के बिना हर खुशी अधूरी लगती रही।”
सरोज की बहु सबके लिए विदेश से तोहफे लाई थी सो सबको दे दिए।दिनभर सरोज और उसके पति पोती के साथ खेलते रहे।रात को वो जल्दी सो गई।सरोज,उसके पति और बेटे बहु चारों ने रात को खूब जमकर बातें की।बीते चार सालों का कोटा जैसे वो एक दिन में ही पूरा कर लेना चाहते थे।
दिवाली के दिन नेहा और रोहन ने सरोज को ये कहकर बिठा दिया कि,आज आप और पापा बस अपनी पोती को संभालों बाकि का सब काम हम दोनों देख लेंगे।सरोज जिन पलों के लिए चार साल से तरस रही थी मानों वो आज उसे मिल गए थे।घर फिर से हँसी,खिलखिलाहट और अपनेपन से भर गया।
रात को लक्ष्मी पूजन के बाद पूरा परिवार देर तक बैठा बातें करता रहा।तभी रोहन ने सरोज व उसके पति का हाथ पकड़कर कहा-“माँ-पापा,हम विदेश इसलिए गए थे कि ज्यादा पैसा कमा सकें और बेहतर जीवन जी सकें।वहाँ हमें अच्छी तनख्वाह और सारी सुविधाएँ मिलीं, लेकिन हर त्योहार पर हम बहुत अकेला महसूस करते थे।जब भी दिवाली आती,घर का आँगन और आपकी यादें हमें बेचैन कर देती थीं।”
नेहा की आँखें भी नम हो गईं।वो बोली-“माँ, इन वर्षों में हमने समझा है कि बैंक बैलेंस बढ़ सकता है,लेकिन रिश्तों का खालीपन कोई पैसा नहीं भर सकता।असली पूंजी तो अपने लोग और उनका प्यार होता है।”कुछ देर की खामोशी के बाद रोहन बोला-“हमने एक निर्णय लिया है,
कि अब हम विदेश वापस नहीं जाएंगे।यहीं अपने देश में नौकरी ढूँढ़ लेंगे।हो सकता है वहाँ जितनी तनख्वाह न मिले,लेकिन अपने लोगों का साथ तो मिलेगा।हमारी बेटी भी अपने दादा-दादी और परिवार के बीच बड़ी होगी।”बेटे की बात सुनकर सरोज और उसके पति की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।उन्होंने कभी बच्चों पर कोई दबाव नहीं डाला था,लेकिन आज उन्हें लगा कि वर्षों का इंतजार सफल हो गया।दोनों ने रोहन और नेहा को प्यार से गले लगा लिया।
उस दिवाली सरोज के घर केवल दीपक ही नहीं जले थे,बल्कि बिखरते रिश्तों की डोर भी फिर से जुड़ गई थी।उस दिन सभी ने महसूस किया, कि जीवन की सच्ची जमापूंजी बैंक-बैलेंस नहीं,बल्कि वे अनमोल रिश्ते हैं जो सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े रहते हैं।जिनसे स्नेह व अपनापन मिलता है।
यानी रिश्तों की जमा-पूंजी ही वास्तविक पूंजी है।
कमलेश आहूजा