रघुनाथ जी एक सप्ताह के बाद अपने छोटे भाई के घर से तीर्थयात्रा पूरी करके वापस लौटे थे। शहर के सबसे पॉश इलाके में बना उनका यह आलीशान दो मंजिला घर, उनकी ज़िंदगी भर की खून-पसीने की कमाई का जीता-जागता सबूत था। हाल ही में उनके बेटे मोहित और बहू शिखा ने घर के निचले हिस्से का ‘रिनोवेशन’ यानी नवीनीकरण करवाया था। सफर की थकान से चूर रघुनाथ जी जैसे ही अपने घर के मुख्य दरवाज़े से अंदर दाखिल हुए, उनकी नज़रें सीधे ड्राइंग रूम की उस मुख्य दीवार पर गईं, जहाँ पिछले बीस सालों से उनकी स्वर्गीय पत्नी सुमित्रा की एक बड़ी सी तस्वीर टंगी रहती थी। चंदन की लकड़ी के फ्रेम में जड़ी सुमित्रा की वह मुस्कुराती हुई तस्वीर, रघुनाथ जी के लिए महज़ एक फोटो नहीं, बल्कि पूरे घर की आत्मा थी।
लेकिन आज वह दीवार खाली थी, या यों कहें कि उस दीवार पर सुमित्रा की तस्वीर की जगह धातु और कांच से बनी एक अजीब सी ‘मॉडर्न आर्ट’ की पेंटिंग लटक रही थी।
रघुनाथ जी के हाथ से उनके सफर का बैग वहीं फर्श पर छूट गया। उनका दिल ज़ोर से धड़कने लगा और आँखों में एक अनजाना सा खौफ और गुस्सा तैर गया। उन्होंने अपनी पूरी आवाज़ खींचते हुए पुकारा, “मोहित! शिखा! कहाँ हो तुम दोनों? बाहर आओ!”
आवाज़ में इतनी तल्खी थी कि मोहित और शिखा अपने कमरे से भागते हुए बाहर आए। रघुनाथ जी की उंगली उस नई पेंटिंग की तरफ तनी हुई थी। उनके होंठ कांप रहे थे। “तुम्हारी माँ की तस्वीर कहाँ है मोहित? वह तस्वीर जो कल तक इस दीवार का गुरूर थी, आज कहाँ है?”
मोहित थोड़ा सकपका गया। उसने शिखा की तरफ देखा और फिर नज़रें चुराते हुए धीमे स्वर में बोला, “पिताजी, आप शांत हो जाइए। वो… वो तस्वीर हमने हटा दी है।”
“हटा दी? क्यों हटा दी?” रघुनाथ जी का स्वर अब क्रोध से कांप रहा था।
इस बार शिखा ने आगे बढ़कर सफाई देने की कोशिश की, “बाबूजी, आप तो जानते हैं हमने घर का इंटीरियर डिज़ाइन बदलवाया है। डिज़ाइनर ने कहा था कि इटैलियन मार्बल और इस ‘कंटेंपरेरी थीम’ के साथ वो पुराने लकड़ी के फ्रेम वाली तस्वीर बिल्कुल मैच नहीं कर रही थी। वो बहुत ‘आउटडेटेड’ और पुरानी लग रही थी। हमारे घर में इतने बड़े-बड़े मेहमान आते हैं, वो तस्वीर पूरे घर के लुक को खराब कर रही थी। इसलिए हमने उसे सुरक्षित तरीके से ऊपर स्टोर रूम में रखवा दिया है और उसकी जगह यह लाखों की पेंटिंग लगाई है।”
‘आउटडेटेड… पुरानी… लुक खराब कर रही थी…’ ये शब्द रघुनाथ जी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गए। उन्होंने एक गहरी, ठंडी सांस ली। उनकी आँखों के कोर भीग चुके थे, लेकिन चेहरे पर एक ऐसा कठोर भाव था जिसने मोहित और शिखा को अंदर तक कंपा दिया।
“आउटडेटेड हो गई थी? मैच नहीं कर रही थी?” रघुनाथ जी ने एक व्यंग्यात्मक और दर्द भरी हँसी हँसी। “अरे मूर्खों, इस घर की तो हर ईंट, हर पत्थर पुराना है, जिसमें तुम्हारी माँ के पसीने की महक और उसके बलिदान की कहानी दबी हुई है। अगर उसे हटाना था, तो इस पूरी इमारत को ही क्यों नहीं गिरा दिया?”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। शिखा ने कुछ कहना चाहा लेकिन रघुनाथ जी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“तुम्हें यह घर, यह सोफा, यह इटैलियन मार्बल आज बहुत कीमती लग रहा है ना? लेकिन तुम दोनों को शायद वो दिन याद नहीं, जब मोहित तुम सिर्फ पांच साल के थे। मेरी फैक्ट्री में ताला लग गया था और हमारे पास दो वक्त की रोटी के पैसे नहीं थे। हम एक छोटे से सीलन भरे कमरे में रहते थे। तब तुम्हारी इस ‘आउटडेटेड’ माँ ने अपने सुहाग के गहने, अपने हाथों के कंगन और मंगलसूत्र तक चुपचाप बेच दिए थे, ताकि मैं अपना छोटा सा व्यापार शुरू कर सकूं और तुम्हारी स्कूल की फीस भरी जा सके।”
