राधिका जब ब्याह कर ‘आनंद भवन’ में आई थी, तो उस घर की भव्यता से ज्यादा वहां के कड़े अनुशासन ने उसे डरा दिया था। शहर के नामी और प्रतिष्ठित ‘शर्मा परिवार’ की बहु होना कोई आसान बात नहीं थी। घर की हर चीज़ घड़ी की सुई के साथ चलती थी। और इस पूरे घर की धुरी थीं उसकी सास, रुक्मिणी देवी। रुक्मिणी जी की छवि पूरे खानदान में एक बेहद सख्त, अनुशासनप्रिय और सलीकेदार महिला की थी। उनके माथे की बिंदी से लेकर साड़ी की प्लीट्स तक, सब कुछ बिल्कुल सटीक होता था। राधिका, जो अपने मायके में एक चुलबुली और थोड़ी लापरवाह लड़की हुआ करती थी, इस नए माहौल में खुद को एक कठपुतली की तरह महसूस करती थी। उसे हर वक्त यही डर सताता रहता कि कहीं उससे कोई ऐसी चूक न हो जाए जिससे उसके मायके की परवरिश पर उंगली उठे।
शादी को अभी बमुश्किल दो महीने ही बीते थे कि घर में कुलदेवी के सालाना पूजन की तैयारियां शुरू हो गईं। यह इस परिवार का सबसे बड़ा आयोजन होता था, जिसमें दूर-दराज़ से सारे रिश्तेदार इकट्ठा होते थे। सबसे ज्यादा खौफ राधिका को अपनी बड़ी ताई-सास (रुक्मिणी जी की जेठानी) का था, जो अपनी नुक्ताचीनी और तीखी ज़बान के लिए पूरे परिवार में कुख्यात थीं।
पूजा से एक दिन पहले घर में गहमागहमी का माहौल था। रुक्मिणी जी ने राधिका को अपने कमरे में बुलाया और एक बेहद खूबसूरत, पुरानी लाल सिल्क की चुनरी उसके हाथों में सौंप दी। उस चुनरी पर सोने और चांदी के तारों का भारी काम था। “राधिका,” रुक्मिणी जी ने गंभीर स्वर में कहा, “यह चुनरी हमारे परिवार की धरोहर है। तीन पीढ़ियों से कुलदेवी को यही चढ़ाई जाती है। कल सुबह की पूजा के लिए इसे निकालकर अच्छे से इस्त्री (प्रेस) कर लो और पूजा की मुख्य थाली सजा कर रख दो। बड़ी ताई जी कल सुबह ही आ जाएंगी और वो सबसे पहले इसी थाली और चुनरी को देखती हैं। ध्यान रखना, कोई कमी न रहे।”
राधिका ने कांपते हाथों से वह भारी चुनरी थाम ली। उस चुनरी का वज़न कपड़ों के वज़न से कहीं ज्यादा, उस घर की परंपराओं का वज़न था। वह चुनरी लेकर अपने कमरे में आ गई। उसने प्रेस का प्लग लगाया और थाली सजाने का सामान निकालने लगी। थाली में कुमकुम, चंदन, अक्षत सजाते हुए उसका ध्यान बार-बार ताई-सास के संभावित तानों की ओर जा रहा था। इसी उधेड़बुन में उसने ध्यान ही नहीं दिया कि इस्त्री का तापमान ज़रूरत से कहीं ज्यादा बढ़ चुका था।
जैसे ही राधिका ने वह गर्म इस्त्री उस पुश्तैनी रेशमी चुनरी के किनारे पर रखी, एक भयानक छन्न सी आवाज़ हुई। और इससे पहले कि राधिका कुछ समझ पाती, रेशम के जलने की एक अजीब सी गंध पूरे कमरे में फैल गई। राधिका ने झटके से इस्त्री हटाई, लेकिन तब तक अनर्थ हो चुका था। उस लाल, सुनहरी चुनरी के बीचों-बीच एक बड़ा सा काला, जला हुआ निशान उभर आया था।
