शहर के जाने-माने उद्योगपति सेठ दीनदयाल के आलीशान ड्रॉइंग रूम में उनकी इकलौती बेटी काव्या के रिश्ते की बात चल रही थी। काव्या अपने कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी होकर सब सुन रही थी। तभी उसके चाचा, कैलाश ने एक गहरी मुस्कान के साथ दीनदयाल जी से कहा, “हाँ भैया, लड़के के माता-पिता भी खुश होंगे कि अमीर घर की लड़की उनकी बहू बनेगी। ससुराल में हमेशा काव्या की ही चलेगी। उसके रहन-सहन, आदतों या कामकाज पर कोई रोक-टोक नहीं होगी। काम करे या न करे, उसकी मर्जी होगी।”
दीनदयाल जी ने भी गर्व से सिर हिलाया। उनका मानना था कि उनकी बेहिसाब दौलत और रुतबा उनकी बेटी को ससुराल में हर तरह के समझौते से बचा लेगा। काव्या के मन में भी यही बात गहराई तक बैठ गई। उसे लगने लगा कि जिस घर में वह जा रही है, वहाँ के लोग उसकी दौलत के आगे नतमस्तक रहेंगे और उसे किसी भी पारिवारिक ज़िम्मेदारी को निभाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
काव्या की शादी समीर से हो गई। समीर एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और उसका परिवार एक मध्यमवर्गीय, लेकिन बेहद संस्कारी परिवार था। उसकी माँ, सुमित्रा जी, एक बहुत ही सरल और धार्मिक विचारों वाली महिला थीं, जिनका पूरा जीवन अपने परिवार को सहेजने में बीता था।
शादी के बाद जब काव्या अपने ससुराल पहुँची, तो उसने अपने चाचा के उन्हीं शब्दों को अपना ढाल बना लिया। वह सुबह दस बजे से पहले कभी नहीं उठती थी। रसोई में जाना तो दूर, वह पानी का गिलास भी खुद उठकर नहीं लेती थी। उसके कपड़े धोने से लेकर उसके कमरे की सफाई तक का काम सुमित्रा जी ही करती थीं। काव्या को लगता था कि सुमित्रा जी यह सब इसलिए कर रही हैं क्योंकि वे एक अमीर घर की बहू से दबती हैं। जब कभी सुमित्रा जी प्यार से काव्या को घर के किसी काम के लिए टोकतीं, तो काव्या अनसुना कर देती या फिर अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लेती।
मोहल्ले की औरतें सुमित्रा जी को ताने मारने लगीं। “अरे सुमित्रा, कैसी बहू ले आई? दिन भर महारानी की तरह पलंग पर बैठी रहती है और तू बुढ़ापे में नौकरानी बनी हुई है। अमीर बाप की बेटी है, पर संस्कार नाम की कोई चीज़ नहीं है।” काव्या ने कई बार अपने कमरे की खिड़की से ये ताने सुने, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसे अपने पैसों का गुरूर था।
लेकिन एक दिन इस गुरूर की दीवार में एक दरार आ गई।
सर्दियों के दिन थे। समीर किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में पंद्रह दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ था। एक रात अचानक सुमित्रा जी की तबीयत बहुत बिगड़ गई। उन्हें तेज़ बुखार और निमोनिया हो गया। काव्या के ससुर जी भी घबरा गए। काव्या ने अपने फोन से तुरंत एक प्राइवेट नर्स बुक कर दी और बाहर से एक महंगे रेस्टोरेंट से खाना ऑर्डर कर दिया। उसे लगा कि पैसों से हर परेशानी हल की जा सकती है।
लेकिन सुमित्रा जी का शरीर बुखार से तप रहा था। बाहर का मसालेदार खाना वे खा नहीं पाईं और नर्स भी बस दवा देकर एक किनारे बैठ गई। रात के करीब दो बज रहे थे। काव्या को प्यास लगी तो वह अपने कमरे से बाहर आई। उसने देखा कि सुमित्रा जी दर्द से कराह रही हैं और उनके होंठ सूख रहे हैं। ससुर जी थकान के कारण कुर्सी पर ही आंखें मूंदे बैठे थे।
