लगातार तीसरा साल था जब निहारिका और उसके पति सार्थक ने दिवाली पर अपने घर, लखनऊ न जाने का फैसला किया था। कारण हर बार की तरह इस बार भी बहुत ‘प्रैक्टिकल’ थे—सार्थक का एक जरूरी प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था, निहारिका को ऑफिस से सिर्फ दो दिन की छुट्टी मिली थी, और दोनों ने अगले महीने अपनी एनिवर्सरी पर मालदीव जाने के लिए अपनी छुट्टियां बचा रखी थीं।
उन्होंने अपने माता-पिता को फोन पर समझा दिया था कि इस बार भी उनका आना मुमकिन नहीं होगा। उधर से भी वही सधी हुई और समझौता वादी आवाज़ आई थी, “कोई बात नहीं बेटा, काम ज़्यादा ज़रूरी है। तुम लोग जहाँ रहो, बस खुश रहो।” निहारिका ने फोन तो रख दिया था, लेकिन उसे पता था कि उस “कोई बात नहीं” के पीछे कितनी गहरी उदासी छिपी थी।
छोटी दिवाली की रात निहारिका और सार्थक अपने दोस्तों के साथ एक बहुत बड़ी कॉर्पोरेट पार्टी में गए थे। वहां डीजे की तेज़ आवाज़ थी, तरह-तरह के पकवान थे, लोग महँगे कपड़ों में तस्वीरें खिंचवा रहे थे, लेकिन निहारिका को उस भीड़ में भी घुटन महसूस हो रही थी। उसे बार-बार अपने बचपन की दिवाली याद आ रही थी। वो घर के आँगन में रंगोली बनाना, गेंदे के फूलों से दरवाज़े को सजाना, और सबसे बढ़कर—पूरे परिवार का एक साथ बैठकर पूजा करना और फिर छतों पर दीये रखना। वो मिट्टी के दीयों में सरसों के तेल की महक, जो दुनिया के किसी महँगे परफ्यूम में नहीं मिल सकती थी।
अगली सुबह, दिवाली के दिन निहारिका देर से सोकर उठी। सार्थक अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। तभी डोरबेल बजी। निहारिका ने दरवाज़ा खोला तो सामने कूरियर वाला एक पार्सल लिए खड़ा था। निहारिका ने अचरज से पार्सल लिया क्योंकि उसने कुछ ऑर्डर नहीं किया था। जब उसने बॉक्स खोला तो उसकी आँखें भर आईं। वह पार्सल उसकी माँ ने लखनऊ से भेजा था।
उस छोटे से डिब्बे में घर की बनी हुई बेसन की बर्फी, घर के शुद्ध घी की महक लिए कुछ गुझिया और रुई की बत्तियों के साथ दो छोटे-छोटे मिट्टी के दीये रखे थे। डिब्बे के अंदर एक मुड़ा हुआ कागज़ था जिस पर माँ की कांपती लिखाई में लिखा था— “निहारिका बेटा, मुझे पता है तुम दोनों वहां बहुत व्यस्त हो। मैंने ये दीये और तुम्हारी पसंद की मिठाई भेजी है। आज शाम जब तुम अपनी बालकनी में ये दो दीये जलाओगी, तो मैं और तुम्हारे पापा यही समझेंगे कि हमारे बच्चे हमारे आँगन में ही खड़े हैं। तुम्हारी बहुत याद आती है। शुभ दीपावली।”
उस छोटी सी चिट्ठी ने निहारिका के अंदर के उस कठोर आवरण को चकनाचूर कर दिया जो उसने अपनी कॉर्पोरेट ज़िंदगी में ओढ़ रखा था। उसके हाथों से वह कागज़ छूटकर गिर गया और वह फूट-फूट कर रोने लगी। सार्थक, जो अंदर से यह सब देख रहा था, दौड़कर बाहर आया। उसने चिट्ठी पढ़ी और उसके भी गले में जैसे कुछ अटक गया। वह भी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था और अपनी महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में वह यह भूल गया था कि उसके बूढ़े माँ-बाप उस खाली घर में किस तरह त्योहार मनाते होंगे।