राधिका के हाथ से इस्त्री छूट कर नीचे गिर गई। उसकी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं। आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। यह कोई मामूली कपड़ा नहीं था, यह तीन पीढ़ियों की धरोहर थी। उसे लगा जैसे आज उसका इस घर में आखिरी दिन है। ताई-सास की गूंजती हुई आवाज़ें, अपनी सास की क्रोधित नज़रें और पूरे परिवार के सामने मिलने वाले अपमान का ख्याल आते ही उसके घुटने कांपने लगे। वह ज़मीन पर बैठ गई और उस जली हुई चुनरी को सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह ज़मीन में कैसे समा जाए। वो खुद को कोस रही थी, अपने कांपते हाथों को कोस रही थी।
तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। रुक्मिणी जी गंध महसूस करके कमरे में आ गई थीं।
राधिका की धड़कनें रुक गईं। उसने लाल, सूजी हुई आँखों से अपनी सास की तरफ देखा। उसके होंठ कांप रहे थे, “मां जी… वो… मुझसे… मुझे माफ कर दीजिए… मैं…” राधिका के गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। वो ज़मीन पर सिकुड़ कर बैठ गई, मानो किसी भी पल बरसने वाले कहर के लिए खुद को तैयार कर रही हो।
रुक्मिणी जी ने कमरे में गिरे हुए इस्त्री को देखा, जली हुई चुनरी को देखा और फिर ज़मीन पर बैठी, खौफ से कांपती अपनी नई नवेली बहू को देखा। कमरे में एक पल के लिए ऐसी शांति छा गई जो किसी तूफान के आने से पहले होती है।
लेकिन तूफान नहीं आया।
रुक्मिणी जी बिना एक शब्द कहे आगे बढ़ीं। उन्होंने राधिका के हाथ से वह जली हुई पुश्तैनी चुनरी ली। राधिका ने आँखें मींच लीं। लेकिन रुक्मिणी जी ने उस चुनरी को ऐसे समेटा जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने उस जली हुई चुनरी को अपनी अलमारी के सबसे निचले हिस्से में एक पुराने बक्से के नीचे दबा दिया।
राधिका अवाक होकर यह सब देख रही थी। तभी रुक्मिणी जी ने अपनी अलमारी का दूसरा कोना खोला और वहां से एक बिल्कुल वैसी ही लाल सिल्क की चुनरी निकाली, जिस पर वैसा ही भारी काम था। यह रुक्मिणी जी की अपनी शादी की सबसे खास चुनरी थी, जिसे उन्होंने सालों से सहेज कर रखा था।
उन्होंने वह नई चुनरी राधिका के हाथों में रखते हुए बेहद सामान्य और शांत स्वर में कहा, “रो क्यों रही है पगली? कपड़े ही तो हैं, कभी भी जल सकते हैं। तू बैठ, मैं पानी भिजवाती हूँ तेरे लिए।”
इससे पहले कि राधिका कुछ कह पाती, बाहर दालान में हलचल मच गई। बड़ी ताई-सास आ चुकी थीं और आते ही उनकी तेज़ आवाज़ गूंजने लगी, “अरे ओ रुक्मिणी! कहां है तेरी नई बहू? लाओ ज़रा देखूं क्या तैयारियां की हैं उसने कुलदेवी की पूजा की! जरा मैं भी तो देखूं आजकल की लड़कियों में कितना सलीका है!”
राधिका की जान सूख गई। वह कांपते पैरों से बाहर दालान में आई। उसके हाथों में रुक्मिणी जी की दी हुई वह दूसरी चुनरी और पूजा की थाली थी। बड़ी ताई जी सोफे पर विराजमान थीं। उन्होंने अपनी पैनी नज़रों से राधिका को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर सीधा उसके हाथों में रखी चुनरी पर नज़र गड़ा दी।
“ये चुनरी…” ताई जी ने अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा, “रुक्मिणी! ये वो पुश्तैनी चुनरी तो नहीं लग रही। वो कहां है?”