काव्या झिझकते हुए सुमित्रा जी के पास गई। जैसे ही उसने सुमित्रा जी के माथे पर हाथ रखा, सुमित्रा जी ने अपनी तपती हुई हथेलियों से काव्या का हाथ पकड़ लिया। उन्होंने बंद आँखों से ही काव्या के हाथ को अपने गाल से लगाया और भर्राई हुई आवाज़ में बोलीं, “बेटा काव्या, तू क्यों जाग रही है? जा जाकर सो जा। कल सुबह तुझे देर से उठने की आदत है, तेरी नींद खराब हो जाएगी। मैं ठीक हूँ।”
काव्या वहीं सन्न रह गई। जिस सास को उसने महीनों तक सिर्फ इग्नोर किया, जिसके हाथों का बना खाना उसने कई बार नखरे करके छोड़ दिया, वही सास इस भयंकर बीमारी और तकलीफ में भी अपनी नहीं, बल्कि अपनी बहू की नींद की फिक्र कर रही थी। काव्या को याद आए अपने चाचा के वो शब्द कि ‘ससुराल में तुम्हारी चलेगी, कोई रोक-टोक नहीं होगी।’ आज उसे समझ आया कि सुमित्रा जी ने उस पर रोक-टोक इसलिए नहीं लगाई थी क्योंकि वे उसकी दौलत से डरती थीं, बल्कि इसलिए नहीं लगाई थी क्योंकि वे उसे अपनी बेटी की तरह मानती थीं। वे नहीं चाहती थीं कि काव्या को इस नए घर में कोई तकलीफ हो।
उसी रात काव्या को सुमित्रा जी के कमरे के बाहर से आती कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। समीर की बुआ आई हुई थीं और वे सुमित्रा जी से कह रही थीं, “भाभी, तुमने इस लड़की को सिर पर चढ़ा रखा है। पैसा है तो क्या हुआ? घर तो घर की तरह ही चलता है न। इसे कुछ कहोगी नहीं तो ये कभी नहीं सुधरेगी।”
तभी सुमित्रा जी की कमज़ोर लेकिन दृढ़ आवाज़ आई, “दीदी, वो मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। उसने अपने मायके में बहुत लाड़-प्यार देखा है, उसे यहाँ ढलने में थोड़ा वक्त लगेगा। मैं उसे डाँट-डपट कर नहीं, प्यार से इस घर का हिस्सा बनाऊँगी। पैसा आज है, कल नहीं रहेगा, लेकिन अगर मैंने उसका दिल दुखाया, तो वो मेरे बेटे को कभी खुश नहीं रख पाएगी।”
दरवाज़े के पीछे खड़ी काव्या की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसके पिता की दौलत और चाचा का वो घमंड आज सुमित्रा जी के इस निस्वार्थ प्रेम और वात्सल्य के आगे घुटने टेक चुका था। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते पैसों से नहीं, बल्कि जज़्बातों और एक-दूसरे के सम्मान से सींचे जाते हैं।
अगली सुबह जब सुमित्रा जी की आँख खुली, तो उन्होंने देखा कि काव्या उनके सिरहाने बैठी उनके पैरों को गर्म पानी से सेंक रही है। रसोई से ताज़ा बनी खिचड़ी और चाय की महक आ रही थी। काव्या ने अपने महँगे रेशमी कपड़ों की जगह एक साधारण सा सूती सूट पहना हुआ था और उसके सिर पर एक छोटा सा पल्लू था—दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सम्मान के लिए।
काव्या ने चाय का कप सुमित्रा जी की ओर बढ़ाते हुए रोते हुए कहा, “माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी दौलत के नशे में यह भूल गई थी कि एक घर को घर की औरतें बनाती हैं, बैंक बैलेंस नहीं। आज से इस घर में मेरी नहीं, हम दोनों की चलेगी।”
सुमित्रा जी ने काव्या को गले लगा लिया। उस दिन के बाद से काव्या ने कभी अपने मायके की दौलत का गुरूर नहीं किया। उसने साबित कर दिया कि जब इंसान अपना अहंकार छोड़ता है, तभी वह किसी के दिल का असली वारिस बनता है।
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