निहारिका ने आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ सार्थक की तरफ देखा और बोली, “सार्थक, हम यहाँ इन महँगी लाइट्स के बीच भी अंधेरे में हैं। असली रोशनी तो वहाँ है जहाँ हमारे अपने हैं। मुझे इस कंक्रीट के जंगल में दिवाली नहीं मनानी। मुझे अपने घर जाना है।”
सार्थक ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा। उसने अपना लैपटॉप बंद किया और कहा, “जल्दी से बैग तैयार करो निहारिका। अगर हम अभी एक्सप्रेसवे से निकलेंगे, तो शाम की पूजा तक लखनऊ पहुँच जाएंगे।”
दोनों ने झटपट अपना सामान बांधा और गाड़ी लेकर निकल पड़े। वह सफर दोनों के लिए किसी तपस्या से कम नहीं था। रास्ते भर दोनों के मन में बस एक ही तस्वीर घूम रही थी—उनके माता-पिता का वो इंतज़ार भरा चेहरा। लगभग आठ घंटे की लगातार ड्राइविंग के बाद, जब सूरज ढल चुका था और आसमान में आतिशबाजी शुरू हो चुकी थी, उनकी गाड़ी लखनऊ के उस पुराने पुश्तैनी घर के सामने आकर रुकी।
घर के बाहर गेंदे के फूलों की लड़ी लगी थी, लेकिन दीये बहुत कम जले थे। मानो घर भी अपने बच्चों के बिना उदास हो। निहारिका और सार्थक ने दबे पाँव दरवाज़े की कुंडी खटखटाई।
कुछ पलों बाद दरवाज़ा खुला। सामने निहारिका के पिता खड़े थे। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। अपने सामने अपनी बेटी और दामाद को खड़ा देखकर वे बुत बनकर रह गए। उनके मुंह से आवाज़ तक नहीं निकली।
“हैप्पी दिवाली पापा!” निहारिका रोते हुए उनके गले लग गई।
आवाज़ सुनकर अंदर से माँ भी दौड़ती हुई आईं। अपने बच्चों को आँगन में खड़ा देख उनके आंसुओं का बांध टूट गया। जो घर कुछ पल पहले एक अजीब से सन्नाटे में डूबा था, वह अचानक खुशियों, हंसी और आंसुओं के एक खूबसूरत समंदर में बदल गया। माँ ने तुरंत दौड़कर रसोई से उनकी पसंद का खाना निकालना शुरू कर दिया। पिता के चेहरे पर जो चमक आई, वह दुनिया की किसी भी लाइट से ज्यादा रोशन थी।
उस रात निहारिका ने अपने हाथों से पूरे घर में दीये जलाए। आँगन में बैठकर जब चारों ने एक साथ पूजा की और हँसी-मज़ाक करते हुए खाना खाया, तो निहारिका को महसूस हुआ कि पिछले तीन सालों से उसने कितनी बड़ी चीज़ खो दी थी। उसे समझ आ गया कि बड़े शहरों की वो दिखावटी पार्टियां और वो महँगे तोहफे उस सुकून के आगे कुछ भी नहीं हैं, जो अपने परिवार के साथ ज़मीन पर बैठकर खाना खाने में मिलता है।
रात को जब सब सोने चले गए, तो निहारिका अपनी छत पर खड़ी होकर आसमान में फूटते हुए पटाखों को देख रही थी। उसके होठों पर एक बहुत ही गहरी और संतुष्ट मुस्कान थी। उसने आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन एक बहुत दृढ़ संकल्प लिया कि अब चाहे जो भी हो जाए, वह अपनी ज़िंदगी का हर छोटा-बड़ा त्यौहार अपने पूरे परिवार के साथ ही मनाएगी। क्योंकि उसने यह गहराई से महसूस कर लिया था कि त्यौहार की जो असली खुशी, जो गर्माहट और जो सुकून है, वह सिर्फ और सिर्फ अपनों के साथ ही होता है।
क्या आपको भी लगता है कि काम और करियर की दौड़ में हम अपने माता-पिता और उन त्योहारों की असली मिठास को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? इस दीवाली आप अपने परिवार के साथ हैं या उनसे दूर? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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