राधिका के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। वह कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी रुक्मिणी जी रसोई से बाहर आईं और बीच में ही बात काटते हुए मुस्कुरा कर बोलीं, “जी जीजी, आपने बिल्कुल सही पहचाना। वो पुश्तैनी चुनरी मैंने ही बहू को रखने को कह दिया।”
“क्यों?” ताई जी ने तीखे स्वर में पूछा।
“जीजी, वो चुनरी बहुत पुरानी हो गई थी, उसके तार जगह-जगह से कमज़ोर पड़ गए थे। अब हमारी बहू के हाथ इतने पवित्र और शुभ हैं कि मेरे मन ने गवाही ही नहीं दी कि इसके हाथों से देवी मां को कोई पुरानी या उधड़ी हुई चीज़ चढ़ाई जाए। इसीलिए मैंने इसे अपनी वो नई चुनरी दी, जो मैंने आज तक किसी को नहीं ओढ़ाई। नई शुरुआत, नए और पवित्र धागों से ही होनी चाहिए ना?” रुक्मिणी जी ने इतनी सहजता और वात्सल्य से यह बात कही कि ताई जी के चेहरे की कठोरता पल भर में पिघल गई।
ताई जी ने मुस्कुराते हुए राधिका के सिर पर हाथ रखा और बोलीं, “क्या बात है! बहू की थाली सजाने का सलीका भी बहुत अच्छा है। रुक्मिणी, तेरी बहू तो सच में बहुत सुघड़ है। तूने तो इसे आते ही घर के रंग में ढाल लिया।”
राधिका की आँखें भर आईं, लेकिन इस बार ये डर के आंसू नहीं थे, ये कृतज्ञता और प्रेम के आंसू थे। वह सिर झुकाए खड़ी रही।
तभी रुक्मिणी जी ने धीरे से राधिका के कंधे पर हाथ रखा और ताई जी से बोलीं, “जीजी, आप बैठिए मैं आपके लिए अदरक वाली चाय लाती हूँ। और राधिका,” उन्होंने राधिका की तरफ देखकर बड़ी ही कोमलता से कहा, “जा बेटी, तू जाकर अपने कपड़े बदल ले। तुझे कल की तैयारियों के लिए बाज़ार भी जाना है। बाकी काम मैं और तेरी ताई जी मिलकर देख लेंगे।”
राधिका चुपचाप वहां से अपने कमरे में आ गई। उस दिन उसे महसूस हुआ कि जो औरत पूरे घर के लिए इतनी सख्त और अनुशासनप्रिय थी, उसके भीतर एक मां का कितना गहरा और कोमल सागर बह रहा था। रुक्मिणी जी ने न सिर्फ उसे पूरे परिवार के सामने अपमानित होने से बचाया, बल्कि ताई जी के सामने उसका मान भी बढ़ा दिया। उन्होंने राधिका की गलती को एक ताने की तरह इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उसे अपनी खामोशी से हमेशा के लिए सुधार दिया।
वो पल राधिका के जीवन का सबसे बड़ा पाठ था। उस एक घटना ने राधिका के मन से हमेशा के लिए सारा डर निकाल दिया। उसे समझ आ गया था कि इस घर में उसे जज करने वाली एक सख्त सास नहीं, बल्कि गिरने पर उसे थाम लेने वाली एक मां भी है।
आज पच्चीस साल बाद, जब राधिका खुद उस घर की सास बन चुकी है और आत्मविश्वास से पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी संभालती है, तो कभी-कभी पूजा की अलमारी साफ करते हुए जब उसकी नज़र उस पुराने बक्से में रखी उस जली हुई चुनरी पर पड़ती है, तो उसके होंठों पर एक गहरी मुस्कान तैर जाती है। वह आज भी उस जली हुई चुनरी को छूकर अपनी सास के उस अनकहे वात्सल्य को महसूस करती है। क्योंकि वह जानती है कि रिश्ते परफेक्शन से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमियों और गलतियों पर पर्दा डालकर उन्हें प्यार से सुधारने से बनते हैं।
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