रघुनाथ जी की आँखों से अब आँसू गालों पर बहने लगे थे। “मोहित, तुमने आज जो ये महंगे कपड़े पहने हैं ना, ये इसलिए पहन पा रहे हो क्योंकि तुम्हारी माँ ने सालों तक फटी हुई साड़ियों में पैबंद लगाकर अपनी जवानी गुज़ार दी। उसने कभी अपने लिए एक नई चप्पल नहीं खरीदी, ताकि तुम्हें ब्रांडेड जूते पहना सके। जब तुम रात को एयर कंडीशनर में सोते हो, तो याद रखना कि तुम्हारी माँ ने सालों तक बिना गद्दे की चारपाई पर अपनी कमर तोड़ी है। अगर वो सुमित्रा मेरे जीवन में न होती, तो ये रघुनाथ आज किसी सड़क किनारे ठोकरें खा रहा होता। और आज, जब उसके त्याग की बदौलत तुम इस मुकाम पर पहुँच गए हो, तो तुम्हें उसकी तस्वीर अपने ‘इंटीरियर’ में एक धब्बा लगने लगी?”
मोहित का सिर शर्म से झुक गया था। शिखा की आँखों से भी पश्चाताप के आँसू बहने लगे थे। उन्हें अपनी गलती की भयानकता का एहसास हो रहा था।
रघुनाथ जी ने किसी के कुछ कहने का इंतज़ार नहीं किया। वे भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर स्टोर रूम की तरफ गए। कुछ देर बाद जब वे नीचे लौटे, तो उनके हाथों में सुमित्रा की वह तस्वीर थी। तस्वीर पर लगी धूल को वे अपने कुर्ते की आस्तीन से साफ कर रहे थे, जैसे किसी जीवित इंसान के माथे से पसीना पोंछ रहे हों।
वे सीधे उस दीवार के पास गए, अपने ही हाथों से उस महंगी मॉडर्न आर्ट की पेंटिंग को उतारा और ज़मीन पर रख दिया। फिर उन्होंने सुमित्रा की तस्वीर को वापस उसकी जगह पर टांग दिया। तस्वीर को सीधा करते हुए वे मुड़े और दोनों से बोले, “यह घर, यह दीवारें और मेरी ज़िंदगी का हर एक कोना सुमित्रा से शुरू होता है और उसी पर खत्म होता है। इस घर का ‘इंटीरियर’ मेरी पत्नी के सम्मान से है। जिसे यह तस्वीर आउटडेटेड लगती है, वो इस घर से अपना सामान बांधकर जाने के लिए स्वतंत्र है।”
मोहित दौड़कर अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी। मैं सच में अंधा हो गया था। मुझे नहीं पता कि मैंने यह पाप कैसे कर दिया। यह तस्वीर अब यहाँ से कभी नहीं हटेगी।” शिखा ने भी रोते हुए हाथ जोड़ लिए।
रघुनाथ जी ने अपने बेटे को उठाया नहीं, बस मुड़कर सुमित्रा की तस्वीर की ओर देखने लगे। तस्वीर में सुमित्रा की वही जानी-पहचानी मुस्कान थी, जो आज फिर से उस घर को अपने आगोश में ले रही थी। मॉडर्न आर्ट ज़मीन पर पड़ा था, और प्यार, त्याग और स्मृतियों का वह पुराना फ्रेम फिर से घर की धड़कन बन गया था।
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क्या आप भी मानते हैं कि बुजुर्गों और माता-पिता की यादें किसी भी महंगे इंटीरियर डिज़ाइन से कहीं ज़्यादा कीमती होती हैं? आपके घर में ऐसी कौन सी पुरानी चीज़ है जो आपके दिल के सबसे करीब है?
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